स्मृतियों के राज प्रसाद में अठखेलियां करता मेरा गांव बेनीपट्टी

आलोक कुमार, आईपीएस

स्मृतियों के राज प्रसाद में सबसे खास जगह उस मिट्टी की होती है जिसकी गोद में खेल कर हम पले-बढ़े होते हैं। मेरा गांव बेनीपट्टी की मिट्टी की सोंधी खुशबू, उस देश में पूरब के ललचाउ आसमान में उगले सूरज देवता, नीरव आसमान पर तिरते बादलों से लुकाछिपी करता चांद, और मादक चांदनी में धीरे ठंडी हवा का छू जाना। वो ऋृतु परिवर्तन के साथ रंग बदलती धूप, वो बारिश में पानी की रेले पर अठखेलियों करती कागज की कश्ती। उम्र के किसी भी पड़ाव पर जब आप यादों की खिड़की खोलेंगे तो हमेशा ही ये गंध, ये खुशबू, ये चित्र चुपके से आपके बगल में आकर बैठ जाएंगे और तब तक आपका साथ नहीं छोड़ेंगे जब तक आप स्वीकार न कर लें कि आपका अस्तित्व, आपका व्यक्तित्व सिर्फ इन यादों का कोलाज भर है।

यही वजह है कि वतन की मिट्टी जैसी कोई सोंधी मिट्टी नहीं और वतन की चिट्ठी जैसी प्यारी कोई चिट्ठी जैसी प्यारी कोई चिट्ठी नहीं। कौन है वो शख्स जिसमें गांव लौटने कि कसक नहीं। ” कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन”… किशोर दा जब यह गा रहे होते हैं तो वो एक यूनिवर्सल टीस बयान कर रहे होते है। बीते हुए दिन, वो प्यारे पल छिन।                                            …………….मेरा गांव बेनीपट्टी

 

मेरा गांव मिथिलांचल में है, मिथिलांचल के हृदय स्थल मधुबनी जिले में, बेनीपट्टी। वैसे तो मेरा जन्म बेगूसराय की बड़ी आईघू में हुआ था,यानी मेरा पैतृक गांव, पर वहां तो बस गर्मी की छुट्टियों में जाना होता था। लेकिन रहते थे हमलोग बेनीपट्टी में। मेरे पिताजी बेनीपट्टी उच्च विद्यालय में शिक्षक थे। 23 साल तक हमारा परिवार बेनीपट्टी में रहा। बचपन वहीं बीता।

बेनीपट्टी मधुबनी सी 25 किलोमीटर पश्चिम मधुबनी से सीतामढ़ी जाने वाली सड़क पर स्थित है। 1980 में प्रखंड से अनुमंडल बनाया गया। मुझे याद है कि तत्कालिन मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा उद्घाटन के लिए आये थे। एक जनसभा हाई स्कूल के प्रांगण में आयोजित हुई थी, पर उससे ज्यादा उत्सुकता लोगों में थी प्रचार निदेशालय द्वारा दिखायी जाने वाली उन दो फिल्मों को लेकर जो हाई स्कूल के प्रांगण में जनसभा से पहले लगातार दो रातों को दिखाई गई थी। एक विशाल प्रोजेक्टर के माध्यम से ह्वाईट स्क्रीन पर दिखाई गई ये फिल्म थी, राजकपूर नर्गिस की आवारा और दिलिप कुमार मधुबाला की गंगा यमुना।  लोगों को बैठने के लिए दरियां बिछाई गई थी। पापा हम लोगों को ले तो गए थे मूवी दिखाने के लिए। आवारा तो मुझे बिल्कुल समझ नहीं आई। हाई स्कूल के खुले ग्रांउड में आॅडियो नहीं आ रहा था। गंगा यमुना में वैजयंती माला का डांस शुरू होते ही हमें घर वापस ले जाया गया और बताया गया कि फिल्में बेकार होती और इनमें कुछ अच्छा नहीं दिखाया जाता और इस तरह से अनुमंडल का उद्घाटन हो गया।                                                       … मेरा गांव बेनीपट्टी

इस दौरान हमलोग बेनीपट्टी मेन रोड पर स्थित तिरपित बाबू के मकान में रहा करते थे। इस मकान के आधे हिस्से में हमलोग रहते थे और आधे में उच्च विद्यालय के ही शिक्षक मल्लिक जी अपने परिवार के साथ। बेनीपट्टी की सबसे पुरानी याद है रामाशीष की बर्फ फैक्ट्री की बर्फ जिसे आप दिल्ली में चुस्की बोलते हैं। पड़ोस में होने के कारण हम कभी भी रंग बिरंगी वर्फ से भरी उस फैक्ट्री 10 पैसे की एक बर्फ ले लेते थे। रामाशीष की बर्फ फैक्ट्री के बाहर बीजू आम का एक पुराना पेड़ था और उस पेड़ के नीचे था एक चापाकल यानी हैंड पंप। साल 1980 में जब हमारे आंगन में हैंड पंप लगा तबतक हमलोग इसी हैंड पंप से पानी लिया करते थे। तब गांव में पानी का स्रोत या तो तालाब या तो कुएं थे या हैंड पंप। हमें याद है कि गर्मियों की दोपहरी में हैंडपंप से कैसा शीतल, सुस्वादू पानी आता था। उसे पीकर आत्मा तृप्त हो उठती थी। गर्मियों की दोपहर किसी मेहमान का स्वागत इस तरह का शीतल जल में रूआफ्जा की शर्बत से किया जाता थ। हमारे हैंड पंप का पानी खास तौर पर अपने मीठे पानी लिए जाना जाता था।                                                                         …..  मेरा गांव बेनीपट्टी

अनुमंडल मुख्यालय होने के बावजूद उस समय का बेनीपट्टी पूरी तरह से गांव ही कही जा सकता है। एक पतली सी सड़क जो ज्यादातर वीरान और खाली लेटी रहती थी। उदास तो यह बस गर्मी की तपती दुपहरी में होती थी, पर वीरान सालों भर। इक्का-दुक्का साईकिल या रिक्शा या मोटर साईकिल के अलावा और कोई ट्रैफिक नहीं था तब। लोग पैदल ही चलते। 10-15 किलोमीटर पैदल ही चले जाना कोई बड़ी बात नहीं थी। हां, मधुबनी से सीतामढ़ी के बीच कुल तीन बसें चलती थी जिनका नाम सतबजिया, नौ बजिया और तीन बजिया वक्त के हिसाब से पुकारा जाता था। बहुत बाद में कुछ बसें बासोपट्टी और दरभंगा के लिए भी चलनी शुरू हुई।
स्काई लैब की यादें शायद ही किसी ने भूली होंगी। 1979 में सारी दुनिया इस बात को लेकर परेशान थी कि स्काई लैब कहां गिरेगा और इससे क्या नुकसान हो। बेनीपट्टी भी इस बात को लेकर परेशान थी कि कहीं बेनीपट्टी में ना आ गिरे। लेकिन सौभाग्य से स्काई लैब ने गिरने के लिए आस्ट्रेलिया चुना। हमसे और हमारी बेनीपट्टी से हजारों किलोमीटर दूर।
फिर 1980 में हमारे घर के सामने से गुजरने वाली उस वीरान सड़क को चौड़ा करने का फैसला हुआ और काम भी शुरू हुआ। कुछ दिनो के लिए खुदाई और धूल मिट्टी से परेशानी हुई। हम तब सड़क चौड़ीकरण के आर्थिक पहलू से कोई मतलब नहीं था। हमें तो सड़क के काम के लिए पड़े चकमक पत्थरों से रात के वक्त चिंगारी पैदा करने में मजा आता था।                                     …….  मेरा गांव बेनीपट्टी

हां, चिंगारी से याद आया जुगनू। हमारे घर के ठीक पीछे एक छोटा तालाब सा था जो चारों ओर से झाड़ियों और अंडी पौधों से घिरा था। यह मेढ़कों और कई किस्म की सांपों का आम आवास था। यह मेढ़कों और कई किस्म के सांपो का आम आवास था। ये सांप अक्सर हमारे घर दर्शन देने आते थे। सावन भादो के मौसम में आसपास के सारे गड्ढे पानी से लबालब भर जाते और रात—रात भर इनमें मेढ़क टर्र-​टर्र टर्राते रहते। रात में चारों तरफ झिलमिलाते जुगनुओं से सजा वातावरण। लगता जैसे आसमान से नक्षत्र धरती पर वर्षा देवी का गान सुनाने उतर आये हों। मन कितना अह्ललाद से भर उठता था प्रकृति के इस अप्रतिम वरदान पर। अब ना तो वैसी रातें ना है वैसे जुगनू।
किसी भी जगह की जैव विविधता कितने प्राकृतिक स्वरूप में है, इसका निर्णय वहां जुगनू, मेढ़क, तितली और केंचुए की जनसंख्या से आसानी से किया जा सकता है। सारे जीव जंतुओं के निवास स्थान तो इंसान ने हड़प लिए। वो बेचारे जायें तो जायें कहां। हमने तालाब पाट दिए, जंगल काट दिए, नदियों की पाट में घर बना लिए। हमें रहने के लिए घर चाहिए, अन्न उगाने को खेत, लाखों हाथों को काम देने के लिए कारखाने। हमी हम रहेंगे धरती पर, बाकी जायें तेल लेने, फिर हम शहर में आहें भरते हैं कि काश वो दिन लौट आते। विकास की जिस प्रतिस्पर्धा में इंसान ने धरती के हर संसाधन पर पहला हक अपना जता दिया। पर प्रकृती के विशाल मशीन को संतुलन बनाने के लिए तो तालाब, जंगल, नदियां टर्राते मेढ़क, रंग बिरंगी तितली, लिजलिजाते केंचुए और झिलमिलाते जुगनू सभी चाहिए। इनके न होने का अर्थ हमें शायद आधा भी समझ नहीं आया। अभी तो इस धरती पर इंसानों की सरकार है। हम इंसानों की सरकार तो जीव जंतुओं और पर पेड़े पौधों की लिए एकाध कानून बना कर करूणामय होने का दावा भले ही कर लें, पर यह जनतांत्रिक तो कदापी नहीं है। ….मेरा गांव बेनीपट्टी
फिर 1980 में हमारे घर के सामने से गुजरने वाली उस वीरान सड़क को चौड़ा करने का फैसला हुआ और काम भी शुरू हुआ। कुछ दिनो के लिए खुदाई और धूल मिट्टी से परेशानी हुई। हम तब सड़क चौड़ीकरण के आर्थिक पहलू से कोई मतलब नहीं था। हमें तो सड़क के काम के लिए पड़े चकमक पत्थरों से रात के वक्त चिंगारी पैदा करने में मजा आता था।

हां, चिंगारी से याद आया जुगनू। हमारे घर के ठीक पीछे एक छोटा तालाब सा था जो चारों ओर से झाड़ियों और अंडी पौधों से घिरा था। यह मेढ़कों और कई किस्म की सांपों का आम आवास था। यह मेढ़कों और कई किस्म के सांपो का आम आवास था। ये सांप अक्सर हमारे घर दर्शन देने आते थे। सावन भादो के मौसम में आसपास के सारे गड्ढे पानी से लबालब भर जाते और रात—रात भर इनमें मेढ़क टर्राते रहते। रात में चारों तरफ झिलमिलाते जुगनुओं से सजा वातावरण। ऐसा लगता जैसे आसमान से नक्षत्र धरती पर वर्षा देवी का गान सुनाने उतर आये हों। मन कितना अह्ललाद से भर उठता था प्रकृति के इस अप्रतिम वरदान पर। अब ना तो वैसी रातें ना है वैसे जुगनू।
किसी भी जगह की जैव विविधता कितने प्राकृतिक स्वरूप में है, इसका निर्णय वहां जुगनू, मेढ़क, तितली और केंचुए की जनसंख्या से आसानी से किया जा सकता है। सारे जीव जंतुओं के निवास स्थान तो इंसान ने हड़प लिए। वो बेचारे जायें तो जायें कहां। हमने तालाब पाट दिए, जंगल काट दिए, नदियों की पाट में घर बना लिए। हमें रहने के लिए घर चाहिए, अन्न उगाने को खेत, लाखों हाथों को काम देने के लिए फैक्र्टिज। हमी हम रहेंगे धरती पर, बाकी जायें तेल लेने, फिर हम शहर में आहें भरते हैं कि काश वो दिन लौट आते। विकास की जिस प्रतिस्पद्र्धा में इंसान ने धरती के हर संसाधन पर पहला हक अपना जता दिया। पर प्रकृती के विशाल मशीन को संतुलन बनाने के लिए तो तालाब, जंगल, नदियां टर्राते मेढ़क, रंग बिरंगी तितली, लिजलिजाते केंचुए और झिलमिलाते जुगनू सभी चाहिए। इनके न होने का अर्थ हमें शायद आधा भी समझ नहीं आया। अभी तो इस धरती पर इंसानों की सरकार है। हम इंसानों की सरकार तो जीव जंतुओं और पर पेड़े पौधों की लिए एकाध कानून बना कर करूणामय होने का दावा भले ही कर लें, पर यह जनतांत्रिक तो नहीं।                ….मेरा गांव बेनीपट्टी
बिहार के गांवों की बात सांपों के बिना तो अधूरी रहेगी। आज शहर में एक सांप निकल आये तो अखबार में छप जाता है कि फलां कॉलोनी में फलां के घर सांप निकल आया। अगर तब अखबार में सर्प दर्शन की खबर छपती तो बाकी किसी और खबर के लिए जगह ही नहीं बचती। दो चार सर्प परिवार तो हर घर में आराम से रहते थे।

हमारे घर के बाहर वाले आंगन में हरहरा सांप का परिवार रहता था जो दिन में निकलता था और शाम ढ़लने से पहले अपने बिल में वापस चला जाता। हरहरा एक विषविहीन सांप है जिसकी पूंछ पकड़ कर नाचने का कौशल गांव का हर बच्चा दशेक साल की उम्र तक हासिल कर लेता है। पीछे की आंगन की तरफ रहता था वाईपर का एक जोड़ा। ये शाम ढ़ले निकलते थे, इसलिए पीछे के आंगन में टार्च के बिना अंधेरे में जाना जीवन दांव पर लगाने जैसा था। एक दिन पीछे के आंगन में स्पांज बॉल से क्रिकेट खेली जा रही थी। तब तक टेनिस बॉल का प्रार्दुभाव नहीं हुआ था। एक शानदार कवर ड्राईव की नतीजे में बॉल एक टूटी हुई सुराही के अवशेष में जा गिरी। बॉल निकालने जैसे ही सुराही में हांथ डालने वाला था कि एक काला करैत को देखकर बरबश पीछे हट गया। सुराही को डंडे से हिलाने से करैत पीछे की तालाब की ओर निकल भागा। दीवारों की फांक में या खपरैल की छप्पर में सांप की केंचुल अक्सर दिखती रहती थी। धामिन और नाग देवता भी यहां वहां दिखते रहते।                                                                                                                     …… मेरा गांव बेनीपट्टी

सर्प की कहानी तफ्शील से इसलिए कही गई जिससे यह स्पष्ट हो सके कि औसतन हर बिहारी गांव में इंसान और सांप का शांतिपूर्ण सहअस्तित्व था। और भला सांप ही क्यों बाकी पशु पक्षियों का ध्यान रखना भी सामाजिक जीवन का अंग था। सबसे पहली रोटी गाय और बाकी जीवन के लिए देहरी पर रखने का चलन लगभग सभी घरों में था। बचपन दादी के किस्सों के साथ ही गुजरा है। एक से एक रोचक कहानियां। दादी की कहानियों में अनमोल रानी, दूध की धार, और ऐसे ही सैकड़ों ग्राम्य जीवन और लोक व्यवहार से जुड़ी सीख देती कहानियां। उन कहानियों में अक्सर काग भाषा, सावन भाषा समझने वलो चरित्र होते थे। हमारे गांव में काग भाषा, सावन भाषा समझने वाले लोग तो नहीं थे पर उनका ध्यान रखने वाले लोग बहुत थे।

उपर ये जिक्र आया कि सड़क अक्सर सन्नाटे में डूबी रहती थी। इसकी वजह आर्थिक गतिविधियों का सुस्त होना था। कुछेक दुकानें थी। किताब और स्टेशनरी के लिए बस दो दुकानें थी उपाध्याय और पुष्पांजली बूक स्टोर। दोनों दुकानें लकड़ी के काठगाड़ी में चलती थी। जहां पुष्पांजली में किताबें और स्टेशनरी जैसे कि वैशाली की कॉपियां, सुलेखा स्याही, फलोरा पेन, ग्राफ पेपर मिलते थे। उपाध्याय स्टोर का आर्कषण ही अलग था। याद रहे कि तब टीवी का चलन नहीं हुआ था। रेडियो भी हर घर में नहीं था। बाह्य जगत को बेनीपट्टी से जोड़ने का माध्यम उपाध्याय जी रखते थे—अखबार और मैग्जीन। अखबार, मैग्जीन और रेडियो ही हमारे लिए बाहर की दुनिया की झरोखा थे। आर्यावर्त और इंडियन नेशन तब बिहार के प्रमुख अखबार होते थे। जब पाटलिपुत्रा टाईम्स निकलना शुरू हुआ तो आर्यावर्त का चलन कम हो गया। दिल्ली की टाईम्स आॅफ इंडिया की दो ही कॉपी बेनिपट्टी आती थी। हमारे यहां और हमारे दोस्त रामलाल सिंघानियां के यहां।
उपाध्याय जी खुद बांटने निकलते थे। उनकी साईकल की घंटी का बेसब्री से इंतजार रहता था। धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, कादंबिनी, रविवार जैसी पत्रिकाओं के अलावा पराग और नंदन। तब धर्मयुग और साप्ताहिक हिन्दुस्तान की विशेषांक बहुत लोकप्रिय थे। हमारी बांछे क्रिकेट विशेषांक देखकर खिल उठती थी। क्रिकेट विशेषांक पढ़ने के लिए घर में लूट मची रहती थी। पराग का एक विजनन कथा विशेषांक आया था। जयंत नार्लिकर ने उस अंक का संपादन किया था। उसकी एक कहानी आज भी याद है। एक मेगासिटी को मैनेज करने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से चालित एक मशीन है जो उस नगर की सभी पहलुओ को खास कर अपराध को नियंत्रित करती है। फिर वो मशीन थक गई, उब गई और खुद को नष्ट करने के लिए मैनिपुलेट किया। ब्रह्मांड और इसके रहस्यों की खोज की कई दिलचस्प कथायें इसमें थी।                                                                                                                                                          ……मेरा गांव बेनीपट्टी
परचून की एक दुकान थी बिकाउ साह की, बाद में एकाध और खुली। एक ही दुकान हज्जाम की थी, विश्वनाथ की जिसे बिसनाथ की दुकान कहते थे। फिर बेहटा हाट के पास एक और दुकान हजामत की खुली। बंभोला बाबू की दुकान सबसे पुरानी दवा दुकान थी। 1981 में शायद सुनिता फार्मेसी हमारे बिल्कुल पड़ोस में खुली। सुनिता स्टोर पर अक्सर क्रिकेट कमेंट्री सामूहिक रूप से सुनने की लिए चौकड़ी लगती थी जिसका मैं सक्रिय सदस्य था। रेडियो कमेंट्री में जो लुत्फ था वो टीवी पर मैच देखने में कहां। ” हेयर कम्स कपिल देव,” सुरेश सरैया की आवाज, उनके आवाज के पीछे उभरता दर्शकों का शोर। जब विकेट गिरता तो कमेंटेटर की आवाज शोर में डूब जाती। दर्शकों का शोर कम होने के बाद ही स्थिती स्पष्ट होती कि विकेट कैसे गिरा। क्रिकेट का एक मंझा हुआ श्रोता दर्शकों के शोर से दूर से भी जान लेता कि पक्का विकेट गिरा।
कपड़े की भी दो तीन दुकानें ही थी। सुल्तानिया और सिघांनिया वस्त्रालय। ये दोनो परिवार मारवाड़ी थे और आपस में रिश्तेदार भी थे। ये जब आपस में बात करते तो मारवाड़ी में और बाकी दुनिया से मैथिली में। इसी तरह पान की बस दो गुमटियां थी। खलीफा की पान की दुकान तो पूरे ईलाके में मशहूर थी। एक सरकारी खलीफा हॉस्पिटल था। 3 स्कूल थे। एक कन्या विद्यालय जहां क्लास 6 तक की पढ़ाई थी। मिडिल स्कूल और हाई स्कूल। हाई स्कूल के टॉपर्स डॉक्टर,इंजीनियर बनते रहे बिना नागा। एक इंटर कॉलेज था उच्चैठ में। उच्चैठ बेनिपट्टी से लगभग 5 किलोमीटर दूरी पर अत्यंत जाग्रत देवी स्थान था जहां दर्शन के लिए संपूर्ण मिथिलांचल से लोग आते थे।
आर्थिक गतिविधियों की बात करें तो बेहटा हाट का जिक्र किये बिना यह कहानी अधूरा रहेगा। मौसम चाहे कोई भी हो, बुधवार और शनिवार चार बजे सुबह से बैल गाड़ियों के बैलों के गले में बंधी घंटियों की आवाज सुनाई देने लगती थी। आप जनवरी की कड़कड़ाती सर्दी में रजाई में लेटे हैं और किसान दूर दराज के गांव से अपनी फसल बेचने रात भर बैलगाड़ी हांकते हुए आया है। बेहटा हाट में एक तरफ चावल, गेहूं और दालों की धूम रहती तो दूसरी तरफ ताजा खूबसूरत सब्जियों की। तब सब्जियां सीजन के हिसाब से आती थीं। परवल महाशय अप्रैल में आते तो भिंडी उससे थोड़ा पहले अपनी आम दर्ज करती थी, गोभी अक्टूबर में, बथुआ नवंबर के आखिर में। इसी तरह से सब्जियों के जाने का भी वक्त होता था।                                                                                            ……मेरा गांव बेनीपट्टी

उन ताजा मौसमी सब्जियों में एक दैविय स्वाद था। हाट का सबसे पसंदिदा कोना होता था। मछलियों का कोना जहां रोहा और कतला, बुआरी और गरई, झींगा और सिंघी अभी—अभी तालाब से लाई गयी होती थीं। मछली को मिथिलांचल में जल तोरई भी कहते हैं, यानी मछली खाने वाले शाकाहारी की जमात में रखे जा सकते हैं। बेहटा हाट की चर्चा हो तो मंगलवार लगने वाले भैंसो की हाट अवश्य चर्चा में आगी। पूरे ईलाके में भैंसों की खरीद बिक्री हर मंगल को बेहटा हाथ में होती थी। भैंस खरीदने बेचने वाले हाट से निकलने के बाद भैंसों को दूह कर दूध बेचते हुए जाते थे। हर मंगलवार को बेहटा बेनीपट्टी में दूध की नदी बहती थी। एक रूपया में ढ़ाई सेर दूध मिल जाना सामान्य था। 15—20 किलो दूध लेकर उसका पेडा बनाया जाता था।
जब आम का सीजन आता तो शुरूआत बंबईया आम से होती जो 15 मई के आसपास पकना शुरू हो जाते थे। इसीके आसपास किशनभोग भी। 5 जून से माल्दह जिसे मैं आम का बेताज बादशाह समझता हूं, आना शुरू हो जाता। बिल्कुल पतले छिलके और पतली गुठली वाले रस से सराबोर माल्दह सामने हो तो बिहारी विशेष रूप से मैथिल 15 से 20 आम एक बार में सधा सकता है।
यदि ग्रामीण खेल कूद की बात करें तो गांव के युवाओं में क्रिकेट और फूटबॉल का क्रेज था पर फूटबॉल का ज्यादा। बेनीपट्टी में इंटर डिस्ट्रिक्ट फूटबॉल टूर्नामेंट का भी आयोजन हुआ था जिसमें खगरिया, मानसी तक की टीमें आईं थी। हर शाम हजारों दर्शक हाई स्कूल के ग्राउंड में फूटबॉल मैच देखने आते थे, फूटबॉल टूर्नामेंट भी हुआ था जिसमें सीतामढ़ी, मधुबनी और दरभंगा की टीमें आई थी, उसमें इतने दर्शक नहीं आये थे।                                                                                                                          ……..मेरा गांव बेनीपट्टी
(लेखक ज्वाइंट पुलिस कमिश्नर,क्राईम,दिल्ली पुलिस के पद पर कार्यरत हैं।)

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