प्रवेश कुमार मिश्र
महात्मा गांधी की कर्मभूमि चम्पारण के साठी थाना में दानियाल परसौना गांव आज विकास की गति के साथ कदमताल करने को तैयार है। कभी शहर व बाजार से महरूम रहा यह गांव आज बड़े-बड़े शहरों से आने वाले धन पर इठला रहा है। लोग देश-विदेश तक अपनी पहुंच बना चुके हैं। कभी फोन की घंटी से घबराने वाले ग्रामीण आज संचार के सभी साधनों से लैस होकर खेतों में काम करते हुए भी मोबाइल का आनंद ले रहे हैं। कभी पेट्रोल वाली जीप के पीछे दौड़कर धुंआ सूंघकर इठलाने वाले लोगों के घर मोटर साइकिल मौजूद है।

यह गांव एक समय अपने साथ हो रहे बेरूखी से कराह रहा था। बाढ़ प्रभावित इलाका धान व गन्ने की खेती के लिए जितना मशहूर था, उतनी ही प्रसिद्धि बाढ़ और डाकुओं के पनाहगार के कारण हासिल थी। बदलते दौर में भी सरकारी राहत के लिए यह पंचायत प्रशासनिक बेरूखी का दंश झेल रहा था। सिकरहना नदी के किनारे बसे इस गांव में प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के माध्यम से बनी सडकों का अस्तित्व कागज पर जरूर मिलेगा, लेकिन वास्तव में लोग आज भी हिचकोले खाने को मजबूर हैं। हालांकि गांव के कुछ प्रबुद्धजनों के प्रयास से बिजली का पोल अस्सी के दशक में ही लग गया था लेकिन लोग पांच साल पहले तक बिजली आपूर्ति के इंतजार में लालटेन की रोशनी में रहने को मजबूर थे। इस गांव में डाकघर 1980 में ही खुल गई थी जिसके कारण टेलीफोन की सुविधा मौजूद थी लेकिन तार के टूटने और चोरी हो जाने के कारण फोन हमेशा अपनी बेहतरी का बाट जोहता रहता था। इन सबके बीच इस गांव में गजब की एकजुटता थी। गांव के मुखिया अलख कुमार मिश्र की तत्परता की वजह से गांव में कभी डकैती नहीं हुई और न ही धर्मांध लोग भाईचारा को खत्म कर पाए। बाढ़ के संकट में मुखिया द्वारा हमेशा बढ़-चढ कर सहायता की जाती थी, जिसके कारण लोगों को सरकार से अनुदान की आस नहीं रहती थी।
एक समय ऐसा था कि साल के छह माह यह गांव सड़क मार्ग से एकदम कटा रहता था। साठी से पांच किलोमीटर की दूरी का सफर बैलगाड़ी द्वारा केवल दो बैलों के सहारे तय नहीं किया जा सकता था, बैलगाड़ी के साथ हमेशा एक जोड़ी अतिरिक्त बैल और कुछ पहलवानों की मौजूदगी आवश्यक होती थी क्योंकि कीचड़ में बैलगाड़ी का फंसना तय होता था और उसे निकालने के लिए अतिरिक्त ताकत की दरकार होती थी। लेकिन आज के दौर में विखंडित सड़कों केे बावजूद गांव में नौ माह तक कार पहुंच जाती है। इस गांव का नाम परसौना था लेकिन बाद में डैनियल नामक एक अंग्रेज सारजेंट के नाम पर डैनियल परसौना कर दिया गया था। आजादी के बाद इसका नाम दानियाल परसौना हो गया।

इस गांव से नब्बे के दशक तक पढ़ने के लिए भी लोग जिला मुख्यालय से बाहर नहीं निकल सके थे। लेकिन गांव के मुखिया के परिवार से संभवतः पहली बार बच्चे पढाई के लिए दिल्ली की ओर गए। बाद अनेक बच्चे बाहर जाकर पढ़ने लगे। उसके बाद न सिर्फ गांव का नजरिया बदला बल्कि गांव के प्रति रिश्तेदारों में बैठी नकारात्मक सोच में भी बदलाव आना शुरू हो गया। गांव से रोजी-रोटी की तलाश में मजदूरों का पलायन शुरू हो गया। दिल्ली व पंजाब जाने का सिलसिला ऐसा शुरू हुआ कि आज इस गांव से लगभग एक हजार से ज्यादा युवा विभिन्न शहरों में मेहनत-मजदूरी कर रहे हैं। हालांकि आज भी होली, दीपावली, छठ के साथ-साथ ईद व बकरीद में युवाओं की टोली गांव की ओर रूख करती है और वे अपने-अपने घरों को शहरी तर्ज पर सजाने व संवारने का प्रयास करते हैं। सरकारी अनुदान पर आश्रित हुए बगैर आज इस गांव ने अपने आपको मिट्ठीनुमा घर से मुक्त कर पक्के मकान की ओर कदम बढ़ाया है।
गांव में अब लाख की बात आम हो गई है। दो दर्जन से अधिक युवक विदेशों में जाकर रोजगार कर रहे हैं। गांव के लोग अब प्राकृतिक आपदा को नियति मानकर आगे बढाने के लिए लगातार प्रयासरत हैं। हालांकि पूर्व मुखिया श्री मिश्र की मृत्यु के बाद जातीय राजनीति ने इस गांव में भी अपनी पहुंच बना ली है। फिर भी दानियाल परसौना अभी जातिवादी दल-दल में सराबोर नहीं है और इस गांव से निकले कई लोग समय पर इसको एकजुट करने के प्रयास में लगे रहते हैं।

दिल्ली में पढाई-लिखाई के बाद पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी हैसियत रखने के बाद भी मेरे जैसे कई युवाओं के दिल में गांव जिंदा है। गंवई संस्कार व संस्कृति सजीव है और सामाजिक एकजुटता के सहारे अपने गांव को आदर्श गांव बनाने के प्रयास में सभी लगे हुए हैं। मेरे प्रयास का एक सुखद अध्याय इस गांव को दूसरे गांवों से अलग करता है। दानियाल परसौना इस इलाके का पहला गांव है जहां कमजोर आय वाले लोगों की बच्चियों की शादी डोली बाहर निकालकर नहीं, बल्कि दरवाजे पर बारात बुलाकर की जाती है। यानी यह गांव अब कुंठित व निकृष्ट परंपरा से मुक्त हो चुका है। हरेक साल आम लोगों की सहमति से ऐसे कमजोर परिवार का चयन किया जाता है और उन्हें बेटी की शादी के लिए जरूरी संसाधन उपलब्ध कराए जाते है। जहां तक विकास में व्यक्तिगत योगदान की बात है तो मैं समय पर स्थानीय प्रशासन का ध्यान इस सुदूर गांव की ओर आकृष्ट करता रहा हूं। जन-प्रतिनिधियों पर भी इस गांव के विकास के लिए दबाव बनाया जा रहा है। कुछ राज्यसभा के सदस्यों द्वारा संासद निधि से ग्रामीण सड़क को सिमेंटेड कराने का प्रयास किया गया है। इतना ही नहीं जन-प्रतिनिधियों से ही स्थानीय मिडिल स्कूल के भवन निर्माण के साथ-साथ पुस्तकालय बनवाने के लिए भी राशि आवंटित कराई गई है।
यानी सरकार के विकास की गति से अलग गांव की मिट्टी से जुड़े लोग ही इस गांव के विकास के लिए प्रयासरत हैं। दानियाल परसौना भौगोलिक, प्रशासनिक व राजनीतिक दंश से घायल होकर भी अन्य गांवों से प्रतिद्वंद्विता करते हुए आगे बढ़ने के लिए हर रोज दो कदम आगे बढ़ा रहा है।
