बिहार पंचायत चुनाव….हमके बनाईं अब मुखिया जी

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मंगरूआ
पटना: चूल्हा चौका फूकब भले,बाकी दिन यार हो
गंवई लोकतंत्र के परब बा आईल, ताल ठोकब हम यार हो
बिहार में पंचायत चुनाव की घोषणा हो गई है। मुखिया जी या अन्य पदों के संभावित उम्मीदवारों के संपर्कों का सिलसिला शुरू हो गया है। वैसे पंचायत जहां महिलाओं की सीट घोषित कर दी गई है फलनवा की बहुरिया से लेकर चिलनवा की महतारी तक और ढ़ेकनवा की भौजाई से ले​कर फेकनवा की लुगाई तक मातृशक्ति चुनाव में जोर आजमाने को तैयार है। जो कल तक घूंघट में दिखा करती थीं, गांव की गलियों से लेकर सोशल मीडिया पर अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही हैं।  घरों की देहरी लांघकर गांव की गलियारों में घूम घूम कर  अपनी मौजूदगी दिखाने लगी हैं। इस बीच गांव की बेटियां भी प्रत्याशी के रूप में दाव आजमा रही है। किसी को सरपंच बनना है तो किसी को पंच तो किसी मुखिया, कोई बीडीसी के लिए ताल ठोक रहा है तो कोई जिला पंचायत सदस्य का दावेदार है, तो कोई वार्ड सदस्य ही बनकर संतुष्ट हो जाना चाहता है। नये चेहरे के संभावित प्रत्याशी वर्तमान पंचायत प्रतिनिधियों के काम काजों में गड़बड़ी गिना रहे हैं।

ऐसी स्थिती इसलिए है ​क्योंकि पंचायती राज व्यवस्था में 50 फीसदी आरक्षण की बदौलत महिला सशक्तिकरण की आवाज खूब बुलं​द की गयी। आरक्षण के बल पर महिलाओं के सिर पर मुखिया, सरपंच, समिति,जिला परिषद और वार्ड सदस्य के ताज भी खूब सजाये जा रहे हैं। और उसी ताज को बरकरार रखने या किसी के सर पर पड़े ताज को अपने नाम करने के लिए फिर से गांव की गलियां गुलजार हो गयीं है। सोशल मीडिया पर बिसात बिछाया जा रहा है। लेकिन जमीन स्थिती यह है कि जैसे आज चुनाव मैदान में ये इनमें से ज्यादातर महिला प्रत्याशी जिस तरह सजावट का सामान बनाकर चुनावी समर में उतारी गई हैं और उनकी पहचान फलनवा की बहुरिया, चिलनवा की महतारी और ढ़ेकनवा की ​बीबी तक सिमटी हुई दिखाई देती है, कमोबेश चुनाव मैदान में जीत हासिल करने के बाद भी इन महिला प्रत्याशियों के सर पर का ताज तो सज जाता है, लेकिन पंचायत में उनकी भागीदारी शो-पीस से अधिक कुछ नहीं होती। ऐसी ही स्थिति ज्यादातर त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था में देखने को मिलती है,और अब तक के अनुभव यही बताते आये हैं।

जनता द्वारा चुने जाने के बाद भी महिला पंचायत प्रतिनिधि चूल्हे-चौका तक ही सिमट कर रह जाती है। उनकी कमान पति , ससुर , भाई या अन्य रिश्तेदार के पास होते हैं। बैठक हो , शिलान्यास हो या कोई अन्य कार्यक्रम महिला की जगह उनके प्रतिनिधि ही भाग लेते हैं। उनके बदले में सारा कार्य पति, पुत्र या अन्य रिश्तेदार संभालते है। आवश्यक बैठकों में सिर्फ इनकी उपस्थिति दर्ज होती है। पति,ससुर, पुत्र या अन्य रिश्तेदार बैखौफ होकर वे पंचायत कार्यालय में उनकी कुर्सी पर बैठते हैं और हस्ताक्षर भी कर देते हैं।

बावजूद इसके, बिहार के गांव—गंवई में इन दिनों चुनावी रंग दिख रहा है। वर्तमान पंचायत चुनाव को लेकर तेज गति से मतदाताओं से हालचाल पूछने का सिलसिला चल रहा है। चौपाल लग रहे हैं,बैठकी हो रही है। जुगत बिठाया जा रहा है,वोट का गणित समझाया बुझाया जा रहा है। यानी वोट के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाये जा रहे हैं। मतदाताओं से उनकी परेशानी पूछी जा रही है। कोरोना काल या बाढ़ के दौरान मुखिया जी या संभावित जन प्रतिनिधियों द्वारा किये गये कथित विकास,सहयोग,मदद सब की याद दिलाई जा रही है और वोट का आश्वासन लिया जा रहा है। दावेदार सुख-दुख के बहाने ग्रामीणों को साधने में जुट गए हैं। कोई तेरहवीं के खर्च में हाथ बंटा रहा है तो कोई बेटे-बेटियों की शादी में सहयोग करने की बात कह वोटरों को साध रहा है। पर्व त्योहार से मरनी—हरनी सब में उपस्थिती दर्ज कराई जा रही है। नेवतरही पुराया जा रहा है।
जिस तरह से चुनाव के बाद घर के पुरूष सदस्यों को इनके जीते हुए सीटों पर कामकाज संभालना है, उसकी झलक चुनाव के दौरान भी देखी जा सकती है। महिला संभावित उम्मीदवारों का फोटो सोशल मीडिया प्रोफाईल और पेज पर चस्पा घर वोट मांगा जा रहा है। मदद की गुहार लगाई जा रही है। फेसबुक लाईव, से लेकर ह्वाट्सएप्प और यूट्यूब तक मुखिया जी के पैखनवा खा जाने और उनको जीत मिलने पर विकास की बयार बहने के वादे किये जा रहे हैं।
किसी को अपनी मां के दावेदारी के लिए वोट चाहिए, तो किसी को भौजाई और पत्नी के लिए तो किसी ने बहन को चुनाव मैदान में उतारा है। प्रत्याशी भले ही महिला हो लेकिन प्रचार—प्रसार की जिम्मेवारी खुद संभाले हुए हैं। फेसबुक लाइव के जरिए प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। इतना ही नहीं, मतदाताओं को अपना चहेता बताते हुए शासन की ओर से संचालित तमाम योजनाएं भी लाइव रहकर गिनाई जा रही हैं।

मतदाता भी खूब आनंद ले रहे हैं। जिस दखिन टोला में कल तक कोई झांकने नहीं जाता था, दुआ सलाम तो दूर की बात रही वहां भी जिन लोगों से दावेदारों को कभी नमस्कार करने का समय नहीं मिलता था, आज उनके दरवाजे पर सुबह-शाम हाल पूछने पहुंच रहे हैं। इतना ही नहीं, दिन भर उम्मीदवार के समर्थक पूरे गांव में घूम-घूम कर बैठकी करते हैं और शाम को चुनावी माहौल के बारे में चर्चा करते हैं।  मतदाता भी दुआ सलाम का जवाब तो दे रहे हैं लेकिन वोट के नाम पर सिर्फ आश्वासन का जवाब आश्वासन से देने का आनंद ले रहे हैं। गांठ खोलने को तैयार नहीं।
गांव का हाल तो कुछ ज्यादा ही चुनावी बयार जैसा लग रहा है। यानी वर्तमान से लेकर निवर्तमान तक और भविष्य में ताज की उम्मीद लगाये बैठे उम्मीदवारों तक कोई कसर नहीं छोड़ना चा​हता। बस एक ही लक्ष्य है,जीत का जुगत बैठ जाये।

 

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