गांव से लौटकर …अपने ही लोगों ने बूढ़ी मां का रास्ता तक रोकने की रच दी थी साजिश

 

हरेश कुमार

कई सालों के बाद गांव गया था। गांव से लौटकर … मन खिन्न हो गया। जिनको बाबूजी ने बसाया था, उन लोगों ने गांव में रह रही मेरी बूढ़ी मां का रास्ता रोकने के लिए मुकम्मल तैयारी कर ली थी। सारे अपने ही लोग थे।
मेरे चचेरे भाई को आगे कर मकान के सामने की जमीन एक दूसरे चाचा के हाथों बिकवा दी, ताकि घर से निकलने का रास्ता ही बंद हो जाए. वो तो भला हो ईश्वर का कि गांव के ही एख अन्य सज्जन शुक्ला जी ने मेरे ही भाई द्वारा बेची जमीन को ट्रांसफर कर दिया। सिर्फ नाम बदलवाने में 60 हजार रुपये खर्च हो गए। शुक्ला जी जमीन ट्रांसफर न करते तो मां का घर से निकलना बंद हो जाता। बताइए लगभग 80 साल की उम्र में ये सब दिन अपने लोगों ने ही दिखा दिया। मुझसे दिनभर बात करते थे ये सभी,लेकिन कभी नहीं बताया।

मेरे चचेरे भाई लालबहादुर चौधरी ने भक्त नारायण चौधरी को जमीन बेच दिया, जबकि उनकी जमीन दूसरे साइड में थी। वो मेरे बाबूजी (स्वर्गीय राजनारायण चौधरी) के बड़े भाई (स्वर्गीय रास नारायण चौधरी) के एकलौते पुत्र हैं। बाबूजी और दादा (बाबूजी के बड़े भाई) का बंटवारा 1995 में हुआ था। बाबूजी ने अपने बड़े भाई यानि दादा से कहा कि भैया आपको जिस साइड का जमीन लेना है, वो आप ले लीजिए और दूसरे साइड का हमको छोड़ दीजिए। फिर गांव के वरिष्ठ पंचों के सामने पंचनामा भी बना था। उसमें चचेरे भाई से जमीन खरीदने वाले पंच भक्त नारायण चौधरी का भी हस्ताक्षर था। देखिए, जो पंच बंटवारा में मौजूद था, उसी ने जमीन खरीदा, जबकि चचेरे भाई की जमीन दूसरे साइड में थी। समझिए कि दक्षिण क्षेत्र में उनका हिस्सा पड़ता था और उन्होंने क्या किया कि अपने हिस्से में पड़ने वाले शीशम व अन्य कीमती लकड़ी को काटकर गांव के एक अन्य व्यक्ति के हाथों बेच दिया और फिर, उत्तर साइड में हमारे हिस्से की जमीन बेच दी, जिस पर कीमती शीशम व आम व अन्य लकड़ी था। हम गांव पर रहते नहीं। छोटा भाई शिवहर जिला में रहता है। उसकी बड़ी बेटी की तबीयत खराब थी, तो उस समय वो कोलकाता में बिटिया का इलाज करा रहा था। इसी दौरान इन सबने मिलकर यह चाल चल दी।
फिर, जब छोटे भाई को मालूम हुआ तो वो कोलकाता से भागा-भागा आया और सामने की एक दूसरी जमीन जो मेरे बड़े भाई ने वीरेंद्र शुक्ला जी से बेच थी। उनके भाई का नाम जीतेंद्र शुक्ला हैं। दोनों भाई सरकारी शिक्षक हैं। जहां तक मुझे ध्यान आ रहा है वीरेंद्र शुक्ला जी रिटायर हो गए हैं। वह जमीन अपने नाम से ट्रांसफर कराया, ताकि रास्ता खुल सके। इस पूरे घटनाक्रम में सिर्फ नाम चेंज कराने में 60 हजार रुपये लगे और शुक्ला जी को उसी प्लॉट में पीछे से जमीन दी। गांव से लौटकर…
बेची हुई जमीन हथियाने की रच रहे हैं साजिश.. गांव के लोग ले रहे हैं मजे
एक तो किस्सा ऐसा है कि मन और दुखी हो जाता है। इसी चचेरे भाई ने बाबूजी की जिंदगी में 1994 में गांव के दक्खिन सरेहा में मोरहा पर की जमीन बेची और अब कह रहा है कि मेरा हस्ताक्षर ही नहीं है। इस जमीन की खरीद-बिक्री के सालभर बाद बाबूजी और दादा का बंटवारा हुआ था। अब वो गांवभर में कहता घूम फिर रहा है कि मेरे बाबूजी ने गलत तरीके से जमीन लिखवा ली। गांव से लौटकर…


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गांव में बदलाव
गांव में काफी कुछ बदला है। घर-घर बिजली पहुंच गई है। नल-जल योजना में काफी भ्रष्टाचार हुआ है। जिनके घरों में नल-जल पहुंच गया हैय़ सरकारी पानी से लोग भैंस नहला रहे या खेतों में पटा रहे हैं। हर जगह भ्रष्टाचार है और अभी तो बस हर दरवाजे पर चुनाव की चर्चा। मुखिया और जिला पार्षद के चुनाव की चर्चा खूब चल रही है। सब जगह वोट खरीदने की बात हो रही है। जिला पार्षद के चुनाव में एक-दो प्रत्याशी करोड़ों खर्चने को तैयार हैं। यह आंकड़ा 5 करोड़ तक भी हो सकता है। होली के समय एक दर्जन के लगभग बुलेट बंटाया है इस सिलसिले में।
इंदिरा आवास ऐसे कुपात्रों को मिले हैं, जो कहीं से इसके योग्य नहीं है। नाबालिगों के नाम से भी इंदिरा आवास बंटा है। जो लोग बेलवा (शिवहर) छोड़कर दूसरे जिले सीतामढ़ी (पूर्व का जिला) में चले गए हैं उनके नाम से भी इंदिरा आवास बंटा है। कुछ तो ऐसे हैं, जो गांव छोड़कर कब चले गए, वो कभी वापस नहीं आएंगे उनका अंगूठा लगाकर इंदिरा आवास उनके परिजनों ने ले लिया और अब दोमंजिला बना रहे हैं। समर्थकों में गौ और बकरी शेड धड़ल्ले से बांटा गया है। गांव से लौटकर…
गांव से लौटकर…नल-जल योजना की बर्बादी
वार्ड पार्षद तक स्कॉर्पियो से घूम रहे हैं। सब नल-जल योजना की मेहरबानी है। कहीं नल-जल योजना सही से क्रियान्वयन नहीं किया गया है तो कहीं पीने वाले पानी की बर्बादी हो रही है। लोग भैंसों को नहलाने के साथ-साथ बालू पर पानी पटा रहे हैं। सुविधाओं का इस तरह से उपयोग और दुरुपयोग हो रहा है। भ्रष्टाचार चरम पर है।
मेरे गांव में कई लोगों ने गांजा और नेपाली शराब बेचकर 3 से 5 एकड़ जमीन लिखा लिया। नेतागीरी पूरी तरह से धंधा बन चुका है। सरकारी योजनाओं के बंदरबांट का यह सिलसिला न जाने कब रुकेगा। यहां हर कोई बिकने को तैयार दिख रहा। आंखों में शर्मोहया नाम की कोई चीज नहीं है।
मुखिया, वार्ड पार्षद से लेकर जिलापार्षद, विधायक, सांसद सब जगह धनबल,जातिबल और बाहुबल काम करने लगा है। गांव में अब वोट पड़ता नहीं, जाति के आधार पर बिकने लगा है। लोग समूहों में बंट चुके हैं। गांव से लौटकर…
विकास से ज्यादा गति से भ्रष्टाचार ने पैर पसारा
गांव में विकास हुआ है इसमें कोई दो मत नहीं,लेकिन विकास से ज्यादा गति से भ्रष्टाचार ने पैर पसार लिया है। गांव के लोगों ने अब मुखिया और वार्ड पार्षद से अपना हिस्सा मांगना शुरू कर दिया है। दो दशक पहले गांव में इस तरह की गंदगी नहीं थी, अब तो हर चुनाव से पहले कौन उम्मीदवार कितना पैसा वाला है और कितना खर्च करेगा इस पर बात होने लगी है।
गांव से 2 किलोमीटर की दूरी पर दो-दो पेट्रोल पंप और गैस एजेंसी खुल चुके हैं। घर-घर गैस सिलेंडर पहुंचने लगा है। बेलवा-देवापुर के बीच के लगभग 4 किलोमीटर सड़क को छोड़कर रास्ता सही है। 40 सालों में सरकार ने बागमती नदी के कारण आज तक सर्वे नहीं कराया, जिसके कारण इस जगह पक्की सड़क नहीं बन सकी। गांव से लौटकर …


 

चल रहा है सर्वे का काम
शिवहर जिला के बेलवा-नरकटिया में सर्वे का काम हो रहा है। सरकारी कर्मचारी पंचायत भवन में न बैठकर गांव में बैठ रहे हैं। पंचायत भवन का निर्माण इन्हीं सब कार्यों के लिए किया जाता है। वहां सर्वे के लिए जरूरी दस्तावेज के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है।
बागमती नदी की बाढ़ से प्रभावित शिवहर जिला का बेलवा-नरकटिया गांव नेताओं, अधिकारियों व भ्रष्ट प्रशासन के लिए दुधारू गाय की तरह है। बागमती नदी के कारण बेलवा-नरकटिया पहले से ही तबाह है और ऊपर से पंचायत में व्याप्त भ्रष्टाचार और सबकी मिलीभगत से स्थिति और बदतर होने लगी है। चालीस साल में बेलवा और देवापुर के बीच सर्वे नहीं हो सका। बाढ़ से बचाव,कटाव रोकने और राहत बांटने के नाम पर हर साल करोड़ों रुपयों की बंदरबांट होती है। एक अर्द्धनिर्मित पुल नदी के बीचो बीच खड़ा है तो दूसरे डैम की तैयारियां कई सालों से चल रही है। गांव के कुछ लोगों का घर डैम बनाने वाली कंपनी द्वारा बनाया गया है। ये किस आधार पर बना है, यह बनानेवाला और लाभ लेने वाला ही बता सकता है। भ्रष्टाचार लोगों के नस-नस में समा चुका है। बागमती के बाढ़ के कारण बेलवा नरकटिया, बेलवा बंदोबस्ती पर शिवहर जिला प्रशासन की विशेष कृपा बनी रहती है। बाढ़ राहत से लेकर सड़क तक हर कार्य में मोटा कमीशन बंधा होता है। गांव से लौटकर…
कर्मचारी से लेकर पंचायत प्रतिनिधि सरकारी पैसों का जमकर बंदरबांट करते हैं। यही हाल रहा तो इस गांव का कभी भला नहीं हो सकता है। 4 दशक में बेलवा-देवापुर के बीच जमीन सर्वे का काम नहीं हो सका, इस कारण शिवहर-मोतिहारी को जोड़ने वाली इस महत्वपूर्ण सड़क का कोई काम नहीं हो सका है। सरकार की सभी योजनाएं मसलन-प्रधानमंत्री आवास योजना (पूर्व में इंदिरा आवास),नल-जल योजना, बकरी शेड,गाय शेड सभी में भ्रष्टाचार चरम पर है। जो बोलने वाले हैं, सभी को योजना का लाभ कमीशन काटकर दिया गया है। इंदिरा आवास (अब प्रधानमंत्री आवास) में भ्रष्टाचार का आलम यह है कि अपात्रों को भी जमकर इसका लाभ दिया जा रहा है।
कई तो ऐसे हैं जो दशकों पहले गांव छोड़कर सीतामढ़ी जिला या दूसरे जगहों पर बस चुके हैं उनके नाम से भी अंगूठा लगाकर या खुद उसे बुलाकर अधिकारियों औऱ मुखिया व वार्ड पार्षद के मिलीभगत से इंदिरा आवास दिया जा रहा है।
सरकारी संस्थानों की बर्बादी यूं ही नहीं हुई। कमीशनखोरी और भ्रष्टाचार ने सबकुछ तहसनहस कर दिया। गांव से लौटकर…
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मूलभूत सुविधाओं की भारी कमी
शिवहर जिला में मूलभूत सुविधाओं की भारी कमी है। शिक्षा, चिकित्सा और रोजगार की बात करना ही बेकार है। शिवहर जिला में एक डिग्री कॉलेज तक नहीं है, जहां विज्ञान की पढ़ाई होती हो। हां, परीक्षा जरूर होता है और प्रैक्टिकल में पूरे मार्क्स भी मिलते हैं। शिवहर के जिला अस्पताल में ब्लड बैंक तक नहीं है। इसके लिए किसी को शर्म नहीं आती। कई लोग तो असमय इस कारण से जान गंवा चुके हैं कि उन्हें सही समय पर इलाज नहीं मिल सका। खून के अभाव में समय पर ऑपरेशन न हो सका। एक-एक यूनिट ब्लड 4 से लेकर 5 हजार तक या कहीं-कहीं 10-10 हजार रुपये तक मिलता है और लोग मजबूर देते हैं। पता नहीं ये ब्लड कैसा होता है, क्योंकि यहां ब्लड बैंक तो है नहीं, फिर संक्रमित ब्लड के कारण मरीज को दूसरी बीमारी हो जाए तो उसका बचना भी मुश्किल हो जाता है। गांव से लौटकर…
कई सालों बाद जमीन सर्वे के सिलसिले में गांव आना हुआ। बड़ी उत्साह से आया, लेकिन गांव आकर पता लगा कि लोग कितने जहरीले बन चुके हैं। दुनियाभर की बातें करेंगे, लेकिन अपनी बात छुपा जाएंगे। दूसरे की सभी जानकारी है,उसपर आप घंटों बात करिए,लेकिन जब संबंधित व्यक्ति के बारे में टिप्पणी होने लगती है तो बात बदलने लगते हैं। ऐसे माहौल और लोगों से बात करके कोई फायदा नहीं होनेवाला है। यह तो भारत-पाकिस्तान वाली बात हो गई। अंदर में गंदगी भरी हुई है और ऊपर में दिखावटी शांति। सभी समस्याओं का मूल कारण सही नीयत न होना है। हमेशा एक-दूसरे को लड़ाने-भिड़ाने में लोग लगे रहते हैं। दूसरों के घर में आग लगाकर तमाशा देखने वाले बहुतायत में हैं यहां पर। कोई किसी से कम नहीं। ऐसी स्थिति में बिहार का कभी विकास नहीं हो सकता, जहां का समाज इतना दूषित हो चुका है और हमेशा भाई को भाई से लड़ाने-भिड़ाने, कोर्ट-कचहरी के मुकदमों में ही लोग अपनी शान समझते हैं। ऐसे ही दूषित माहौल में लोग जी रहे हैं। गांव से लौटकर…

खेतीबाड़ी का हिसाब करने बैठा
कासिम मियां से पूछा भाई आप पीढ़ी दर पीढ़ी खेत जोतते आ रहे हैं, लेकिन पिछले 21-22सालों में आपने कुछ भी नहीं दिया। कासिम मियां बड़े खिलाड़ी निकले, उनका जवाब सुनकर हम चुप हो गए। मास्टर साहब का लड़का बनके सब खा गये।
पिछले साल आम इतना फला था कि लग रहा था घर का छत तोड़ देगा। कासिम मियां और उनके पुत्र रखवाली कर रहे थे। खूब खाया। हमें बताने से भी रहे।
गांव जाने पर परत दर परत प्याज के छिलकों की तरह सब बाहर आता गया। सबको एक-एक कर सुना और अंत में यही कहा-अब तक जो खा लिया, सो खा लिया। अब आप सब ऊपज का हिस्सा देने की आदत डाल लो नहीं तो खेत छुड़ाकर दूसरों को हुंडा पर दे देंगे। भाई हमारे भी बाल-बच्चे हैं। भलाई की भी एक सीमा होती है।
सभी बटाईदारों दुखन सहनी से लेकर रघुनाथ साह व अन्य को सख्त चेतावनी दे दी। अब समय-समय पर चक्कर लगाते रहना होगा। वरना धन और धर्म दोनों ही चला जाएगा। गांव से लौटकर…


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कहां है कोरोना
बिहार में कोरोना को लेकर कोई फिक्र नहीं है। बिहार की राजधानी पटना में कोरोना को लेकर जो जांच हो, दूसरे शहरों में इसे लेकर लोगों में भारी लापरवाही दिखी। जो लोग दिल्ली या बाहर से आए हैं, उन्होंने तो मास्क लगा रखा है,लेकिन बाकी लोग जानबूझकर इसे इग्नोर कर रहे। यह ऊपर वाले का ही भरोसा है कि बिहार में कोरोना संक्रमण उतना नहीं फैला, वरना बिहार में स्वास्थ्य व्यवस्था की जो स्थिति है, उससे शायद ही कोई बचता।
सब अपनी मस्ती में हैं। कहीं कोई चेकिंग नहीं, बस एकाध अपवादों को छोड़कर और वो भी सिर्फ शहरों में ही। गांव में कोरोना को लेकर अफवाह जरूर है,लेकिन कोई फिक्र की बात नहीं। किसी को कोई चिंता नहीं। हर दिन कोई अफवाह उड़ा देता है कि अब दिल्ली में लॉकडाउन लग गया है। गांव से लौटकर…

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गांव में राजपूत परिवार
मेरे गांव में राजपूत परिवार 5-6 घर होंगे। अब तो उससे बंटकर कई घर हो गया होगा। इन सबके पास घर बनाने के लिए जमीन नहीं थी, तो रात-रात भर पिताजी के आगे-पीछे होकर लगभग एक बिगहा जमीन बदलैन करा लिया सड़क का। उस जमीन के बगल में इंद्रवा और सिंगाही खोर राजपूत बहुल गांव है। जब जमीन लिया तो इतने विनम्र थे कि पूछिए मत और जमीन मिलते ही हमारे ही खिलाफ हो गए सब। दिनभर गांव में गंदी राजनीति करते रहते हैं सब।
लालबहादुर सिंह सरकारी शिक्षक हैं। जगत बहादुर सिंह उनके भाई हैं। कुल मिलाकर सब पांच भाई हैं। सभी आपराधिक किस्म के हैं।
चोरी-डकैती, छिनतई सामान्य बात है इनके लिए। आनंद मोहन सिंह का इनके यहां उठना-बैठना शुरू हो गया, तब से ये और आग ..ने लगे। खैर, ये इनका अपना मसला था। बाबूजी की मृत्यु और उसके बाद खुद का दवा रियक्शन के बाद से मेरा गांव आना-जाना कम हो गया,जिस कारण कई चीजें मालूम नहीं होती थीं। लोग बताते भी थे तो अपनी बात और आधी चीजें छुपा लेते थे। इस कारण से कई चीजें बिगड़ती चली गईं। गांव में जितनी राजनीति होती है उससे अब गांव बहुत ही दूषित हो चुका है। अब आप बाहर से जाएंगे, तो मन नहीं लगेगा। मन खट्टा हो जाता है। आपको लगता है कि सामने वाला बड़ा-बुजुर्ग है तो उसे आप सम्मान दे रहे हैं और वो आप​को बेवकूफ समझता है। काफी कुछ देखा और सुना भी।

कुछ समय पहले यादव जाति के एक लड़की को महावीरी झंडा उत्सव के दौरान राजपूत जाति के एक लड़के ने छेड़ दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि यादवों ने दरवाजे पर चढ़कर ठुकाई की। उसके बाद इन सबकी गुंडई थोड़ी शांत हुई है। अन्यथा ये किसी की बहू-बेटी के साथ छेड़खानी करना अपनी शान समझने लगे थे। ये हाल है गांव का। शर्म होती है,लेकिन इन सबको शर्म नहीं आती। हमने बचपन में इ सबके चोरी-छिनतई के किस्से सुने थे। आज ये सब देखने को मिल रहा है। गांव से लौटकर…
गांव अब गांव न रहा
बहुत ही प्रदूषित वातावरण हो गया है गांव का। गांव के कई लोग ज्यादातर मल्लाह, यादव, राजपूत जाति के, नेपाली शराब और गांजा बेचकर काफी पैसा इकट्ठा कर चुके हैं। ऐसा नहीं कि लोगों और प्रशासनिक अधिकारियों को मालूम न होगा यह सब, सबका हिस्सा बंटता है। कई लोगों ने तो गांजा बेचकर 3 से 5 बिगहा जमीन लिखा लिया है गांव में।बोरा भरकर पैसा इधर से उधर जाता है और प्रशासन को खबर न हो, यह हो नहीं सकता।
ये तो हाल है गांव का। जिनके कधों पर गांव-समाज के विकास की जिम्मेदारी है, वो सभी दलाली में व्यस्त हैं। गांव से लौटकर…

 

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