मुलाकात ओबामा से.. या यूनिसेफ के साथ मिलकर… कोरोना से लड़ाई..सरपंच शरमी बाई ने राह दिखाई

संतोष कुमार सिंह

सिरोही: टीका उड़े रे गुलाल..लायो रंग केसरियो
टीका उड़ो रे गुलाल..लायो रंग केसरियो
मारी रे मंगेतर..कोरोना वाली
मारी रे मंगेतर..मास्क वाली
मारी रे मंगेतर..सेनेटाईजर वाली
हांथो नारो उड़े रे गुलाल..लायो रंग के​सरियो
दूर दूर रहयो रे उदास लायो रंग के​सरियो
गीत के ये बोल उठाये जाते हैं शरमी बाई गरासिया द्वारा जो निचला गढ़ पंचायत,सिरोही की पूर्व सरपंच और वर्तमान पंचायत समिती सदस्य हैं। अन्य महिलाओं के संग जब इस गीत के बोल के जरिए कोविड अनुकूल व्यवहार और टीकाकरण के महत्व को रेखांकित करते हुए ये तान छेड़ती हैं तो मानो ऐसा लगता है जैसे शरमी बाई कोविड के दौरान कोविड से बचाव के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मूल मंत्र से लोगों को सजग कर रही हों।  शरमी बाई ने पूरे टीकाकरण अभियान के दौरान गंवई लोकतंत्र के बुनियाद को न सिर्फ मजबूत किया है बल्कि इस महामारी के खिलाफ यूनिसेफ जैसी संस्थाओं द्वारा देश में चलाये जा रहे टीकाकरण जागरूकता अभियान में बढ़ चढ़कर भागीदारी करते हुए पंचायती राज व्यवस्था के प्रति आम जन का भरोसा भी बढ़ाया है।

 

एक तरफ जहां देश के अलग—अलग हिस्सों से कोविड टीकाकरण अभियान के खिलाफ विरोध के स्वर सुनाई दे रहे थे, वहीं इस पंचायत समिती सदस्य ने टीके के बारे में जागरूकता फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। शरमी बाई कहती हैं कि “मैंने अपने पहले बच्चे के स्वास्थ्य के साथ बहुत संघर्ष किया क्योंकि मैंने गर्भवती होने पर कभी भी अपना टीकाकरण नहीं कराया या उसे बीसीजी और टेटनस आदि के दिलवाये गये। उसके स्वास्थ्य के रखरखाव को लेकर जिस तरह से वर्षों संघर्ष करना पड़ा उसने मुझे टीकाकरण और टीकाकरण अभियान के महत्व का एहसास कराया। जब कोविड फैलने लगा तो इस महामारी से बचाव के लिए जो मंत्र प्रधानमंत्री या अन्य विशेषज्ञों द्वारा बताये या सुझाए गये वो साफ जाहिर कर रहे थे कि, दो गज दूरी,मास्क है जरूरी और टीकाकरण ही बचाव का एक मात्र रास्ता है। ऐसे में मुझे लगा कि जिस तरह से जच्चे बच्चे के लिए नियमित टीकाकरण अ​भियान के तहत जीवन रक्षक टीका ने अहम भूमिका निभाई है,कोरोना टीकाकरण अभियान भी उसी का विस्तार है।

पहले भी राह दिखाती आई हैं शरमी बाई
ऐसा भी नहीं है कि शरमी बाई ने पहली बार अपने पंचायत के लिए निर्णायक भूमिका अदा किया हो। शरमी बाई उन सरपंचों में शामिल हैं जिन्हे अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा से मिलने और उनके समक्ष पूरे तन्मयता से बिना किसी झिझक के अपनी बात रखने का गौरव हासिल है। भले ही यह सुखद वाक्या 12 वर्ष पहले यानी वर्ष 2010 का हो लेकिन उसी वक्त से शरमी बाई न सिर्फ देश में पहचाने जाने लगीं बल्कि सतत रूप से अपनी पहचान को लोक हित में गाढ़ा करते हुए सदैव गंवई लोकतंत्र की सजग प्रहरी के रूप में अपनी भूमिका निभाती आई हैं।

विलेज प्रेसिडेंट की ​दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश के प्रेसिडेंट से हुई मुलााकात
भले ही 12 वर्ष बीत गया हो, पंचायत में उनकी भूमिका बदल गयी हो लेकिन नीचला गढ़ पंचायत की पूर्व सरपंच और वर्तमान पंचायती राज व्यवस्था में कोरोना जैसी महामारी के खिलाफ जमीनी जंग छेड़कर अपनी भूमिका निभा रही शरमी बाई गरासिया बराक ओबामा से हुई मुलाकात को लेकर आज भी रोमांचित हो उठती हैं और उस पूरे वाक्ये को बड़े ही उत्साह से सामने रखती हैं। कहती हैं, 2010 में, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से हमारी मुलाकात हंगर प्रोजेक्ट के लिए काम करने की वजह से हुई थी। हंगर प्रोजेक्ट के जरिए वैसे पंचायत प्रतिनिधियों के साथ काम करती है जो निर्वाचित महिलायें पंचायत में अच्छा काम कर रही हों। शरमी बाई बताती हैं कि ओबामा से मिलने के पहले दिल्ली में उनका साक्षात्कार हुआ था। वर्ष 2010 में बराक ओबामा मुंबई आए थे जहां उनसे उनकी मुलाकात हुई। उस मुलाकात की याद को ताजा करते हुए कहती हैं कि बहुत भीड़ थी। वो सोच रहीं थी कि मुलाकात होगी, ऐसा बताया गया है लेकिन वे तो वहां लोगों से 2-3 सेकंड के लिए मिल रहे थे। कार्यक्रम के दौरान मैं भी एक इस्टॉल पर खड़ी थी, तभी ओबामा उनके इस्टॉल पर आये। उन्होंने कहा कि मैं अमेरिका का प्रेसिडेंट हूं। मेरा जवाब था, मैं नीचलागढ़ पंचायत की प्रेसिडेंट हूं। वे कहती हैं, ‘ओबामाजी मुझे बोले की वो भी मेरे जैसे परिवार से आए हैं’ (ओबामा ने मुझे बताया कि वह भी एक समान परिवार से आते हैं)। ये क्षण मेरे लिए अविश्वसनीय था कि ​ आदिवासी, सामान्य महिला संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति से मिल रही है और उनसे हाथ मिला रही है। बाकी लोगों से उनकी मुलाकात भले ही एक दो मिनट के लिए हुई लेकिन हमसे 20 मिनट तक उन्होंने बात किया।। इस लिहाज से शरमी बाई पूरे देश से वो पहली महिला सरपंच थी जिन्हें बराक ओबामा से मिलने का सौभाग्य मिला था।

आसान नहीं था सफर
पंचायती राज व्यवस्था में अहम किरदार निभा रही शरमी बाई के सफर की शुरूआत आसान नहीं थी। शरमी बाई कहती हैं कि भले ही अमेरिकी राष्ट्रपति से मुलाकात के बाद उन्हें देश व्यापी पहचान मिली और वो रातों रात पूरे देश में पहचाने जाने लगीं। यहां तक की ‘अब मेरे नाम से राज्य की जीके की किताब में एक सवाल भी है। शरमी बाई भले ही ओबामा से मिलने के बाद पहचान पाने में कामयाब हुई हों लेकिन इस सफर की शुरूआत उस वक्त हुई जब शर्मी बाई 2005 से पंचायत के सदस्य के रूप में चुनी गईं। जब उन्हें 2010 में नीलागढ़ की सरपंच के रूप में चुना गया था, तब उन्हें अदालती मामले से जूझना पड़ा था। कुछ बदमाशों ने उनकी उम्मीदवारी को वापस लेने की अपील करते हुए कहा था कि उनके पास देखभाल करने के लिए चार बच्चे हैं। सरपंच की भूमिका जिम्मेदारी से नहीं निभा पायेंगी। लेकिन शरमी बाई भला कहां हार मानने वाली थीं। सरपंच सरमी बाई चार बच्चों की मां हैं। उसका पति शारीरिक रूप से विकलांग है और गांव में किराने की दुकान चलाता है। बावजूद इसके जीवन उनके लिए कभी आसान नहीं था, अपने माता-पिता के साथ लड़ने से लेकर सरपंच के पद के लिए चुनाव लड़ने के लिए, उन्हें अपने जीवन में कई मोड़ों पर लोगों से अस्वीकृति और आलोचना का सामना करना पड़ा, जो उनका मानना ​​​​है कि उसने उसे वही बनाया जो उसने बनाया था। आज है। एक मजबूत, स्वतंत्र महिला। सभी बाधाओं से जूझते हुए शर्मी बाई ने अभी भी 476 मतों के अंतर से अन्य 5 उम्मीदवारों (2 पुरुष और 3 महिलाओं सहित) पर जीत हासिल की।

​ निर्वाचित होने के बाद से ही शरमी बाई नीचला गढ़ पंचायत के विकास को समर्पित रहीं। चाहे दंतेवाड़ा परियोजना के तहत अपनी पंचायत में चेक डैम, नालियों के निर्माण और हैंडपंप लगाने का काम हो या फिर किसानों के खेती के लिए पानी का उपयोग करने का साधन विकसित करने की पहल हो शरमी बाई हर मोर्चे पर अपनी सक्रिय उपस्थिती दर्ज कराने में कामयाब रही हैं। चाहे स्वचछता का सवाल हो या फिर पहाड़ियों की चोटी पर रहने वाली आदिवासी आबादी का विकास उन्होंने इन अधिकारों के लिए लगातार संघर्ष किया शरमी बाई कहती हैं कि उनका दृढ़ विश्वास है कि महिलाएं पर्यावरण और जल संरक्षण को बचाने के लिए बहुत कुछ कर सकती हैं क्योंकि वे ही हैं जो स्थिति को बेहतर ढंग से समझती हैं और घर के पानी से संबंधित सभी कामों का प्रबंधन करती हैं।
हालांकि शरमी बाई की स्थिती अब बदल गई है। अब वे सरपंच नहीं है बल्कि पंचायत समिती की सदस्य हैं। बावजूद इसके वो अपने अधिकारों का प्रयोग सजगता से गांव के लोगों के लिए करती आई हैं। वह अभी भी अपने समुदाय की सभी महिलाओं के लिए आदर्श बनी हुई हैं और सही मायने में एक सक्रिय ग्राम नेता बनी हुई हैं। यही कारण है कि शरमी बाई ने पूरे कोरोना काल में नीचलागढ़ पंचायत को न सिर्फ कोरोना महामारी से बचाये रखने में कामयाबी पाई बल्कि यूनिसेफ के सहयोग से चल रहे स्थानीय एनजीओ जन चेतना संस्थान के साथ मिलकर पहले खुद कोरोना महामारी,सोशल डिस्टेंसिंग और कोरोना टीकाकरण के महत्व को समझा। खुद टीकाकरण करवाया और उसके बाद पूरे नीचलागढ़ पंचायत में कोरोना के खिलाफ चल रहे टीकाकरण अभियान से पूरे पंचायत को जोड़कर जनअभियान बना दिया।

शरमी बाई गरासिया ये बखूबी समझती हैं कि कोरोना के खिलाफ ये जंग अभी खत्म नहीं हुई है। वे लगातार सक्रिय हैं और माउंट आबू के अन्य पंचायतों की तरह ही नीचलागढ़ पंचायत में भी बूस्टर डोज लगाने का काम चल रहा है। 12 वर्ष से उपर के किशोरों को टीका लगाने का अभियान जोड़ो पर है। साथ ही कोरोना के व्यापक प्रभाव के काल में लगभग भूला सा दिया गया नियमित टीकाकरण अभियान ने भी फिर से गती पकड़ ली है और स्थानीय स्वास्थ्य केंद्रो में जच्चा—बच्चा फिर से जीवन रक्षक टीका के लिए आते दिखाई दे रहे हैं। ये भी कहा जा सकता है कि कोविड ने सभी लोगों को टीके की जरूरत के प्रति सजग करने में अहम भूमिका निभाई है और शरमी बाई जैसी जागरूक पंचायत प्रतिनिधी इस पूरे अभियान का कमान न सिर्फ अपने हाथों में ली हुई हैं बल्कि उत्प्रेरक की भूमिका भी निभा रही हैं।

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