नाकामी छुपा कोरोना कहर को काबू करने का ढ़िढ़ोरा पीटते हुक्मरान

अमरनाथ झा
पटना: कोरोना कहर को संभालने में बिहार सरकार बुरी तरह नाकाम हुई है। लोगों के जीवन की रक्षा के दायित्व को पूरा करने पटना हाईकोर्ट सक्रिय हुआ। रोजाना सुनवाई होने लगी और सरकार व अधिकारियों को बुरी तरह फटकार मिलने लगी तो बौखलाहट में सरकार ने लॉकडाउन लगा दिया। पर अस्पताल, बेड, दवाई, आक्सिजन, एम्बुलेंस आदि की व्यवस्था ठीक करने की कारगर कोशिश नहीं हुई। चिकित्सा के सारे इंतजाम बुरी तरह बदइंतजामी के शिकार हैं। पर इनकी आवाज उठाने वाला कोई नहीं है। कोरोना कहर को संभालने में पप्पू यादव यही करने लगे थे तो उन्हें गिरफ्तार कर 32 साल पुराने मामले में जेल भेज दिया गया है। पूर्व सांसद पप्पू यादव के कारनामे और उनकी गिरफ्तारी एक अलग कहानी है पर कोरोना को लेकर बदइंतजामी व हाईकोर्ट में सुनवाई अलग। पहले हाईकोर्ट से निकली और अन्य स्रोतों से मिली जानकारियों पर बात करें तो भयावह तस्वीर उभरती है।


वर्तमान हालत यह है कि गांव-देहातों में कोरोना कहर  फैल चुकी है। पर अभी तक सरकार सभी जिलों में कोरोना जांच की व्यवस्था भी नहीं कर सकी है। एंटीजन जांच किट की कालाबाजारी हो रही है। पीडितों और मृतकों के आंकडे व्यवस्थित नहीं है। इसलिए अधिक प्रभावित इलाके को चिन्हित कर चिकित्सा की रणनीति बनाने का प्रश्न ही नहीं है। हाईकोर्ट ने पंचायती राज संस्थानों को इस दिशा में सक्रिय होने का स्पष्ट निर्देश दिया है।
कोरोना कहर  की दूसरी लहर का प्रकोप बढ़ने पर लोकहित याचिका के माध्यम से मामला हाइकोर्ट में उठा और अदालत 15 अप्रैल से इस मामले की सुनवाई कर रही है। अदालत के कठोरतापूर्वक हलफनामा के साथ जानकारी मांगने पर मामला परत दर परत खुलता जा रहा है। सरकार के पास सूचनाएं नहीं हैं। अदालत का रुख कड़ा है। सरकार की ओर से बहस करने के लिए सुप्रीम कोर्ट से वकील बुलाए जा रहे हैं। पर अस्पताल, बेड, आक्सीजन, दवाई, एंबुलेंस की गडबड़ी रोजाना उजागर हो रही है। अब तो गंगा में बड़ी संख्या में तैरती लाशें दिखने लगी हैं।
ताजा फैसले में हाईकोर्ट ने बिहार सरकार से गांवों में कोरोना से हुई मौतों का विवरण मांगा है। साथ ही उन 40 लाख प्रवासी मजदूरों की स्थिति का विवरण भी मांगा है जो कोरोना की पहली लहर के दौरान दूसरे राज्यों से लौटकर आए थे। उनमें से कुछ बाद में रोजी-रोटी की तलाश में निकले, पर दूसरी लहर के दौरान फिर वापस आए हैं, अदालत ने उन सबकी स्थिति का पूरा विवरण मांगा है। साथ ही गांगा में तैरती लाशों के बारे में रिपोर्ट मांगी है। बीते सप्ताह बक्सर जिले के चौसा में 70 से अधिक लाशें तैरती हुई मिली थी। जिला प्रशासन ने उनकी अंत्येष्ठि की व्यवस्था की। पर लाशों का मिलना रुका नहीं है। पटना के गंगा घाटों पर भी लाशें मिली हैं। अदालत ने ग्रामीण इलाकों में कोरोना संकट से निपटने के लिए हुए सरकारी इंतजामों के बारे में विस्तृत रिपोर्ट राज्य सरकार से मांगा है। उसने जिलावार मृतकों का आंकड़ा भी देने को कहा है।
राज्य सरकार के एक पिछले हलफनामें में राज्य में कोरोना कहर  से मरने वालों का आंकड़ा 0.56 प्रतिशत कुल संख्या-3,357 बताई गई है। इसका उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि इसमें जिलावार आंकड़ा नहीं दिया गया है, फिर सरकार ने कुल जोड़ कैसे निकाला, यह बात समझ में नहीं आती। इसलिए अदालत ने राज्य के मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि ताजा हलफनामा दायर कर जिसमें सरकार द्वारा की जा रही कार्रवाई और संसाधनों की उपलब्धता के बारे में जिलावार विवरण हो। उल्लेखनीय है कि पिछले निर्देश में हाईकोर्ट ने राज्य भर विभिन्न अस्पतालों में उपलब्ध बेड और उनकी उपलब्धता के बारे में विवरण मांगा था।


मुख्य न्यायाधीश संजय कोरोल और जस्टीस एस कुमार की खंडपीठ ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में अनपढ़, गरीब और वंचित लोगो अपनी समस्या को ठीक से बता भी नहीं पाते। कोई दुर्घटना होती है तो स्थानीय स्तर पर रिश्तेदार उपलब्ध साधनों से अंतिम संस्कार कर देते हैं। इसलिए कोरोना कहर  में महामारी की फैलाव के बारे में पूरी जानकारी प्रशासन को नहीं हो पाती। यह पंचायतीराज संस्थानों के पदाधिकारियों का कर्तव्य होना चाहिए कि मृतकों के बारे में तत्काल स्थानीय प्रशासन को जानकारी दें।
कोरोना कहर को संभालने में पंचायतों के मुखिया, उप मुखिया, प्रमुख, उप प्रमुख, अध्यक्ष, उपाध्यक्ष अपने क्षेत्र में होने वाली मृत्यु की सूचना 24 घंटे के भीतर स्थानीय प्रशासन को दें, प्रशासन इन सूचनाओं के एकत्र करने की व्यवस्था बनाए। केवल यह उपाय प्रशासन को महामारी के फैलाव पर ठीक से नजर रखने में सहायक होगा। मृत्यु की सूचना मिलने के बाद उसके कारण का पता किया जा सकेगा।
सुनवाई के आरंभिक दौर में ही अदालत ने कहा कि सरकार ने आईजीएमएस में कोरोना के इलाज के लिए एक हजार बेड की व्यवस्था करने का वायदा किया था, पर केवल 500 बेड तैयार किए जा सके। पीएमसीएच बुरी हालत में है। एनएमसीएच में सुविधाओं की घोर कमी है। सरकार अदालत में पूरी जानकारी नहीं दे रही। यह हालत राजधानी पटना की है, छोटे शहरों और देहाती इलाके की हालत के बारे में केवल कल्पना की जा सकती है।

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