बिहार में जन वितरण प्रणाली-चुनौतियाँ और सुधार की ज़रूरतें

 अनिन्दो बनर्जी और प्रतिमा कुमारी पासवान

पटना: कोविड-19 महामारी के नियंत्रण के लिए देशभर में लागू किये गये लॉकडाउन तथा अन्य पाबंदियों की स्थिति में जन वितरण प्रणाली एक अद्वितीय जीवनरक्षक व्यवस्था के रूप में सामने आई है। दूसरे विश्वयुद्ध के समय से भुखमरी की रोकथाम के लिए चलाई जा रही यह व्यवस्था वर्ष 2013 से राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के प्रावधानों के स्वरूप में लागू की जाती रही है तथा आज की तारीख में देशभर में लगभग 80.95 करोड़ लोग राष्ट्री खाद्य सुरक्षा कानून के लाभुक के तौर पर पंजीकृत हैं। बिहार में ऐसे लाभुकों की संख्या लगभग 8.64 करोड़ है, जिनमें लगभग 1.16 करोड़ लोग अन्त्योदय अन्न योजना तथा 7.48 करोड़ लोग प्राथमिकता-प्राप्त परिवारों के सदस्य के तौर पर खाद्य सुरक्षा प्रावधानों का लाभ लेने के लिए पंजीकृत हैं। इन दोनों योजनाओं में पहचान किये गए परिवारों को हर महीने 2 रूपए प्रति किलो गेहूं तथा 3 रूपए प्रति किलो चावल की दर से क्रमश: 35 किलो खाद्यान्न (अन्त्योदय अन्न योजना में) तथा प्रति व्यक्ति 5 किलो खाद्यान्न (प्राथमिकता-प्राप्त परिवारों के लिए) दिये जाने का प्रावधान है।

प्रतिमा कुमारी पासवान

अनिन्दो बनर्जी

बिहार की पृष्टभूमि में जन वितरण प्रणाली की वर्त्तमान स्थिति और चुनौतियों का जायज़ा लें, विशेषकर कोविड-19 महामारी से उत्पन्न चुनौतियों के सन्दर्भ में तो कई महत्वपूर्ण सवाल उभरते हैं? क्या जन वितरण प्रणाली के वर्त्तमान स्वरूप में हाशिये पर रहने वाले कमज़ोर सामाजिक और आर्थिक पृष्टभूमि के लोग पर्याप्त रूप से शामिल हैं? एक लाभुक के लिए अपने कोटे के खाद्यान्न का नियमित उठाव कर पाना कितना आसान है? क्या डीलरों के पास समय पर वितरण के लिए पर्याप्त मात्रा में खाद्यान्न उपलब्ध होता है? प्रणाली में कितनी पारदर्शिता और जवाबदेही की व्यवस्थाएँ हैं? इन सवालों के जवाबों को लाभुकों, विक्रेताओं और व्यवस्थागत सुधार के दृष्टिकोणों से ढूँढ़े जाने की ज़रूरत है।

बिहार में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के कार्यान्वयन की व्यवस्था

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत खाद्यान्नों का वितरण जन वितरण प्रणाली के दुकानों के नेटवर्क के ज़रिये किया जाता है। 2011 की जनसंख्या के आधार पर बिहार में जन वितरण प्रणाली के कुल 56,921 दुकानों की आवश्यकता मानी गई है। राज्य सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार वर्श 2018 तक लगभग 42,520 डीलर कार्यरत थे, यानी आज की तारीख में जन वितरण प्रणाली के एक औसत वितरक के पास हर माह लगभग 2000 लाभुकों तक खाद्य सुरक्षा योजनाओं का लाभ पहुँचाने की ज़िम्मेदारी है। कार्यरत विक्रेताओं में लगभग 36.3 प्रतिशत पिछले वर्गों से, 16.7 प्रतिशत अनुसूचित जातियों, 6.4 प्रतिशत अल्पसंख्यक समुदायों तथा 0.8 प्रतिशत अनुसूचित जनजातियों से हैं। महिला डीलरों का अनुपात लगभग 8.6 प्रतिशत है जबकि 0.4 प्रतिशत विक्रेता विकलांग श्रेणी के हैं। संस्थागत विक्रेताओं में सहकारी समितियों की तादाद लगभग 10.3 प्रतिशत तथा स्वयं सहायता समूहों का अनुपात लगभग 0.7 प्रतिशत हैं।

लॉकडाउन की वजह से उत्पन्न कठिन परिस्थितियों में आर्थिक रूप से कमज़ोर परिवारों को राहत पहुँचाने के लिए भारत सरकार की ओर से कई नीतियां की घोषणा की गई। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के नियमित प्रावधानों के अतिरिक्त हर लाभुक को तीन महीनों के लिए प्रति व्यक्ति 5 किलाग्राम मुफ्त खाद्यान्न तथा प्रति परिवार 1 किलाग्राम मुफ्त दाल दिये जाने की घोषणा की गई। साथ ही दूसरे राज्यों से घर वापसी कर रहे प्रवासी मज़दूरों को भी मई और जून 2020 के महीनों में प्रति व्यक्ति 5 किलोग्राम खाद्यान्न उपलब्ध कराने का निर्णय लिया गया। ऐसे मज़दूरों की संख्या की स्पष्ट जानकारी न होने की वजह से बिहार में अन्त्योदय अन्न योजना और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून में प्राथमिकता-प्राप्त परिवारों की कुल संख्या के दस प्रतिशत के हिसाब से अतिरिक्त आवंटन का फैसला किया गया तथा जन वितरण प्रणाली के विक्रेताओं को अपने अपने क्षेत्र में वापस आए ऐसे मज़दूरों की संख्या का पता लगाने और उनके लिए खाद्यान्न उपलब्ध कराने की ज़िम्मेदारी दी गई।

चुनौती यह रही कि जन वितरण प्रणाली के ज़्यादातर विक्रेताओं के पास पंजीकृत लाभुकों की संख्या के अलावे मई महीने के अंत तक एक भी अतिरिक्त लाभुक के नाम पर खाद्यान्न उपलब्ध नहीं कराया गया। प्रणाली में दर्ज़ आँकड़ों के अनुसार जहाँ वर्ष 2020 के जनवरी, फरवरी और मार्च के महीनों में बिहार में क्रमश: कुल 84.3, 85.4 और 86.5 लाख क्विंटल अनाज का वितरण किया गया, वहीं लॉकडाउन के दौरान अप्रैल, मई और जून के महीनों में क्रमश: कुल 84.2, 83.7 और 59.4 लाख क्विंटल अनाज ही बाँटा जा सका। शायद व्यवस्था की अपेक्षा थी कि विक्रेता अपने पास उपलब्ध नियमित स्टॉक से ही ज़रूरतमंद लोगों को अतिरिक्त अनाज उपलब्ध करा सकेंगे, चूँकि आज की व्यवस्था में कोई विक्रेता चाहे तो ठीक-ठाक तादाद में खाद्यान्न के उपलब्ध स्टॉक से ही अन्य उद्देश्यों के लिए अनाज निकाल सकता है। इसके कई कारण हैं। यूँ तो राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत चिह्नित प्राथमिकता-प्राप्त परिवारों तथा अन्त्योदय अन्न योजना के लाभुकों के नाम पर निर्धारित आवंटन जन वितरण प्रणाली के विक्रेताओं को हर महीने उपलब्ध कराया जाता है, लेकिन लगभग हर विक्रेता के वितरण क्षेत्र में ऐसे कई लाभुक परिवार होते हैं जिन्हें यह जानकारी नहीं होती कि उनका कार्ड बना हुआ है और उनके नाम से नियमित आवंटन भी आता है। समय समय पर प्रणाली में शामिल किये जाने का आवेदन करने वाले बहुत सारे इच्छुक परिवारों का आवेदन लम्बे समय तक अनुमंडल पदाधिकारी के पास लंबित होता है और कभी कभी आवेदन स्वीकृत हो जाने पर भी इसकी जानकारी लाभुकों को नहीं हो पाती। कभी कभी डीलरों के पास भी सभी लाभुक परिवारों की पहचान नहीं होती, जिस वजह से उनके नाम से जारी खाद्यान्न का उठाव नहीं हो पाता। कभी—कभी प्रणाली में एक ही नाम कई बार दर्ज़ होता है, जिसकी वजह से खाद्यान्न का उठाव नहीं हो पाता। इसी तरह बिना आधार सीडिंग वाले राशन कार्डों पर भी उठाव नहीं हो पाता। साथ ही, अक्सर कई लाभुकों की आँखों की पुतलियों या उंगलियों के निशानों का प्रणाली में दर्ज़ डाटा से मिलान नहीं हो पाता, जिसकी वजह से वह अपने कोटे का उठाव नहीं कर पाते। ऐसा माना जाता है कि बड़ी संख्या में विक्रेता पंजीकृत लाभुकों को साल में नौ महीनों से ज़्यादा का राशन वितरित नहीं करते, जबकि आधिकारिक रिकार्ड में अनाज के पूर्ण मात्रा में वितरण और उठाव की पुष्टि की जाती है।

यह बात महत्वपूर्ण है कि ऊपरोक्त कारणों से विक्रेता के नाम जारी किये गए स्टॉक की मात्रा के अनुसार खाद्यान्न का पूरा पूरा उठाव नहीं हो पाना अक्सर विक्रेता के नुकसानों की भरपाई करने के ही काम आता है, अन्यथा यह व्यवस्था शायद विक्रेताओं के लिए बहुत फायदेमंद नहीं होगी। यह नुकसान आपूर्त्ति में दर्ज़ की गई वजन या गुणवत्ता की कमियों की भरपाई तो करता ही है, साथ ही कभी कभी स्थानीय दबाव में दिये जाने वाले अतिरिक्त खाद्यान्न के समायोजन के भी काम आता है। कई विक्रेताओं को हर महीने अपने क्षेत्र के प्रभावशाली लोगों तक ठीक-ठाक तादाद में अनाज पहुँचाना पड़ता है ताकि उनकी कृपा बनी रहे। वैसे डीलरों के पास यह मौका होता है कि वह ऐसे लाभुकों को भी खाद्यान्न उपलब्ध करा सकें जिनके शारीरिक निशानों का मिलान मशीन के डाटा से न हो रहा हो, बशर्त्ते वह अपने आधार कार्ड के साथ उपस्थित हों। बाकी लाभुकों को अपना कोटा उपलब्ध करा दिये जाने के बाद सबसे अंत में ऐसे लोगों को निर्धारित मात्रा में खाद्यान्न दिया जा सकता है, जिसका विवरण एक ऑफलाइन पंजी में रखा जाता है। कई बार एक डीलर के ऑनलाइन व ऑफलाइन वितरण की पंजियों की प्रविष्टियों में 100 बोरों तक का फ़र्क हो जाता है।

एक डीलर को हर महीने अपनी दुकान पर दर्ज़ लाभुकों के नाम पर निर्धारित कोटा हासिल करने के लिए प्रखंड स्तरीय विपणन अधिकारी के पास रसीद कटवाना पड़ता है। फिर डीलर की उपस्थिति में दुकान पर विभाग की ओर से स्टॉक की डिलीवरी करवाई जाती है तथा उपलब्ध स्टॉक का ब्यौरा डीलर को अपनी दुकान पर संधारित स्टॉक पंजी में दर्ज़ करना होता है। विक्रेताओं के अनुसार 50 किलो के बोरों में कभी कभी 10 किलो तक की अशुद्धियाँ पाई जाती हैं, जिसका खमियाजा विक्रेताओं को ही भुगतना पड़ता है। कभी कभी डिलीवरी करने वाली व्यवस्था में ऐसे तत्व शामिल होते हैं जिनका मिलावटी या खराब गुणवत्ता के खाद्यान्न की आपूर्त्ति में निहित स्वार्थ होता है। डीलर को विक्रय किये गए प्रति किलोग्राम खाद्यान्न में 70 पैसे की प्रोत्साहन राशि दिये जाने का प्रावधान है, यानी हर महीने 2000 लाभुकों को 5 कि.ग्रा. की दर से खाद्यान्न के विक्रय की स्थिति में डीलर को 7000 रू. तक की मासिक आमदनी हो सकती है, बशर्त्ते उसे किसी सहायक को काम में मदद के एवज में भुगतान न करना पड़े। जन वितरण प्रणाली के हर दूकान पर 4 या 5 लोगों को व्यस्त रख पाने लायक काम तो होता ही है, जिसमें भंडार से ग्राहक के लिए अनाज निकालना, तौलना, पॉस मशीन का संचालन, वितरण के ब्यौरों को रजिस्टर में दर्ज़ करना, साफ-सफाई जैसे कई कार्य शामिल हैं। सीमित आमदनी की वजह से ऐसे विक्रेताओं की संख्या नगण्य है जो सहायकों की मदद ले पाते हैं। प्रायः ऐसी परिस्थितियाँ ही अनाज की कालाबाज़ारी का कारण भी बनती हैं। विक्रय का काम ज़्यादातर नकद में ही होता है तथा विक्रय के ब्यौरे का संधारण बिक्री पंजी में किये जाने का प्रावधान है। किसी भी अनियमितता की स्थिति में डीलर के पास उपलब्ध शिकायत पंजी में कोई लाभुक अपनी शिकायतें दर्ज़ कर सकता है।

पिछले 3 सालों से जन वितरण प्रणाली के अन्तर्गत खाद्यान्न की बिक्री के लिए पॉस मशीन का उपयोग किया जाता रहा है, जिसमें हर बिक्री से संबंधित कार्ड और डीलर का विवरण तथा बिक्री की तारीख, समय और मात्रा स्वतः दर्ज़ करने का प्रावधान है। विक्रेताओं के अनुसार इन मशीनों के उपयोग से व्यवस्था में सहजता तो ज़रूर आई है, मगर इन मशीनों की एक मुख्य खामी वितरण की प्रक्रियाओं के दौरान जब-तब स्वतः लॉग आउट हो जाने का है, जिससे बार बार सिस्टम में दुबारा प्रवेश करने की ज़रूरत आती रहती है। कभी कभी इन्टरनेट कनेक्शन बाधित या अनियमित होने की स्थिति में लाभुकों को लम्बा इन्तज़ार करना पड़ता है, जिसकी वजह से विक्रेताओं को अक्सर अपना निजी इंटरनेट कनेक्शन उपयोग में लाना पड़ता है। कभी कभी सरवर तक पहुँच बना पाना मुश्किल हो जाता है, जिससे लाभुकों को बार बार दुकान पर आते रहने की ज़रूरत बनती है। अन्यथा, सामान्य स्थितियों में प्रति लाभुक 2 मिनट से 30 मिनट तक के समय अंतराल के अन्दर खाद्यान्न के वितरण की प्रक्रिया पूरी हो जाती है। मशीन में किसी तरह की गड़बड़ी हो जाने की स्थिति में विक्रेताओं को प्रखंड स्तर के तकनीकी सहायकों की मदद लेनी होती है। विक्रेताओं की एक बड़ी शिकायत यह है कि मशीन की तकनीकी गड़बड़ियों में सुधार करवाने के लिए कई बार तकनीकी सहायकों को पैसे देने पड़ते हैं। यह भी कि पॉस मशीनों के साथ छेड़छाड़ संभव है और अनाज के वितरण को बढ़ा-चढ़ा कर रिपोर्ट किया जा सकता है।

विक्रेताओं को प्रायः अधिकारियों और स्थानीय नेताओं का दबाव झेलना पड़ता है। अक्सर बहुत से काम बिना पर्याप्त समय या पूर्वसूचना के निपटाने होते हैं। कभी कभी सिस्टम में नाजायज़ प्रविष्टियां दर्ज़ करने का भी दबाव होता है। उदाहरण के लिए, यद्यपि लॉकडाउन के लगभग डेढ़ महीनों के बाद तक भी पटना अनुमंडल के भी कई विक्रेताओं तक प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के तहत देय दाल की आपूर्त्ति नहीं हो सकी थी, फिर भी कई डीलरों पर दबाव था कि वह दाल का वितरण न हो पाने की ज़िम्मेदारी अपने कंधो पर लें और सिस्टम में दाल की उपलब्धता दर्ज़ करें। इसी तरह का दबाव हर दुकान के पोषक क्षेत्र में वापस आए प्रवासी मज़दूरों की संख्या के निर्धारण का भी था, जिसके लिए कई डीलरों को बहुत कम समय दिया गया। निर्देषों पर अमल न होने की स्थिति में सीधे एफ. आई. आर. दर्ज़ किये जाने या अनुज्ञप्ति रद्द किये जाने की धमकी दी जाती है। दबाव और धमकियों के प्रशासनिक माहौल में ही पूरी व्यवस्था काम करती है और दबाव हर स्तर पर दिखता है, चाहे वह डीलर हों, विपणन अधिकारी हों या उनके ऊपर के पदाधिकारी। कई डीलरों का मानना है कि उनके खुद के संगठनों के कई नेता भी प्रभावशाली लोगों की शह पर व्यवस्था में यथास्थिति बरकरार रखने में लगे होते हैं। पंचायत के नेताओं की ओर से भी कभी कभी अतिरिक्त या फर्ज़ी लाभुकों को फायदा पहुँचाये जाने का दबाव होता है, जिनपर अमल न करने पर कभी कभी पंचायत स्तरीय निगिरानी समिति की ओर से विक्रेताओं के खिलाफ शिकायतें भी दर्ज़ की जाती हैं। किसी ऐसी स्थिति में ज़िम्मेदार प्रशासनिक हस्तक्षेप बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। पटना सदर अनुमंडल के एक विक्रेता ने एक संवेदनशील महिला अनुमंडल पदाधिकारी का उदाहरण दिया, जो गैर-ज़िम्मेदार शिकायतों की स्थिति में शिकायतकर्त्ताओं को अपनी ज़िम्मेदारियों का अहसास कराने में कोई कसर नहीं छोड़ती थी।

व्यवस्था से जुड़ी विभिन्न चुनौतियों के बीच महिला विक्रेताओं को अलग तरह के जोखिमों का सामना करना पड़ता है। जब से महिलाओं को जन वितरण प्रणाली में बतौर विक्रेता शा​मिल किये जाने की नीति बनी है, बड़ी संख्या में महिलाओं का व्यवस्था में प्रवेष हुआ है। दबाव और धमकियों के माहौल में चलने वाली इस व्यवस्था में पुरूषों का वर्चस्व हर स्तर पर दिखता है और अक्सर महिला विक्रेताओं को यथोचित सम्मान नहीं मिल पाता। अकसर महिला विक्रेताओं को अलग अलग तरह के उत्पीड़नों का सामना करना पड़ता है, जिनमें धमकाये जाने और हाथ पकड़ कर खींचे जाने से लेकर कई अन्य तरह की हिंसाएं शामिल होती हैं। व्यवस्था में बने रहने के लिए महिलायें अक्सर इन बातों की शिकायतें दर्ज़ नहीं करतीं। यह बेवजह नहीं कि बहुत सारी महिलाओं के नाम से जारी की गई अनुज्ञप्तियों का संचालन उनके परिवार के पुरूषों के द्वारा किया जाता है।

प्रणाली में समाज की वंचित जातियों से आने वाले विक्रेताओं का अनुभव भी बहुत सुखद नहीं है। वितरण की व्यवस्था और प्रक्रियाओं में अक्सर कुछ खास प्रभावशाली जातियों के अधिकारियों और दलालों का दबदबा होता है, जिसकी वजह से बहुत से डीलरों को कई स्तरों पर समझौते करने पड़ते हैं। ऐसे भी बहुत सारे मामले दिखते हैं जहाँ औपचारिक रूप से दुकान चलाने का लाइसेंस वंचित जातियों से आने वाले लोगों के नाम होता है, मगर वास्तव में अन्य प्रभावशाली जातियों के लोग दुकानों को चला रहे होते हैं। वंचित जातियों के कई अनुज्ञप्तिधारकों को हर माह दुकान पर वास्तविक नियंत्रण रखने वाले ‘मालिकों’ की ओर से एक मासिक भुगतान किया जाता है और प्रणाली का पूरा संचालन प्रभावशाली तबकों के लोगों के हाथ में चला जाता है।

सुधार की ज़रूरतें व संभावनायें

आम जनजीवन में जन वितरण प्रणाली की अहमियत को देखते हुए इसकी सुलभता, प्रक्रियाओं और व्यवस्था में व्यापक सुधार की ज़रूरत दिखती है। सुधार का एजेंडा विशेषकर आम लाभुकों और विक्रेताओं के अनुभवों के आधार पर निर्धारित किया जाना चाहिये, जिसमें निम्नलिखित बातों का शामिल होना ज़रूरी होगा –

कोविड-19 महामारी की स्थिति में छूटे हुए ज़रूरतमंद परिवारों को व्यवस्था से जोड़ने की जो ज़रूरतें सामने आई हैं, वह मूलतः प्रणाली के सार्वभौमीकरण की ज़रूरत की ओर इशारा करता है, ताकि कोई भी परिवार महज़ चयनात्मक प्रक्रियाओं की खामियों की वजह से अपने अधिकारों से वंचित न हों पायें। इससे अनाज की कालाबाज़ारी की रोकथाम में भी मदद मिलेगी। आज की तारीख में बड़ी संख्या में बेघर परिवार, घुमंतु जातियों के लोग, एकल महिलायें और हाशिये पर स्थित समुदायों के लोग व्यवस्था से बाहर हैं। यूँ भी उपभोक्ता मामले, खाद्य और नागरिक आपूर्त्ति मंत्रालय के अनुसार भारतीय खाद्य निगमों के गोदामों में पिछले पाँच वर्षों में लगभग 38,000 मीट्रिक टन खाद्यान्न बर्बाद हो चुके हैं, और ऐसी बर्बादी से बेहतर है खाद्यान्न का अतिरिक्त मात्रा में ज़रूरतमंद परिवारों के पास उपलब्ध होना।

व्यवस्था में पूरी पारदर्शिता लाया जाना दूसरी बड़ी ज़रूरत है। सार्वजनिक दायरे में एक ऐसा सूचना तंत्र बनाये जाने की ज़रूरत है जिसमें कोई भी नागरिक जन वितरण प्रणाली के पूरे तंत्र के हर हिस्से पर नज़र रख सके तथा व्यवस्थागत खामियों की वजह से उसके अधिकारों की हकमारी न हो। किसानों से अनाज खरीदे जाने से लेकर गोदामों के भंडारण, जन वितरण प्रणाली के हर दूकान के लिए जारी किये गए स्टॉक तथा लाभुकों द्वारा उठाव की पूरी जानकारी सार्वजनिक स्तर पर उपलब्ध तंत्र में दर्ज़ होनी चाहिये।

लाभुकों का नियमित फीडबैक व्यवस्था में दर्ज़ किये जाने की ज़रूरत भी इस सुधार का हिस्सा होना चाहिये, जिसके लिए कई तरह के सरल, सहभागी तरीकों का उपयोग किया जा सकता है। लाभुकों के पास अपने जन वितरण प्रणाली की दुकान का मुआयना करने, भंडारण की जाँच करने, सूचना मांगने और सवाल पूछने का भी अधिकार होना चाहिये, जिसके लिए सप्ताह का एक खास दिन निर्धारित किया जा सकता है।

व्यवस्था में जन वितरण प्रणाली के विक्रेता की अहम भूमिका को देखते हुए उनके लिए एक निश्चित मानदेय का निर्धारण किया जा सकता है, ताकि खाद्यान्न की आपूर्त्ति में विलंब की स्थितियों में उनकी आमदनी बाधित न हों। उनपर स्थानीय नेताओं, पूर्व डीलरों और वरीय अधिकारियों की ओर से किसी तरह का अनुचित दबाव न हो, इसके लिए भी आवश्यक कदम उठाये जाने की ज़रूरत है। विक्रेताओं के खुद के मज़बूत संगठन का उपलब्ध होना एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है, जिस दिशा में विक्रेताओं को स्वयं पहल करना चाहिये।

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