मेरा गांव सजांव… पुरखों ने एक संसार रचा था, हम पूरी शिद्दत से उसे उजाड़ रहे हैं

शिवानंद द्विवेदी
मेरा गांव सजांव बिहार सीमा से सटे पूर्वी उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में पड़ता है। मुझे गांव में रहने का ऐसा अवसर शायद बीस साल बाद मिला है।
आजकल ‘आपदा में अवसर’ चलन में है। कोरोना नामक इस अदृश्य परिजिवी ने हमें आपदा के अंतहीन लगने वाले दौर में बांध दिया है। अंतहीन इसलिए क्योंकि ये जाता है तो पलटकर आता भी है। दूसरी लहर गयी नहीं कि तीसरी लहर की चेतावनी डराने लगी है। कहावत है ‘जो डर गया वो मर गया। लेकिन कोरोना के मामले में जो डर गया और घर से नहीं निकला उसके सुरक्षित होने की गुंजायश ज्यादा है। खैर आपदा के इस दौर में मुझे अपने गांव में डेढ़ महीने से ज्यादा रहने का अवसर मिल गया।                                                                                                                                                                                   …मेरा गांव सजांव
यानी मेरे हिस्से का ‘आपदा में अवसर’ यही है कि मुझे अपने गांव रहने का मौका मिला। गांव में रहने के सुख भी अंतहीन हैं। बयां नहीं किया जा सकता है। सिर पर बाल होने का महत्व सबसे ज्यादा वह बता सकता है जिसके सिर पर बाल न हों। ठीक वैसे ही गांव के सुख का सही महत्व वही बखान पायेगा जो किन्हीं कारणों से मेरी तरह शहर में रहने को मजबूर हुआ हो। हमने गांव छोड़ दिया। अंधाधुंध शहरों की तरफ भागे। ऐसे भागे मानो वहां ….का अकूत खजाना गड़ा है। जबकि यह हमारी मृगतृष्णा थी जिसे हम खोजते हुए एक शहर से दूसरे शहर भटक रहे हैं। जबकि खजाना हमारी मिट्टी पड़ा है।                                                                                …मेरा गांव सजांव
बड़ा निराश हुआ जब अनेक लोगों के मुंह से सुना कि ‘खेती में कुछ बा ना.. खेती से पेट ना भरी….ब्लां…ब्लां। बरबस कवि डॉ राम कुमार वर्मा याद आ गये, जिन्होंने कभी लिखा था, ‘हे ग्राम देवता नमस्कार….सोने-चांदी से नहीं किंतु तुमने मिट्टी से किया प्यार…हे ग्राम देवता नमस्कार!’ सोच रहा हूं वर्मा जी ने किनके लिए लिखा होगा ये सब? उनके लिए जो मानते हैं कि खेती से पेट ना भरी!

जब मैं छोटा था तो कभी ‘खेती’ शब्द किसी के मुंह से नहीं सुनता था। जब भी सुना ‘खेती-बारी’ शब्दयुग्म ही सुना। उस समय तक जो लोग खेती करते थे वो बारी (बगीचा) भी संजोते-संभालते थे। अब वैसे बारी (बगीचा) नहीं देखने को मिलते हैं। ठूंठ पड़े उस परती जैसे विशाल भूखंड, जिसे खेत कहा जा रहा, के बीचोबीच खड़ा होकर सोच रहा होता हूं। कि ‘खेती’ तो जैसे-तैसे बची है, मगर वो बारी (बगीचे) कहां गये? ‘खेती-बारी’ महज शब्दयुग्म नहीं थे, बल्कि यह हमारे गांवों का संसार था, जो उजड़ा-उजड़ा सा नजर आता हैं। जब दो शब्द मिलते हैं तो केवल शब्द नहीं मिलते बल्कि संसार रचते है।. चलन से शब्द उजड़ते हैं तो अपने अर्थों में रचे संसार को भी खंडहर बना देते हैं। गांवों से ‘बारी’ का उजड़ना ऐसे ही ठूंठ के निर्माण और प्रकृति के ध्वंस की शुरुआत है। ध्वंस की अभी बुवाई हो रही है। फसल तो हमारी आने वाली पीढियां काटेंगी. काश इस फसल को कीड़े लग जाएं।                                                                            …मेरा गांव सजांव
खैर कोरोना की त्रासदी ने इस यूटोपिया की पोल खोल दी। शहर निर्मम, निष्ठुर साबित हुए और गांवों ने खुली बाहें पसार कर अपनों को गले लगाया। गांवों की एक और विशेषता है कि यहां कोई रोटी के बिना नहीं मरता है। लेकिन फिर भी गांव आधुनिक समाज के लिए समस्या हैं और शहर समाधान! कभी-कभी सोचता हूं। कि जल्द ही सारे गांव शहर हो जाते ताकि सारी समस्याएं खत्म होतीं और चहुंओर सिर्फ समाधान ही समाधान दिखता। पता नहीं यह कब होगा?
शहरी आकर्षण से ग्रसित ज्यादातर लोग खुद को पूर्णकालिक बीमार मानकर अपना भविष्य प्लान करते नजर आयेंगे। उनसे पूछिए कि शहर क्यों जरुरी है तो जवाब होगा बच्चों के लिए स्कूल और हेल्थ फेसिलिटी। स्कूल पर आगे चर्चा करेंगे लेकिन हेल्थ फेसिलिटी की पोल भी कोरोना की त्रासदी ने खोल दी है। वो मानकर बैठे हैं कि उन्हें भविष्य में अस्पताल में ही जल्दी पहुंचना है। उन्हें अपने को बीमार होने से बचाने अर्थात स्वस्थ रहने के उपाय करने से ज्यादा फिक्र इसबात की है कि अस्पताल का रास्ता उनके घर से कितना दूर है। ऐसे लोग हेल्थ मार्किट के लिए ‘पोटेंशियल कस्टमर’ हैं। उन्हें पता है कि उनका जीवन बिना अस्पताल के चल ही नहीं सकता। कोरोना में ऑक्सीजन के संकट के लिए हम जिसे मर्जी कोस लें, लेकिन साझा गुनहगार तो हम सभी हैं। गांवसे निकलकर शहर में बसने की चाह में क्या कभी हमने खुद से पूछा है कि हमारी कृषि संरचना से बारी (बगीचे) क्यों उजड़ गये? खैर हम नहीं पूछेंगे क्योंकि हमारे लिए करना कठिन और बोलना आसान हो चूका है। हम इसी के अभ्यस्त समाज का निर्माण कर रहे हैं।                                                      …मेरा गांव सजांव

भौगोलिक बसावट के लिहाज से मेरा गांव सघन बस्तियों वाला है। कहा जा सकता है कि आबादी और सघनता के लिहाज से देवरिया जिले के दस बड़े गांवों में शुमार है।  गांव के उत्तरी सीमा पर प्रसिद्ध जंगली बाबा का स्थान है। पूरबी सीमा पर माँ दूर्गा का काली माई का चौरा है। पश्चिम में भगवान भोले नाथ और माता जी का मंदिर है, जहां ‘हाथी वाले बाबा’ बैठते हैं। दक्षिण में गांव के लोकदेवता डीहवार बाबा विराजते हैं। बीच गांव में श्री राम-जानकी मंदिर है तो वही गांव के पूज्य लोकदेव रतन पाड़े बाबा का स्थली है। अनेक ऐतिहासिक अच्छाइयों को अपनी परंपराओं में समेटे हुए है। कई परंपराएं सिर्फ इसलिए निभाई जाती हैं क्योंकि परंपरा हैं। इसलिए नहीं निभाई जातीं कि उन्हें करने का जूनून भी गांव के सभी लोगों में है। 1952 में मेरे गांव में ग्राम-समाज द्वारा रामलीला का मंचन शुरू होता है। यह रामलीला दिन के उजाले में और खुले मैदान में होती है। 1952 से यह अनवरत जारी है। जब छोटा था तब मैंने भी इसमें लक्ष्मण का किरदार किया था। अब नहीं करता हूं। क्योंकि शहर में आ गया हूं। शहर सभ्य होते हैं। मैं भी सभ्य हो गया हूं। मैं केवल लेख लिखकर रामलीला की तारीफ कर सकता हूं, लेकिन अब किरदार नहीं निभाता क्योंकि यह शहरी लोगों का काम नहीं है। ठीक वैसे ही जैसे खेती से कुछ नहीं होना। हमने करना छोड़ दिया कुछ साल बाद गांव भी करना छोड़ देंगे। इसलिए छोड़ देंगे क्योंकि शहरी सभ्य समाज ने एक यूटोपिया गढ़ दी है कि शहर समाधान हैं और गांव समस्या।                                                                                                                                            ...मेरा गांव सजांव
गांव का सामाजिक ताना-बाना विविधताओं से भरा है। सवर्ण बहुलता वाले इस गांव में लगभग 3 हजार से अधिक मतदाता हैं। गांव में सवर्ण(ब्राह्मण) आबादी सर्वाधिक है। ओबीसी और अनुसूचित जाति तबके की आबादी भी अच्छी है। गांव के उत्तर दिशा से पश्चिम और पूरब की तरफ गांव का फैलाव सवर्णों की बहुलता के साथ-साथ दो-तीन परिवारों वाली पेशेवर जातियों मसलन, नाई और धोबी, जातियों की जनसंख्या वाला है। वहीं दक्षिण से पूरब और पश्चिम की तरफ ओबीसी और दलित समाज के लोगों की बसावट है। आबादी सघन होने की वजह से कोई सीमा विभाजन कभी भी नहीं रहा।

टूट रही है बेड़ियां लेकिन बनी हुई है जातीयता की जकड़न
मैं जब बचपन में स्कूल में पढ़ने जाता था तब बैठक व्यवस्था में कोई भेदभाव नहीं था। दलित समाज के छात्रों के साथ बैठकर पढ़ते थे। दलित और पिछड़ा समाज से मेरे कुछ मित्र भी बन गए थे जो आज भी मिलते हैं तो हालचाल लिया जाता है। पुराने दिन याद किये जाते हैं। यह कठोर सच है कि इस तबके के पास तुलनात्मक रूप से जमीन कम है। लेकिन यह तबका मेहनतकश है। मेरे साथ पढ़े कई मित्र जो दलित समाज से आते हैं अच्छी स्थिति में है। जो कहीं रोजगार नहीं पा सके हैं वे दैनिक श्रम से आजीविका जुटा रहे है। उनका परिश्रमी होना मुझे प्रेरित करता है। मैं मानता हूं कि सवर्ण समाज के बच्चों को भी उनसे यह सीखना चाहिए। यह सच है कि भेदभाव कम हुआ है। लेकिन समाप्त नहीं हुआ। जातीयता की जकड़न अभी भी कई मोर्चों पर मजबूती से बंधी हुई है। इसे ढीला होने में शायद और वक्त लगे। इसे ढीला होना चाहिए।                                                                                                                                  …मेरा गांव सजांव

छुआछूत के बावजूद बना हुआ है जातीय सद्भाव
जातीय/धार्मिक सद्भाव मेरे गांव की विशेषता कही जा सकती है। गांव के उत्तर और पूरब में 25-30 परिवार मुस्लिम समाज का है। मुझे याद है जब मोहर्रम में उनके ताजिया निकलता था तो वह पूरे गांव, सभी समाज, के लोगों के दरवाजे पर जाता था। ताजिये का बाकायदे जल गिराकर पूजन सभी हिन्दू परिवारों की महिलाओं द्वारा किया जाता था। बचपन में हम लोग ताजिये के दिन भाले और तलवारों के करतब देखने के लिए ताजिये के पीछे-पीछे घूमते थे। वहीं गांव की रामलीला में ताशा बजाने का काम मुस्लिम परिवार के जिम्मे था। परंपरा के रूप में ही सही लेकिन ये आज भी जारी है। छुआछूत जरूर अभी भी गांव में है। लेकिन कम हुआ है।

आरक्षण ने खोला प्रतिनिधित्व का रास्ता
हमारे गांव के इतिहास में पहली बार 2005 में अनुसूचित वर्ग के धोबी समुदाय से ग्राम प्रधान चुना गया क्योंकि पंचायत अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित थी। बीच में एकबार पिछड़ा के लिए आरक्षित हुई तब ओबीसी ग्राम प्रधान चुने गए। इसबार फिर अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हुई तो दलित समाज से एक युवा निर्वाचित होकर आए। सामाजिक न्याय के लिए आरक्षण एक विवादित विषय है। फिर भी मैं मानता हूं कि अगर सबकी भागीदारी और प्रतिनिधित्व का एकमात्र रास्ता आरक्षण ही है, तो वही सही। मैं भरोसे के साथ नहीं कह सकता हूँ कि अगर आरक्षण नहीं होता तो मेरे गांव में गैर-सवर्ण पंचायत प्रधान बन पाता। सबका आगे आना अच्छा है।

सरकारी स्कूली ​शिक्षा व्यवस्था में आई गिरावट

रही बात स्कूल की तो शिक्षा व्यवस्था का अति सरकारी करण हमारे देश के ग्रामीण शिक्षा तंत्र की नाकामी की बड़ी वजह है। मेरी प्राथमिक शिक्षा गांव प्राथमिक विद्यालय में ही हुई है। पाठक बाबा, मोटका पंडीजी, मोल्बी साहब, गुरु जी…कुछ नाम भूल रहा हूं जिन्होंने मुझे क, ख, ग….से सीखाना शुरू किया। पेड़ के नीचे, बोरी पर बैठकर, भट्ठा से पटरी पर लिखकर ही हमारे बचपन की शुरुआती शिक्षा हुई। मुझे नहीं पता कि आज जो पीढ़ी प्राथमिक शिक्षा के अति दबाव में पढ़ाई कर रही है, उनका भविष्य क्या है लेकिन मेरे साथ के औसत दिमाग वाले अनेक छात्र वर्तमान में अच्छा कर रहे हैं। हमारी पीढ़ी साबित हुई पीढ़ी है और नयी पीढ़ी को अभी साबित होना है। …मेरा गांव सजांव
जब हम प्राइमरी में पढ़ते थे तो सबसे ज्यादा डर मार खाने का होता था। आज वह डर अनेक बेवजह के नियमों में बंधकर खत्म हो चुका है। अब छात्र सम्मान नहीं बल्कि कानूनों से हासिल अधिकारों के भरोसे शिक्षक से बात करते हैं. कौन पद्धति सही है और कौन गलत, इसपर मैं कोई निर्णय नहीं दे रहा. मैं सिर्फ इस बदलाव को बता रहा हूं। गांवों के सरकारी स्कूल अब गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा के लिए कम और दोपहर के भोजन की गुणवत्ता के लिए ज्यादा जवाबदेह हैं। कभी-कभी लगता है कि हमारे प्राथमिक विद्यालयों का उद्देश्य ‘कुपोषण हटाओ अभियान’ के लिए ही है।                                                                                                                                                    …मेरा गांव सजांव

एक समय था जब धन की कमी थी लेकिन गांव को जिंदा रखने के जूनून में कमी नहीं थी। गांव के सबसे पुराने विशाल बरगद के नीचे खड़े होकर मैं सोच रहा था कि हमने किसकी-किसकी हत्या की है? मेरे अपने महुआ और आम के अनेक पेड़ हुआ करते थे। अनके बारियां थीं। गांव में सैकड़ों महुआ बारी, बाबा की बारी, बड़का बारी, खलिहान वाली बारी…..सब कहां गये? उस विशाल भूखंड की हरियाली को किसने लील लिया? मेरी आंखों देखी है कि दिन के उजाले में भी उन बारियों(बगीचों) में सांझ का ठंडापन महसूस होता था। वहां की दूब भी अब सूरज की गर्मी में जलकर लाल हो जाती है। न हम पेड़ बचा पाए, न हम दूब बचा पा रहे हैं। सही कहूं तो प्रकृति के सर्वाधिक निर्मोही हत्यारे हमीं हैं।                                                                                                                                                            …मेरा गांव सजांव
बाबा की बारी में जलती हुई दूब को देखकर मैं सोच में पड़ गया. कहावत है ‘डूबते को तिनके का सहारा’….हमने तो उस तिनके को भी मार दिया…फिर कौन सहारा देगा? हम इस कहावत को डिजर्व ही नहीं करते। हम डिजर्ब करते हैं-न रहेगी दूब न रहेगा सहारा।  गांव के तीन दिशाओं में मंदिर और तालाब हैं। कुछ मंदिर सार्वजनिक हैं कुछ निजी स्थापना वाले हैं कुछ तालाब निजी हैं और कुछ सार्वजनिक हैं। परंपराएं आज भी जीवित हैं। चाहें जैसे भी जीवित हों, लेकिन जीवित हैं। साल में एक बार कृष्ण जन्माष्टमी के बाद कुश्ती प्रतियोगिता जरूर होती है। पिछले साल कोरोना की वजह से नहीं हो सकती थी क्योंकि वहां इलाके की भारी भीड़ जुटती है। परंपरा न खंडित हो इसलिए पूजन करके गांव के ही दो लोगों की प्रतीकात्मक कुश्ती करा दी गयी। परंपरा के प्रति मेरे गांव की सजगता मुझे अच्छी लगती है। यह अलग बात है कि कुश्ती की परंपरा कभी नहीं टूटी लेकिन हट्ठे-कट्ठे प्रदेश स्तर का कोई पहलवान गांव से नहीं निकल सका। यह सिद्धांत और व्यवहार के विरोधाभास का एक उदाहरण मुझे नजर आता है। इससे मैंने यह अनुभव किया कि अनेक प्रतीकात्मक चीजें प्रेरणा देने में सफल नहीं भी हो सकती हैं।                                                                                                                          …मेरा गांव सजांव

जैसा कि ऊपर बताया कि डेढ़ महीने से ज्यादा वक्त से गांव में हूं। कोरोना की त्रासदी ने एक निराशा की स्थिति तो पैदा की ही है। देखते-देखते कुछ लोग गुजर भी गये। लेकिन गांव अब ‘फ्री कल्चर’ की तरफ बढ़ने लगे हैं। पिछले कुछ वर्षों में सीधे खातों में राशि आने का एक नुकसान भी पहुंचा है। अब यह मानसिकता घर करने लगी है कि सबकुछ सीधे खातों में आ जाए। मेहनतकश जीवट वालों की संख्या वैसे ही कम हो रही है।
ऊपर बात खेती-बारी की हो रही थी। बचपन में मैंने गन्ना, अरहर, चना, सरसों, मटर, जौ, तिल, तिस्सी, मक्का की खेती होते खूब देखा है. अब फसली सीजन में ये सभी मेरे गांव से नदारद की स्थिति में हैं। गन्ना की पेराई करने वाली मशीने होती थीं। आज वो मशीने नहीं दिखाई देतीं। आज की तारीख में तो मेरे गांव में शायद एक भी नहीं है. धान-गेहूं के अलावा गांव के लोग किसी और फसल के प्रति उदासीन होते जा रहे हैं।

बारी और खलिहान तो इतिहास हो गये। बच गयी खेती तो वह भी अब बस बची ही है। गांव के पास कोई नया विचार नहीं है। कोई नवाचार नहीं है। कोई पहल की कोशिश नहीं दिखती। कहीं कोई भविष्य को आशावान बनाने की उम्मीद के साथ पत्थर तोड़ता दशरथ मांझी नहीं दिखता। हमारे गांव अब केवल पराश्रित बसावट बनते जा रहे हैं। पराश्रित इसलिए क्योंकि कोई सरकार पर आश्रित है तो कोई शहर में 16 घंटे का ओवर टाइम करके थोड़े पैसे बचा रहे अपने परिजन की तरफ टकटकी लगाये बैठा है। सृजन की क्षमता तो दूर की बात सृजन की कल्पना भी गांवों में अंतिम सांस ले रही है।  इस दिशा में पहल करते हुए गांव में अपने खेत के एक छोटे से हिस्से (लगभग 50 हजार स्कावयर फीट) का पूर्ण घेराव करके उसमें से 8 हजार स्कावयर फीट फलदार एवं छायादार पेड़ों की बागवानी के लिए रखा है तथा शेष 42 हजार स्कावयर फ़ीट में फार्मिंग के नवाचार करने की योजना है। मिट्टीकरण का कार्य आज से शुरू है। अगर यह उत्साह जनक होता है तो आगे चलकर पूरे खेत (लगभग 2 लाख स्कावयर फीट) तथा अपने अन्य खेतों भी का घेराव किया जाएगा।                                                                                                                                                                                                                                   …मेरा गांव सजांव

यह सिर्फ मेरे गांव की कहानी मात्र नहीं है। यह यथार्थ है। गांव कैसे जियेंगे…यह देश के सामने यक्ष प्रश्न है। मेरा गांव कैसे जियेगा, यह प्रश्न मेरे सामने है। संभव है कि ये निराशा सिर्फ मेरे गांव की समस्या हो..बाकी गांव आशावान हों…अगर ऐसा हो तो यह बड़ी ख़ुशी की बात होगी। यह एक गंवई का उदगार है। इसे लेखक की पीड़ा भी समझा जाए। यह पीड़ा ही मेरा परिचय है।

(लेखक डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी शोध अधिष्ठान में सीनियर फेलो हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन के साथ ही दो किताबों का संपादन किया है। गृहमंत्री अमित शाह की पहली और प्रमाणिक राजनीतिक जीवनी लिखी है।)

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