टुकुर-टुकुर दोमुंहा में बैठ अपनों का बाट जोहती आंखें

शक्ति शरण
जीवन तो कमोबेश शहर में ही गुजरा। अभी भी रोजी-रोटी की चाहत लिये बाल-बच्चे समेत महानगर में हूं। लेकिन हर प्रवासी का एक ठांव होता है, हर शहरी का एक गांव होता है, वैसे ही मेरा भी एक गांव है। तो आईये आपको गांव की ओर ले चलता हूं। विचरण कराता हूं गांव की क​हानियों में। यह कहानी बिहार राज्य के सिवान जिले के सामपुर विशनपुरा गांव की है जो सिवान-मलमलिया रोड पर वसंतपुर ब्लाक से दो किलोमीटर पहले डेढ़ किलोमीटर उत्तर में स्थित है। छोटा-सा रमणीक गांव, आबादी लगभग सात सौ की आबादी वाला। पानी का एक प्राकृतिक स्रोत है जिसको नदी नहीं कहा जा सकता लेकिन इसमें पानी पूरे साल रहता है। इसी के किनारे पर है एक मठिया (पुराना मंदिर) है जहां शिवरात्रि पर बड़ा मेला लगता है, इलाके में लोग इस मेले के कारण भी इस गांव को जानते है।

जिस दौर की बात है उस दौर में इस गांव में नब्बे प्रतिशत घर कच्चा और खपरैल के थे। हालांकि दस प्रतिशत घर पक्का भी बन गए थे, लेकिन शायद ही किसी घर की ढ़लाई पूरी हुई थी। बिजली का खम्भा तो खड़ा था, लेकिन तार गायब थी। आज की तारीख में गांव में सभी घर कंक्रीट के बन गए है, ऐसा होना लाजमी है। पक्का घर विकास का द्योतक जो है और कच्चा का घर पिछड़ेपन का। आज घर-घर में बिजली है और एनड्रायड मोबाइल की तो भरमार है।

लेकिन इस गांव की प्रमुख पहचान है कि यहां की ज्यादातर आबादी शिक्षित और सरकारी नौकरी करने वाली थी। चार पीढ़ी पहले गांव के लोग पुलिस में सेवारत थे। उनके बाद वाली पीढ़ी आधुनिक भारत के मंदिर कहे जाने वाले पब्लिक सेक्टर संस्थानों-सिंदरी, बरौनी, गोरखपुर, नामरूप जैसे संस्थानों में कार्यरत थी। यहां तक तो गांव की मिटटी की भूमिका अपने मूल भाव में रची बची रही। सभी संस्कारों-जन्म से लेकर उपनयन, शादी-विवाह, मन्नत पूरा होने पर अष्टजाम और मृत्यु के बाद अपनी जमीन पर अंतेष्टि की लालसा कायम रही। ग्रामीण एक दूसरे के सुख-दुःख को अपना मानते थे। लेकिन स्थिति उस समय से बदलने लगी जब से देश में आर्थिक उदारीकरण की बयार बहनी शुरू हुई। मानवीय संवेदना पर पैसा की खनक भारी होता गया।

लेकिन इसी रमणीक गांव के बीचोबीच एक आलीशान सी कोठी खड़ी है-बाहर से चमचमाती हुई। दूर से देख कर आपको जीवंतता से भरपूर लगेगी। अन्दर झांकेगे तो संपन्नता के हर साजोसामान उपलब्ध मिलेंगे। चार पहिया वाहन भी खड़ा है। लेकिन सच्चाई कुछ कड़वी है। इसी कोठी से ७५ वर्षीय मां टुकुर टुकुर रास्ता अगोरती रहती है। रास्ता देखते पच्चीस वर्ष से ज्यादा हो गया है।नाम है बागमती चाची, घर के दुमुहा पर बैठकर मोटका सीसा के चश्मा से रोज की तरह आज भी रास्ता देख रही है। बताता चलूं ​ कि चाची ने 1969 में इंटर किया था, सिंदरी से। उसी सिंदरी से जहां आधुनिक भारत का पहला खाद कारखाना देश के पहले प्रधानमत्री पंडित नेहरू ने लगवाया था। उस समय किसी महिला का इंटर तक पढ़ा होना आज के मास्टर्स के बराबर की वजन रखता था। बागमती चाची का पैतृक गांव भगवानपुर ब्लॉक में पड़ता है।
चाची की शादी 1971 में बरौनी खाद कारखाना में सीनियर टेक्नीशियन पद पर कार्यरत सरदार सिंह से हुई थी। सरदार सिंह का जन्म सामपुर विशुनपूरा में देश को स्वत्रन्त्रता मिलने वाले साल यानी 1947 में हुआ था। उनके पिताजी समरदे हाई स्कूल में हेडमास्टर थे। इस क्षेत्र का पहला हाई स्कूल जो इस गांव से दो कोस की दूरी पर है।
पढ़ा लिखा परिवार था। उस जमाने में भी हेडमास्टर साहेब के घर पर आर्यावर्त हिंदी दैनिक आया करता था। बेशक एक दिन बाद ही सही। पटना से छपने वाला यह अखबार, स्टीमर और सडक की यात्रा करते हुए देर-सबेर सामपुर पहुंचता था। सारे गांव के लोग बारी-बारी से अखबार को बांचते और इसके माध्यम से देश दुनिया से जुड़ते। इसलिए बेहतर साक्षरता वाले इस गांव में अखबार का इंतजार रहता था। संचार के दूसरे माध्यम रेडियो से गांव को अवगत कराने का श्रेय सरदार सिंह को ही जाता है। 1971 में अपनी शादी के लिए जब वे गांव आए तो पटना से मर्फी कंपनी का ट्रांजिस्टर लेकर आये थे।
घर के बाहर दलान में रेडियो को गोलाकार टेबुल पर रखा गया था। बागमती चाची की शादी की पेटी में आई क्रोशिया से बुनी लाल टेबुलक्लॉथ से ढककर रखा गया यह ट्रांजिस्टर गांव वालों के लिए सचमुच नुमाईश का सामान जैसा था। पांच-दस गांव के लोग, आकाशवाणी करने वाले इस यन्त्र को देखने आए थे। यह लोगों के आकर्षण का केंद्र था। रेडियो को लेकर संयुक्त परिवार में मनमुटाव भी हो गया। सरदार सिंह के चाचा हलधर सिंह ने एक दिन उखड़ते हुए कहा कि यह फिजूलखर्ची की क्या जरूरत थी। अभी छोटकी का विवाह करना था। पहले उसका विवाह जरूरी था कि यह झुनझुना। मझलो चाची तो बागमती चाची को ही टारगेट पर लिए हुए थी। उनका मानना था कि शहरवाली बहुरिया के लिए रेडियो आया है। अभी कुछ दिन बाहर मर्द लोग सुनेगे बाद में यह सुविधा सिर्फ चाची को उपलब्ध होगी।
उस जमाने में इतना ओरहन बहुत ज्यादा माना जाता था। सरदार चाचा ने स्पष्ट करते हुए कहा कि यह झुनझुना नहीं है, यह एक जरूरी यन्त्र है। हलदर चाचा को अभी भी बात समझ में नहीं आ रही थी। तब सरदार चाचा ने कहा कि अखबार देर से यहां आ पता है। दुनिया बहुत तेजी से बदल रही है। इसकी जानकारी सब को होनी चाहिए। पढाई करने वाले बच्चों को देश दुनिया से परिचित कराने, गांव की चौहद्दी से बाहर की दुनिया से जुड़ने में रेडियो की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। अभी भी हलधर चाचा का नथुना फूला देखकर सरदार चाचा ने समझाया कि भारत-पाकिस्तान का युद्ध चल रहा है। आकाशवाणी पर सुबह शाम खबर मिलती रहेगी। भारत-पाकिस्तान वाला फार्मूला उस समय भी कारगर था, सो काम कर गया। आगे उन्होंने कहा कि गांव के तीन लड़के मुक्तिवाहिनी में बांग्लादेश में लड़ रहे है, उनके परिवार के लिए युद्ध से जुडी खबरें जरूरी है। इसलिए यह रेडियो और भी जरूरी है।

अब तो सूचना प्रौद्योगिकी की क्रांति ने सूचनाओं का ओवरफ्लो कर दिया है। आज पूरी दुनिया ‘ग्लोबल विलेज’ की अवधारणा को साकार करने में लगी है। इस प्रयास में अनायास ही गांव की मूल परिकल्पना ही धूमिल हो गयी है। ‘‘ग्लोबल विलेज‘‘ यानी विश्व-ग्राम एक सांस्कृतिक अवधारणा है। यह आभासी दुनिया ने वास्तविक दुनिया पर ग्रहण लगा दिया है।
सब आपसे जुड़े है, लेकिन भावनात्मक रूप में वास्तव में कोई किसी का नहीं है. “ग्लोबल विलेज” कहता है कि सूचना प्रौद्योगिकी ने पूरी दुनिया को एक गांव बना दिया है, जिसमें सभी लोग एक-दूसरे से, ग़ैरभौतिक या आभासी रूप से ही सही, सम्बद्ध हैं। वास्तविक रिश्तो का क्या? मानवीय मूल्यों और संवेदनाओ का क्या?
नौकरी से रिटायर होने के बाद चाची और चाचा बरौनी से अपने पुस्तैनी गांव शिफ्ट होने का निर्णय लेते है। इनके दोनों बेटे पढाई पूरा के बाद अमेरिका में बस गए हैं। बड़ा बेटा संस्कार आईआईटी , काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से एम.टेक. कर के सिलिकॉन वैली में है और छोटा बेटा संदर्भ आईआईएम कोलकाता से एमबीए कर के ऑकलैंड, न्यूजीलैंड में है। जब दोनों की विदेश में नौकरी लगी थी, तब बागमती चाची फूली नहीं समा रही थी। चाची के हर भाव में खुशी का ओवरफ्लो दिखता था। स्वाभाविक थी वह खुशी। मध्यमवर्गीय परिवार अपनी पूर्णता को हासिल कर इतरा रहा था।
शादी करने वालों की लाइन लग गयी। लेकिन दोनों भाइयों ने अपने पसंद के महिला मित्रों से शादी की। करनी भी चाहिए। चाचा ने विरोध करने की कोशिश भर की तो चाची का समर्थन और आशीर्वाद दोनों भाइयों को प्राप्त था। शादी के दो साल बाद बड़ी बहु ने बिटिया संस्कृति को जन्म दिया। चाची और चाचा खुशी के समंदर में हिचकोले ले रहे थे। छह महीने के बाद छठ पूजा के अवसर संस्कार सपरिवार गांव आया तो आंगन किलकारियों से गुलजार हो उठा। संस्कृति दादी की गोद में जब पहली बार आई तो दादी और पोती दोनों निहाल हुए जा रहे थे, जैसे खून के डीएनए का जो रिश्ता अभी—अभी कायम हुआ है, वह ऐसे निर्बाध चलता रहेगा। लेकिन सात दिन के बाद वह वापस चली गयी। संदर्भ भी शादी के बाद एक बार ही गांव आया, वह भी अकेले। उसको भी एक 18 वर्ष का बेटा है सार्थक। तभी से उनके फिर आने की आस में चाची दुमुंहा अगोरती है।
सब कुछ तो है आज इस परिवार के पास। किसी भी चीज की कमी नहीं है। घर-द्वार, गाड़ी-घोडा, रुपया-पैसा। नहीं है तो सिर्फ अपनों का आलिंगन और प्यार। बागमती चाची दो लोगों के लिए ‘कुछ भी’ खाना बना लेने के बाद और दिनों की तरह आज भी दुमुंहा से रास्ता निहारने लगती है। तभी चाचा टेलीविजन पर न्यूज लगाते है। टेलीविजन पर एनआरसी का मामला दिखाई और सुनाई पड़ता है। गैर-कानूनी तरीके से भारत में घुसपैठ करके आने वालों के खिलाफ सरकार के निर्णय पर राजनीति आंदोलित हो उठी है। वर्तमान की भारत सरकार भारी संख्या में बांग्लादेश से आए घुसपैठियों को देश से बाहर निकाल कर उनके मौलिक देश भेजना का प्रस्ताव लेकर आई है।

मां का दिल कानूनी और गैरकानूनी का फर्क करना भूलकर यह दुआ करने लगता है कि काश उन देशों में जहां भी उसके अपने जने रहते है, वहां की सरकार उनको भी देश निकाला दे देती तो कितना अच्छा होता। ब्रह्मनाल से जुड़े अपने सुतों से फिर से जुड़ने की लालसा ने चाची की तर्क शक्ति को कुंद कर दिया थां वोह जोर-जोर से रीफूजी और एच १ वीजा के अंतर को ख़त्म करने की मन्नत मांगने लगी। वो अपने मन मस्तिष्क में ऐसा होने की कल्पना मात्र से इतनी खुश हो जाती है कि जोर—जोर से रोने लगती है। रोना वह कई वर्षों से भूल गयी थी।

चाचा चाची के कंधे को स्पर्श करते हुए कहते हैं, ”रोती क्यों हो, आज स्काइप पर बात करेंगे। स्काइप नहीं, तो व्हाट्सअप्प, नहीं तो मैसेंजर पर ही सही, जिसपर फोटो साफ दिखेगा।”

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