August 15, 2020

गांव की तरक्की..आधी हकीकत,आधा फसाना

अनुरंजन झा
वरिष्ठ टीवी पत्रकार

चम्पा के अरण्य यानी चम्पारण। इस जिला का एक गांव जहां पहले सिर्फ फूलों का बगीचा था और उसे फुलवारी कहा जाता था, बाद में फुलवरिया बना। वैसे तो इस गांव को बेतिया राज के पुरोहित रहे मेरे पुरखों ने बसाया, मेरे परदादा के परदादा हनुमंत नारायण झा अपने पिताजी अत्रि नारायण झा के साथ यहां आ बसे। फिर उन्होंने धीरे धीरे अपने साथियों, संबंधियों को यहां बसने के लिए प्रेरित किया। यह कहानी मेरे परदादा जो १०५ साल की उम्र में १९९५ में स्वर्ग सिधारे, अक्सर सुनाया करते थे। हम गांव के सामंत नहीं रहे लेकिन गांव पर अपना हक पूरी तरह समझते रहे।

बचपन से लेकर किशोर अवस्था यानी ग्रेजुएशन के लिए दिल्ली आने से पहले तक मेरा वक्त गांव में ही गुजरा। तकरीबन १६-१७ साल की उस उम्र तक अपने गांव की शायद ही कोई याद हो जो हमारे जेहन में नहीं हो। नेशनल हाइवे के किनारे, रेलवे स्टेशन से महज तीन किलोमीटर की दूरी पर बसा मेरा गांव उस वक्त वाकई किसी आदर्श गांव की परिभाषा में बिल्कुल फिट बैठता था। गांव के उत्तर में नदी, पूरब में नदी, पश्चिम और दक्षिण में हरे भरे खेत खुशहाली के प्रतीक थे। बिजली हमारे जन्म से पहले ही हमारे घरों में आ चुकी थी। चूंकि मेरे दादाजी प्रतिष्ठित शिक्षक और उनके बड़े भाई प्रख्यात कवि-लेखक थे, लिहाजा मेरे घर पर अक्सर शिक्षकों और कवियों-लेखकों की बैठकें हुआ करती। रामधारी सिंह दिनकर, शिवपूजन सहाय, हरिवंश राय बच्चन, रामबृक्ष बेनीपुरी और न जाने और कितने विद्वानों की बैठकों के किस्से सुने और उनके पोस्टकार्ड वाले पत्रों से खेलते हुए बचपन बीता। अस्सी के दशक के शुरुआती सालों में हमारे गांव में दो बेहतरीन आयोजन हुए, मेरे दादाजी ने अपने आध्यात्मिक गुरु कांची के शंकराचार्य (स्वर्गीय जयेंद्र सरस्वती) को गांव बुलाया और उसके कुछ सालों बाद ही युवा फिल्मकार प्रकाश झा ने अपनी दूसरी फिल्म दामुल की शूटिंग मेरे गांव के पूरब नदी के तट पर की। इन वाकयों का जिक्र हमने इसलिए किया ताकि सदियों पुराने इस गांव की भव्यता का थोड़ा अंदाजा लग सके।

जब हम बड़े हो रहे थे तो गांव के एक छोर पर काफी बड़ा मैदान था जहां रोज शाम में गांव के बच्चे-युवा अपने अपने हिसाब से खेलते हुए मिल जाते थे। कई दफा ऐसा होता कि जब हम खेलकर थक जाते और ढ़लती शाम में वहीं घास पर बैठ सुस्ता रहे होते तो वहां से गुजरता गांव का कोई बुजुर्ग हमें टोक देता कि शाम हो रही है अंधेरा हो जाएगा, अभी तक यहां क्यों बैठे हो घर जाओ। कई बुजुर्ग ऐसे थे जिनको आते देखकर हम पहले ही घर जाने को खड़े हो जाते। गांव अब भी वहीं है, मैदान भी वही है और अब चारदीवारी से घिरी हुई है, अब भी गांव के बच्चे-युवा वहां खेलते हैं और शाम ढलने से पहले और बाद में सुस्ताते भी हैं लेकिन सुस्ताते वक्त या तो सुट्टा-गांजा पी रहे होते हैं या फिर देसी शराब, गांव के कई प्रौढ़ अब भी वहां से गुजरते हैं लेकिन अब टोकते नहीं बल्कि इन युवाओं के साथ उनकी हमजोली में शरीक हो जाते हैं। ये है आज का हमारा गांव।

गांव के जिस विद्यालय में हम पढ़ने जाते थे, वहां हम पढ़ने ही जाते थे और शिक्षक पढ़ाने आते थे। आज की तरह खाना खाने स्कूल नहीं जाते और आज के शिक्षकों की तरह के शिक्षक अगर हमें मिले होते तो वाकई हम तो फूटने से पहले ही नेस्तानाबूद हो गए होते क्योंकि तब तकनीक की कोई ताकत नहीं थी और गूगल गुरु भी नहीं थे तो यकीन मानिए ऐसे शिक्षक (९५ फीसदी) जैसे आजकल हैं, वैसे होते तो हम आज यह कहानी लिख ही नहीं रहे होते और कहानी बनते भी तो ऐसी जिसको बांचना कोई नहीं चाहता। तो यह तो रहा शिक्षा और संस्कार के मामले में गांव का विकास पिछले २५-३० सालों में।

जब हम छोटे थे थो मेरे एक चचेरे दादा सतनजी झा रोज सुबह या शाम आधे गांव की गलियां बड़ी झाड़ू से साफ कर डालते थे। हालांकि सबसे ज्यादा जमीन जोतने वाले किसान भी वही थे, लेकिन उनको गांव की सफाई करने में कोई शर्म महसूस नहीं होती थी। इकट्ठा किए हुए बुहारन को शाम में जला दिया जाता जिसके धुएं से मवेशियों के पास मच्छर नहीं फटकते और राख को खेतों में छिड़क दिया जाता जिससे पेस्टीसाइट्स की जरूरत नहीं पड़ती। बाद के दिनों में हमारे शिक्षक चाचाजी भी कुछ समय तक ऐसा करते रहे, लेकिन नई पीढ़ी की उदासीनता ने उनका उत्साह ठंडा कर दिया। इतना ही नहीं, हमारे गांव में सड़क के किनारे-किनारे एक बड़ा नाला बहता था जो निस्संदेह बारिश के अलावा बाकी के दिनों में सूखा रहता था। हालांकि गांव के एक बड़े हिस्से के घर का पानी उसी नाले तक पहुंचता था लेकिन वहां पहुंचते पहुंचते सूख जाता था। बारिश के दिनों में पानी जमा नहीं होता और उसी नाले के सहारे बहता हुआ पूरे गांव का पानी गांव के पश्चिमी की ओर नहर में जा मिलता। अब हालात बदल गए हैं। ऐसे समझिए हमारे गांव में स्वच्छता अभियान की हकीकत को। अब टीवी पर देखकर कभी-कभार सफाई का जोश लोगों में सवार होता है और फिर वही ढाक के तीन पात। शहरों की तरह लोग-बाग अपने घरों की सफाई कर बुहारन सड़क पर या दूसरे के दरवाजे की ओर ढकेल देते हैं। जिस नाले से बरसात का पानी निकल जाता था, उसे सड़क किनारे बसे लोगों ने भरकर अवैध कब्जा कर लिया और लिहाजा थोड़ी बारिश में भी बीच बीच में टापू बनता दिखता है। पानी की निकासी की व्यवस्था को दुरुस्त करने और रेन हार्वेस्टिंग के जरिए पानी बचत करने के बजाए बिहार सरकार की ओर से नल-जल योजना के तहत गांव में पानी की टंकी लगाकर नल के जरिए घर-घर पानीं पहुंचाने की योजना पर काम हो रहा है। पानी की टंकी कहां लगाई जाएगी, यह अभी तय नहीं है लेकिन पाइप बिछाने के लिए गड्ढे किए जा रहे हैं और फंड की बंदरबांट शुरु हो गई है। अव्वल तो इस टंकी के बनने के आसार नहीं है और अगर यह बन भी गया इसमें पानी होगा इसमें हमें पूरा संदेह है।

अब एक किस्सा सुनिए। आज से ८ साल पहले एक दफा होली में गांव जाने की योजना बनाई और अपने चार साल के बेटे और पत्नी को लेकर गांव पहुंच गया। जहां होली के एक हफ्ता पहले से गांव-बाजार में रौनक महसूस की जा सकती थी, हर दरवाजे पर योजनाएं बनाते नौजवान दिख सकते थे, वह सब नदारद था। हमने सोचा कि पलायन इसका बड़ा कारण है, लोग बाग घरों में कम है इसलिए ऐसा महसूस हो रहा है, होली के दिन तो सभी निकलेंगे ही। तो हुआ यूं कि मेरा बेटा अपने कुछ भाई-बहनों के साथ होली खेलने की कोशिश करता रहा और सुबह के २-३ घंटे हम इस इंतजार में रहे कि कोई तो आएगा जिसके साथ रंग-गुलाल लेकर गांव की चैहद्दी नापूंगा, लेकिन यहां तो मामला बिल्कुल सन्नाटा। फिर मैं ही निकला जितने घरों में जा सकता था गया और मिल-जुल के चला आया। लेकिन जो प्रतिक्रियाएं हमें मिली उसके बाद घर लौटते ही हमने अपने एक मित्र जो रेलवे के अधिकारी हैं, को फोन लगाया और बोला कि भाई १२ बजने वाले हैं, दो बजे तक ट्रेन सुगौली आती है जरा पता करो कि सीट का इंतजाम हो जाए तो दिल्ली लौटूं। मित्र भी अवाक, बोले आज होली के दिन। हमने कहा हां भाई इस पर बात बाद में करूंगा फिलहाल सीट की व्यवस्था करो, उन्होंने छूटते ही कहा होली पर वो बात गांव में नहीं रही मित्र, तुम स्टेशन पहुंचो मैं इंतजाम करता हूं। हम अगली सुबह दिल्ली वापस चले आए, तो यह तो है हमारे गांव में अपनापन का विकास।

अब ठेठ गांवों में तो वही रह रहा है जिसको शहरों में मौका नहीं मिला या फिर शहरों ने बेदखल कर दिया। लेकिन हमारा गांव इससे अलहदा है, सड़क और रेल से ऐसे जुड़ा हुआ है कि गांव में साधनों की कमी नहीं है। पास का छोटा-सा हाट पिछले तीन दशक में एक अच्छे-खासे कस्बे में तब्दील हो रहा है तो इस लिहाज से जीवन-यापन करने के लिए पर्याप्त साधन हैं। गांव के बाहर अब भी खेत लहलहाते हैं, लेकिन उसमें मेहनत करने वालों की तादाद कम हो गई है। उत्तर और पूरब दिशा की नदी धीरे-धीरे सूख रही है। इलाके में जिले का पहला शानदार हरिजन विद्यालय स्मगलरों व जुआरियों का अड्डा बन गया है। शिक्षक पढ़ाने में कम और अनाज की बोरियां गिनने में अधिक व्यस्त हैं, लिहाजा तमाम तकनीक से लैस गांव अपने भविष्य के दुर्दिन का इंतजार कर रहा है। तो यह है हमारे गांव का विकास जो गांव को अब न तो गांव रहने दे रहा है और न हीं शहर बनने दे रहा है।

इन सारी समस्याओं से लड़ते हुए मैं हर महीने-डेढ़ महीने पर गांव जाता हूं, कुछ बदलाव ला सकूं इसकी कोशिशों में जुटा हूं। दिल्ली के दोस्त अक्सर पूछते हैं कि इतना गांव क्यों और कैसे जा पाते हो। सीधा जवाब है ऑक्सीजन लेने जाता हूं, सेहत के लिए भी और स्वभाव के लिए भी। माता-पिता का शहर में मन नहीं लगता और वहां रिटायरमेंट के बाद खेती-किसानी में इस कदर व्यस्त हैं कि दिल्ली में भी हम अनाज अपने खेत से लाकर ही खाते हैं। वे भी स्वस्थ हैं और हमें भी रखने की कोशिश में हैं। लिखने को तो पोथी लिखा जा सकता है लेकिन फिलहाल इतना ही।

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