टुकुर-टुकुर दोमुंहा में बैठ अपनों का बाट जोहती आंखें

शक्ति शरण जीवन तो कमोबेश शहर में ही गुजरा। अभी भी रोजी-रोटी की चाहत लिये बाल-बच्चे समेत महानगर में हूं। लेकिन हर प्रवासी का एक ठांव होता है, हर शहरी का एक गांव होता है, वैसे ही मेरा भी एक गांव है। तो आईये आपको गांव की ओर ले चलता हूं। विचरण कराता हूं गांव …

टुकुर-टुकुर दोमुंहा में बैठ अपनों का बाट जोहती आंखें Read More »