…और बेनीपुरी स्मारक नहीं बचा सके हम

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महन्त राजीव रंजन दास
बागमती तटबंध के बाहर सरकार द्वारा बसाए गए नए बेनीपुर की धरती पर रामबृक्ष बेनीपुरी स्मारक भवन के शिलान्यास कार्यक्रम में पहुंचा तो दिल में एक अजीब-सी टीस उठी। कार्यक्रम बेनीपुरी जयंती के अवसर पर 20 दिसंबर 2018 को आयोजित हुआ था। इस अवसर पर बेनीपुरी जी की पुस्तक ‘जयप्रकाश की विचारधारा’ का लोकार्पण भी हुआ जिसे उन्होंने अपने प्रिय मित्र लोकनायक जयप्रकाश नारायण को उनके जन्मदिन पर 11 अक्टूबर 1948 को भेंट की थी।
आखिर आज बांध के उस पार की धरती से रिश्ता टूटना शुरू हो ही गया। हम हार गए। वह धरती जिसकी मिट्टी ने आजादी की लड़ाई में महात्मा गांधी से लेकर आचार्य कृपलानी ,जयप्रकाश नारायण, गंगा शरण सिंह, बसावन सिंह और योगेंद्र शुक्ला जैसे महान सेनानियों को अपने यहां पुकारकर बुलाया। आजादी के बाद देश के प्रथम राष्ट्रपति भी अपने बीमार मित्र के हाल जानने के लिए आए। वह धरती जहां देश के सिने रंगमंच के प्रथम परिवार पृथ्वी राज कपूर साहेब अपनी पत्नी, दो पुत्र और अपने थियेटर के अनेक कलाकारों के साथ महीने भर तक रहे। वही धरती जिस पर आचार्य शिवपूजन सहाय,दिनकर जी, कर्पूरी ठाकुर, रामानंद तिवारी, डॉ जगन्नाथ मिश्र जैसे सम्मानित राजनेताओं के अलावे समाजवादी विचारधारा के किस-किस को अपने यहां नहीं बुलाया। वह धरती जिसका हरेक व्यक्ति बड़ेे गर्व से खुद को, बेनीपुरी का वंशज या ग्रामीण बताने में गर्व महसूस करता रहा। अब उस धरती से हमारा नाता टूट सा रहा है। मेरी मां स्व प्रभा बेनीपुरी, स्वतंत्रता सेनानी, समाजवादी विचारधारा के एक प्रमुख स्तंभ और लेखक रामबृक्ष बेनीपुरी जी की एक मात्र पुत्री थीं। उस धरती से, इस बृहत परिवार के सदस्यों में एक मात्र मैं ही हूं जो पास में रहता हूं, उसका भी नाता अब टूटने लगा है।

यादों के झरोखे ने एकाएक 1968 के सितंबर में धकेल दिया। उसी यात्रा से बेनीपुर की कई यादें जुड़ी हैं। वैसे तो बचपन में नाना-नानी की गोद की याद अनेक तस्वीरें दिलाती हैं, मगर वह यात्रा तो आज भी जेहन में कैद है। बेदौल में हम आराम कर रहे हैं, नाव आने का इंतजार हो रहा है। चारों तरफ बाढ़ का पानी चढ़ा हुआ था। बाबू गंगा शरण सिंह दरी पर लेटे हुए, आंख बंद कर, हाथ में पंखा लिए, अपने हाथ हिलाए जा रहे थे, मैं भी बगल में लेट गया और बड़े आश्चर्य से सोते हुए आदमी को हाथ हिलाते देख कर मन ही मन कौतूहल में था। कुछ देर बाद खबर आई कि नाव आ गई है। हम सब लोग फिर नाव पर, चौकी पर बैठ गए और करीब आधे घंटे बाद, बेनीपुर की कोठी पर पहुंच गए।
वही कोठी जिस पर मेरी माता जी की शादी के समय, जयप्रकाश जी ,कर्पूरी जी, शिवपूजन सहाय जी के सामने दिनकर जी ने कहा कि बेनीपुरी भाई, आपने इतना बड़ा घर गांव में क्यों बनाया? शहर में बनाए रहते तो कम से कम हजार से ज्यादा का किराया भी आता। तुम नहीं समझोगे दिनकर जब मैं इंग्लैंड में शेक्सपियर के गांव गया तो देखा कि उनका घर ही उनकी स्मारक भी है। इसी सोच को मैंने यहां उतारा है। यह मेरा स्मारक रहेगा। अफसोस कि हम उस स्मारक को बचाने में असफल हो गए। समूचा बेनीपुर ही बांध के अंदर आ गया। तरह तरह की कोशिशें हुई, मगर लगता है कि अब हम हार गए। हमारी लड़ाई भी खत्म हो चुकी।

1968 में नाना की मृत्यु हुई थी। गांव में ही उनकी तबियत बहुत बिगड़ गयी, चारों तरफ बाढ़ का पानी था, उन्हें खाट पर लादकर और खाट को सिर पर रख कर, कहीं पैदल और फिर नाव पर, किसी तरह से मुजफ्फरपुर लाया गया जहां उनकी मृत्यु हुई और फिर उनकी इच्छा को ध्यान में रखते हुई उनका दाह संस्कार उसी घर के सामने किया गया और फिर स्वाभाविक तौर पर संपूर्ण श्राद्धकर्म भी वहीं हुआ। कुछ वर्षों बाद हम लोग गाड़ी से जनाढ़ चौक से घर तक जाने लगे। चौक से आगे बढ़ने पर चौर में एक ऊंची जगह, एक बड़ा-सा चबूतरा बना हुआ था जो इस मिट्टी की गौरवशाली अतीत की एक निशानी था। हर आगंतुक को स्थानीय लोग रुक कर इस जगह को दिखाते थे कि इस जगह, इसी मंच से भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद, अपने मित्र बेनीपुरी जी के बुलावे पर बागमती कॉलेज की नींव रखने आये थे और इसी मंच से भारी भीड़ को संबोधित किया था। अफसोस कि उस समय की सरकार को बेनीपुरी और महामहिम राष्ट्रपति का संबंध खटकता था। 25 एकड़ जमीन किधर गयी? कॉलेज तो हवा में ही रह गया और अब वह मंच भी बागमती परियोजना में बनने वाली बांध की भेंट चढ़ गया।
मंच से आगे बढ़ने पर बेनीपुर गांव की शुरुआत हो जाती थी। एक खपरैल वाले मकान पर सबसे पहले नजर पड़ती थी जो सरकारी प्राइमरी स्कूल था, उससे आगे बढ़ने पर रिहाइशी बस्ती शुरू होती है जिसमें बेनीपुरी जी के सबसे प्रिय मित्र जगदीश जी के तीनों पुत्र रहते हैं। दूसरी तरफ शिवकुमार सिंह तीनों भाई का मकान है और इसी देहाती सड़क पर आगे बढ़ते हैं तो बायीं तरफ बेनीपुरी जी का पुश्तैनी मकान है जिसमें उनके पट्टीदारी के भतीजे रहते है और सड़क से जब दाहिने मुड़ते हैं तो राम लखन सिंह दोनों भाई का मकान है जिनके परिजनों का स्थायी ठिकाना, एक जमाने से ही लखनऊ में हो गया है। हमारी गाड़ी वही उनके ही दरवाजे पर रुक जाया करती थी। फिर एक पगडंडी पकड़कर हम एक बरसाती नाला पार कर बेनीपुरी जी की हवेली पर आते थे। बाद में उस नाले वाले जमीन को भी खरीद कर ऐसा रास्ता कर लिया गया जिससे गाड़ियां मकान तक जाने लगी।

गांव में बिजली भी बहुत बाद में आयी। हर घर के सामने मवेशी जरूर बंधे मिलते थे। खेती और दुग्ध उत्पादन ही मुख्य रूप से जीविका के साधन थे। हर साल बाढ़ की चपेट में आने के चलते विकास की किरण इस गांव में नहीं पहुंच सकी और जब लगा कि राज्य में सड़क बिजली की स्थिति ठीक होने लगी है तब तक इस गांव को बागमती परियोजना ने अपने चंगुल में जकड़ लिया और सरकार ने बांध के बाहर बसने के लिए लोगों को जमीन आवंटित कर दी और घर और घरारी का उस समय के सरकारी दर से मुआवजा का भुगतान भी कर दिया। यह बात कुछ और ही है कि अभी भी कुछ परिवार अपने घर को नहीं छोड़ पा रहे हैं और बांध के अंदर ही रहते हैं, जहां रात में अगर किसी की तबियत भी खराब हो तो न तो उस व्यक्ति को देखने कोई जा सकता है या उसे बाहर दिखाने के लिए लाया जा सकता है।

इस तरह के रास्तों से, कभी गाड़ी से तो कभी पैदल, फिर नाव पर बागमती की धार को पार करते हुए बलुआही जमीन पर करीब सवा किलोमीटर चलने पर हम बेनीपुरी स्मारक पर हर वर्ष (2016 तक लगातार ही) 23 दिसंबर को बेनीपुरी जयंती मनाने पहुंचते रहे। मेरे सबसे छोटे मामा स्व महेंद्र बेनीपुरी (2-3-17 को देहांत )और मेरे बड़ेे मामा के लड़के रतन बेनीपुरी बराबर ही शरीक होते रहे। हर वर्ष स्थानीय विधायक,सांसद और सरकार के मंत्री तरह-तरह के वादों और इरादों की घोषणा करते रहे। मौजूद जनता भी तालियों से इन घोषणाओं का तहेदिल से स्वागत करती रही। उम्मीद थी कि कभी न कभी कुछ तो काम होगा ही। 2005 में मक्कू मामा (महेन्द्र कुमार बेनीपुरी) ने अपनी वसीयत लिख कर दी थी कि उनकी मृत्यु के बाद उनका श्राद्धकर्म इसी धरती पर ही किया जाए। उनके जीवन की अंतिम बेनीपुरी जयंती 2016 में ही हुई।

उस दिन डॉ रघुवंश सिंह (पूर्व मंत्री भारत सरकार) मुख्य अतिथि थे और बिहार में महागठबंधन की सरकार थी जिसमें रघुवंश बाबू ताकतवर हैसियत रखते थे। उनके समक्ष स्थानीय विद्यायक ने अपनी तरफ से पुस्तकालय सह वाचनालय, जिला परिषद के सदस्य ने बेनीपुर की तरफ आने वाली सड़क पर एक भव्य द्वार और स्थानीय सांसद ने एक सामुदायिक भवन देने की घोषणाएं की। स्थानीय सांसद ने तो इस मद में काम की स्वीकृति भी दे दी, मगर औरों के बारे में क्या कहा जाए। जब खुद बिहार सरकार ने स्मारक के लिए 1.14 एकड़ जमीन आवंटित किया तो उस समय खुद आयुक्त ने हमसे स्मारक का प्रारूप लिया कि प्रारूप आपका और खर्च सरकार का। फिर कुछ वर्ष बाद 2012 में मुख्यमंत्री ने खुद ही बुला कर स्मारक बनाने की चर्चा की और प्रारूप लिया। मगर 7 साल तो बीत ही गए 10 जुलाई 2012 को मुख्यमंत्री कक्ष में बातें हुईं थी।

अफसोस तो यह रहा कि हम लोग तो महेंद्र बेनीपुरी जी की भी इच्छा पूरी नहीं कर सके। उनकी मृत्यु के बाद दरिद्र नारायण भोज का इंतजाम हमें बांध के इसी पार नए बेनीपुर में, स्मारक और इनके परिवार के लिए मिले जमीन पर ही करना पड़ा।

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