…वर्क फ्रॉम गांव की तरफ बढ़ने की है दरकार

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धर्मेंद्र कुमार

 

कोविद-19 जीवाणु के प्रकोप ने अफरा-तफरी मचा रखी है। लॉक डाउन के कारण सब कुछ ठहर सा गया है। कल कारखाने बंद पड़े है। बाज़ार सुनसान हैं। सड़के सुनी है और डरावनी दिखती है। शहर भूतहा प्रतीत होता हैं लेकिन प्रवासी मजदूर सड़को पर निकल आया है। बोरिया बिस्तर व बच्चो को साथ लेकर। एक ही जिद कि घर वापस जाना है।
खाली हाथ आया है खाली हाथ जायेगा
क्या तू लेके आया है क्या तू लेके जायेगा
तूने तो कमाया है वो दूसरा ही खायेगा
खाली हाथ आया है खाली हाथ जायेगा
एक दिन इसी तरह की मजबूरी वश ही घर से शहर को निकला था। गांव में, खेती-बारी में गुजारा मुश्किल था। शहर में संभावनाए थीं। कई अवसर थे। छोटा बड़ा काम करके, मेहनत मजूरी कर शहर में किसी तरह गुजारा चल रहा था। सिर्फ गुजारा और वो भी किसी तरह चल रहा था। हां इतना संतोष था कि गुजर-बसर के लिए काम था। और काम ही सब कुछ था। काम ही आसरा और काम ही सुरक्षा थी। लॉक डाउन में काम बंद हो गया। काम के एवज में शहर ने इतना भी नहीं दिया की बिना काम के कुछ दिन भी गुजारा हो सके। सरकार ने जब कहा की कोरोना से बचना है तो घर में ही रहे।

अब बिना काम के आखिर एक प्रवासी मजदूर कब तक घर में रह सकता है। रहने को घर के नाम पर है ही क्या। खुली हवा और धूप तो दूर की बात मूलभूत सुविधाए भी नहीं। सिंगापुर के प्रवासी मजदूर इलाकों में कोरोना दुबारा वापस आ गया. हिन्दुस्तान के प्रवासी मजदूरों के घर मोहल्ला तो कतई सुरक्षित नहीं जहा सोशल डिस्टेंसिंग संभव ही नहीं. झुग्गी भी किराये की। बिना वेतन – आमदनी किराया कहां से दे। जैसा कि विभिन्न सरकारों ने कहा कि प्रवासियों से किराया न लिया जाए। लेकिन झुग्गी या पुर्नवास कॉलोनियों में मकान मालिक किराया छोड़ दे तो वो खुद भारी मुसीबत में। मजदूर भले ही खाली हाथ था, लेकिन मुट्ठी बंधी हुई थी। जिस महानगर और जिस राष्ट्रीय राजमार्ग के निर्माण में उसका भी खून पसीना लगा हुआ था, उस खून पसीने का हिसाब मांगे बिना लॉक डाउन की अनिश्चितता में बिना कोरोना संक्रमण की परवाह किये वो निकल पड़ा।
वो गाना है न..निकल पड़े हैं खुल्ली सड़क पर
अपना सीना ताने, अपना सीना ताने
मंजिल कहां, कहां रुकना है
उपरवाला जाने, उपरवाला जाने।

लेकिन यहां इस बात का ​ठिकाना भले न हो कि रास्ते में रूकना कहां है और कितने तरह से और किन लोगों से प्रताड़ित होना है लेकिन यह पता था कि कोरोना की महामारी से बचते बचाते गांव पहुंचना है। लोगों ने सवाल उठाया क्यों जा रहे हैं?  मजदूरों के जत्थे से जवाब आया कि गांव में यह उम्मीद तो है कि कुछ तो खाने को मिलता ही रहेगा और खुदा ना खास्ते कुछ हुआ तो अपनों का साथ तो होगा। शायद यही सब सोचकर लाखों प्रवासी मजदूर निकल पड़े गांव की ओर।

कितने निकले, कहां से निकले, अब ये सब डाटा के बतौर सामने आ रहा है। सरकारी आंकड़ो के अनुसार 15 लाख प्रवासी मजदूर तो रिलीफ कैंप में है। 31 मार्च 2020 को सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया की 5 से 6 लाख प्रवासी मजदूर सड़को के रास्ते गांव की ओर जा रहे है। जिसको कभी गिना नहीं गया अब वो चारों तरफ दिख रहे है। अगर ये वापस नहीं लौटे तो शहर और अर्थव्यवस्था को वापस पटरी पर लाना असंभव होगा। अब जब लाखों की संख्या में प्रवासी मजदूर गांव लौट चुके है या लौट रहे है या आने वाले दिनों में लौटेंगे तो इसको कैसे देखा जाए। क्या मजदूरों के पीछे-पीछे इंडस्ट्री भी वहां पहुचेगी। अगर मजदूर नहीं है तो इंडस्ट्री को तो शिफ्ट करना ही होगां। लेकिन बाकी फैक्टर्स भी निर्णायक होंगे। खैर, पिछड़े राज्यों के लिए ये एक मौका भी है। नए सिरे से इंडस्ट्री को न्योता देने का। ये जो प्रवासी मजदूर है अपने साथ हुनर और अनुभव का खजाना लेकर गांव आ रहे है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नयी उर्जा देने की भरपूर संभावना हैं प्रवासी मजदूर आधुनिकता व आधुनिक व्यवस्था से दोचार होकर लौटे है। अर्थव्यवस्था के साथ-साथ ग्रामीण सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव में भी ये एक सक्रिय एजेंट का काम करने वाले है। इस संकट से उत्पन्न अवसरों को समझने और समेटने की जरूरत है। प्रवासी मजदूर चाहे गांव में रहे या शहर में उनकी अहम् भूमिका और गूढ़ प्रतिभा और परिश्रम को उचित दिशा और पारिश्रमिक देना ही हितकारी है।

कोविड-19 ने वैश्वीकरण की हमारी दिशा को सर के बल खड़ा कर दिया है। सभी ने अपनी सीमाओं को बंद कर दिया है। देश के अन्दर ही उत्पादन पर जोर दिया जा रहा है। तकनीक के इस सदी में किसी के लिए अलग थलग रहना संभव नहीं है और ना रहने की जरुरत है। जरुरत है तो एक स्तर तक की आत्मनिर्भरता को पाने का। सभी जरूरतों के लिए हम दुनिया पर निर्भर नहीं रह सकते। वैश्वीकरण में वैल्यू चैन ग्लोबल हो गयी थी। कुछ भी बिना ग्लोबल हुए नहीं हो पा रहा था। फाइनल प्रोडक्ट तभी संभव था जब दुनिया भर से जरुरी चीज़े आ सके। दुनिया की आधी आमदनी इसी प्रकार की इंटरनेशनल ट्रेड से होती है। कोरोना ने सब बंद कर दिया। अभी हम वही बना सकते है जिसको बनाने का पूरा सामान हमारे पास मौजूद है। ग्लोबल ट्रेड जरुरत है और रहेगी। विकास तो करना ही है लेकिन सावधानी बरतनी होगी। अपने आप को पूरी तरह दुनिया के हवाले नहीं छोड़ा जा सकता। ग्लोबल और लोकल को नए सिरे से पुर्नपरिभाषित करना होगा।

प्रवासी मजदूरों को जिनके पास ग्लोबल वैल्यू चैन का अनुभव है उसे लोकल इकॉनमी खड़ा करने की कोशिश हो। कृषि आधारित लघु, कुटीर उद्योगों से शुरुआत की जा सकती है। फ़ूड प्रोसेसिंग की संभावनाओ से कोई अनभिज्ञ नहीं है। कोरोना काल में वर्क फ्राम होम की बात बहुत की गई और लोगों ने ऐसा किया भी। मददगार बना तकनीक। लेकिन अब उसी तकनीक ने वर्क फ्रॉम गांव की भी संभावनायें खड़ी की है. आईटी जैसे हाई स्किल जॉब भी गांव से किये जा सकते है. लेकिन गांव की सामाजिक-सांस्कृतिक माहौल भी देना होगा जहा आधुनिक मूल्यों और विचारो के साथ आज़ादी से जिया जा सके और सभी जरूरते शहर की भांति मौजूद हो। बिजली, पानी, सड़क, सुरक्षा, नेटवर्क जैसी बुनियादी सुविधाओ में शहर जैसा ही हो यह भी सुनिश्चित करना होगा।
(सामाजिक कार्यकर्ता एवं शोधकर्ता। असंगठित क्षेत्र के मजदूरों, खाद्य एवं व्यापार नीति से जुड़े विषय पर लगातार सक्रिय)

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