मंगरूआ
नयी दिल्ली: हम मेहनकश जग वालों से जब अपना हिस्सा मांगेगे,
इक खेत नहीं एक देश नहीं हम सारी दुनिया मांगेगे
फैज अहमद फैज की ये पंक्तियां गुनगुनाई तो खूब जाती हैं लेकिन कोरोना महामारी के दौर में ये मेहनतकश गांव के रास्ते में हैं। जिस महानगरों के निर्माण में इनका योगदान था उन महानगरों की सड़कों पर दुरदुराये जा रहे हैं। देश मांगने की तमन्ना लिए गए थे लेकिन शहरों से भगाये जा रहे हैं। लेकिन ये भाग कर जाएंगे कहां..एक ही ठिकाना है वो है उनके सपने का गांव। लेकिन वो गांव भी उन्हें अपनों की नजरों से नहीं देख रहा। देख रहा है तो हिकारत की नजरों से। रास्तों की दुश्वारियां,अपमान,भूख, सहकर यदि गांव के मुहाने पर पहुंच भी गये तो गांव में प्रवेश की अनुमति नहीं। हो भी क्यों कोरोना के फैलने का खतरा है। डर है संक्रमण से कहीं पूरा गांव न प्रभावित हो जाए। लेकिन कहीं न कहीं तो सर छुपाना ही होगा। रात काटना ही होगा और वो आशियाना बना है गांव का विद्यालय।
आईये आपको लिए चलते हैं उन दो गांवो में जहां मजदूरों उस स्थान का कायाकल्प कर दिया है जहां उन्हें सर छिपाने की जगह मिली थी। सबसे पहले चलते हैं राजस्थान के सीकर जिले के पलसाना गांव में। जी हां जैसा कि सबको मालूम है कि अचानक हुई लॉकडाउन की घोषणा के बाद देश भर से मजदूर निकल कर अपने गांव की ओर चल पड़े। जब प्रशासन की नींद खुली तो इन मजदूरों को जहां तहां क्वारंटाईन के लिए रोका गया। ऐसे ही कुछ मजदूरों का जत्था दूसरे प्रदेशों से राजस्थान पहुंचा। लेकिन आप कहेंगे इसमें कौन सी नयी बात है। नयी बात तो वो जो इन्होंने 14 दिन के क्वारंटाईन पीरियड में जो किया वह नया है। सचमुच काबिले तारीफ है। उल्लेखनीय है कि लॉकडाउन के कारण बीच रास्ते में फंसे मजदूरों ने अपनी मेहनत से राजस्थान के एक स्कूल की सूरत बदल डाली। राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित कस्बे पलसाना के सरकारी स्कूल में बनाए गए पृथक केन्द्र में जब इन मजदूरों को ठहराया गया था तो इनके मन में अविश्वास था। गांव के लोग डरे हुए थे। बावजूद गांव ने अपना धर्म निभाया। बदले में इन मेहनतकश मजदूरों ने सकारात्मक सोच दिखाते हुए स्कूल का कायाकल्प कर दिया स्कूल में ठहराए गए मजदूरों ने खाली समय में स्कूल के रंग रोगन का बीड़ा उठाया और वे दूसरों के लिए नजीर है।

क्या है मामला
पलसाना कस्बे के ‘शहीद सीताराम कुमावत और सेठ केएल ताम्बी राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय’ में हरियाणा, राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश के 54 मजदूर ठहरे हुए हैं। ये सभी लोग पूर्ण रूप से स्वस्थ हैं और इनकी पृथक वास अवधि भी पूरी हो गई है। मजदूरों से जब इस विषय में बात की गई तो उन्होंने बताया कि ये पृथक वास के दौरान सरपंच और गांव के लोगों ने स्वयं खर्च कर उनके रहने के लिए बहुत ही बढ़िया व्यवस्था की थी। वे इस व्यवस्था से इतना खुश थे कि बदले में गांव के लिए कुछ करना चाहते थे और इसी सोच में उन्होंने स्कूल के रंग-रोगन का काम शुरू कर दिया।
मजदूरों ने सरपंच से रंग-रोगन का सामान लाकर देने की मांग की। सरपंच और विद्यालय कर्मियों की ओर से सामग्री उपलब्ध कराने के बाद मजूदरों ने विद्यालय में रंगाई पुताई कर स्कूल को ऐसा चमका दिया। गांव वालों के व्यवहार और मजदूरों की मेहनत ने स्कूल की दशा ही बदल दी। बदलाव इस कदर आया कि शिविर का निरीक्षण करने के लिए आए जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव जगत सिंह पंवार ने भी पृथक केन्द्र यानि स्कूल को देखा तो प्रभावित हुए। उन्होंने केन्द्र में ठहरे लोगों से काफी देर तक चर्चा भी की। पंवार ने मजदूरों के विचार सुनकर उनकी तारीफ की और कहा कि उनका यह कार्य अन्य केन्द्रों के लिए ‘रोल मॉडल’ है।
क्या कहते हैं सरपंच
पलसाना के सरपंच रूप सिंह शेखावत से जब पंचायत खबर ने इस विषय में बात की तो उन्होंने कहा कि तो उन्होंने कहा कि झुंझनू जिले से ये 52 मजदूर पैदल ही अपने राज्य उत्तर प्रदेश और हरियाणा की ओर जा रहे थे। इनमें से 38 मजदूर उत्तर प्रदेश के थे जबकी शेष 16 हरियाणा के थे। जिला प्रशासन से जुड़े लोगों को जब इन मजदूरों पर नजर पड़ी तो उन्होंने पंचायत को निर्देश दिया कि इनको गांव के स्कूल में बनाए गये क्वारंटीन सेंटर में जाए। गांव वालों ने इनकी पूरी देखभाल की। खाने पीने की बेहतर व्यवस्था की गई। इसका परिणाम सामने है। मजदूरों के व्यवहार से पूरा गांव अभिभूत है। यहां तक कि जब ये मजदूर गांव से अपने गांव जा रहे थे तो उनको कंबल वस्त्र और चादर देकर विदा किया गया। सरपंच ने बताया कि जब ये मजदूर गांव से जा रहे थे तो ऐसा लग रहा था कि कोई अपना विदा ले रहा है। वहीं राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय पलसाना के प्रधानाचार्य राजेन्द्र मीणा ने बताया कि विद्यालय में पिछले नौ साल से रंग-रोगन का काम नहीं हुआ था। सभी शिक्षकों ने रंग रोगन का सामान लाने के लिए आर्थिक योगदान भी दिया और भी सराहनीय बात यह रही कि यहां ठहरे मजदूरों ने स्कूल में रंग रोगन करने के लिए कोई मजदूरी भी नहीं ली।
अब चलते हैं बिहार की ओर जहां बगहा के स्कूल से ऐसी ही खूबसूरत तस्वीर सामने आई है।
देश के अन्य राज्यों की तरह ही बिहार के बगहां में भी क्वारंटीन सेंटर बनाया गया था। वहां क्वारंटीन में 52 मजदूरों को रखा गया था जो नेपाल से आये थे। क्वारंटीन सेंटर स्कूल में इस लिए बनाया गया था कि क्योंकि स्कूल महीनों से बंद था और बाहर से आये मजदूरों को या तो पंचायत भवन में रूकवाना था या फिर स्कूल में। प्रशासन ने फैसला लिया कि स्कूल में क्वारंटीन सेंटर बनाया जाए।
मजदूरों ने किया श्रमदान,चमकने लगा स्कूल
भारत नेपाल सीमा पर स्थित लक्ष्मीपुर रमपुरवा राजकीय मध्य विद्यालय में खाली समय में इन मजदूरों ने बेहद खास काम किया। उन्होंने महीनों से बन्द पड़े स्कूल में अपनी मेहनत से साफ-सफाई और रंग-रोगन किया, साथ ही फूल-पत्तियों से स्कूल का कायाकल्प कर दिया। इतना ही नहीं इस दौरान उन्होंने सोशल डिस्टेंसिग का पूरी तरह से पालन किया और साथा ही स्वच्छता और सामाजिकता का संदेश देते हुए गांव वालों के लिए भी नजीर पेश किया। यही कारण है कि मजदूरों के इस प्रयास को न सिर्फ जिला प्रशासन बल्कि गांव के मुखिया प्रतिनिधि सुमन कुमार सिंह,प्रधान शिक्षक संजय कुमार व ग्रामीणों ने बहुत प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि जिस तरह से इन मजदूरों ने बेकार बैठने की जगह कुछ नया करने का फैसला लिया, इसी तरह से दूसरों को भी सबक लेना चाहिए।
उल्लेखनीय है कि इन दो अलग—अलग जगहों पर शहर से लौट कर आये इन मजदूरों ने जो संदेश दिया है उससे साफ है यदि गांव इन प्रवासी मजदूरों के काम की व्यवस्था गांव में ही करे, उन्हें सहजता से अपनाये तो जो मजदूर अपने खून पसीने से महानगरों को संवार सकता है वह अपने गांव को भी बदल सकता है। इसके साथ ही गांव से पलायन कर शहर गये इन मजदूरों को कोरोना काल में भले ही मजबूरी में गांव लौटना पड़ा हो लेकिन संकेत साफ है रूखी सूखी खाकर जो मजदूर शहर को बदल सकता है वो अपने गांव को भी बदल सकता है। इसलिए इन्हें भी संकल्प लेना होगा रूखी सूखी खाएंगे गांव छोड़के न जाएंगे।