सोशल मीडिया पर नहीं रूक रहा अध्यक्ष जी को याद करने का सिलसिला

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मंगरूआ
नयी दिल्ली: देश में कोरोना महामारी के कारण आपात काल जैसी स्थिति है। लॉक डाउन के दौरान बाहर निकलना मना है। कोई सार्वजनिक सभा समारोह भी नहीं किया जा सकता। लेकिन इस बीच आपात काल के दौरान और उसके बाद के संसदीय राजनीति में, देश में जनमानस के नायक, लोकयात्री और युवा तुर्क के रूप में अपनी पहचान बना चुके पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की 93 जयंती के अवसर पर कोरोना के लॉक लॉक डाउन के सोशल मीडिया पर लगातार जारी है। सोशल मीडिया माध्यमों पर चंद्रशेखर को लेकर जो लिखा, कहा गया उससे उनके विराट व्यक्तित्व का पता चलता है। पेश है इनमें कई लोगों के फेसबुक पोस्ट का संपादित,संक्षेपित अंश—पार्ट 2
वरिष्ट पत्रकार और सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय रहने वाले चंचल जी ने लिखा है..

दाढ़ी ।
( पूर्व प्रधानमंत्री मरहूम चंद्रशेखर को जॉर्ज फर्नांडिस दाढ़ी कह कर बोलते बतियाते थे, हम लोग भी जदा कदा इसी नाम से आपस मे समझ लेते थे) कुछ लोग आज यानी 17 अप्रैल को चंद्रशेखर जी का जन्मदिन मनाते हैं , हम भी उन्ही में एक हैं । गोकि चंद्रशेखर जी के जन्मदिन की यह तारीख घपले में है , लेकिन इससे क्या मतलब , चंद्रशेखर जी पैदा ही नही हुए , यह तो हो नही सकता , यह गारंटी है कि वे पैदा हुए हैं तारीख उन्हें नही तय करना था , तारीख आपको बताना था , बलिया के इब्राहिम पट्टी को बताना था
– का हो फलाने ! अपने चंद्रशेखर बाबू कब पैदा भ रहलेन हो ?
– उही साल हो जब सैमन कमीशन आवा रहल ।
– हूँ सत्ताईस । वोनइस सौ सत्ताईस ? तारीख ?
– का मर्दे ! बूड़ बकयी के बात करत हौव् । तब लइकन के जन्मदिन के याद करत रहा हो ? मुंसी जी मदरसे में जवन लिख दिहिन बस उहै तय ।

बात वाजिब है । इब्राहिम पट्टी बलिया जिले का एक गांव जो था तो पहले से , लेकिन राजस्व के खाते तकही महदूद था उसने एक बच्चे को जन्म देकर खुद अमर कर लिया इब्राहिम पट्टी । चंद्रशेखर का इब्राहिम पट्टी , उसकी गरीबी , गुरबत , अभाव आज की निराश पीढ़ी को बल देती है कि चलो उठो देखो चंद्रशेखर को जानो बहुत कुछ सीखने को मिलेगा ।
हम कहें कि हमसे पटती थी तो सलीके के साथ ज्यादती होगी सच तो यह है कि वे हमें मानते थे , परिवार के सदस्य के रूप में और उसमें हम अकेले नही रहे इनके कुटुम्ब रजिस्टर को देखा जाय तो देश का कोई कोना नही बचा होगा जहां दाढ़ी का परिवार न हो ।

सही बोला न , प्रोफेसर साहब ? ( प्रो0 राजकुमार जैन ) विदेश तक ,।
विषयांतर कर दूँ । हम जीवनी लिखने थोड़े ही बैठे हैं , हम तो उस मनीषी को याद कर रहे हैं , क्यों कुंवर सुरेश जी ? दाढ़ी के ससुराल में हमने अपनी बड़ी बेटी की शादी तय कर दी । वे लोग इसकी सूचना और निमंत्रण लेकर दाढ़ी के पास गए । दाढ़ी हंसे – कुछ पाए क उम्मीद मत करिह , चंचल समाजवादी हउवें । यह किस्सा आज तक चलता है बेटी के घर मे । हुआ भी वही , काहे झूठ बोलूं । दहेज में मिठाई ही दे पाया ।
एक दिन दिनमान के संपादक रहे रघुवीर सहाय ने कहा चंचल जी जॉर्ज का एक इंटरवियू ले आइए । मामला बिगड़ गया गए थे कुछ और के लिए टिकट मिल गया चुनाव लड़ने का और हम उम्मीदवार बन कर तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीपति मिश्र के खिलाफ चुनाव मैदान में । इज्जत के साथ खेत रहे । हमारे प्रचार में चंद्रशेखर जी बहुत मदद दिए ।
अनगिनत वाक्यात हैं । चंद्रशेखर जी बहुत याद आते है , इस समय तो कुछ ज्यादा ही । उनका इकला चलो बहुत बल देता है ।
सादर नमन
पटना से वरिष्ट पत्रकार सुरेंद्र किशोर ने इन शब्दों के साथ चंद्रशेखर को याद किया है।

लिखते हैं..ऐसे थे चंद्र शेखर जी

तब मैं दैनिक ‘आज’ के पटना संस्करण में काम करता था। उस अखबार में वरिष्ठ पद पर थे मान्यवर नर्मदेश्वर राय। कुछ ही माह पहले उनका निधन हुआ है। नर्मदेश्वर बाबू चंद्रशेखर जी के काफी करीबी थे। सुना था कि राय साहब के बड़े भाई चंद्रशेखर जी के साथ राजनीति में थे। वे भी उत्तर प्रदेश के ही रहने वाले थे। उनका एक तरह से परिवारिक संबंध था। हालांकि दोनों भिन्न जातियों से आते थे। मैं उन दिनों पटना के लोहिया नगर में रहता था। पास में ही नर्मदेश्वर राय का आवास था। उनके साथ अक्सर सुबह में राजनीतिक गपशप का दौर चलता रहता था। वे समकालीन राजनीति के बड़े जानकार थे। असल में यहां मैं एक दूसरी बात कहना चाहता हूं। जो कुछ मैंने देखा,वह विरल है। वैसा चंद्रशेखर जी ही कर सकते थे। चंद्र शेखर जी जब कभी पटना आते थे तो अक्सर रात का भोजन नर्मदेश्वर राय के साथ ही करते थे।
राय साहब पटना में अकेले ही रहते थे। वे खुद होटल में खाना खाते थे। चंद्रशेखर जी के लिए खाना कैसे बनता ?
उस समस्या का हल भी चंद्रशेखर जी के पास था। चंद्र शेखर जी अपने साथ खाने का पूरा सामान होटल से ही बंधवा कर नर्मदेश्वर जी के यहां चले आते थे। स्वाभाविक है, उनके साथ दो- चार लोग और होते थे। इसलिए मेरे घर से थालियां चली जाती थीं। फिर सब साथ मिल -बैठकर खाना खाते थे।
चंद्रशेखर जी का यह अपनापन राय साहब के सिर्फ पत्रकार होने के कारण ही नहीं था। उससे कुछ अधिक था।
आम धारणा रही कि अध्यक्ष जी यानी चंद्र शेखर जी दोस्तपरस्त नेता थे। नर्मदेश्वर जी उनके छोटे भाई की तरह थे। ‘आज’ से अलग होने के बाद राय साहब दिल्ली में यूनीवार्ता में अनेक वर्षों तक रहे। पहले मैं जब कभी दिल्ली जाता था तो राय साहब से मिलने की कोशिश करता था। मिलता भी था। इधर तो अनेक साल हो गए दिल्ली गए।
राय साहब को मैं सच्चे व स्वाभिमानी व्यक्ति के रूप में याद करता रहा हूं।

सुरेंद्र किशोर जी के इस पोस्ट  पर उनके मित्र मंडली द्वारा की गई टिप्पणी भी चंद्रशेखर जी की यादों को ताजा करती है।
एक फेसबुक मित्र किशोर चौबे यह कहते हुए तंज करते हैं कि जी, चन्द्रशेखर जी इतने महान थे कि धनबाद के सूर्यदेव सिंह से मिलने उनके घर भी जाते थे।
इसके जवाब में सुरेंद्र किशोर जी ने लिखा है कि प्रधान मंत्री स्तर के भी इस देश में ऐसे कितने नेता हुए हैं जिनमें
ऐसी भीषण कमजोरियां न हों ?!! आप उन्हें जानते होंगे,मैं नहीं जानता। दिवंगत राज्य सभा सदस्य गंगा शरण सिंह कहा करते थे कि ‘‘यदि मैं महान नेताओं से संबंधित संस्मरण लिख दूं तो आप जिन्हें आज स्वर्गीय कहते हैं,उन्हें नारकीय कहने लगेंगे।’’
गंगा बाबू गांधी से लेकर वैसे अनेक बड़े नेताओं को अत्यंत करीब से जानते थे जो आजादी के बाद हमारे ‘‘भाग्य विधाता’’ हुए।
जेता सिंह की टिप्पणी है कि
यशवंत सिन्हा जी ने हाल में ही चंद्रशेखर जी के बारे में कई संस्मरण सुनाए और जैसा कि आपने लिखा है उन्होंने भी बताया कि चंद्रशेखर जी दोस्ती निभाने की कोई सीमा नहीं मानते थे और दोस्ती में कमजोरियां कैसी?
वरिष्ट पत्रकार मनमोहन शर्मा ने अपनी टिप्प्णी में लिखा है कि
राय साहब को यूनीवार्ता मे नौकरी दिलाने मै भी चंद्र शेखर जी का योगदान था। समाचार समिति मे फ्लैट खरीदने मे भी उन्हो ने सहायता की थी। यह हकीकत है कि नेहरू परिवार की तरह चंद्र शेखर जी भी दोस्त नवाज थे। उन्हो ने हर दोस्त की दिल खोल कर मदद की। यह आरोप सरासर गलत है कि चंद्र शेखर जी जातिवादी थे। मै उन की मित्र मंडली मे भले ही नही रहा मगर उन की पत्रकार मंडली मेसभी जातियों के लोग थे।
एक फेसबुक यूजर संजय त्रिपाठी जो संभवत: छपरा से ही होंगे जहां के सुरेंद्र किशोर जी हैं, लिखते हैं की छपरा ( अब सारण) जिला वाले संकोची व अंतर्मुखी निकले। नहीं तो आप भी राज्यसभा की दहलीज तक अवश्य पहुंचे होते। ये मेरा मन कह रहा है। जो भी है आप जहां हैं मजबूत व प्रतिष्ठित मुकाम पर हैं।
इसके जवाब में सुरेंद्र किशोर जी लिखते हैं…
संजय जी,
अपने काम में न तो मैं संकोची हूं और न अंतर्मुखी। एक समय की बात है। पटना में सूर्यदेव सिंह के आवास पर चंद्रशेखर जी प्रेस कांफ्रेंस कर रहे थे।
सूर्यदेव चंद्रशेखर जी के ठीक पीछे खड़े थे। मैंने उनकी आंखों में आंखें डाल कर पूछा, ‘‘सूर्यदेव जी को लेकर आपकी इतनी बदनामी होती है,फिर भी आप उनके आवास पर प्रेस कांफ्रेस कर रहे हैं। इस पर आपने कभी विचार नहीं किया है ?’’ आप कल्पना कीजिए,इस पर उनकी कैसी प्रतिक्रिया रही होगी ?
उनका रौद्र रूप तुरंत सामने आ गया। उन्होंने धमकियों के साथ लंबी झाड़ लगा दी। बड़े-बड़े नामी-गिरामी संवाददाता वहां उपस्थित थे। किसी को उन्हें टोकने की हिम्मत नहीं हुई। किसी ने उस पर पूरक प्रश्न नहीं पूछा। हां,मैंने उनकी पूरी बातों को जरुर नोट किया। पूरा का पूरा दूसरे दिन जनसत्ता में छप गया था। वह जिस दिन कटिंग मिल जाएगी तो उससे भी अवगत करा दूंगा। जहां तक राज्य सभा का सवाल है,मैं खुद को उस गरिमायुक्त जगह के लायक नहीं समझता। वैसे जो काम मैं कर रहा हूं और करने वाला हूं,वह किसी अन्य काम से कम महत्वपूर्ण नहीं है।

इसी पोस्ट पर अपनी टिप्पणी में ज्ञान वद्र्धन मिश्रा लिखते हैं..
बात सम्भवत: 1981 की होगी। तब मैं रात्रि में 10 बजे पंजाब मेल से पटना जंक्शन से घर पटनासिटी लौटता था। एक दिन अपने सहयोगी कुमार दिनेशजी के साथ रात में पंजाब मेल की प्रतीक्षा कर रहा था। ट्रेन आने पर पता चला कि फर्स्ट क्लास की बागी में चंद्रशेखर जी हावड़ा जा रहे है। बस फिर क्या था हम दोनों पटना सिटी तक उनसे गपियाते आये। न कई तामझाम न कोई सिक्युरिटी। बात आदरणीय नर्मदेश्वर राय जी से शुरू हुई और वहीं आकर खत्म हुई। देख तहार स्टेशन आ गइल ठीक से उतर– यही अंतिम वाक्य था उनका।
अजेय कुमार लिखते हैं…
मान्यवर,श्रद्धेय अध्य क्ष जी स्वयं स्वीकारा कि सूर्यदेव सिंह उनके मित्र हैं। मित्र होने के नाते प्रिय भी होंगें ही। प्रधानमंत्री रहते भी उनके आवास पर गये। परन्तु,कभी किसी मुकदमे में उनकी पैरवी किसी अधिकारी से नहीं की। एक घटना मुझे इस प्रसंगवश याद आ गयी। चारा घोटाले के आरोप में मान्यवर लालू जी बेऊर जेल में बंद थे। अध्यक्ष जी पटने में थे। कल होकर उन्हें एक सभा में छपरा जाना था,आदरणीय रामसुन्दर दास जी,शिशिर कुमार जी,मेरे पिताजी (मुनीश्वर बाबू) और मैं भी उनके साथ उनके लिए आरक्षित राजकीय अतिथिशाला में बैठा था। बातचीत के दरम्यान वे बोले–लालू जेल में बा,काल्ह छपरा जात समय ओकरो से मिल लेवल जाए। मेरे पिताजी ने उनके इस प्रस्ताव का विरोध किया। इस पर उन्होंने कहा कि–भाई जी,संकट में त दुश्मनों से मिले के रिवाज हमार संस्कृति में पुरान बा,रौआ के ठीक ना बुझाए रौआ ना जाएब।अगले दिन सब लोग मिलने गये,पिताजी बाहर ही बेऊर में गाड़ी में बैठे रहे। सबलोग वापस आए तो साथ हमसब छपरा सभा में गये। अध्यझ जी सदा भारतीय संस्कृति और मान्य सिद्धांतों का पालन अपने जीवन में सदैव किया।(मेरे पिताजी और अध्यझ जी के बीच सदैव बातचीत उन दोनों के आंचलिक भाषा में होती थी,जो उनके आत्मीय संबंधों को परिभाषित करती है।)
परमहंस सिंह ने लिखा है कि…
राजनेता अपराधियों से संबंध रखते हैं यह आम तौर पर पाया जाता है लेकिन सभी छिप-छिपकर मिलते हैं और उनकी सहायता भी करते हैं। यह साहस सिर्फ चन्द्र शेखर जी का ही था जिन्होंने कुछ भी छिपाया नहीं, साहसपूर्वक सामने रखा।
उनके गांव के ही एक मित्र मुगलसराय जं.पर रेल में तार बाबू के पद पर कार्यरत थे जब वे राज्यसभा सदस्य थे।दिल्ली यात्रा के बीच कभी-कभी उनके साधारण रेलवे क्वार्टर पर भी चले जाते थे।संबंध निभाने वाले विरल शख्स से यह गुण सीखने लायक है।
कुछ इसी तरह की टिप्पणी महंत राजीव रंजन दास की भी है। लिखते हैं..
व्यक्तिगत रिश्ते निभाने में तो उन्होंने कभी कोताही नहीं की और यह भी परवाह नहीं की कि कोई क्या कहेगा? ऐसा कौन बड़ा राजनेता नहीं रह होगा जिसके यहां इस तरह के लोगों का आना जाना या नजदीकी रिश्ते नहीं थे ?अंतर इतना ही कि कुछ लोग रात के अंधेरे का इंतज़ार करते थे मगर यह नहीं करते थे ।
ज्योतेंद्र मिश्रा ने लिखा है..
आदरणीय चन्द्र शेखर जी से मेरे जैसे अदना आदमी से परिचय का कोई आधार ही नहीं था। लेकिन पितृ तुल्य पूज्य त्रिपुरारि प्रसाद सिंह भू पू विधान सभा अध्यक्ष के अंतेवासी होने के कारण इस महापुरुष से वार्त्ता और स्नेह का अवसर मिल जाता था। आदरणीय त्रिपुरारि बाबू के चुनाव में जाने के पूर्व एक बुकलेट प्रकाशित करने की योजना तय हुई। इसे लिखने का उत्तर दायित्व मुझे ही दिया गया था। 15 दिनों की अथक मिहनत के बाद जब इसे प्रेस में बैठकर छपवाने के लिए जाना था। इसी क्रम में संयोग वश चन्द्रशेखर जी त्रिपुरारि बाबू के आवास पर आये। वे दोनों ऊपर के कमरे में एकांत वार्त्ता में तल्लीन हो गए । मुझे एक आइडिया तुरत सूझा कि क्यों नहीं इस बुकलेट पर चन्द्रशेखर जी के दो शब्द हो जाय । लेकिन जहां दो व्यक्ति वार्त्ता कर रहे हों वहाँ मूसलचन्द का जाना महामूर्ख की कैटेगरी में गिना जाना है।मैंने आदरणीय चन्द्रशेखर जी से पहले कभी मिला नहीं था। फिर भी हिम्मत कर पूज्य चाचाजी को लक्ष्य करते हुए उनके पास पहुंच गए और उनकी इजाज़त लेकर बुकलेट पर
कुछ लिख देने का बाल सुलभ अनुरोध किया। उन्होंने मेरी ओर गौर से देखा फिर त्रिपुरारि बाबू की ओर मुखातिब हुए।
जैसे मन ही मन पूछ रहे हों क्या लिखना है? पू चाचाजी ने कहा कि युवा लेखक कवि हैं हमारे कंस्टीट्येंसी के ज्योतींद्र जी। काफी जीनियस है। मेरे बारे में कुछ लिखा है ।
वे समझ गए ।
बोले- दिहीं कलम दिंहि। मैंने टी टेबल पर बुकलेट की पांडु लिपि रख दी ।
चन्द्र शेखर जी ने मुश्किल से 5 मिनट लिखा होगा। लेकिन उनकी यह लघु टिप्पणी त्रिपुरारि बाबू के सम्पूर्ण राजनीतिक जीवन का निचोड़ था । उनके शब्द उनकी अध्ययन शीलता और उच्च संस्कार को प्रतिबिंबित कर रहे थे। उस लघु पुस्तिका का नाम था
” वह” ।
रामनंदन प्रसाद इसी पोस्ट पर अपनी टिप्पणी में लिखते हैं…
साहसी राजनेता थे । सामान्य राजपूत परिवार से उनका होना विश्वनाथ प्रताप सिंह जी पर उन्हें बढ़त देता था ।
दिल्ली में मंत्री पद नहीं लेकर अध्यक्ष बने रहना उनको इमानदार राजनीति में बढ़त दिलाता है ।
देवी लाल जी और विश्व नाथ प्रताप सिंह जी के बीच की गठबंधन को ईशू बनाना उनके राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी कमजोरी साबित हुई ।
वरिष्ट पत्रकार ओमप्रकार अश्क ने लिखा है..श्रद्धेय चंद्र शेखर जी को नमन

चंद्रशेखर जी की कल (17अप्रैल) पुण्यतिथि थी। कल से आज तक कई लोगों के संस्मरण उन पर आए। आज अग्रज सुरेंद्र किशोर जी का फेसबुक पोस्ट पढ़ते हुए मेरे मन में भी तीन स्थानों की चार मुलाकातें स्मृति पटल पर तैरने लगीं।
उनको जानने-समझने का पहला मौका रांची में मिला। दूसरा अवसर पटना में आया। बाकी दो मौके कोलकाता में मिले। मैं अपनी बात क्रमवार रांची से ही शुरू करता हूं।
प्रभात खबर में काम करने के दौरान मैंने देखा कि तत्कालीन प्रधान संपादक और संप्रति राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश उनसे कितना प्रेरित थे। तब संपादकीय में एक टीवी लगा हुआ था, जो दिन भर चलते रहता था। उसके सामने के कमरे में हरिवंश जी बैठते थे। बात तब की है, जब चंद्रशेखर प्रधानमंत्री नहीं बने थे, लेकिन इंदिरा गांधी का विरोध कर वह चर्चा में आ चुके थे। हरिवंश जी के कमरे का दरवाजा बंद रहता था और संपादकीय का दरवाजा हमेशा खुला रहता था। मैंने अक्सर देखा कि टीवी पर जब कभी चंद्रशेखर जी की आवाज सुनाई पड़ती थी, हड़बड़ी में कमरे से निकलकर हरिवंश जी सामने आकर इस मुद्रा में खड़े हो जाते थे, जैसे कोई गुरु प्रवचन कर रहा हो और शिष्य विशेष मनोयोग से सुन रहा हो। चंद्रशेखर जी के भाषण के तेवर के हिसाब से हरिवंश जी की भाव भंगिमा बदलती रहती थी। उनके चेहरे पर विजय भाव साफ नजर आता था।
वे उनकी बातों को इतना मनोयोग से क्यों सुनते थे, यह तब समझ नहीं पाया, लेकिन कुछ ही महीने बाद जब चंद्रशेखर जी प्रधानमंत्री बने तो रहस्य से परदा हटा। उनके मंत्रिमंडल में रांची से सुबोध कांत सहाय मंत्री बनाए गए। अचानक एक दिन तत्कालीन चीफ रिपोर्टर किसलय जी ने संपादकीय में आकर सब को यह सूचना दी कि हरिवंश जी प्रधानमंत्री के प्रेस सलाहकार बनाए गए हैं। किसलय जी को यह सूचना सुबोध जी के माध्यम से मिली थी।
यद्यपि उनके सलाहकार बनाए जाने पर पत्रकारिता जगत में कई तरह की बातें तब उठी थीं, लेकिन कई अवसरों पर हरवंश जी ने इसकी वजह भी बतायी थी। किसी से बातचीत के दौरान या हरिवंश सिंह के बाद में लिखे लेखों को पढ़कर यह समझ पाया कि सलाहकार का पद स्वीकार करने के पीछे उनकी मंशा क्या थी। दरअसल वे उसे बड़ी उपलब्धि मान रहे थे। जहां प्रधानमंत्री के प्रेस सलाहकार अब तक बड़े-बड़े पत्रकार होते रहे, वहां हरिवंश जी का पहुंचना उनके लिए यकीनन बड़ी उपलब्धि थी।

दूसरा मौका पटना में मिला, जिससे चंद्रशेखर जी को थोड़ा नजदीक से जान और समझ पाया। यह 1997 या 98 की बात होगी। वह निवर्तमान प्रधानमंत्री हो चुके थे। हरिवंश जी के माध्यम से यह सूचना मिली कि चंद्रशेखर जी कल पटना जाने वाले हैं। साथ होंगे एच एन शर्मा। उनके प्रेस कॉन्फ्रेंस की व्यवस्था में हर संभव मदद करनी चाहिए। अजय कुमार पटना प्रभात खबर के तब चीफ रिपोर्टर होते थे। उनके जरिए सभी अखबारों को यह सूचना दे दी गई कि कल चंद्रशेखर जी का प्रेस कॉन्फ्रेंस है, आप लोगों को अवश्य आना चाहिए। एच एन शर्मा मुझ से लगातार संपर्क बनाये हुए थे। पटना पहुंचते ही चंद्रशेखर जी तब चारा घोटाले के आरोप में बेउर जेल में बंद लालू प्रसाद यादव से मिलने गये थे।
बहरहाल प्रेस कॉन्फ्रेंस खत्म होने के बाद मैं उनसे मिलने गया। याद नहीं कि वह होटल था या सर्किट हाउस। वे प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद एक कमरे में आराम कर रहे थे। सुरक्षा जांच के बाद मैं उनके पास पहुंचा तो पहले उन्होंने हाल-समाचार पूछा। हरिवंश जी के बारे में पूछा। मैने जानना चाहा कि प्रेस कॉन्फ्रेंस कैसा रहा तो वे संतुष्ट दिखे।
मेरे मन में भी कुछ सवाल थे। हालांकि वे ऐसे सवाल नहीं थे, जिनकी चर्चा प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान पत्रकारों ने नहीं की थी। मेरा पहला सवाल था कि चारा घोटाले के आरोपी लालू यादव से जेल में मिलने क्यों गए। इस पर उन्होंने जो बात कही, उससे सहमत हुए बिना कोई नहीं रह सकता। उन्होंने कहा कि यह बताइए कि आपका बेटा या भाई किसी अपराध में जेल चला जाए तो क्या आप उससे नहीं मिलेंगे? दूसरी बात कि लालू प्रसाद अभी आरोपी हैं, उन्हें सजा भी नहीं हुई है। वे मेरे राजनीतिक मित्र रहे हैं। उनसे मिलने में भय और संकोच कैसा?
मेरा दूसरा सवाल था कि प्रधानमंत्री रहते आपने देश के स्वर्ण भंडार से सोना गिरवी रखा। इस पर उनका जवाब था- हम लोग गांव के आदमी हैं। गांव की औरतों को सोने-चांदी के गहने इसलिए नहीं दिए जाते हैं, वे सिर्फ श्रृंगार के लिए उसका उपयोग करें। इसके पीछे हमारे बुजुर्गों की मंशा यह भी रही है कि जब उस औरत पर कभी कोई संकट आये या दुर्दिन हों तो वह उन आभूषणों का इस्तेमाल कर सके। गिरवी रखकर अपने दुर्दिन से निजात पा सके। यही काम तो हमने किया। देश पर कर्ज का बोझ इतना था कि अगली बार हम जितना कर्ज लेते थे, उसका एक बड़ा हिस्सा ब्याज की रकम चुकता करने में ही चला जाता था। ऐसे में सोना गिरवी रखकर मैंने देश को दुर्दिन में बचाने का काम किया।
अब उन दो प्रसंगों की चर्चा करते हैं, जिनका ताल्लुकात कोलकाता से है। किसी कार्यक्रम में शामिल होने के लिए वे कोलकाता आए थे। संभवत: महाजाति सदन में कार्यक्रम था। कार्यक्रम के बाद भोजन की व्यवस्था सामने ही एक भवन में थी। संयोग से उस दिन हरिवंश जी भी कोलकाता में ही थे। कार्यक्रम समाप्ति के समय के हिसाब से उनसे मिलने हम लोगों को जाना था। इतनी भीषण गर्मी थी कि टैक्सी में सफर करना पसीने से तरबतर हो जाने जैसा था।
महाराजा ब्रांड के उत्पाद बनाने वाले तारकनाथ गुप्ता जी संयोगवश अपनी स्कॉर्पियो के साथ मुझसे मिलने आए थे। उन्हीं की गाड़ी से हम दोनों वहां पहुंचे। हरिवंश जी सबसे पिछली कतार में जाकर बैठ गए। मैं चंद्रशेखर जी के पास पहुंचा। उन्हें बताया कि हरिवंश जी भी आए हैं। उन्होंने इधर-उधर नजर घुमाते हुए पूछा, कहां हैं! मैंने इशारे से बताया कि सबसे पीछे बैठे हैं। इस पर उन्होंने कोई हड़बड़ी या आतुरता नहीं दिखाई।
इस बीच प्लेट में उनके लिए खाना आ गया। उन्होंने कहा- तूहों कुछ ले लs। तब तक मेरे किसी परिचित ने मुझे भी खाना परोस दिया। हम साथ खाने-बतियाने लगे। मैंने अपनी एक इच्छा जाहिर करनी चाही। उन्होंने पूछा- क्या?  मैंने बताया कि मेरे कई व्यावसायिक मित्र यहां उपस्थित हैं। मेरे अखबार के वे विज्ञापनदाता भी हैं। आपके साथ अपनी तस्वीर लेना चाहते हैं। अमूमन गंभीर रहने वाले चंद्रशेखर जी के चेहरे पर ठिठोली के भाव उभरे और उन्होंने कहा- पहले बता दिया होता। मैं एक फोटो सेशन ही रख लेता या सम्मान का सत्र ही रख लेता। मेरे पास शाल आ जाते और आपको विज्ञापन मिल जाता।
बहरहाल उनकी हामी पर खाते-खाते कई लोगों के साथ उन्होंने फोटो खिंचवाये। एक सज्जन थोड़ी देर तक उनके पास बैठे रहे तो उन्हें टोक दिया- हो गया, अभी और लोग भी हैं।
कोलकाता की दूसरी मुलाकात पार्क होटल में हुई। वे विश्व भोजपुरी सम्मेलन के कार्यक्रम में शामिल होने आए थे। कार्यक्रम के कर्ता-धर्ता समाजवादी नेता कृष्ण गोपाल सिन्हा थे, जिन्हें मैं कृष्णा भैया कहता था। शाम को मैं उनसे मिलने पहुंचा तो कमरे से बाहर ही मिल गए कृष्णा भैया। मैंने उनसे पूछा, कहां हैं अध्यक्ष जी? इशारे से उन्होंने कहा, कमरे में। मैं गया तो वे लेटे हुए थे। जाते ही पूछा- तोहार संपादक कहां बाड़े? (हरिवंश जी को उन्होंने संपादक कहा) फिर हाल-समाचार पूछा। मैंने जब यह पूछा कि कार्यक्रम कैसा रहा तो इस पर वे तिलमिला गये। चंद्रशेखर जी ने पास ही खड़े कृष्णा भैया की ओर इशारा कर कहा-इन्हीं से पूछ लीजिए। मुझे अपमानित कराने की इन्होंने ठान ली थी। कार्यक्रम में कम उपस्थिति पर वे भड़के थे। यह भी कहा- इनको मेरे साथ तस्वीरें ही खिंचवानी थी तो अपने घर ले जाते। आंगन में पूरे परिवार के साथ जितनी तस्वीरें चाहते, मैं खिंचवा लेता। यह संयोग कहिए कि श्याम नगर के गारुलिया के कार्यक्रम ने मेरी इज्जत बचा ली। काफी भीड़ थी।

मित्रो, इन प्रसंगों की चर्चा मैंने इसलिए की कि चंद्रशेखर जी को जितना मैंने जाना-समझा, वह बमुश्किल एक दशक के वक्त में, लेकिन मैंने पाया कि बेबाक-बेलाग बातचीत करने में या राजनीतिक-सामाजिक चिंतन-मनन में उनसे बढ़िया कोई राजनेता नहीं था। अगर तुलना करें अपने जमाने के हिसाब से तो अटल जी को मैं उनके बरअक्स पाता हूं। संसद में चंद्रशेखर जी को बोलते मैंने टीवी पर देखा है। सांसदों के झांव-झांव के बीच जब वह खड़े हो जाते थे तो पक्ष-विपक्ष को सांप सूंघ जाता था।


वरिष्ट पत्रकार अनुरंजन झा ने इन शब्दों के साथ एक तस्वीर साझा की है…
ये तस्वीर जो जेहन में चस्पा है । पूर्वांचल के लिए ऐसा दूसरा न हुआ । नमन, जयंती पर ।

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