लोक आस्था

गांव अगर खो गए, नहीं बचेगा देश और नहीं बचेगी संस्कृति

डॉ.राजश्री देवी गांव शब्द में ही एक अद्भुत आकर्षण है। गांव बोलते ही मन में हरे-भरे खेत, गाय-बैलों के चरने के लिए विशाल मैदान, पानी भरती औरतों का खिल-खिलाकर हंसना, शाम के समय नामघर (कीर्तनघर ) से आती शंख, घंटा, डबा की सम्मिलित मांगलिक ध्वनि, युवक-युवतियों का मिलकर मैदान में बरगद के नीचे बिहु नाचना, …

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टाटा..बिरला के सहयोग निर्मल होगी गंगा..नमामी गंगे से जुड़ेगे कॉरपोरेट

संतोष कुमार सिंह नयी दिल्ली: गंगा की साफ सफाई पर तमाम तरह की घोषणाएं सरकार के स्तर पर होती हैं। दावा किया जाता है कि गंगा अब निर्मल होगी,तब निर्मल होगी लेकिन जिनकी जीवनधारा गंगा के साथ—साथ आगे बढ़ती है। गंगा से प्रभावित होती है,वे सरकार के प्रयासों को नाकाफी मानते हुए अक्सर ये सवाल …

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केले के पत्ते पर भोजन..पर्यावरण की सुरक्षा, किसानों को आमद भी

नीरज प्रताप सिंह भागलपुर: गांव की अपनी परंपरा होती है। अपने रिवाज होते हैं। लेकिन गांव बदल रहे हैं। रिवाज बदल रहा है। परंपराएं पीछे छूट रही हैं। खान-पान के तौर—तरीके आधुनिकता के मोह में त्यागे जा रहे हैं। लेकिन गंभीरता से सोचे तो इन तौर-तरीकों को सहेजकर न सिर्फ हम परंपराओं से जुड़े रह …

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ज्यादा घांस काटने पर पुरस्कार में मिला चांदी का मुकुट

पंचायत खबर टोली घनसाली (टिहरी): अक्सर लोगों में मुंह से यह सुना जाता है कि पढ़ोगे नहीं तो बड़े होकर घांस काटोगे। यानी घांस काटना मतलब बेवकूफ होना। सबसे निकृष्टतम पेशा अपनाना। मानो, घास काटने वाला अनपढ़, जाहिल, गँवार और अनाड़ी ही होगा। लोग यह भी कहते हैं कि‘’मुझे भी जिन्दगी का काफी तजुर्बा है, …

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काच ही बास के बहंगिया… बहंगी लचकत जाय…

संतोष कुमार सिंह नयी दिल्ली: घाट सज चुके हैं। 2 बज गया है। दूरदराज से आने वाले व्रतियों ने घाटों पर डेरा डालना शुरू कर दिया है। घाटों पर भयंकर भीड़ होने की वजह से लोग काफी पहले ही अपने घर से घाट की ओर निकल जाते हैं।दिल्ली सरकार ने राजधानी में काफी बड़ी संख्या …

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