
मेघालय की पश्चिम जयंतिया पहाड़ी पर बसा एक सुंदर सा गांव है नर्तियांग जहाँ रहती है माँ जयन्तेश्वरी। इस गांव की पहचान में एक राजा, दो मंदिर और एक मोनोलिथ का बड़ा योगदान है।जयंतिया समाज की मान्यता है कि यह स्थान माँ जयन्तेश्वरी और भैरव, कामदीश्वर महादेव का स्थायी निवास है।जय की देवी माता जयंती का यह स्थाई निवास पुराण मे वर्णित 108 दिव्य शक्ति पीठों में से एक है। मंदिर की स्थापना के सन्दर्भ में उपलब्ध जानकारी के मुताबिक इसकी स्थापना लगभग 600 वर्ष पूर्व हुई थी।तब इस क्षेत्र में जयंतिया साम्राज्य के शासक राजा धन मानिक का राज हुआ करता था। उन्होंने नर्तियांग को जयंतिया शासनकाल की ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाया थी। लोकमान्यता के अनुसार एक रात राजा को स्वप्न हुआ। इस स्वप्न में स्वयं माँ दुर्गा ने राजा को नर्तियांग क्षेत्र के महत्व के बारे में बताया और कहा कि इस क्षेत्र में मंदिर का निर्माण करों। माता के आदेशानुसार राजा ने नर्तियांग में माँ दुर्गा के मंदिर का निर्माण कराया जो माँ जयन्तेश्वरी मंदिर के नाम से जाना गया।
नर्तियांग दुर्गा मंदिर के अतीत की कथा राजा दक्ष के यज्ञ से जुड़ी है। कथा के अनुसार जब राजा दक्ष के यज्ञ स्थल पर जब देवाधिदेव शिवजी का अपमान हुआ तो माता पार्वती यज्ञ कुंड में प्राणों की आहुति देकर सती हो गयी। इससे क्रोधित होकर भगवान शिव ने माता सती की मृत देह को लेकर भयानक तांडव करना शुरू कर दिया। उन्हें शांत करने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती की मृत देह 108 भागों में विभक्त कर दिया।धरती के जिन स्थानों पर माता सती के अंग गिरे वो स्थान शक्ति पीठ हो गए। मान्यता के मुताबिक माता सती की बाईं जंघा जयंतिया पहाड़ी के नर्तियांग में गिरी थी,शक्ति पीठो के नियम परम्परा के अनुसार ही इस शक्ति पीठ में भी माँ दुर्गा के साथ कालभैरव जी उपस्थित हैं। माता जयंती यहाँ जयन्तेश्वरी के नाम से पूजित है।
माता के मंदिर से तकरीबन एक कोस की दूरी पर काल भैरव जी का प्राचीन मंदिर है।यहां भैरव जी कामदीश्वर महादेव के रूप में पूजे जाते है। इस मंदिर के प्रांगण में जयंतिया राजा के आयुध और अस्त्र भी संरक्षित है।
नवरात्र उत्सव –
नर्तियांग दुर्गा मंदिर का नवरात्र उत्सव भी अपने आप मे विशिष्ट है। मंदिर में नवरात्र के दौरान केले के पेड़ को गेंदा आदि फूलों से सजाया जाता है और उसी की पूजा माँ दुर्गा के स्वरूप में की जाती है।6ठे दिन से 9 वें दिन तक चलने वाले इस त्योहार के अंत में दुर्गा स्वरूपा केले के पेड़ को पास की मयंगतांग नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है।पुराने वक़्त में इस मंदिर में आत्मोसर्ग की परम्परा थी वर्तमान में बदलाव के साथ मानवीय मुखौटे का प्रयोग करते हुए बलि दी जाती है।
क्षत्रिय मराठा है पीढ़ियों से पुरोहित–
नर्तियांग के इस शक्तिपीठ में पुरोहित की भूमिका पीढ़ियों से एक मराठा क्षत्रिय परिवार निभाता आ रहा है। ओनी देशमुख नाम के मौजूदा पुरोहित अपने परिवार की 30 पीढ़ी के है।पुजारी बताते है महाराष्ट्र के निवासी उनके पुरखो को पुरोहिती के लिए जयंतिया राजा ने सर्वप्रथम सिलहट बुलवाया था,फिर नर्तियांग में मंदिर निर्माण के साथ ही राजपुरोहित की नियुक्ति स्थाई तौर पर इसी मंदिर में कर दी गयी । पुरोहित देशमुख के पुरखे परिवार सहित पिछले 30 पीढ़ी से इसी स्थान पर रहकर भगवती माता जयन्तेश्वरी की पूजा विधान पूर्ण करते आ रहे है।






