कृषि शिल्पियों से समृद्ध खेती

पद्मश्री अशोक भगत

देश के निर्माण में शिल्पकार की बहुआयामी भूमिका होती है। इसलिए यदि कृषि और कृ​षकों को बचाना है तो कृषि यंत्र निर्माण करने वाले ग्रामीण कारीगरों को भी सशक्त करना होगा।
चाहे कोई भी व्यक्ति हो या परिवार या देश, उसकी प्रगति का मौलिक तत्व उसके नैसर्गिक स्वभाव और प्रकृति में निहित होता है। भारत की आत्मा उसके गांवो में बसती है और गांव की समूची संस्कृति और अर्थव्यवस्था मूलत: उसकी कृषि और परंपरागत शिल्प पर आधारित रही है। इन आधारभूत सामथ्र्य को त्यागकर एक सर्वथा अपरिचित विदेशी व्यवस्था को लादने का जो कु​त्सित प्रयास साम्राज्यवादी शाषकों ने किया था, उससे भी अधिक विद्रूप व कुत्सित तरीके से हमारी तथाकथित स्वदेशी एवं लोकतांत्रिक सरकारों ने किया है।


भारत में अर्थप्रणाली का केंद्र गांव का शिल्पकार होता था। इन दिनों भारत की खेती में उन्नयन और विकास की बातें खूब की जा रही हैं। हमारी सरकारे खेती करने वाले किसानों को कई प्रकार के आर्थिक सहायता दे रही है। अब तो खेतिहरों की सुविधा के लिए फसल बीमा भी लागू कर दी गई है। सरकार के द्वारा प्रत्येक वर्ष फसलों के लिए एमएसपी तय की जा रही है, बावजूद इसके न तो हमारे किसानों की हालत सुधर रही है और न ही भारत की खेती सुधर रही है। इसके पीछे के कारणों पर आज तक ध्यान नहीं दिया गया। भारत की खेती लंबे समय से ग्रामीण शिल्प पर आधारित रही है। देश के कई क्षेत्रों में यह परंपरा आज भी कायम है। स्थानीय संसाधनों से ही भारत की खेती उन्नत होती रही है। खेती के लिए बड़े पैमाने पर मानव एवं पशु श्रम का उपयोग किया जाता था। उसका स्थान अब स्वचालित मशीनों ने ले लिया है। ये मशीनें बहुत मंहगी होती हैं। इनके संचालन में भी बड़े पैमाने पर इंधन का उपयोग किया जाता है, जिसका उत्पादन भारत में बहुत कम होता है। पहले इस काम के लिए भी पशु श्रम का उपयोग होता था। साथ ही जो यंत्र बनाए जाते थे, वे गांव के कारीगरों के द्वारा निर्मित होते थे। इसलिए ये बेहद सस्ते होते थे। पशुपालकों के लिए भी आवश्यकता की सारी वस्तुएं गांव के कारीगर ही बनाते थे। कुम्हार द्वारा मिट्टी के दीप व बर्तन बनाना, लोहार, बढ़ई, नाई, तेली, रंगरेज, बुनकर आदि शिल्पियों द्वारा गांव की सभी आवश्यकताओं को गांव में ही पूरा किया जाता था। इसी कारण भारत का हर गांव आत्मनिर्भर होता था।


गलत योजनाओं के कारण आज भारत का हर गांव विपन्न हो चुका है। बड़े पैमाने पर गांव से पलायन हो रहा है। अब गांव में नौजवान नहीं मिलते हैं। सब शहरों की ओर पलायन कर गए हैं। भारतीय ग्रामीण शिल्प परंपरओं के लुप्त होने के कारण यह सब संभव हो पाया है। जब तक इन तमाम शिल्पियों को व्यापक आधार प्रदान नहीं किया जाएगा, खेती किसानी को दुरूस्त करना असंभव है।

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन की सरकार ने इस दिशा में पहल प्रारंभ की है। ग्रामीण शिल्पियों को ध्यान में रखकर कौशल विकास की विभिन्न योजनाएं प्रारंभ की गई हैं। वैसे इन योजनाओं में भी सुधार की जरूरत है, लेकिन मोदी सरकार की यह सकारात्मक पहल है। कोविड महामारी के विश्वव्यापी संक्रमण के इस दौर में एक बार फिर से ग्रामीण अर्थव्यवस्था ने अपनी ओर सबका ध्यान आकृष्ट किया है। ग्रामीण आधारभूत संरचना को दुरूस्त करने के लिए कृषि और कृषक के साथ ही कृषि व अन्य शिल्पियों को आधुनिक प्रशिक्षण एवं उनके द्वारा निर्मित उत्पादों को कृषि व कृषकों की तरह संरक्षण प्रदान किए जाने की जरूरत है। भारतीय कृषि को जबसे मशीनीकृत किया गया है तब से कृषि प्रक्षेत्र में महामंदी देखी जा रही है। खेती के साथ शिल्पकारों का आर्थिक व सांस्कृतिक जुड़ाव रहा है। इसे खंडित कर भारत की खेती को दुरूस्त नहीं किया जा सकता है,और न ही किसानों को खुशहाल बनाया जा सकता है।


ऐसा नहीं है कि इस दिशा में सोचा नहीं गया है। तीन राजनीतिक चिंतको ने समय—समय पर इस दिशा में सरकार और नीति नियंताओं का ध्यान आकृष्ट कराने की कोशिश की है, लेकिन पश्चिमी सोच के योजनाकारों और नौकरशाहों ने इस ओर कभी भी ध्यान ही नहीं दिया। यहां भारतीयता के तीन यिंतकों की चर्चा जरूरी हो जाती है। जनसंघ के अध्यक्ष रहे पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने अपने एकात्मवादी राजनीतिक चिंतन में ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर व्यापक विमर्श प्रस्तुत किया है।


सच पूछिए तो गांधी, लोहिया और दीनदयाल उपाध्याय जैसे तीनों स्वदेशी चिंतकों देश के विकास के लिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को महत्वपूर्ण बताया है। गांधी ने गांवो की संपत्ति, परंपरागत धरोहर तथा स्वरचित, स्वनियंत्रित,स्वस्फूर्त, पंचायत प्रणाली के सामूहिक, सहकारी व समरस भाव पर आधारित विकास की अवधारण का प्रतिपादन किया, तो लोहिया ने चौखंभा प्रणाली की अवधारणाा का प्रति​पादन किया। इन तीनों राजनीतिक चिंतकों ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की बात कही है। आज जब देश आर्थिक मामलों में चौराहे पर खड़ा है, तो सभी आर्थिक चिंतकों को गांव की याद आ रही है। संकट की इस घड़ी में भी गांव के कृषक और कारीगरों ने भारत की अंधधूरि को गतिमान बनाए रखने में अभूतपूर्व सहयोग किया है। यही कारण है कि विपरीत परिस्थितियों में भी भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था बढ़ रही है।
{दैनिक जागरण से साभार)

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *