” हम्मे आबे यहां नय रहभौं हो रवि ! “

५ नवम्बर की सुबह, ३ बजे। मोबाइल बजने लगी। मैं नींद में था। आशंका से मैं सिहर उठा। असमय फोन की घंटी थरथराहट पैदा करती है।मोबाइल की स्क्रीन पर नजर गयी- प्रभाकर पीजी। उधर से घबडायी हुई आवाज आयी- “ मेरी तबीयत बहुत खराब हो गयी है। कहॉं जाऊं?”
मैंने कहा-“ फिलहाल ‘मंगलम्’ में भर्ती हो जाओ।” मैं जबतक उसके क्वार्टर पर पत्नी के साथ पहुंचा। वह तैयार होकर निकल रहा था। चलने में उसे बहुत परेशानी हो रही थी। पांच नवम्बर को पूरे दिन ठीक था। छह नवम्बर को सुबह साढे आठ बजे सीभियर हर्ट एटैक हुआ और वह बर्दाश्त नहीं कर सका। बारह बजे वह अज्ञात लोक की ओर चल पड़ा।
मैने सपने में भी नहीं सोचा था कि मुझे अपने अभिन्न मित्र प्रेम प्रभाकर पर स्मृति शेष लिखना पड़ेगा। 35 वर्षों के उसके साथ का सफर यों थम गया कि मैं अवाक हूं। शब्द नहीं उस समय मेरे, जब मैने अपनी आंखों से उसे जाते हुए अस्पताल में देखा। सोशल मीडिया पर मैं सक्रिय रहता हूं, लेकिन मैं उसके लिए श्रद्धांजलि के दो शब्द भी नहीं लिख सकता। अब यह भयावह सच्चाई मेरे सामने है।

मधुपुर में कथाकार सुधाकर जी के निवास में उनके साथ संवाद करते हुए प्रेम प्रभाकर

३ जनवरी १९५८ को प्रेम प्रभाकर का जन्म जगदीशपुर प्रखंड के मखना गॉंव में हुआ। सामान्य-सा परिवार था। तंगहाली थी।वह सुनाता था कि शुरूआत में उसने बीडी बनाने का भी काम किया। निर्धनता के बावजूद वह ठहरा नहीं। इंटर और बीए टी एन बी कॉलेज से किया।एम ए ,बी एड और पीएच.डी की डिग्री भागलपुर विश्वविद्यालय से उसने पायी। भागलपुर से १९८३- ८४ में पहला दैनिक अखबार ‘ नई बात’ निकला। वह वहीं काम करने लगा।पत्रकारिता में उसकी गहरी रूचि थी। नवभारत टाइम्स और जनसत्ता के लिए उसने रिपोर्टिंग की। उसकी आवाज बहुत मधुर थी। भागलपुर आकाशवाणी में अस्थायी उद्घोषक भी बना और कंपेयरिंग भी की। धनबाद से निकलनेवाली पाक्षिक पत्रिका ‘ चर्चा’ में भी काम किया।इसके बाद गुवाहाटी गया और दैनिक उत्तरकाल और सेंटिनल में पत्रकारिता की। ७ नवम्बर १९९६ को भागलपुर विश्वविद्यालय में हिन्दी का प्राध्यापक नियुक्त हुआ।स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग में काम करते हुए उसने कई पुस्तकें लिखीं जिनमें ‘ हम सारी दुनिया बदलेंगे’, ‘पहचान तलाशते आदिवासी’,’साहित्य विमर्श’, ‘क्वेस्ट फॉर सेल्फडिटरमिनेशन’,’ हिन्दी कहानी का नवॉं दशक और कृषक’ महत्वपूर्ण हैं। वे कई वर्षों से परिश्रमपूर्वक ‘ अंगचंपा’ का संपादन कर रहे थे।जब प्रो रामआश्रय यादव ति मां भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति बन कर आये तो प्रेम प्रभाकर जी को विश्वविद्यालय सांस्कृतिक सेल का सचिव नियुक्त किया जिसकी जिम्मेदारी उन्होंने बखूबी निभायी। कुछ महीने पूर्व ही उसे अंगिका विभाग का अध्यक्ष भी बनाया गया था।
अंत में एक निजी वाकये का जिक्र करना चाहता हूं। उन दिनों वह भीखनपुर गुमटी नंबर एक पर रहता था। पत्नी उसके साथ रहती थी। हम तीन चार आवारा दोस्त थे- मैं आशुतोष जो कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रोफेसर है और कहानीकार रविशंकर सिंह। उसकी पत्नी बहुत प्रेम से मछली भात पकाती थी और हम तीनों हर दिन पहुंचते और चट कर जाते। मैने कभी उसे गुस्साते नहीं देखा। देहाती शब्द का सहारा लें, तो पीतमरू था। शांत स्वभाव का तो धनी था ही, बौद्धिक क्षमता भी बेमिसाल थी। भागलपुर के सामाजिक और साहित्यिक क्षेत्र में उसकी कमी खलती रहेगी।
…….
न जाने वह आदमी इतनी विनम्रता को कहां से उठा लाया था
डॉ अमरेंद्र
दुनिया रोती धोती रहती है जिसको जाना है, जाता है। लेकिन कोई अच्छा आदमी जाकर भी कहां जाता है। वह तो साथ रहता है, हमारी यादों में, हर अच्दे काम में साथ हो जाता है कुछ बीती बातों की याद दिला कर, कभी अपने मृदुल स्वभाव से, तो कभी अपनी मीठी असहमति से।
मैंने अपने जीवन में अपने मित्र प्रेम प्रभाकर जैसा कोई और मित्र नहीं पाया, जिन्हें कम से कम उबलते हुए तो कभी नहीं देखा। न जाने वह आदमी इतनी विनम्रता को कहां से उठा लाया था। बोलने में ही नहीं, उनके व्यवहार में भी जलतरंग की लय थी, किसी पहाड़ी धुन का संगीत, उनके आचरण में कभी भी बाढ़ का फेनिल वेग नहीं देखा, वह जो कुछ शरत का स्थिर पारदर्शी जल।


मैं यह नहीं कहता कि प्रभाकर से बढ़िया कोई प्रोफेसर नहीं हो सकता, हिन्दी के ताजा साहित्य का उनसे बेहतर कोई जानकारी रखने वाला नहीं हो सकता, भागलपुर में प्रभाकर से बड़ा कोई पत्रकार भी नहीं है, लेकिन यह तो तय है कि डॉ प्रेम प्रभाकर जिस श्रम और लग्न के साथ अंगचंपा का संपादन कर रहे थे और हिंदी पत्रकारिता की श्रेष्टता को बचाए हुए थे, छात्रों के प्रति कुछ ऐसे ही शीतल स्वभाव से मिलते, जैसे, जेठ से आषाढ़ मिलता है, तो लगता है कि प्रेम प्रभाकर के जाने से गुरूकुल की वह संस्कृति कुछ कमजोर हो जायेगी, जिसे वह नये सिरे से स्थापित करने पर तुले थे।
विश्वविद्यालय के कार्यों की व्यस्तता के बीच भी उन्होंने पठन पाठन से कभी आंखे नहीं फेरी, बड़े लेखकों को पढ़ने की चाहत में नये लोगों के साहित्य को अपनी पीठ नहीं दिखाई। उनके लिए साहित्य से बड़ा लेखक नहीं था।
डॉ प्रेम प्रभाकर का हमारे बीच से हठात यूं चले जाने का अर्थ है, कि आंखे अब एक ऐसे चेहरे को कभी नहीं देख सकेंगी, जो विषम परिस्थितियों के बावजूद कभी उदास नहीं दिखीं, न अपनी आखों पर मन की परेशानियों या विरोध की छाया को ही उभरने दिया।
कल को दोस्त और मिलेंगे, बनेंगे, टूटेंगे लेकिन प्रेम प्रभाकर जैसा मित्र कभी नहीं मिलेगा और यही बात बेहद डरा जाती है, बहुत उदास कर जाती है। ऐसा नहीं यह सिर्फ मैं ही कह रहा हूं, मेरे जैसे उनके सैकड़ों मित्र यही कह रहे होंगे।
………
नहीं रहे डॉ प्रेम प्रभाकर
किशन कालजयी

1982 के ठीक बाद जब मैं साहिबगंज कॉलेज से बीएससी करके भागलपुर आया था तो आशुतोष के माध्यम से मेरी मुलाकात अनिल प्रकाश, रामशरण, घनश्याम,योगेन्द्र, विजय,प्रसून लतान्त, प्रेम प्रभाकर,रविशंकर सिंह से हुई थी। उन दिनों अनिल प्रकाश के नेतृत्व में गंगा मुक्ति आन्दोलन अपने चरम पर था और हम सभी जी जान से आन्दोलन में सक्रिय थे।


बाद में हमलोगों (मैं, प्रसून लतान्त, योगेन्द्र, आशुतोष, प्रेम प्रभाकर) ने भागलपुर के एक मात्र दैनिक नयी बात में वर्षों एक साथ काम किया। इस दौरान हमलोगों की घनिष्ठता बहुत बढ़ गयी। हमारे सभी साथियों की पृष्ठभूमि आर्थिक अभाव वाली ही थी। चूँकि मैं अपने प्रोफेसर पिता से बगावत करके पत्रकारिता में आना चाहता था इसलिए उन्होंने आर्थिक सहयोग बन्द कर दिया था। मेरी अध्यापिका माँ भी मेरी जिद के खिलाफ पिता के साथ हो गयी। मुझे अपने बड़े भाई का समर्थन प्राप्त था फिर भी आर्थिक संकट बना ही रहता था। अपनी तंगहाली की वजह से हम सभी एक वर्ग के हो गये थे और जाति तो हम किसी की जानते नहीं थे और मानते भी नहीं थे। अभाव और संघर्ष ने हमें एक दूसरे के करीब बनाए रखा।
तब से प्रभाकर जी से जो संग साथ बना वह परसों टूट गया। कल एक बड़ी हुजूम के साथ प्रेम प्रभाकर को लेकर बरारी गये और उन्हें अग्नि को सौंपकर खाली हाथ वापस लौटे। श्मशान घाट में चिता पर जलते दोस्त को देखना कितना त्रासद था, यह बता नहीं सकता।लगता है कि घाट से मैं चिता की एक लौ साथ लेकर लौटा हूँ जो मेरे मन को थोड़ा थोड़ा जला रही है।
……
प्रेम प्रभाकर की छोटी-छोटी यादें
आशुतोष

दोस्त!चले गये। सबकुछ छोड़कर। तुम्हारी यादें रह गयीं। गंगा मुक्ति आन्दोलन का साइक्लोस्टाइल बुलेटिन ‘संवाद’ का पहला अंक भीखनपुर में तुम्हारे कमरे में ही हमने देर रात तक साइक्लोस्टाइल किया था। अनिल प्रकाश ने एक बक्सानुमा मशीन बनवाया था। हरबार रौलर में इंक लेना पड़ता था।हमारे हाथ दुखने लगे थे। तुम बहुत प्यार से पूरी प्रक्रिया में शामिल रहे। कुछ काम हमने सुबह किया था। तुमने रात की बची हुई रोटियाँ निकाली सुबह खाने के लिए। मैं बिदक गया। तुमने मातृवत स्नेह से ताजा रोटी बनाई। कितना ममत्व था हम साथियों के लिए तुममें। यह प्रसंग मैं कभी नहीं भूल सकता। सभी को सुनाता हूँ और लज्जित होता हूँ।
संवाद के अंक को बेचकर ढाई रुपये हुए थे। उसी से शाम को गांधी प्रतिष्ठान में हमने लौकी और रोटी बनाई थी। अनिल प्रकाश, योगेंद्र भी थे। याद है उस दिन साथी पत्रकार अनिल सिन्हा भी शाम को आये थे वहाँ।

रविशंकर सिंह
” हम्मे आबे यहां नय रहभौं हो रवि ! “
” कन्हें , …कि होल्हौं ? “
” …कि बतैयहौं हो रवि ! हम्मे खाना बनाय क तनी टा बगलवाली कन गेलिहौं, तुरन्त आबि क देखै छिहौं कि हमरो भात, दाल, सब्जी सब साफ छौं। “
” धत् , आशुतोष आरो जोगिंदर आबी क खैले होतौं। “
” …नय हो रवि, वें सिनि खैतौं त थरिया थोड़े न धोतौं। हमरो सब बरतन-बासन धोलो- पखारलो रखलो छै भाय ! “
” महाराज , भात चोरावैल’अ काहीं चोर आबैय छै ? ओकरा दोन्हू क छोडिक कोय नै खैल’अ होथौं। “
…..
” अब छोड़ न दीजिए जी, ये भुखले रह जाएंगे। “, उर्वशी
” चुप रहिए, सब तोरे दुलहा खाएगा ? “, योगेंद्र
” खाने दो – खाने दो ना उर्वशी। “, प्रेम प्रभाकर

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