डॉ. लखिमा देओरी
एक नाम मेरे जेहन में हमेशा रहता है तुलसी छेत्री। उसका परिवार नेपाल से आकर अरुणाचल प्रदेश में बस गया था। बचपन की सहेलियों में तुलसी के साथ ही मेरा सबसे करीबी रिश्ता था। खाना-पीना, खेलना-कूदना, स्कूल साथ जाना, एक-दूसरे के घर रहना लगभग सबकुछ हम साथ ही करते थे।
एक बार तुलसी और मैंने अपने रसोई के खिलौनों के बारे में स्कूल में दूसरी लड़कियों के सामने यह कहना शुरू कर दिया था कि अरुणाचल में किसी भी नौ साल की लड़की के पास हमसे ज्यादा खिलौने नहीं हैं। हमारे पास स्टील और प्लास्टिक के बर्तन, गिलास का एक सेट और सोने का रंग चढ़ाया हुआ बर्तन भी था जिसमें हमने मेरे पिताजी के तिनसुकिया (असम) से लाए हुए बर्तनों को तो जोड़ा भी नहीं था। इसके अलावा माँ ने खुशी-खुशी अपने रसोईघर से कुछ असली थालियाँ भी लाकर दे दी थीं। इनमें से काँच वाला सेट हम अपने खास काल्पनिक मेहमानों के लिए इस्तेमाल करते थे। उस दिन खास मेहमान थे मेरे पिता और उनके सहकर्मी। बाप-बेटी की भूमिका हम ही निभा रहे थे। इस भूमिका के लिए तुलसी ने नाटक सिखाने वाले गुरूजी के दराज से दो नकली मूँछे भी चुरा ली थी। अभिनय के लिए हमने मूँछें लगा ली और तुलसी ने तो एक काली टोपी भी पहन ली थी। तुलसी ने वेशभूषा में थोड़ा फेर बदल कर लिया था। उसने होंठों के बीच बच्चों की मिठाई वाली फैंटम नामक सिगरेट दबोच रखी थी। मुझे बुरा नहीं लगा क्योंकि उसने मुझे भी एक फैंटम मिठाई दे दी थी, जिसे मैंने कान के ऊपर अटका लिया था।
“बुड़ी , मुझे थोड़ी शराब दो।” अपने पिता की भूमिका निभाते हुए तुलसी पीछे मुड़ती है। फिर खुद का नाम लेकर कहती है, “और तुलसी, उस टेप रिकॉर्डर को बंद कर दे। यहाँ बड़े लोग बात कर रहे हैं।”
“ठीक है, आपा ,” तुलसी अपनी मूँछे निकालते हुए विनम्र आवाज में कहती है।
“हम उनके लिए मारने वाली मशीनों के सिवाय और कुछ नहीं हैं,” तुलसी दुबारा मूँछे लगाकर गुस्से में कहती है। “वे अभी-भी हमारे साथ कुत्तों जैसा व्यवहार ही करते हैं।”
“नम्बरी , गुस्सा मत करो।” बोलने के लिए कुछ न समझ आते हुए, मैंने कहा ।
“इतने साल तक उनकी नौकरी की है, पर क्या भविष्य में वे हमारा ख्याल रखेंगे?” तुलसी ने गुस्से में कहा, “नहीं, बल्कि पुराने जूते और मोजे की तरह हमें फेंक देंगे। जो पेंशन मिलेगी, वह भी किसी काम की नहीं होगी। ऐसा कैसे है कि बाकी सारे ब्रिटिश आर्मी के रेजिमेंटस को अच्छा-खासा पेंशन मिलता है? बस हम ही ‘वीर गोरखा हैं जिनको दूसरों के मुकाबले पांच गुना कम पेंशन मिलती है। वाह क्या बहादुरी है! इसे बहादुरी नहीं, बेवकूफी कहते हैं।”
“अरे! नम्बरी। अपने आपको भाग्यशाली समझ,” मैंने गिरती हुई मूँछों को अंगूठे से संभालते हुए कहा, “अगर यहाँ भर्ती न होते तो, तो पुलिस में जाना पड़ता जिसमें और कुछ नहीं मिलता। इस देश में करने को और रखा ही क्या है?”
“जरा सोच, नम्बरी!” मैं अच्छा अभिनय नहीं कर रही थी और मेरी भूमिका भी काफी कम थी। यह जानते हुए भी मैंने कहा, “हमारी बेटियाँ अच्छी अंग्रेजी स्कूल में पढ़ रही हैं। हमारी बीवियाँ ठाठ-बाठ से जी रही हैं।”
“आमा, मुझे भूख लगी है,” मूँछे निकालते हुए मैंने कहा।
“हाँ, बुड़ी, भूख तो मुझे भी लगी है,” तुलसी बोली। उसकी मूँछे अभी तक उसकी मुँह पर चिपकी हुई थी। “हाँ गोरखा, हमें खाना खिला, हम बहादुर लोगों और उनके परिवारों को क्योंकि जिस हिसाब से हमें पेंशन मिलेगी, उसमें तो हम कुछ सालों में भुखमरी से मर ही रहे होंगे।”
“आयो बीर गोर्खाली। ” हू-ब-हू तुलसी अपने पिता की आवाज में गाने लगती है। यह ऐसा गीत था, जिसे उसके पिता ने हमें सिखाया था। कभी-कभी हमारी माएँ भी लोरी के रूप में इसे गया करती थी। मैं भी तुलसी के संग गाने लगी जो मूँछें लगाकर अपने पिता की आवाज में गाती थी और मूँछें निकालकर अपनी। मैंने भी उसी की तरह गाने की कोशिश की, पर मेरी दोनों आवाज एक-सी लग रही थी।
तुलसी के सिगरेट का अब बस नीचला गुलाबी हिस्सा ही बचा था।
“ये लो,” अपनी मिठाई को आधा करते हुए मैंने कहा। “थोड़ा मेरे में से खा सकती हो।”
उसने आधे को और आधा काटा।
“बहुत स्वादिष्ट है,” उसने कहा ।
“पता है,” मूँछे लगाकर अपनी भूमिका में लौटते हुए मैंने कहा, “चलो सभी मिलकर साथ खाना खाते हैं, घर के खाने की बात ही कुछ और है। नम्बरी, हम दोनों के परिवार काफी समय के बाद साथ में एक छत के नीचे हैं ।”
“हाँ, नीरसता से तुलसी कहती है ।
उसकी रूचि बरकरार रखने के लिए मुझे नए किरदार के बारे में सोचना पड़ता था। हमारे छोटे से गाँव में बस एक ही नेपाली ब्राह्मण था क्योंकि यह इलाका जनजातियों का है। नौकरी के चलते बाहर से कई लोग यहाँ आ बसे थे। पंडित जी का भी वैसे ही आना हुआ। लेकिन इस इलाके में किसी अनुष्ठान के लिए ब्राह्मण की आवश्यकता नहीं पड़ती है।
“चलो नुकीले नाक वाले ज्योतिषी को बुलाओ,” मैंने कहा। “बुलाओ ताकि हम सभी उसके कान को ढकते हुए सफेद बालो को देख सके।”

तुलसी कहीं से ऊन के दो टुकड़े निकल लाती है। उन पर थूक लगाकर उसने अपने दोनों कान के पास एक-एक चिपका लिया।
पंडित जी हमारे यहाँ कई बार आते थे। एक बार हमारे घर में तुलसी के माता-पिता सभी थे, जब नुकीले नाक वाले पंडित आए। उन्होंने पहले मेरी ओर देखा, फिर मेरी जन्म कुण्डली मांगी, जिस पर मेरी माँ ने कहा कि हमारे में जन्म कुंडली नहीं बनाई जाती । उसकी आँखें छत को घूरने लगी। छत के किनारों से लोहे के कड़ियाँ बाहर की ओर निकली हुई थी। नाटक आगे शुरू होता है ।
“नानी , ये लो अमरूद खाओ और खेलने जाओ,” पंडित जी ने मुझसे कहा था।
“अच्छा नहीं है,” उन्होंने मेरे मां से कहा। “इसकी किस्मत में एक दोष है। एक प्रकार का कालसर्प दोष। आने वाले कुछ वर्षों तक वह आपके लिए दुर्भाग्य मात्र लाएगी।”
मां ने अपनी भौंहें सिकोड़ी। उनको पंडित जी ने यह बता दिया था कि मेरी किस्मत में साफ-साफ लिखा है कि मैं बदकिस्मत हूँ। जब तक मैं पंद्रह साल की न हो जाऊँ, हमारा घर का निर्माण पूरा नहीं होगा। यह भी कहा कि मेरा दुर्घटना योग है और माँगलिक दोष भी अर्थात् मेरे लिए वर ढूँढ़ना भी मुश्किल होगा।
“दुर्भाग्य?” मां ने कहा। “क्या दुर्भाग्य? इसके जन्म के बाद ही मैं जमीन का एक टुकड़ा खरीद पाया हूँ, इसके जन्म के बाद ही, यह घर बनाना शुरू हुआ। इसके जन्म के बाद ही मेरा प्रमोशन हुआ है ।”
“यह सभी बातें सच हो सकती हैं, परन्तु आने वाले कुछ साल कठिन होंगे।” पंडित ने भौंहें सिकोड़ते हुए कहा। जिस कारण उनके माथे पर छः समानांतर रेखाएँ बन गईं। “देखिए, अभी तो यह बस नौ साल की है। दोष समाप्त होने के बावजूद अगले पाँच-छः सालों तक चीजें ऐसी ही रहेंगी। देखिए, मैं दूसरे पंडितों की तरह आपको पूजा-अर्चना करने वाला सुझाव दे सकता हूँ, पर मैं ऐसा नहीं करुंगा क्योंकि आप लोग आदिवासी हैं, पर मैं इसकी भलाई के लिए कह रहा हूँ ।”
“तो इसका उपाय क्या है, पंडित जी?” मां ने व्यंग्यपूर्वक पूछा ।
“मैं भगवान की तुष्टि के लिए पूजा-पाठ में विश्वास नहीं करता,” पंडित ने बात को खारिज करते हुए कहा, “हम इसके दुर्भाग्य को हटाने के लिए ‘मितेरी अनुष्ठान’ करना पड़ेगा? इस अनुष्ठान को करने से थोड़ा-बहुत बदलाव आ सकता है। पर ऐसे दोष को दूर करने के लिए हम ज्यादा कुछ नहीं कर सकते। मैं उन ब्राह्मणों में से नहीं हूँ जो यह मानते हैं कि एक इंसान की किस्मत धार्मिक क्रियाओं से बदला जा सकता है, परंतु हम इस अनुष्ठान को कर सकते हैं। पहले भी मैंने यह अनुष्ठान एकाध बार किया है और अधिकतर सफल ही हुए हैं।”
बांग अब भी नाराज थे। छेत्री आंटी ने पंडित जी के लिए पहले तैयार रखा लाल रंग का लिफाफा मंगवाया। लिफाफे के अंदर और एक नया कड़क पचास रुपए का नोट डाल दिया और नुकीली नाक वाले पंडित जी से कहा कि जल्द ही वह उनसे इस बारे में मिलेंगे।
“धन्यवाद पंडित जी। वैसे तो हमने दावत रखी है, लेकिन हम जनजाति समुदाय के हैं। हमारे द्वारा तैयार किया गया खाना आप नहीं खा पाएँगे।”
“मैं नए जमाने का पंडित हूँ।” पंडित जी ने गर्व से मुस्कुराते हुए कहा। “मैं अपने साथी पंडितों की तरह जाति के आधार पर भेदभाव नहीं करता। जब तक माँस-मच्छी न पकाए, मैं सब कुछ खा लेता हूँ।”
छेत्री अंकल और आंटी ने उन्हें इतनी बड़ी मुस्कान दी कि मुझे अंकल की मसूड़े दिख गई और आंटी की सोने की दाँत तक दिख गई।

“ठीक है, फिर मैं नीचे जाकर जल्दी से बंदोबस्त करती हूँ,” योंग ने कहा। “आपके लिए शाकाहारी खाना बन जायेगा ।”
मैं उठ खड़ी हुई, मेरी मुट्ठी में अभी भी अमरूद था और मैं इंतजार करने लगी कि कब बांग, अंकल और पंडित जी बाहर जाएँ । अपनी पूरी ताकत से मैंने अमरूद को सड़क पर उसी तरह फेका जैसे मैंने टीवी पर क्रिकेटर को करते हुए देखा था। सड़क बिल्कुल हमारे छत के बराबर थी जिसके चलते एक साईकिल सवार आदमी को अमरुद जा लगा। उसने गुस्से से मेरी ओर अपना हाथ उठाया। मैंने भी उसकी ओर हाथ हिलाया और हँसने लगी। इस किस्से को सुनकर तुलसी जरूर हँस पड़ती। शायद वह हमारे अपूर्ण घर के आंगन में झरे-गिरे हुए सारे अमरूद इकट्ठा कर, रास्ते से गुजरने वाले हर इंसानों पर निशाना साधने का सुझाव देती । यह हमारा एक और गुप्त राज हो सकता था।
कुछ हफ्तों बाद हमारा मीतेरी अनुष्ठान सम्पन्न कर दिया गया था। गीता और मैं अब एक कल्पित रिश्तेदारी में बंध चुके थे। एक ऐसा सूत्र जो हमारे परिवार को एक साथ बांधता था। मानो भगवान ने मेरी और तुलसी की प्रार्थना सुन ली हो। कई बार स्कूल में हमने दोस्तों को झूठ बोला था कि हम दोनों चचेरी बहनें हैं।
बांग को समझ में नहीं आ रहा था कि इस अनुष्ठान की क्या जरूरत थी क्योंकि जनजातियों में इस प्रकार का कोई अनुष्ठान नहीं होता। तुलसी के माता-पिता का मान रखने के लिए बांग ने भी कुछ कहा नहीं। अनुष्ठान के सुबह मैंने और तुलसी ने पीले रंग की पोषक पहनी जिसमें तितलियाँ बनी हुई थी। इन्हें हमनें अपनी-अपनी माँ के साथ रविवार के हाट-बाजार से खरीदा था। हमारी पोशाक बिल्कुल एक जैसी थी, फर्क था तो बस यह कि मैंने आधी बाजू वाली और तुलसी ने बिना बाजू वाली पोशाक चुनी थी। अनुष्ठान के दौरान बुजुर्गों ने हमें चारों ओर से घेर लिया और बार-बार गले से लगाने लगे। हर कोई हमें गर्व से देख रहे थे और कहने लगे कि मीतेरी बनाने का यह अच्छा विचार उनमें से किसी एक को पहले क्यों नहीं सूझा। नुकीली नाक वाले पंडित जी दूसरी दिशा में बैठे हुए थे और मंत्र-उच्चारण करते हुए चावल और घी अग्निमुख में डाल रहे थे। मेरी कमर से जाता हुआ एक पीला कपड़ा तुलसी की कमर में भी बांध दिया था। पंडित जी समय-समय पर हमें उनके पीछे-पीछे मंत्र दोहराने को कहते थे और उन्होंने हमारे सर को नए रुमाल से ढंक दिया था। हमने अपनी हँसी दबाने की कोशिश की क्योंकि संस्कृत के शब्द हमारे मुँह से धीरे-धीरे अटकते हुए अनिश्चित रूप से निकल रहे थे।
“यह तो शादी की तरह है,” मैंने तुलसी से फुसफुसाकर कहा।
“हाँ पर मैं पत्नी हूँ, क्योंकि मैंने बिना बाजु की पोशाक पहनी है।” तुलसी ने समझाया।
“अच्छा, चलो तुम ही दुल्हन हो,” मैंने स्वीकार किया।
हाथ के इशारे से पंडित जी ने हमें चुप रहने को कहा और हमने अपनी हँसी दबा ली।
“तुलसी कृपया खड़े होकर अपनी मितिनी के लिए लाए उपहार उसे दे दो, उससे आशीर्वाद लो।” अपनी झुरिदार हथेली जोड़कर, उंगलियाँ सीधी कर माथे के ऊपर रखते हुए पंडित जी ने आशीर्वाद लेने का तरीका सिखाया। “हाँ, तो तुम्हें इस तरह से प्रणाम करना है। तुम बिना मुस्कुराए भी कर सकती हो। और तुम, नानी, क्या तुम बिना मुस्कुराए वैसा ही अपनी मीतेरी को प्रणाम कर पाओगी?”
फिर हमने पंडित जी को माध्यम बनाकर एक-दूसरे को पाँच रुपए का नोट पकड़ाया। मैंने तुलसी को उसी की तरह बिना बाजू वाली पोशाक पहनी एक गुड़िया उपहार में दी। तुलसी ने भी मेरे लिए बड़ी एक गुड़िया ले ली थी जिसका नाम सैंडी रखा था। पंडित जी ने कहा कि आज से हम दोनों एक-दूसरे को नाम से नहीं, बल्कि मितिनी कहकर पुकारेंगे। पूरा कार्यक्रम काफी भव्य था । इंतजार है तो इस बात का कि जब हम एक-दूसरे को स्कूल में मितिनी कहकर बुलाएँगे, तब दूसरी लड़कियों को कितनी ईष्या होगी।
उस दिन के बाद, छेत्री आंटी मेरी ‘मीत आमा’ बन गई। छेत्री अंकल मेरे ‘मीत आपा’ बन गए। तुलसी को भी मेरे माता-पिता को इसी तरह संबोधित करना पड़ेगा जिसे उसने आसानी से कर लिया। मुझे ऐसा करने में थोड़ी हिचकिचाहट हुई। कैसे मैं अचानक उन्हें दूसरे नाम से पुकारती?
फिर एक दिन योंग से पता चला कि तुलसी का पूरा परिवार विदेश जा रहा है, हमेशा-हमेशा के लिए। यह सुनकर में बहुत रोयी। तुलसी के जाने के कुछ महीने बाद तुलसी को मैं कोसने लगी। उसी के चलते मैंने किसी और को अपनी सहेली नहीं बनाया था, वह मेरी मितिनी भी थी। और अब वह मुझे छोड़ कर जा रही थी। मैं यह सोच कर भी डर रही थी कि स्कूल में हर कोई मुझपर हसेंगा। लेकिन तुलसी अब हर दिन आकर मुझे अपने विदेश योजना के बारे में बताकर सताती थी।
“यू.के. में बिल्कुल भी कीचड़ नहीं है। हर चीज साफ-सुथरी है। मैं तो वहाँ बहुत सारे बाजू कटे हुए कपड़े पहनुँगी।” तुलसी ने कहा।

तुलसी के दूर के भाई-बहन यू.के. में रहते थे और उसे समय-समय पर वहाँ से तस्वीरें भेजते रहते थे। उसने उन तस्वीरों को इतना ध्यान से देखा है कि उनके वहाँ के पहनावे के बारे में उसे जानकारी है।
“एक बार यू.के. पहुँच जाऊँ, फिर तो मैं नाक छेदवा कर रहूँगी,” तुलसी ने कसम खाई। “सभी छेत्री लड़कियों की नाक में छेद है। आमा कहती है कि मैं थोड़ी बड़ी हो जाऊं, लेकिन मुझे अभी ही नाक छिदवानी है। मैं दस साल की होने वाली हूँ। मैं इतनी बड़ी तो हो ही चुकी हूँ।”
“हम एक हवाई जहाज से जाएँगे और ऐवरेस्ट पर्वत की चोंटी पर चाय के लिए रुकेंगे,” तुलसी ने कल्पना की। “आमा यह भी कहती है कि मैं बीयर भी पी सकती हूँ।”
“भगवान का शुक्र है, अब चावल से छुटकारा मिलेगा,” उसने कहा। “अब तो सिर्फ ब्रेड, बट्टर, केक खाँऊगी और मैं हमेशा चोप्सटिक से खाया करुँगी। रेणु दीदी ने मुझे बताया था कि वहाँ लोग चोप्सटिक का ही इस्तेमाल करते हैं ।”
“चोप्सटिक क्या होती है?” मैंने पूछा।
“हर चीज खाने के लिए इस्तेमाल करने वाली लकड़ी। हांगकांग में इसी का प्रयोग होता है और लंदन में भी इसी का इस्तेमाल करते हैं। शायद, मैं तेरे लिए वहाँ से भेजूँगी ।”
“हाँ, और यहाँ मैं उससे खाऊँगी, लेकिन मुझे सिखाएगा कौन?” मैंने उम्मीद के साथ पूछा।
“जब छुट्टियों में भारत आऊँगी, तब सिखा दूंगी। वैसे मैं वहाँ नई मितिनी बनाउँगी। तुझे भी यहाँ नई मितिनी बना लेनी चाहिए क्योंकि अब हम लोग एक ही जगह तो रहेंगे नहीं।”
इतना सुनते ही मैं माँ के पास रोते हुए, दौड़ी चली गई। मैं अपनी सबसे अच्छी सहेली खोने वाली थी। अब जादू की नगरी जाने वाली है।
उसके बाद सब कुछ धुंधला हो गया। अब नाटक में बस अब मैं ही अकेले अभिनय करती थी। खिलौनों वाले लाल रंग के टेलीफोन में घंटी बजती है जिसकी आवाज मैं मुँह से निकलती हूँ ,“ट्रिंग ट्रिंग”।

“हैलो मितिनी, लेकिन तुमने तो मुझे एक चिट्ठी तक नहीं भेजी।” मेरी खुद की आवाज लौट आई। “कोई बात नहीं, माफी माँगने की जरूरत नहीं। तुम मेरी मितिनी हो, तुम्हें माफी नहीं माँगनी चाहिए।” कुछ देर मैंने बातें की और काफी हल्का महसूस करने लगी। तुलसी के बाद स्कूल में सुनीता और मोनिका थी। वे अच्छी लड़कियाँ थी। वे स्कूल से भागने का कभी नहीं सोचती और न ही रास्ते के लड़कों से लड़ती थी। लेकिन वे तुलसी नहीं थीं। आज भी मुझे जब अपना बचपन याद आता है, तो तुलसी उसमे हमेशा रहती है।
हिंदी विभाग, अरुणाचल यूनिवर्सिटी ऑफ स्टडीज, नाम्साई, अरुणाचल प्रदेश।