गांव के साथ…बात जिला-जवार, राजनीति की

अरविंद कुमार सिंह
वरिष्ठ पत्रकार और लेखक

ब तो गांव की बात हो गयी थोड़ी बात अपने बात जिला-जवार, राजनीति की कर ली जाए। हमारे जिला बस्ती का सरोकार बोधिसत्व से भी रहा है और महान संत कबीर से भी। दोनों महान नायकों से निकली धारा ने भारत ही नहीं दुनिया के कई हिस्सों में समाज को बदलने में योगदान दिया। राजनीतिक धारा में आज भी इनके विचारों की प्रासंगिकता है। रूढ़ियों के खिलाफ पहला विद्रोह महात्मा बुद्ध ने किया था जिसे संत कबीर और गुरु गोरखनाथ ने भी नयी दिशा दी। देश के बेहद पिछड़े जिलो में शामिल बस्ती पहले गोरखपुर का हिस्सा था। अंग्रेजों ने 6 मई 1865 को इसे नया जिला बनाया।

बस्ती जिले की अपनी यात्रा के दौरान 1879 में महान लेखक भारतेंदु हरिश्चंद्र हमारी तहसील हरैया तक पहुंचे तो राह में काफी कष्ट उठाने पड़े। हरैया के बाद वे बस्ती गए और लिखा कि ‘वाह रे बस्ती..इसी को कहते हैं तो तो उजाड़ किसे कहेंगे।’ उनकी यह कहावत बस्ती पर आज भी हम पर चिपकी है।

हालांकि यात्राओं के कष्ट अब पहले जैसे नहीं है लेकिन जीवन अब भी सरल नहीं है। बस्ती जिले के दायरे में ही मखौड़ा आता है जहां राजा दशरथ ने पुत्रेष्टि यज्ञ किया था। पांचवीं सदी में चीनी यात्री फाह्यान ने भी बस्ती की यात्रा की थी। हमारे जिले का इलाका 1597 से अवध सरकार का हिस्सा था, लेकिन 1707 के बाद अराजकता की स्थिति बनी और इलाकाई अधिकतर जागीदार स्वतंत्र हो गए। 1801 में जब नवाब वजीर सआदत अली खां नें गोरखपुर इलाका ईस्ट इंडिया कंपनी को दे दिया तो बस्ती अंग्रेजों के कब्जे में आ गया। उस दौरान कैप्टन मैलायड के नेतृत्व में सैनिक अभियान चला कर राजस्व वसूली हुई और अमोढ़ा और नगर को छोड़ कर बस्ती जिले के सारे किले ध्वस्त कर दिए गए थे। बस्ती आजादी के बाद भी एक छोटा नगर ही था। आज भी कोई बहुत बड़ा नही है। आजादी के बाद बस्ती जिले के तीन हिस्से हो गए। 1988 में जिले के उत्तरी हिस्से को सिद्धार्थनगर जिला बना दिया गया। इसके एक दशक बाद पूर्वी हिस्सा संत कबीर नगर नाम से नया जिला बना। बस्ती के बाकी लोगों को संतुष्ट करने के लिए जुलाई 1997 में इसको कमिश्नरी बना दिया गया। लेकिन इस बदलाव से कोई खास फर्क पड़ा हो ऐसा दिखा नहीं। क्योंकि हर इलाके में पिछड़ापन नजर आता है।

1999 में मैं पाकिस्तान की एक यात्रा पर गया था। लाहौर में मुझे बस्ती जिले से ही जुड़े एक बुजुर्ग मिले। भारत पाक विभाजन के बाद वहां चले गए थे। नाम थोड़ा टेढ़ा था, अब भूल गया हूं। लेकिन नाम के आगे ‘बस्तवी’ लगा कर उन्होंने जिले के प्रति अपनी भक्ति भाव बनाए रखा था। मैने उनसे बिना यह बताए कि खुद बस्ती जिले का ही हूं, उनको टटोलता रहा। उनका कहना था कि बस्ती जिला गोरखपुर और अयोध्याजी के बीच है और नेपाल से लगा है। दरअसल राष्ट्रीय स्तर पर आज भी बस्ती की यही पहचान है।

 

इसकी हैसियत न तो गोरखपुर जैसी है न पड़ोसी अयोध्या जैसी। हमारा जिला लखनऊ, पटना, काशी या मुंबई, दिल्ली या कोलकाता भी नहीं है कि जहां जाए बिना काम न चले।……………………… जिला-जवार, राजनीति
बस्ती जिले से हिंदी के कई महान साहित्यकार पैदा हुए। आचार्य रामचंद्र शुक्ल, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, डा.लक्ष्मी नारायण लाल, डा. मुनिलाल उपाध्याय ’सरस’ और पं.बलराम प्रसाद ‘द्विजेश’ समेत कई प्रख्यात साहित्यकारों व कवियों को बस्ती की धरती ने जन्म दिया। प्रेमचंद जैसे लेखकों को यहां से दिशा मिली। संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष रहे माता प्रसादजी भी बस्ती के ही रहने वाले हैं।
बस्ती लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र में पांच विधानसभा सीटें आती हैं, जिनमें हरैया, बस्ती सदर, रुदौली, महादेवा और कप्तानगंज शामिल हैं। महादेवा अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट है। प्रशासनिक स्तर पर बस्ती भले ही ही एक जिले का तीन जिला बन गया लेकिन राष्ट्रीय स्तर यह अभी भी ठोस पहचान को मोहताज है। शासन-प्रशासन की उपेक्षा जारी है और बौद्धिक जगत सुप्त है। पिछड़ापन खास दूर हुआ हो यह नजर नहीं आता है। हां कई महंगी गाड़ियां जरूर दिखती हैं और राजनेताओ की चमक बढ़ी है। लेकिन खेती बाड़ी की चुनौतियां पहले से कहीं बढ़ी हैं, बेरोजगारी से लेकर चिकित्सा और शिक्षा क्षेत्र की कमजोरियां और बुनियादी सुविधाओं का अभाव साफ दिखता है। चीनी मिलें बीमार हुई हैं, कुटीर और घरेलू उद्योगों का सत्यानाश हुआ है और किसानों का शोषण और गांवों से शहरों को पलायन बढ़ा है।………………..जिला-जवार, राजनीति
20वीं सदी के आरंभ तक बस्ती की भूसंपदा में अधिकतर पर राजपूत राजाओं और जागीरदारों का नियंत्रण था। इसमें सबसे बड़ी हैसियत बांसी राजा रतनसेन की थी जिसके स्वामित्व में 1.04 लाख एकड़ जमीन आती थी। 1920 में भी उनकी सालाना आय जब 1.28 लाख रुपए थी। सन् 1900 में गोरखपुर डिवीजन, जिसमें तब आजमगढ़ भी शामिल था, उसकी 46 बड़ी हस्तियों में बांसी राजा नंबर एक पर थे। 1857 की क्रांति और बाद में लगातार अंग्रेजों को मदद देने के नाते बनी थी और उनकी जमींदारी का काफी विस्तार हुआ। आज भी बांसी के ही जय प्रताप सिंह योगी सरकार में स्वास्थ्य मंत्री हैं। ……………………..जिला-जवार, राजनीति
लेकिन बस्ती जिला-जवार, राजनीति  में चेहरों की कमी नहीं है। केशव देव मालवीय और माधव प्रसाद त्रिपाठी जैसे दिग्गज नेता यहीं से निकले। सुचेता कृपलानी उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं तो बस्ती जिले से ही विधानसभा में प्रतिनिधित्व कर रही थीं। मालवीयजी का भारत में तेल उद्योग के विकास में ऐतिहासिक योगदान रहा। बांबे हाई में तेल उत्पादन की आधारशिला उन्होने रखी थी। 1955 में सरकार ने तेल और प्राकृतिक गैस संसाधनों के विकास के लिए मालवीयजी को जिम्मा सौंपा, जिसको जानने समझने के लिए कई देशों का दौरा कर उन्होंने ठोस रणनीति बनायी। वहीं पंडित माधव प्रसाद त्रिपाठी ने जनसंघ की बुनियाद मजबूत करते रहे। 1980 में भाजपा बनी तो उत्तर प्रदेश में उसकी बागडोर भी माधव बाबू ने ही संभाली और इस पद पर 1984 में अपने निधन तक रहे। उनके बाद यह दायित्व कल्याण सिह को मिला।……………………………..जिला-जवार, राजनीति

वैसे तो वोट की राजनीति का इतिहास बस्ती जिले में 100 साल पुराना हो गया है। लेकिन आम आदमी को ताकत तो आजादी के बाद संविधान ने दी, जब राजा और रंक के बीच का अंतर पट गया। आरंभिक चुनावों में स्वाधीनता सेनानियों को चुना गया जिनका लक्ष्य एक नया भारत बनाना था। धीरे धीरे चुनावों पर धनबल से लेकर बाहुबल काबिज होने लगा। क्षेत्रीय दलों के उभार के बाद धन संपदा, परिवारवाद और जातिवाद का नया चेहरा दिखा। फिर अवसरवाद बाकी इलाकों की तरह बस्ती जिले मे स्थायी प्रभाव बनाने में सफल रहा। बस्ती जिले के ईमानदार और प्रतिष्ठित नेताओं में शिवनारायण का नाम भी लिया जाता है जिन्होंने अपनी लंबी राजनीतिक पारी खेली। जनता पार्टी शासन में वे रेल राज्य मंत्री रहे और प्रो. मधु दंडवते के नेतृत्व में रेलवे में काफी काम किया। दो साल से अधिक समय तक वे अपने पद पर रहे तो पूर्वी उत्तर प्रदेश में रेल सुविधाओं के विकास में काफी मदद की। बाद में माता प्रसाद पांडेय, जगदंबिका पाल, स्व. बृजभूषण तिवारी और युवा पीढ़ी के प्रतिनिधि हरीश द्विवेदी ने भी राजनीति में नाम चमकाया। खांटी समाजवादी धारा के नेता माता प्रसाद पाण्डेय दो बार उत्तर प्रदेश विधान सभा का अध्यक्ष बनने वाले जिले के एकमात्र नेता हैं।………………………………जिला-जवार, राजनीति

वहीं बस्ती की माटी में जन्में बृजभूषण तिवारी डॉ. राममनोहर लोहिया के बेहद प्रिय रहे। छात्र युवा राजनीति में देश प्रदेश में अलग स्थान बनाया लेकिन राजनीति में वह मुकाम नहीं हासिल कर सके जिसके पात्र थे। हमारे हरैया विधान सभा क्षेत्र से समाजवादी धारा के सुखपाल पांडेय ने तमाम विवादों के साथ प्रदेश की राजनीति में एक अलग हैसियत बनायी। परिवहन मंत्री रहे तो गन्ना किसानों के साथ सरयू नदी के कटाव को लेकर राज्य सरकार से लंबी जंग लड़ी। वहीं हरैया से ही कोट साहब के नाम से विख्यात सुरेंद्र प्रताप नारायण पांडेय कई बार विधायक रहे।………………..जिला-जवार, राजनीति
इन सब के बावजूद मुख्य बात वही है कुछ तो बदल दो सरकार। अब तो बस्ती जिले का नाम बदल कर भगवान राम के गुरु वशिष्ठ के नाम पर वशिष्ठ नगर करने की चर्चा चल पड़ी है। बस्ती महोत्सव पर बस्ती मेडिकल कालेज का नाम महर्षि वशिष्ठ के नाम पर रखने का एलान हुआ था। तबसे सांसद हरीश द्विवेदी और विधायक अजय कुमार सिंह जिले का नाम बदलने की मुहिम चलाए हैं। पड़ोसी फैजाबाद का नाम अयोध्या हो चुका है। जिले का नहीं तो हमारे गांव का नाम ही बदल दो सरकार। कुछ नया नहीं तो पुराना ही कर दो।……………जिला-जवार, राजनीति
(समाप्त।)

गांव गुण्डा कुंवर का नाम ही बदल दो सरकार… कुछ नया नहीं तो पुराना ही कर दो

 

गुण्डा कुंवर-कितना बदला मेरा गांव…

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