गांव गुण्डा कुंवर का नाम ही बदल दो सरकार… कुछ नया नहीं तो पुराना ही कर दो

अरविंद कुमार सिंह
वरिष्ठ पत्रकार और लेखक

हमारे गांव  गुण्डा कुंवर में केवल खेती पर आश्रित परिवारों की बदहाली देश के किसी भी दूसरे गांव जैसी ही है। जिनके परिवारों के लोग बाहर जाकर नौकरी कर रहे है, वे थोड़ी बेहतर दशा में है। दलित परिवारों की स्थिति पहले जैसी ही दयनीय बनी हुई है, उनमें कोई खास सुधार समय के साथ नहीं दिखता है। लेकिन एक बात जरूर है कि पढ़ाई-लिखाई के प्रति थोड़ा उत्साह दिखता है। गांव में राजनीति का मतलब भी यही दिख रहा है कि जिसका जोर है उसके साथ रहो। हां, आरएसएस जरूर इस बीच में गांवों में घुस गया है लेकिन उसे खास सफलता नहीं मिल पायी है क्योकि यहां के मुसलमनों का मिजाज हिंदुओ के इतना करीब है कि सांप्रदायिक उन्माद या ध्रुवीकरण जैसी बात कहीं बन नहीं पाती है। पहले राजपूत जिसका वोट चाहते थे डलवा लेते थे लेकिन अब उनका वह दबदबा नहीं है। खास तौर पर दलितो के वोटो पर उनकी पकड़ बहुत कमजोर हो चुकी है और ओबीसी पर भी। बहका फुसला कर भले ही कुछ लोग समर्थन हासिल कर लें लेकिन वोट की ताकत वे समझ चुके हैं।

गांव-के-स्कूल-में-संघ-का-कार्यक्रम

पिछले कुछ सालो में गांव में लोगों के जीवन स्तर में जरूर बदलाव आया है। सड़कें थोड़ी बेहतर हुई है। शौचालय भी अधिकतर घरों में बन गए हैं। महिलाओं की स्थिति भी बदली है लेकिन सरकारें जो धन भेज रही हैं, उसका बड़ा हिस्सा अभी भी कहीं औऱ जा रहा है। मनरेगा से कोई स्थायी परिसंपत्ति बनी है मैने नहीं देखा। केवल स्कूल ही है जिसे कहा जा सकता है कि ठीक ठाक है। लेकिन बाकी सब भगवान भरोसे। गांव के गोदाम की एक तस्वीर जो इस लेख के साथ है वह बहुत कुछ कहानी बताती है। इसकी एक बड़ी वजह गांव के लोगों में लगातार कम होती एकता और एक दूसरे को कमजोर करने का भाव है।
मेरे छोटे भाई धर्मेंद्र कुमार सिंह जो इंजीनियर हैं, वे गांव गुण्डा कुंवर के कई लोगों को रोजी रोजगार दिलाने में मदद करते रहते हैं। दूसरे स्तर पर भी सहयोग देते है और लगातार गांव में लोगों से संपर्क में रहते हैं। मै भी गांव आता जाता हूं। गांव और इलाके के लोगों के साथ संवाद बना हुआ है। लेकिन हमारे गांव गुण्डा कुंवर की तुलना में हमारे पड़ोस के गांव पचवस कुंवर में काफी बदलाव दिख रहा है।
पड़ोसी गांव पचवस कुंवर
वैसे तो पचवस कुंवर गांव हमारी पट्टीदारी का ही गांव है। लगभग 800 घर व लगभग 4000 की आबादी वाला पचवस कुंवर सैनिकों का गांव है। इस गांव में सिपाही से लेकर एडमिरल रैंक तक के अफसर शामिल हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध से लेकर करगिल युद्ध तक में दुश्मनों के दांत खट्टे करने वाले इस गांव के कई जवान लोगों के लिए प्रेरणस्रोत भी हैं। आकड़ों के लिहाज से देखें तो पचवस कुंवर गांव में 85 अफसर, 56 जेसीओ और करीब 1600 सिपाही थल सेना और वायुसेना में भर्ती होकर देश की सेवा में लगे हुए हैं। 1971 में भारत पाक लड़ाई में पंजाब के हाजीपुर में बतौर कमांडिग आॅफिसर कर्नल केसरी सिंह के बहादुरी के किस्से काफी मशहूर हैं। केसरी सिंह ने पाकिस्तानी सेना को पीछे ढ़केल दिया था। वे जब रिटायर हुए तो उन्होंने गांव के बच्चों को सेना में भेजने का जज्बा पैदा किया, उसके बाद यह सिलसिला जारी है। रिटायर होकर आने वाले फौजी युवकों को सेना में भर्ती कराने के लिए आधार तैयार करते हैं। सबने मिल कर गांव को चमकाने का हर संभव प्रयास किया है।

कर्नल केशरी सिंह द्वार, पचवस

इतना ही नहीं गांव के केसरी सिंह के बेटे मेजर एके सिंह का नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज है। एडीए कैडेट्स को ग्लाइडिंग सिखाते समय हादसे में मेजर का एक पैर खराब हो गया था। इसके बावजूद मेजर एके सिंह ने मुंबई से पालनौका में वल्र्ड टूर करके रिकार्ड कायम किया था। द्वितीय विश्वयुद्ध में शहीद हुए सिपाही इसी गांव के तालुकेदार सिंह का नाम इंडिया गेट पर शहीदों के नाम के साथ दर्ज है। 1971 के युद्ध में पंजाब के आदमपुर में एयरफोर्स के फ्रंट बेस पर बमबारी के बीच एयरक्राफ्ट ठीक करने के लिए विंग कमांडर अमरनाथ सिंह को विशिष्ट सेवा मेडल से नवाजा गया है। इसके अलावा दर्जनों गैलेट्री अवार्डस इस गांव की शान बढ़ा रहे हैं। यह हमारी पट्टीदारी का ही गांव है।
मैने 1983 के दिनों में अपने इलाके को लेकर काफी कुछ लिखा पढा। लेकिन उसका उलटा असर हुआ। प्रशासन नाराज हुआ। बहुतों को ऐसा लगा कि जो कुछ संसाधन गांव के लिए मिल रहे हैं, वे भी ऐसे लिखने से बंद हो जाएंगे मैने मुख्यतया भूमिहीन दलितों के सवालों, बाढ़ से राहत के नाम पर लूट और बंधुआ मजदूरी के साथ नदी कटाव जैसे मुद्दो को उठाया था। उसके बाद मैने इतिहास पर केंद्रित लेखन ही खास तौर पर किया।
गांव नहीं तो गुण्डा कुंवर नाम ही बदल दो
मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि कि हमारा गांव गुण्डा कुंवर खास बदला नहीं है। हो सकता है कि बहुतों को बहुत बदला लग रहा हो लेकिन मैने तो देश भर के जाने कितने बेहतरीन गांवों को देखा है, उसकी तुलना में मुझे यह कहीं नजर नहीं आता है। गांव में नेतृत्व के नाम पर नेताओं के आगे पीछे चक्कर लगाने वाले कई लोग हैं। लेकिन इसका गांव को कोई फायदा नहीं दिखता।
हमारे गांव गुण्डा कुंवर का नाम पंडित गोविंद बल्लभ पंत से लेकर योगी आदित्यनाथ नहीं बदल पाए। वे बलिदानी लगातार पूछ रहे हैं कि कुछ खास नहीं कर सकते तो गांव का नाम ही बदल दो। मेरे पिताजी ने कई बार इसके लिए ज्ञापन दिया। मैने इस बाबत कोई प्रयास नहीं किया। मुझे पता है कि फैजाबाद और इलाहाबाद के नाम बदलने में सरकार को रुचि वोट के नाते है। हमारे गांव गुण्डा कुंवर में तो बिना मांगे वोट मिल रहा है तो फिर कोई सुनेगा क्यों। अब तो बस्ती जिले का नाम बदल कर भगवान राम के गुरु वशिष्ठ के नाम पर वशिष्ठ नगर करने की चर्चा चल पड़ी है। बस्ती महोत्सव पर बस्ती मेडिकल कालेज का नाम महर्षि वशिष्ठ के नाम पर रखने का एलान हुआ था। तबसे सांसद हरीश द्विवेदी और विधायक अजय कुमार सिंह जिले का नाम बदलने की मुहिम चलाए हैं। पड़ोसी फैजाबाद का नाम अयोध्या हो चुका है। जिले का नहीं तो हमारे गांव का नाम ही बदल दो सरकार। कुछ नया नहीं तो पुराना ही कर दो।

 (गांव गुण्डा कुंवर की कहानी..दूसरा भाग…कमश: जारी।)

गुण्डा कुंवर-कितना बदला मेरा गांव…

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