एक पीड़िता की दास्तां…हां मैं वही लड़की हूं

प्रतिमा कुमारी पासवान
आज से लगभग दस साल पहले की बात है। अगस्त का आखिरी सप्ताह। जैसा कि हम सब जानते हैं कि बिहार में इस महीने में मानसून अपने चरम पर होता है। खूब घनघोर बारिश होती है। ऐसी बारिश कि घर से निकलना मुश्किल। ऐसा ही अगस्त उस वर्ष भी था। पूरे सप्ताह झमाझम बारिश। गांव के चारो और आहार पैन और खेत पानी से लबालब भरे हुए थे। ग्रामीणों को अपने मवेशियों के चारे की चिंता सता रही थी। वहीं कई घरों में जलावन की कमी के वजह से एक समय खाना बनाता और दो शाम खाते। क्योकि उपले सूख नहीं रहे थे। ऐसे में आज सुबह से ही अच्छी धूप निकली थी। मौसम साफ होते ही सभी लोग अपने-अपने कामों पर जाने लगे। खेतों में भी आखिरी खर—पतवार साफ करने एवं पानी की निकासी के लिए किसान एवं मजदूर सभी खेतों की और जाने लगे। आहर-पोखर भरे होने के कारण छोटी छोटी मछलियां घोंघे आहर के पानी के दोनों किनारे पर खूब दिख रहे थे।……………….हां मैं वही लड़की हूं
आप सोच रहे होंगे कि किस गांव की बात हो रही है। जी हां यह गांव पटना शहर से पचीस किलोमीटर की दूरी पर है। गांव का नाम है रौनकपुर। घनी आबादी वाला रेवन्यू गांव। लगभग सभी जातियों का वास स्थान। चारों ओर हरियाली, दूर—दूर तक फैले हुए खेत। चारों और से खेतों से घिरा गांव होने की वजह से जहां तक नजर जाती वहां तक धान के खेत। ऐसा मनमोहक दृश्य मानों प्रकृति ने हरे—हरे चादर की कालीन बिछा दी हो। गवंई सड़क वहां से गुजरने वाले मुख्य सड़क तक जाती थी यही वजह था की वहां खूब चहल-पहल रहता था। आमतौर पर रात नौ बजे गावों में सन्नाटा पसर जाया करता था वहीं इस गांव में थोड़ी हलचल रहती थी। गंवई जरूरत के सारे साजो सामान मसलन साईकिल—मोटसाइकिल पंक्चर की दुकान से लेकर छोटे—मोटे स्वास्थ्य केंद्र, ग्रामीण चिकित्सक ,कपड़े की दुकान, सब्जियां,फल लगभग कई गांव के लोग छोटे बाजार करने के लिए यही आया करते थे। मुस्लिमों की भी थोड़ी आबादी होने की वजह से मजार एवं कब्रिस्तान भी इस गांव में है। गांव की दलित आबादी का निवास स्थान गांव के दोनों छोड़ पर यानी नहर पर बसे थे, जो किसानों के यहां मर— मजदूरी कर के अपनी आजीविका चलाते। कब्रिस्तान की ज़मीन से सटे बगीचे में भी दलित परिवारों का बसेड़ा था हालांकि मालिकाना ज़मीन में सब बसे थे और किसी के पास जमीन का कोई कागजात नहीं था। बाद के वर्षों में सबने अपने अपने नाम से रसीदें कटवाई। गांव के कई लोग बहुत प्रभावशाली हैं तो कई बड़े किसान है। क​ई परिवारों में लोग सरकारी नौकरियों में बड़े ओहदे पर भी है,जिनका समाजिक आर्थिक ,राजनीतिक प्रभाव दलित परिवारों पर पड़ता रहा है। चाहे पूरी मजदूरी की बात को लेकर हो या कर्ज वसूली सभी में कई बाद दलित उत्पीड़न की घटनाएं आम रही हैं, लेकिन एक कहावत है पानी में रहकर मगर से बैर कैसे किया जा सकता है। उन्हीं के खेतों में आजीविका पाने वाला दलित समाज भला अन्याय के खिलाफ कैसे मुंह खोल सकता था। इस लिए हर बार समझौता तो दलित परिवार को ही करना पड़ता है।………….हां मैं वही लड़की हूं

खैर, आज बारिश तो थमी। थोड़ी धुप भी सुहानी निकली है लेकिन हर तरफ केवल मिट्टी की फिसलन से लोगों का गिरने का खतरा बना हुआ है। सुबह से कई लोग जो सरकारी चापाकल से पानी लेकर जा रहे थे वह फिसल कर गिर चुके हैं। इसी सरकारी चापाकल पर पश्चमी दलित टोले के लोग पानी ले जाते हैं। इस चापाकल से दो सौ मीटर की दूरी पर फूलमतिया बदला हुआ नाम का घर है। आहर के पैन पर झोपडी नुमा घर। जिसमें उसके माता—पिता एवं दो भाई और उसकी दादी रहती है। मनमतिया के परिवार की पहचान उसकी दादी ही है। उन्हीं के नाम से परिवार जाना जाता। अपने समय की बहुत ही तेज तर्रार और साफगोई से मुंह पर बात कहने वाली महिला के रूप में पहचान।—————————-हां मैं वही लड़की हूं

फूलमतिया महज नौ वर्ष की है और देखने में बिल्कुल अपनी मां पर गई है। मां जैसी सांवला रंग बड़ी- बड़ी आखें, घुंघरैले बाल, थोड़ा—चौड़ी नाक और पतली सी जमुनी रंग की होंठ। हंसते हीं उसकी बतीसी दिख जाती यानी बिल्कुल सेप में कसी हुई दांते। लेकिन अच्छे से ब्रश न करने की वजह से दांते दूध सी सफेदी वाले विज्ञापनों की तरह कदापी नहीं थी बल्कि पीली पड़ी हुई थी को नीली रंग की फ्रॉक बहुत पसंद थी और बड़ी रबड़ वाली पैंट। जब भी दादी के साथ कपड़े खरीदने जाती उसे नीली रंग ही पसंद आती। उसके पास उस समय तीन फ्रॉक्स थे, जिसमें दो नीले रंग की थी। फूलमतिया के घुंघरैले बालों को कभी उसकी मो छोटी काट देती तब उसे बिल्कुल अच्छा नहीं लगता। उसे तो ऐसे ही बिखरे बाल पसंद थे। रबड़ या क्लिप से उसे चिढ़ होती थी। गांव के ही सरकारी विद्यालय में दूसरी कक्षा में पढ़ती है। फिलहाल बरसात की वजह से स्कूल बंद है। बेहद चंचल स्वभाव की फूलमतिया की दोस्ती उसके ही पड़ोसी दीपू और गोलू से थी। वह दोनों इससे थोड़े बड़े थे लेकिन यह दोनों को नाम से ही पुकारती थी। फूलमतिया के उम्र की लड़की उसके आस पास न थी इस लिए यह दीपू और गोलू के साथ खेलते हुए बड़ी हो रही थी। बाकी दलित परिवारों की तरह ही उसका परिवार भी खेतिहर मजदूर हैं और आज माता पिता दोनों खेतों में खर-पतवार निकालने का काम करने जाते हैं। दादी पिछले कई दिनों से बुखार में होने की वजह से आज घर पर है और जब दादी घर पर होती है तब फूलमतिया के लिए बहुत बढ़िया दिन होता है क्योकि उसके दो छोटे भाई की देख-रेख उसे ही करना होता है जब सब लोग एक साथ खेतों में काम करने चले जाते हैं। आज वह सुबह से ही मन बना चुकी है की आज दादी है इस लिए हमको खेलना का मौका मिलेगा। अपने घर की सफाई कर के कुछ बर्तन धोकर खेलने निकल जाती है। इधर दीपू और गोलू भी खेलते-खेलते इसके घर की तरफ से आहार पर नजर डालते हैं। कुछ लोग घोंघा चुन रहे थे। पानी की वजह से आहर के दोनों किनारे पर ढ़ेर सारा घोंघा जमा दिख रहा था। दीपू और गोलू अपने कमीज खोलते हैं और घोंघा चुन चुनकर उसी में रखता जाते हैं। फूलमतिया भी इनके साथ घोंघा चुनती है और अपने फ्रॉक में रखती जाती हैं। कुछ देर में उसकी दादी उसी रास्ते से शौच के लिए जाती है। उस वक्त वह फूलमतिया को जल्दी घर जाने को कहती है क्योंकि उन्हें डर था की पांव फिसल गया तो सीधे पानी में चली जायेगी और काफी गहराई है। दादी के टोकने पर फूलमतिया ने जल्दी घर जाने की बात कही और जवाब दिया हम जाते हैं। दादी उधर से लौटते समय खेत की पगडंडियों से घर लौट आई और उन्हें लगा की फूलमतिया फिर कहीं खेलने में लग गई होगी इस लिए वह सो गयी दोनों बच्चों को लेकर। फूलमतिया को बचपन से ही मछली और घोंघा खाना बहुत पसंद है। ये तीनो घोंघा चुनते हुए आहर पर दूर तक चले जाते हैं।……………………..हां मैं वही लड़की हूं

जब शाम होने को आई तो अचानक दीपू ने कहा चलो घर चलते हैं। गोलू भी बोल पड़ा हां चलो अब ढेर सारा हो गया। फूलमतिया भी साथ में चलने को तैयार हो गई। तीनों जैसे ही आगे बढ़े ही थे की गांव के ही चालीस वर्षीय नन्दू काका रास्ते में मिले और सभी को मिक्स्चर देते हुए बोले घोंघे का सौदा कर लो। तीनो के हांथ मिट्टी से सने थे। बावजूद इसके तीनों में मिक्सचर खा लिया। नन्दू काका पी कर टूल था और झोले में और भी चखना और दारु लेकर जा रहा था। दीपू और गोलू नंदू की बात न मानकर घर चला आया। फूलमतिया इस सोच में पड़ गई कि हम तो कल फिर से चुन लेंगे लेकिन अभी इस घोंघा के पैसे से दादी की दवा ला सकेंगे। इस लिए वह नन्दू के पीछे-पीछे चली आई। नंदू फूलमतिया को एक केविन में ले गया जहां पहले से तीन और लोग बैठे थे। सब नशे में धुत्त थे हालाकि थे पहचान वाले ही। पडोस के ही दो लोग थे। फूलमतिया ने घोंघ उनके पास रखा और पैसे मांगने लगी। नन्दू ने पहले तो उसके हांथों पर ढेर सारा मिक्सचर दिया और बोला खाओ फूलमतिया। उसने कहा, काका दादी मारेगी जल्दी पैसे दे दो। अब थोड़ा अंधेरा होने चला था लगभग सभी मजदूर व् किसान खेतों से निकल कर अपने-अपने घर लौट गए थे। केविन भी गांव से लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर था। इधर बहुत कम लोगों का आना जाना रहता था। रास्ते में कई जगह बड़े बड़े झलासी थे इस लिए केवल महिलायें शौच के लिए दिन में आती थी। रात में आहर से ही लोग लौट जाते थे। फूलमतिया को अनहोनी की आशंका सताने लगी, डर सा लगने लगा और वह रोने लगी। मुझे मेरे पैसे दो लेकिन नन्दू ने उसको जोर से पकड़ा और केविन में अंदर कर लिया।………………हां मैं वही लड़की हूं

 

उसके बाद मुंह में अपना गमछा ठूंस दिया। बाकी के दोनों ने भी और ने भी उसका सहयोग किया। किसी ने हांथ पकड़ा किसी ने पैर और गर्दन पकड़ा। इस दौरान नंदू ने उसके कपड़े उतारे और फिर उसके निजी अंगों में उंगलियां डाल दी। इसके बाद जैसे ही उसके ऊपर चढ़ कर संभोग करना चाहा तो उसका निजी अंग अंदर नहीं जा सका। गुस्से में बिना उभार के स्तन निचोड़ने लगा। फूलमतिया दर्द से कराह उठी। बच्ची ही तो थी। लेकिन मुंह में कपड़ा डाल रखा था इस लिए बेसुध हो गई। फिर मुंह से कपड़ा हटा कर उसके मुंह में अपने निजी अंग को घुसेड। बेसुधी में भी फूलमतिया ने कस के दांत बिठाया तो छटपटाने लगा और गुस्से में गालियां दी। उसके पिता की नाम से और जाति का नाम लेकर बोला चाम मोटा गया है सब का। उसमें से ही एक व्यक्ति ने वहीं पड़े ईंट से उसके सर पर मार दिया। सर और ललाट पर कई बार मारने पर फूलमतिया बेहोश हो गई और चारों ने मिलकर जल्दी से उसे उसी नग्नावस्था में केविन के छत पर रख दिया और वहीं पर ईंट उसके कपड़े शराब की बोतल ,माचिस बीड़ी सब के साथ उसके घोंघे भी उसके ऊपर फेंक के केविन बन्द कर के दूसरे रास्ते से भाग गये।……………………हां मैं वही लड़की हूं

खेत से वापस आते ही मां फूलमतिया को खोजने लगी। दादी से पूछा तो उन्होंने बताया कि दीपू और गोलू के साथ घोंघा चुन रही थी दोपहर तक। फूलमतिया की मां दीपू और गोलू से पूछती है तभी दीपू ने बताया की नन्दू काका को घोंघा देने गई थी। सब का घोंघा खरीदने के लिये बोले लेकिन हम दोनों नहीं दिए और फूलमतिया बोली हम कल फिर चुन लेंगे। आज काका से पैसा लेकर दादी का दवाई लाने जायेंगे और उनके साथ चली गई। फूलमतिया की मां नन्दू के घर गई। नन्दू घर पर ही था फूलमतिया की मां बोली, भैया हमारी काजल आपके साथ आई है न ? नन्दू पीकर बेसुध पड़ा था। उसकी पत्नी बोली न यहां तो नहीं आई है। नन्दू नशे में धूत्त कुछ न बोला। वहीं फूलमतिया की मां का दिल बैठा जा रहा था। उसे आशंका हुई की कही पैर फिसलने से पानी में तो नही चली गई। फूलमतिया के घर व पास पड़ोस के लोग टॉर्च लेकर पूरा आहर की पानी से लेकर खेत तक खोज लिया लेकिन फूलमतिया कहीं न मिली। उसके माता—पिता दिन भर खेतों में काम कर के लौटे थे लेकिन न जाने थकान कहां गायब हो गई। बुखार से तप रही थी और रो रो कर बुरा हाल था। न खाना बनाया न खाया। पड़ोसियों फूलमतिया के छोटे भाइयों को खाना खिलाया दीपू और गोलू तो सुन्न से पड़ गए क्या हुआ होगा? हमें उसके साथ आना चाहिए था। उन दोनों का भी रो रोकर बुरा हाल थ। पूरा मुहल्ला जगा रहा पूरी रात, लेकिन फूलमतिया कहीं न मिली। नन्दू के तीनों मित्र रात में हीं भाग गए। बस नन्दू ने इतना ज्यादा पी लिया था की वह किसी तरह घर पहुंच सका। पूरी रात सबों में छटपटाहट ऐसी थी जैसे अब फूलमतिया कहीं से आ जायेगी।लगभग चार बजे गांव के दूसरे टोले की औरतें शौच के लिये आहर पर निकली। जैसे ही एक साथ तीन औरतें आहर पर बैठी, उनकी खुसपुसाहट शुरू हो गई। उसमें से एक ने कहा अरे कुछ आवाज सुनाई दे रहा। आप दोनों को उन दोनों औरतों ने भी आपसी बातचीत बंद करके गौर से आवाज सुनी तब सभी को किसी बच्चे की कराहने की आवाज सुनाई दी। तीनों महिलायें डर सी गईं। जल्दी से तीनों अपने घर आ गई तीनों ने यह बात अपने पति को बताया। पहले तो पुरुषों ने अनसुना किया फिर जिद करने पर अपने—अपने घरों से टॉर्च लिए निकले और जिधर महिलाओं ने बताया उसी दिशा में गए इनलोगों को भी रुक—रुक कर कराहने की आवाज सुनाई दी। सब ने टॉर्च जलाकर इधर—उधर देखा लेकिन कुछ न दीखने पर वः सीधे आहार पर आए ताकि पैर में लगी मिट्टी सरकारी चापाकल पर जाकर धोई जा सके। ये लोग कुछ बातें भी करते जा रहे थे इनकी आवाज सुनते हीं फूलमतिया की मां बाहर निकली और इनकी बातों को ध्यान से सुनने लगी। जैसे ही उसे कुछ बात समझ आई वह अपने पति के साथ उन सबको रोक बातें करने लगी। सबको लगा की कुछ तो है लेकिन सुबह होने के पहले घनघोर अंधेरा होता है। वैसे ही अंधेरे की वजह से सबने एक घंटे आपस में बातचीत में बिताया। जैसे ही अंधेरा छटा सब लोग मिलकर उसी दिशा में दौड़ पड़े। आवाज के सहारे वहां तक पहुंचे और कई लोग ऊपर चढ़ कर देखे। फिर उसे पिता की लुंगी में ही लपेट कर नीचे उतारा गया। दौड़ते हुए मुहल्ले के ऑटो वाले को लाया गया पटना के पीएमसीएच अस्पताल में भर्ती किया गया। वहां पहुंचते—पहुंचते काजल कोमा में चली गई सर में और ललाट में। कुल 54 टांके लगे और होश में आने में लगभग दो महीने लग गए। नन्दू को दीपू और गोलू के बयान पर पुलिस पकड़ कर ले गई लेकिन बाकी तीन लोग फरार रहे। मार के डर से नन्दू ने अपना जूर्म कुबूल किया और वह तीनों का नाम भी लिया लेकिन पुलिस ने पैसे लेकर उनके खिलाफ कारवाई करने में कोताही बरती। मानवधिकार संघठनों के दबाव में उस दारोगा को सस्पेंड किया और तीनों को पकड़ लिया पुलिस ने। लेकिन उसको बेल मिल गया। केस तो चलता रहा। यह चारों अलग-अलग जाति समुदाय के लोग थे। मेडिकल रिपोर्ट में आया की रेप नहीं हुआ है। लेकिन हत्या के जूर्म में बीस वर्ष की सजा दी गई बाकी तीन लोग बेल पर बाहर रहे और यहां से शर्म की वजह से घर छोड़ कर जो दो दलित थे, भाग गये। उसके भी बच्चे थे इस लिए डर से चला गया। दो अनुसूचित जाति, दो गैर अनुसूचित जाति के लोग थे। इस घटना ने फूलमतिया के परिवार को सामाजिक,आर्थिक रूप से तोड़ दिया।………………हां मैं वही लड़की हूं

ज्ञात हो कि इस गांव में पिछड़े वर्गो का वर्चस्व रहा है। वही बड़े किसान भी हैं। वही लोग इस गांव के सामाजिक,आर्थिक ,राजनीतिक व्यवस्था को चलाते हैं। ऐसे में न केवल फूलमतिया के परिवार पर बल्कि सभी दलित परिवारों पर एक दवाव बनाया, जिसके डर से गांव के लड़कियों का घरों से बाहर आना जाना बंद किया गया। यहां तक की लोग इतने भयभीत हो चुके थे की बेटियों को अपने ही गांव के सरकारी स्कूल भी नहीं जाने देते। लगभग दो महीने में काजल को होश आया और उसने अपना बयान दर्ज कराया। लेकिन जो प्रभावशाली व्यक्ति था उसके विरूद्ध कोई कार्रवाई नही हुई। वह उसी गाँव में रहता और पुलिस बगल से पूछ कर चली जाती। फरार लिखती रही अपनी डायरी में। बाहर से बाहर तीनों को बेल मिला। थाने से आरोपियों को डरना चाहिए था लेकिन पूरा दलित परिवार डरा सहमा था। सरकारी मुआवजा सिर्फ दो बार में बावन हजार ही मिले। उसके लिए भी बहुत समय लग गया। l अस्पताल में चार महीने रहने पर घर और अस्पताल आने जाने का खर्च एवं दवाइयां भी बाहर से लाना होता था। फूलमतिया का परिवार कर्ज में भी आ गया।
कुछ संस्थाओं ने थोड़ी मदद की। डॉ बहुत मानते थे। वे फूलमतिया को कहते इतना होने पर भी जीवित रहने की शक्ति इसमें प्रबल है। यह जरूरत ठीक हो जाएगी।

 

कमश: जारी…

पटना जिले के परसा गांव के कुओं और पानी की व्यवस्था ने यूं बदला ग्रामीण जीवन

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