ठेठ देहात है बेलहर प्रखंड का मेरा गांव… बीरगांव

0
734
          अलका सिन्हा                          सहायक निदेशक,राष्ट्रीय संग्रहालय, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार

बिहार का ठेठ देहात है मेरा गांव… बीरगांव जो बेलहर प्रखंड, जिला बांका में स्थित है। पिछले तीस वर्षों से गांव नहीं गई हूं। शादी के कुछ समय बाद बस एक बार गांव गई थी और शादी को तैंतीस साल होने जा रहे हैं। ऐसा नहीं कि इस बीच कभी गांव नहीं गई, कार्यक्रमों वगैरह में जाना होता रहा पर मैं बात कर रही हूं अपने गांव की। बिहार के भागलपुर में बसा .. सुल्तानगंज की गंगा पार करके बेलहर रोड से निकलें तो जिलेबिया मोड़ पार करते हुए हरेंद्र चाचा के घर के ठीक सामने उतारती है बस। मेरा गांव तो उसके बाद शुरू होता है। भीतर तक पक्की रोड नहीं बनी है। तब तक तो नहीं बनी थी। हो सकता है, अब तक बन गई होगी। सामान उठा कर गलियों से गुजरने लगते तो जैसे मिट्टी के घरों तक मानुस गंध पहुंच जाती। हर कोई झांक-झांक कर पूछता- ‘के छिके, के छै…’ हम समझ नहीं पाते कि अपना परिचय किस प्रकार दें। तब तक वो ही चिह्न लेते, ‘सीतारामो क बेटी छैं… दिल्ली से आय रहल छैं…?’ कितना दुलार उमड़ आता इस सवाल में, जैसे ये गलियां कब से हमारी राह देख रही थीं! गांव के बच्चे, ‘चचा परनाम!’‘परनाम, बड़का भइया!’कहते हुए पापा के पैर छूते और हमारे हाथ से सामान उठा लेते। फिर आ जाती एक चौड़ी पगडंडी। जिसके दोनों तरफ रेशमी फूस की झाड़ियां लगी होतीं। मन ही मन उनका स्पर्श करती तो उनकी छुअन मखमल-सी मालूम पड़तीं। साथ में खड़े होते जंगली सफेदे जैसे कुछ पेड़। उनके पत्ते एक तरफ से बिलकुल चिकने और चांदी के वर्क चढ़े मालूम पड़ते। पता नहीं, इन पेड़ों का क्या नाम था। पर वे हमें जैसे खूब पहचानते थे। हवा में झूम-झूम कर अपनी खुशी व्यक्त करते तो चांदी के पत्ते झलझल करने लगते जैसे कोई दांत दिखाकर हंस रहा हो।

 

प्रायः गरमी की छुट्टियों में लगभग महीने भर के लिए गांव जाना होता था। भागलपुर के एन सी चटर्जी लेन पर आलिशान घर था नानी का, हर तरह से सुविधासंपन्न। जबकि दादी घर ठेठ देहात। बिजली, पानी तक की सुविधाओं से वंचित। फिर भी, यहां अजब-सा आकर्षण यहां बांधता। लौटने को मन ही नहीं करता। एक तरह का अधिकार भाव महसूस होता। एक समय था जब यहां आने के लिए बस के बाद बैलगाड़ी की सवारी करनी पड़ती थी। वो बारिश के दिन होते और जगह-जगह पानी भर जाता। बैलगाड़ी कीचड़ में धंस जाती तो मम्मी खूब झल्लातीं कि क्या सोचकर उनके भैया ने ऐसे देहात में ब्याह दिया उन्हें। बस, फिर शुरु हो जाता उनका एकालाप कि मामू तो पापा की सादगी और पढ़ाई के रुझान पर ऐसा मोहित हुए कि और कुछ देखा ही नहीं। पापा ने भी मामू से अपने आगे की पढ़ाई गछवा ली और हो गया रिश्ता। मामू टीएनबी कॉलेज में गणित के विभागाध्यक्ष थे, क्या मुश्किल थी। पापा ने गणित में एम ए की पढ़ाई की और गांव के पहले एमए पास व्यक्ति बने। दिल्ली में नौकरी लगी और सभी मम्मी के भाग्य पर रश्क करने लगे। यह सब दोहराते हुए मम्मी के चेहरे पर कहीं गौरव का भाव भी उमड़ता जिसे वे झल्लाहट में दबाने की कोशिश करतीं। गाड़ी फिर पानी में धंस जाती और पापा नीचे उतर कर गाड़ी निकालने में गाड़ीवान की सहायता करने लगते।

उस समय अक्सर यह ख्याल आता कि बड़े हो कर किसी लायक बन जाऊं तो यहां पक्की सड़क बनवाऊंगी। घर पहुंचते तो मामा, यानी दादी लालटेन की बत्ती उठा कर हम सबका चेहरा निहारतीं, हमारे स्वास्थ्य के प्रति चिंता व्यक्त करतीं और आंचल के कोर से आंख पोंछने लगतीं। उम्र में मुझसे थोड़ी ही बड़ी मेरी फूआ हमारे लिए लोटे में गुड़ का शरबत ले आतीं। मिट्टी का घर, खप्परैल की छत, धूलदार पगडंडियां, जाने कैसे पक्के मकानों पर भारी पड़तीं, अजब-सा आकर्षण अपने आत्मीय घेरे में कसता जाता। खेतों में तैयार खड़े गन्ने. पके आम से गंधाते रास्ते. नक्काशीदार पेड़ों से टपकते खजूर… यह सब बहुत ही अनूठा था और मेरे भीतर इतने गहरे तक समाया है कि अरसे से गांव न जाने के बाद भी उसकी याद पर कतई धूल नहीं पड़ी है। अक्सर सपने में दिखता है कि पीपल गाछ वाले रास्ते से निकल कर मैं सीधा रास्ता पार कर नहर तक गई हूं। फिर वहां से बाईं तरफ वाली पगडंडी पर चल पड़ी। बाईं ओर कुछ घर और दाईं ओर खेत ही खेत। खटहिंया रास्ता छोटा पड़ता है न, इसलिए बीच का रास्ता छोड़ मैं खेतों की मेड़ पर डगमगाती सी आगे बढने लगी। कुछ देर खेत पार करने के बाद, बरगद पेड़ के साथ जाते रास्ते से पगडंडी पर उतर आई। यह रास्ता चौड़ा है, बाईं ओर एक बस्ती है। फूआ ने इस बस्ती का नाम बताया था, कौन तो टोला… ठीक से याद नहीं आ रहा। फूआ ने समझाया था, ‘लगे कोई पुकारे तो मुड़कर पीछे नहीं देखना, आत्मा भटकती है यहां. वही पुकारती है…’ और ऐसा हमेशा ही होता कि यहां से गुजरते हुए लगता कोई पीछे से आवाज दे रहा है। मैं जैसे ही ठहर कर देखने के लिए पीछे मुड़ने लगती कि फूआ टोक देतीं, ‘कहे न तुमको मुड़कर नै देखना।’

‘मैं यह सब नहीं मानती,’ मैं कह देती मगर अजब-सा रोमांच हो जाता।

बस्ती पार करते ही नदी दिखने लगती।

‘मसानी नदी है यह,’कहते हुए फूआ दूर बैठे अघोरी की तरफ इशारा करतीं।

‘क्या कर रहा है यह?’मैं उत्सुकता से ठिठक जाती।

‘मसानी सिद्धि कर रहा है, मत देखो उधर।’उस तरफ दिखाते हुए, वह उस ओर न देखने की हिदायत देतीं।

फिर अपनी सलवार ठेहुने तक मोड़ कर हम पानी में उतर जाते और नदी पार करते। कमर तक पानी में पहुंचती तो मैं लड़खड़ाने लगती।

‘कुच्छु नै होतै. हम छिये न… ’और फूआ कसकर हाथ धर लेतीं। नदी पार की रेत में गीले पैर धंस जाते। मगर थोड़ी ही देर में सारी रेत सूख कर झर जाती और हम चप्पल पहन लेते। फिर छोटी सी चढ़ाई और उसके बाद कैलाश पहड़ी का मंदिर दिखने लगता। मंदिर के आगे मेला जैसा लगा होता। रंग-बिरंगी चूड़ियां, कांच के मोतियों की माला, लाल-पीले रिबन… गरम तेल में पकौड़ों के तलने की छनछनाती आवाज और मुरही-घुघनी की सुगंध से स्वाद ग्रंथियां सक्रिय हो उठतीं… पैर आगे बढ़ने से बगावत कर देते।

‘पूजा क बाद खैबै!’ फूआ आश्वस्त करती आगे खींच ले जातीं।

 

मंदिर के अहाते में घुसते ही बाईं ओर कूंआ था जिससे एक बाल्टी पानी निकाल कर हम खुद पर उझल लेते। शीतल जल तन और मन में पवित्र अहसास भर देता। पहले शिव परिवार दिखता फिर और दूसरे भगवानों की मूर्तियां। काले पत्थरों की मूर्तियां दक्षिण भारत की याद दिलातीं। फूआ का अनुकरण करती मैं सर्वप्रथम गणेश जी को जल चढ़ाती फिर बाकी सभी मूर्तियों पर जल ढारती जाती। मंदिर के बीच से होकर बाड़ी का रास्ता गुजरता। फूलों से भरा खुला बगीचा। महानगर के लोग इसे नर्सरी के तौर पर देख सकते हैं। कनेर के फूलों की मदमाती महक मुझे पागल कर देती। यह महक तो दिल्ली में भी साथ बनी रही है। मैं कहीं भी रहूं, कनेर के पेड़ एकबारगी तो मुझे रोक ही लेते हैं। बाड़ी के दूसरे फूलों का भी क्या कहना। उढ़ल, धतूरा, अपराजिता और भी बहुत से फूल जिनका नाम नहीं पता मुझे। हालांकि, फूआ की रनिंग कमेंटरी चलती रहती और वे हर फूल और पेड़ से मेरा परिचय कराती जातीं पर इस तरह के परिचय से कभी भी मेरे जहन में नाम अंकित नहीं होते। थोड़ा बैठते, बतियाते तो कोई बात होती मगर ध्यान में तो मूरी घुघनी की महक दस्तक दे रही होती। तो जल्दी-जल्दी पूजा कर हम बाहर निकलते और फिर आलू, प्याज के पकौड़े, उबाले हुए मसालेदार घुघनी (छोले) के साथ मूरी का नाश्ता होता। लजीज नाश्ता। स्वाद याद कर अभी भी मुंह में पानी भर आता है। छक कर खा लेते तो शुरु होती ‘हटिया खरिदारी’जिसका आनंद मुझे‘मॉल शॉपिंग’से ज्यादा भाता है। पॉकेट-फ्रैंडली दुकान। कुछ भी खरीदो, कितना भी खाओ, जेब में झोल नहीं पड़ेगा। फिर भी, बहुत सामान जमा नहीं करना क्योंकि लौटते में फिर नदी पार करनी है, थाम कर आगे बढ़ना है…

कैलाश पहाड़ी मतलब हनमना डैम का आधा रास्ता तय… अक्सर इसके बाद डैम तक हो आने की इच्छा बलवती होने लगती है मगर अब धूप तीखी हो चली है और घर लौटना ही बेहतर होगा। तो हनमना डैम अगली बार, फिलहाल घर लौटते हैं…

इस गांव से बचपन की यादें जुड़ी हैं. क्योंकि शादी के बाद तो छूट ही गया गांव। शादी के बाद जब गई थी उस घर में सवासिन बन कर तो बहुत अजीब लग रहा था। अपने घर के आगे खड़े पीपल के सामने पड़ी तो लजा गई, इसके सामने तो कैसा हुड़दंग मचाया करती थी। आज सिंदूर भरी मांग और पति के साथ वहां से गुजरते हुए शर्म से गड़ी जा रही थी। सामने का कूआं भी मेरी स्थिति देख कर मुस्का रहा था और बगल में खड़ा अमरूद गाछ, वह तो हंस-हंस कर दोहरा हुए जा रहा था। मैं आज सहमी-सकुचाई उस घर-आंगन में प्रवेश कर रही थी जहां मैंने बेहिसाब मस्ती की थी। खैर, कुछ ही देर में संकोच जाता रहा और मैं अपने वास्तविक स्वरूप में आ चुकी थी। चचेरे भाइयों ने मेहमान(मनु जी) से मीठी छेड़छाड़ शुरू कर दी थी और गांव घुमाने का कार्यक्रम भी बना डाला था। अगले दिन हम हनमना डैम देखने गए थे। लंबा प्रोग्राम था। आज भी अपने ख्यालों में सारा रास्ता वैसे ही पार कर जाती हूं।

पता नहीं इन पेड़ों का क्या नाम है, हरे पत्तों की दूसरी तरफ चांदी का वर्क चढ़ा है। हवा में हिलते हैं तो झिलमिल-झिलमिल करने लगते हैं ये पत्ते। रेशमी झाड़ू-से फूस रूमानी याद से खूबसूरत मालूम पड़ते हैं। सचमुच, कुदरत कितने रूपों में हमसे संवाद करती है जिसे हम अनसुना कर देते हैं। क्या दिल्ली में यह संवाद होता है? होता ही होगा। दिल्ली में इतने बरस जी लेने के बाद भी उससे उस तरह का जुड़ाव कहां महसूस किया मैंने जैसा यहां से छूट जाने के बाद भी महसूस होता है। एक तरफ हवा से लोट-पोट होते ऊंचे पेड़ हैं तो दूसरी तरफ रेशमी झाड़ियां… बीच में धूलदार उजली पगडंडी, रास्ते भर जिससे बतियाते जाओ, वह भी हुंकारे भरती सुनती रहती है। बीच-बीच में कोई बस्ती आ पड़ती है जहां कुछ पत्थरों के टुकड़े चौंक कर देखते हैं कि गांव में कौन अजनबी आ गया है?

‘अजनबी हम या तुम?’मन तमक कर पूछता है, ‘मेरा तो गांव है यह…’

‘तुम्हारा गांव है तो रहती क्यों नहीं यहां?’वह अपना अधिकार जताता है।

‘आती तो हूं बराबर…’मेरा स्वर क्षीण हो जाता है।

‘लौट जाने के लिए?’

‘शहर में पढ़ाई है, नौकरी है…’

‘और यहां की पढ़ाई-नौकरी?’

मेरे पास कोई जवाब नहीं है।

 

बचपन में खुद से वायदा किया था कि बड़े होकर इस गांव की बेहतरी के लिए काम करूंगी। बिजली, पानी, सड़क… इसके विकास के लिए काम करूंगी। जब-जब हमारी बैलगाड़ी कीचड़ में धंस जाती और पापा नीचे उतर कर गाड़ी ऊपर निकालने में गाड़ीवान का हाथ बंटाते, तब-तब मैं अपना वादा दोहराती। जब मम्मी अपनी किस्मत पर झल्लातीं कि भैया ने क्या देखा जो इस ठेठ देहात में मुझे ब्याह दिया। तब मैं मन-ही-मन अपना वादा दोहराती। मैं बड़ी हो गई थी। हनमना डैम जाते हुए रास्ते का देहातीपन मुझे अपनेपन से बुलाता और मैं अपना वादा भूल जाती। बल्कि जब लाड़ली की शादी पर इस घर में आई थी तो पाया घर का कुछ हिस्सा चाचा ने पक्का करा दिया है। दिल की धड़कन थम गई जैसे। ओह, वो घर कहां गया जिसकी प्यास लिए मैं दिल्ली से यहां तक आती थी। आज भी सपनों में वही मिट्टी वाला घर दिखता है। मैंने कस कर आंखें मूंद ली थीं कि उस घर की याद पर कोई और रंग नहीं चढ़ना चाहिए। मेरे सपने उसी घर की छवियों से आबाद रहेंगे। तो क्या गांव की पगडंडी पर रखे ये पत्थर अपना रंग-रूप बदलने की दरयाफ्त कर रहे थे? नहीं, मुझे धोखा हुआ होगा। इनकी नैसर्गिक खूबसूरती में किसी तरह के फेरबदल नहीं। याद नहीं, मम्मी के गुजर जाने के बाद जब मैं बहुत बेचैन रहने लगी थी तब बच्चों ने दिल्ली में ही खोज कर ऐसा स्थान निकाला था जहां गांव का अहसास था। मिट्टी के घर थे, (ये बात और है कि इसके बावजूद वह एसी और अन्य आधुनिक सुविधाओं से लैस था।) बांसों के झुरमुट, ढलान से उतराई पर बगल में छोटा-सा तालाब था, तैरती लिलि और बतखें थीं… यह सब कितना भाया था मुझे। पांच सितारा होटलों से कहीं ज्यादा आकर्षण था इनमें।

अपने तर्कों में खोई मैं कैलाश पहाड़ी तक का रास्ता पार कर चुकी थी। इसके बाद मैदानी भाग था। उजाड़-सा दीखता, कटे खेतों के बाद का उजाड़… जैसे बच्चा जनने के बाद थकी-हारी जमीन, प्रसूती की तरह सुस्ता रही हो। दूर से ही पहाड़ों के आकार चुंबक की तरह खींचने लगे। कदमों में गति आ गई। बीच में कुछ न होने से दूरी का अहसास नहीं होता और हम दौड़ने लगते कि कौन पहले सीढ़ियों पर चढ़ेगा। काले पहाड़ों के बीच बनी काली सीढ़ियां, दूर से ही पानी का हहराता स्वर जो पास आते-आते गर्जन में बदलने लगता। यों लगता जैसे कोई दहाड़ रहा हो- ‘कौन हो?’ ‘क्यों आए हो?’हम बिना जवाब सीढ़ियां चढ़ते जाते। हमारे बीच की होड़ हमें एक पल रुकने नहीं देती। भाई-बहनों के बीच की होड़, सांस रोके, दांत भींचे, सीढ़ियां चढ़ते जाते…. मगर इस बार मैं ब्याह के बाद आई थी, अपने पति के साथ। उस पति के साथ जिससे ठीक से परिचित भी नहीं थी और जिसे पति कहने में भी लाज आती थी। मगर यह कब तक हावी रहती, मैं अपने मौलिक स्वरूप में आ चुकी थी और साड़ी का फेंड़ा कस कर थोड़ा ऊंचा कर लिया। फिर? फिर लगी दौड़ने, दनादन सीढ़ियां चढ़ने। सांस फूल रही थी, पीछे पलट कर देखा, कुछ लोग पीछे थे। मैंने बढ़त हासिल कर ली थी। मेरा बचपन लौट आया था। सीढ़ियों के बीच हहराता पानी अब हमारे साथ हो लिया था। उसकी दहाड़ उन्मुक्त हंसी में बदल चुकी थी।

 

 

‘मेहमान, अपना नाम पुकारिये तो? अच्छा, ताली बजाइए,’सीढ़ियां पार कर ऊपर पहुंचे तो कुंदन ने ताली बजाई। ताली की अनुगूंज अन्य दिशाओं से आने लगी। मनु जी हंसने लगे। उन्होंने मेरा नाम पुकारा। दिशाएं मेरा नाम दोहराने लगीं। मनु अचंभित हो कर देखने का स्वांग करने लगे। भाइयों को मजा आया। चंदन ने बताया कि यहां आप ताली बजाएंगे तो बारिश होने लगेगी।

‘अरे, पानी बरसा रे?’मनु जी ने जोर-जोर से ताली बजाई और इधर-उधर भागने का अभिनय करने लगे। मनु जी के स्वांग को स्वाभाविक बनाती अनायास ही कुछ बूंदें टपक पड़ी थीं कि मनु जी लदफदाकर स्पेलवे के पानी में जा गिरे। अब तो क्या था, सभी तालियां बजाकर हंसने लगे।

‘ताली बजाना बंद करिए, वरना बाढ़ आ जाएगी।’ झेंपते हुए मनु जी उठे और कपड़े झाड़ते हुए बीच की पगडंडी पर लौट आए। इस घटना से आनंद बढ़ गया था। आजाद, चंदन और कुंदन घर के बेटे थे और कम उम्र में भी समझदार हो चले थे। वे हंस तो रहे थे मगर इस बात का ध्यान बराबर रखे हुए थे कि किसी भी बात से मेहमान के सम्मान पर चोट नहीं पहुंचनी चाहिए। बगीचे की रौनक देखने लायक थी। कई रंग के फूल, स्वाभिकता में खूबसूरती बयान करता बगीचा। डैम के पानी से ही बगीचे की सिंचाई हो जाती थी। बहुत मेहनत नहीं करनी पड़ती। यह डैम बहुत से लोगों के लिए रोजगार का जरिया था। पापा ने बताया था कि अपने शुरुआती दिनों में उन्होंने भी कुछ समय यहां काम किया था। क्या काम किया था यह तो मुझे ठीक-ठीक याद नहीं पर यहां हर तरह की आवश्यकता थी। गांव से कोई भी लड़का, किसी भी उम्र का यहां आकर काम मांगता तो उसके लायक कुछ न कुछ काम निकल ही आता।

(शेष अगले अंक में)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here