प्राकृतिक संपदा से परिपूर्ण गांव तिलईबेलवा…कुआं, तालाब, पोखर का जल आॅडिट

आर्यावर्ती सरोज “आर्या”
भारत वर्ष में उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले का तिलईबेलवा गांव का ग्रामीण आंचल अपनी प्राकृतिक संपदा व सौंदर्य से परिपूर्ण व समृद्ध है। यह ग्रामीण अंचल अपनी प्राकृतिक और मनोहारी दृश्य से बरबस ही अपनी ओर आकर्षित करने की क्षमता रखती है। जिले से अधिकतम निकटतम होने पर भी अपने परंपरागत सांस्कृतिक रीति-रिवाजों विभूषित हो ग्रामीण आंचलिक परिधि के आवरण से आवृत्त है। इस आंचलिक परिधि को ताल, पोखर,कूप और नाले आदि श्रृंगारित एवं सुसज्जित करने में सहर्ष अपना योगदान प्रदान करने में अपनी भूमिका निभा रहे हैं। इस गांव की भूमि पूर्णतः उपजाऊ है। प्रत्येक स्थान पर कुआं, तालाब,ताल, पोखर व नाले होने के कारण यहां के खेतों में सिंचाई की सुविधा आसानी से उपलब्ध हो जाती है।

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ताल- तिलईबेलवा गांव से सटे दक्षिण में ताल है। जिसमें सारस पक्षी का युग्म रहता है। जिसकी प्राचीनता अकथनीय है। ताल के पूर्व में गोरस्थान और मिस्कारी गांव है। गांव के दक्षिण तथा पश्चिम में सोंदा गांव है एवं उत्तर में तिलईबेलवा गांव मजरुआ भूमि है।
ताल में कमल और बेर (कौमुदनी) के फूल खिलते हैं। जिससे ताल शोभायमान हो उठता है।

पोखर- तिलईबेलवा गांव में पांच पोखर हैं। जो कि फेकन बाबा द्वारा निर्मित है।
१- कुड़हिया पोखर- जो कि गांव समाजी है।
२- घोटही पोखर- यह पोखर राम रक्षा मिश्र द्वारा निर्मित है यह समस्त ग्रामवासियों का सम्मिलित पोखर है।

३- चमरहिया पोखर- राम रक्षा द्वारा निर्मित यह पोखर भी गांव समाजी ही है।

इसके अतिरिक्त अन्य दो और पोखर है।

कुआं- इस गांव में १७ कूप अथवा कुआं है। जिसमें से वर्तमान समय में अधिकतर कूपें पाट गईं हैं और कुछ अभी हैं। गांव के पूर्व टोला मिश्रा घराने में दो द्वारों पर कुआं है। एक परशुराम बाबा ( मुखिया बाबा) के द्वार के दक्षिण तरफ और दुसरा पृथ्वीनाथ मिश्र ( प्रधान जी) के द्वार पर है।

भगवान दत्त मिश्र द्वारा १९४३ में बलुआ पर खेतों को पाटने के उद्देश्य से बनाया गया।राणा वाली बारी में एक कुआं है तो एक कुआं पश्चिम टोला में।जोखू यादव के चक में झारखंडी बाबा के पास अकटा काट कर एक कुआं बनाया गया जो कि अकटहवा कुआं के नाम से प्रसिद्ध है। पश्चिम टोला में ही एक कुआं बाबा के पूर्वजों द्वारा बनवाया गया है।चमार टोली के निकट तपेश्वर बाबा द्वारा एक कुआं का निर्माण किया गया है। वंशी यादव के घर के समीप एक कुआं का निर्माण १९४० के पूर्व ही हुआ था।एक कूप झिन्नू के घर के पास है। भगेलू के इनार-भगवानदत्त के जमीन में १९४० के पूर्व खोदी गई है तो रामरक्षा मिश्र द्वारा निर्मित कूप १९४० के पूर्व बनवाया गया। भरकुंया इनार – बंजारों द्वारा निर्मित कूप है। तपेश्वर मिश्र द्वारा एक और कूप निर्माण किया गया है जो कि पूर्व के मुख्य मार्ग पर दक्षिण की ओर है। कन्हई चौहान द्वारा निर्मित कुआं पूरब के बारी के मुख्य मार्ग के पश्चिम सटे हुए है। जो कि खेती सिंचन के उद्देश्य से बनाया गया है। जो कि वर्तमान समय में यथावत स्थित है। राम नरेश मिश्र द्वारा निर्मित कूप उनके चक में स्थित है जिसका निर्माण १९६६ के लगभग हुआ था। राम रक्षा द्वारा निर्मित कूप पूरब की बारी में है।

एक भूतहवा इनार भी था जो कि वर्तमान में पाट गया है। एक कूआं भूतहिया बारी और एक कुआं छोटकी बारी में स्थित था जो अब पाट गया है। छोटकी बारी वाले कुआं में सांपों का डेरा था। अब वह पाट चुका है। भूतहवा,भरकुइआं और भगेलू के इनार के साथ अधिकतर कूपें पाट गईं हैं। एवं अन्य कुछ कुएं वर्तमान में यथावत स्थित है ।
गांव के पूर्व दिशा में एक नाला का निर्माण किया गया है जो कि तिलईबेलवा और गोरस्थान के बीच में है। इन सभी परिदृश्यों के सौजन्य से गांव का सौंदर्य मुखरित हो उठता है।

गांव के सामाजिक ताने-बाने में रसूख का संकेत भी देते थे परंपरागत कुंवे

छप …छप . .. छप …..चूं चर मर ..क्यों विलुप्त हो रहे हैं गांव के परंपरागत कुएं

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