गांव के सामाजिक ताने-बाने में रसूख का संकेत भी देते थे परंपरागत कुंवे

दि गांव अपना एक विश्व है जिसमें सदियों की सभ्यता और सांस्कृतिक विकास का समुच्चय संचित हुआ दिखता है तो परंपरागत कुंवे के आसपास का सामाजिक आर्थिक ताना-बाना लघु विश्व। इस लघु विश्व में  हर व्यक्ति का अपना अलग अनुभव संचित है। प्रस्तुत है मेरे गांव के कुंओं की कहानी और उससे जुड़ा सामाजिक, वैयक्तिक अनुभव। मेरे गांव का नाम है बंगरा के बारी जो सिवान जिले के सिसवन प्रखंड का हिस्सा है ।

इनार को नयनतारा माता भी कहीं-कहीं कहा जाता है। जल स्रोत सृष्टि और सृजन का आधार होते हैं। इनार को मातासम देखना हमारी  लोक जीवन की विशेषताओं में गिनी जा सकती हैं। हमारे यहां दीवाली के अवसर पर कुंओं के जगत पर स्त्रियां प्रज्वलित दीप आज भी रखती हैं और वहां तीन चार बार सिंदूर से टीकती हैं। वे पूजा के प्रथम दीप घर, पूजा स्थल,चौखट, पशुओं के नांद, भूसा अनाज रखने के खोंप आदि के साथ कुंओं पर भी जलाती हैं ।  इसके बाद ही घर के सीढ़ियों,अटारियों, छतों पर दीप मोमबत्ती जलाने का काम पूरा किया जाता है। अब जब कुंवे नहीं रहे उनके स्थान पर नलकूप (नल वाला कुंवा, हैंडपंप) आ गया तो आज भी नलकूप पर दीवाली के अवसर पर स्त्रियां दीपदान और सिंदूर दान करती हैं। छठ के अवसर पर भी जलस्रोतों पर स्त्रियां दीये जलाती हैं ।  कुंओं के पानी को झांकना कभी-कभी किसी मनौती के रूप में भी भाखा जाता था ।

गांव के सारे कार्य गतिविधियां स्वावलंबन को ध्यान में रख की जाती थीं । संयुक्त परिवार अन्न जल से भी स्वावलंबी हो इसी उद्देश्य से कुंओं की खुदाई की जाती थी।  स्वावलंबी परिवार की प्रतिष्ठा मान मर्यादा कुछ अलग ही होती थी। किसी से कुछ मांगना ना पड़े, ना अन्न, ना जल, ना श्रम, ना वस्त्र आदि। परिवार से आगे गांव भी सुखी और सर्व सम्पन्न हो, स्वावलंबी हो।

डेढ़ दर्जन से अधिक कुओं वाले मेरे गांव में अब गिनती के दो-चार कुएं

कुंओं का इतिहास गांव घर के संयुक्त परिवार के इतिहास और स्वयंपूर्ण होने की कामना से गहराई से जुड़ा था। कुंओं का विलुप्त होना, बिगड़ना और संयुक्त संयुक्त परिवार की टूटने की घटनायें इतिहास में साथ साथ घटित हुई हैं। उस काल में खेती सामूहिक उपक्रम होता था। यह सामूहिक श्रम, कर्म और विचार का प्रतिफल होता था। श्रम में साझेदारी आपसी मेल जोल को बढ़ाता था। श्रमशील संस्कृति के पुष्प, लोकगीत संस्कार आदि सामूहिक उल्लास में प्रस्फुटित और मुखरित होते थे।

हमारे गांव में दो प्रकार के खेत हैं। एक थोड़ा ऊपर की भूमि है। इसके उपयुक्त स्थान पर गांव की बसावट है और घरों के आसपास के खेत और बगीचे हैं। यह चिकनी मिट्टी नहीं है, बलुहट है । इस कारण  बरसात का पानी रिस कर जमीन के नीचे तक जाता रहता है और 25 – 30 फीट के तल पर स्थिर हो जाता है। ऐसे खेत को ऊपरवार खेत कहते हैं और इनमें रबी और भदई फसलें अर्थात गेहूं,दाल, अरहर आदि और साग सब्जियां मुख्यतः उपजाई जाती हैं।

दूसरी प्रकार की जमीन चंवर है। चंवर की नीची जमीन में बरसात का पानी गर के टिकता है। चंवर की मिट्टी चिकनी होती है। इसमें बरसात का पानी  एक दो महीने तक रहता है। पारंपरिक रूप से इन खेतों में धान की फसलें लगाई जाती हैं और मछलियाँ पाली जाती हैं।

दोनों प्रकार के खेतों की सिंचाई का तरीका भी अलग अलग है। ऊपरवार के खेतों में पारंपरिक रूप से कुएं खोदे गए हैं। इन कुंओं का नाम भी व्यक्ति के नाम पर या चारित्रिक गुणों के आधार पर रखा हुआ है।
कुछ कुंवे बहुत पुराने हैं। उन्हें 1917 में भू सर्वेक्षण के दौरान तैयार गांव के नक्शे में भी देखा जा सकता है। ये कुंवे खेतों के बीच हैं और खेतों की सीमा के विवादों की स्थिति में अमीन द्वारा उन्हें नापने के एक अविवादास्पद बिंदु के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। ऐसा ही एक कुआं जगु तिवारी का कुआं था। यह मूलतः ऊपरवार खेतों को पटाने के लिए कभी बनाया गया था और यहां से नापी प्रारंभ करते हुए मैंने अपने बचपन में देखा है। भूसर्वेक्षण में चिन्हित ये कुएं खेतों की सीमा रेखा को निर्धारित करने और ग्रामीण विवादों को निपटाने में एक विश्वसनीय और अविवादास्पद बिंदु हुआ करते थे। पर अब जब कुएं ना रहे तो सब कुछ अनुमान और परस्पर विश्वास पर टिक जाता है। नापी की शुद्धता और विश्वसनीयता पर सदैव संदेह इस प्रकार बना रहेगा।

कुंओं के कई भौतिक उपयोग भी थे जो हमारे लोक व्यवहार और परस्पर मेलजोल और विश्वास को पुख्ता करते थे। कुंवे के गोल चबूतरे के आसपास छोटी मोटी बैठकें और विचार-विमर्श भी हुआ करते थे। गर्मी के दिनों में ये चबूतरे साफ और समतल होने के कारण गरीब ग्रामीणों के रात्रि विश्राम का स्थान भी होते थे। इन पर अखरे आकर या हल्के चादर डालकर एक आध दर्जन भर लोग तो आराम से सोते थे और सोते समय अपने दुखों , कार्यों या अन्य घटनाक्रमों की चर्चा भी किया करते थे। जल स्रोत के करीब होने के कारण चबूतरो का फर्श साफ और शीतल भी होता था ।
यदि कुछ उदाहरणों को छोड़ दिया जाए तो उनका जल सार्वजनिक साझा संपत्ति होता था। गांव में कुएं के जल के लिए एक आध विवाद भी सुनने को मिलता था। पर , यह बिरले ही होता था और इसका कारण क्षणिक स्वार्थ का टकराहट होता था ।

बउरहवा कुंवा

हम लोगों के संयुक्त परिवार वाला मकान मिट्टी और खपरैल से बना था।  हमारे गांव किस तरह आत्मनिर्भर थे यह उसका अनुपम उदाहरण था। घर के निर्माण में प्रयुक्त बांस, लकड़ी, धरण, खपड़ा आदि सभी गांव के ही  उत्पाद थे। गांव के बाहर का कुछ भी नहीं था। मिट्टी की ऊंची दीवारें भी सहयोग से खड़ी की गई थी। खपरैल छत के किनारों को मजबूती देने के लिए लकड़ी के पट्टे दिए गए थे। इन पट्टों पर लकड़ी का अच्छा काम था। खिड़कियां छोटी थी और लगभग छत के साथ लगी थीं।

इसी घर के सामने एक कुआं भी खोदा गया था जिसे पता नहीं किन कारणों से  बउरहवा इनार कहा जाता था।
इस इनार को मेरे बाबा लोगों ने (यहां बहुवचन ही उपयुक्त होगा) 110 – 120 वर्षों पूर्व खुदवाया था। ग्रामीणों को तब पता होता था किन किन कुओं का पानी किन-किन खेतों तक ही चढ़ता है।
यह कुआं पास के ऊपर वार खेतों में लगे फलों और सब्जियों को पटाने के काम भी आता था।  एक वृद्ध बताते हैं कि इस कुएं पर दो ढेंकुल चलते थे और इस कुएं से लगभग 20 बीघा में लगी फसलों की सिंचाई हो जाती थी और 1 दिन में लगभग 10-12 कट्ठे की सिंचाई भी ढेंकुल चलाकर की जाती थी ।
गांव के सामाजिक ताने-बाने में कुंवे रसूख  का भी संकेत देते थे। दूसरे गरीब और कम हैसियत के लोग पीने के पानी को कुंओं से संग्रहित कर ले जाते थे। हमारे गांव में पानी के लिये किसी प्रकार की रोक टोक नहीं थी ।

बारह वर्ण, 22 टोले में बसा है मुजफ्फरपुर जिले का जारंग पश्चिमी पंचायत.. हरेक जाती के टोले में अलग-अलग कुआं

भुड़कुंवा –  यह गांव का सबसे पुराना कुंवा था। गांव के मध्य इस छोटे कुंवे को गांव वाले भुड़कुंवा कहते थे। इसकी घेराई बहुत कम थी। अनुमान से चार गुना चार फीट होगी। यह गोल नहीं चौकोर चार गुना चार फीट के क्षेत्र में अनुमानतः होगा। पर उपयोग की दृष्टि से सबसे अधिक चालू था। एक समय इसमें तीन तीन बाल्टियाँ तक जल निकालने में लगी रहती थीं। पीने , नहाने , जानवारों के चारा पानी में इसका प्रयोग होता था। पटवन में इसका कोई उपयोग नहीं था ।
यह परंपरागत कुंवा स्थानीय जमींदार के कारिंदा बनारस राय द्वारा बनवाया गया था। वहां एक छोटा सा मिट्टी और खपड़ा नरिया का निर्माण था जो उसके कर वसूली के दौरान निवास का काम आता था। मेरे सुदूर बचपन की यादों में वह दलान जिसे कचहरी भी कहा जाता था कभी कभी आता रहता है। इसके लकड़ी के दो पायों पर सुंदर नक्काशी की गई थी ।
जमींदारी खत्म होने पर गांव वालों ने इस कुटिल कारिंदे को खदेड़ दिया। पर कुंवा कई दशकों तक स्नान आदि के रूप में प्रयुक्त होता रहा। इसके जल से कभी सिंचाई होते हमने नहीं देखा है।

मरजी राय के इनार

ग्रामीण सहपाठी और मित्र जय कांत सिंह बताते हैं कि मर्जी राय का कुंवा उनके बाबा का बनवाया हुआ था। उनके पिता का नाम श्रीनाथ राय था और मर्जी राय उनके बाबा थे।  कोई 1930—40 के आसपास इस परंपरागत कुंवे का निर्माण किया गया था। आय के स्रोत खेती और बाहर की छोटी मोटी नौकरी के पैसे ही थे।  इस कुएं की विशेषता यह थी की इससे नहाने और पीने के पानी के सिवा दूसरा कोई काम नहीं होता था। इससे सिंचाई नहीं होती थी। यह कुआं दरवाजे पर होने के कारण अधिकांशत: खाली ही रहता था और नौजवानों की बैठकी और गप मारने के काम इसका चबूतरा, खासकर जाड़े के दिनों में, आता था। 1970 – 80 के दशक में जब क्रिकेट का रेडियो से जगजीत सिंह द्वारा का आंखों देखा हाल प्रसारित होता था तो हम सभी नौजवान यही इकट्ठे होकर उसे सुनते थे।
इसका जल मीठा था और कहा जाता है कि इससे दाल बहुत आसानी से गलती थी। उन दिनों दाल एक दुर्लभ उपज हुआ करती थी। किसके यहां आज दाल बन रहा है इसकी गवाही इस कुएं से जा रहे जल से हो जाती थी ।

ऊसर पर का इनार 
यह पास के खेत में ही था। इसके आस पास के खेत ऊसर थे। उन्हें हरा भरा करने और अन्न उत्पादन के लिये इसे खोदा गया था। ईट की दीवारें थीं इसकी। इसका उपयोग मुख्यतः पटाने के लिए किया जाता था। पीने के पानी के लिए इसका उपयोग कम ही होता था। इस पर दो ढेंकुल चलते थे। जिस कुएं में पर्याप्त जल होता था वहां दो ढेंकुल चलते थे।

पकवा इनार
पकवा इनार को चैनपुर के एक मारवाड़ी ब्यापारी ने बनाया था।  चैनपुर और रेलवे स्टेशन चैनवा के बीच कुल दूरी 10 किलोमीटर के लगभग है। पकवा इनार इसको जोड़ने वाले धूल भरे कच्चे मार्ग के ठीक बीच में पड़ता है।  यहां राहगीरों को प्यास बुझाने के लिए पके  ईंटो का एक कुआं उपरोक्त व्यापारी ने शुद्ध रूप से परमार्थ के उद्देश्य से बनवाया था। कच्ची सड़क से माल ढुलाई करते समय और राहगीरों को पानी की कमी महसूस होती थी।  मारवाड़ी का व्यापार चमक उठा था। 1930 के आसपास जब इसका  निर्माण किया गया तब सड़क कच्ची थी, यातायात का साधन जानवर या काठ के चक्के वाली बैलगाड़ी थी। उस व्यापारी ने राहगीरों के प्यास बुझाने के साथ गुड़ और भीगे चने की भी व्यवस्था की थी। इस हेतु पास के गांव के रक व्यक्ति को नियुक्त किया था। परंपरागत कुंवे के बड़े से चवना में पानी इकट्ठा रहता था ताकि पशु पक्षी भी पानी पी सकें।

मेरे गांव में एक ऐसा भी कुंवा है जिसके पानी का अब कोई उपयोग नहीं । पर पुरखों की स्मृति के रूप में उसके जगत, घेरे को पुनरुद्धार कर बचा रखा गया है।

(क्रमश: जारी…शेष अगली कड़ी में)

 

सुरवारि टोला से सैदपुर मठिया तक (झौवा पंचायत) के कुएं-तालाब का ऑडिट

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *