छप …छप . .. छप …..चूं चर मर ..क्यों विलुप्त हो रहे हैं गांव के परंपरागत कुएं

गांव के परंपरागत कुएं पर ढेंकुल चलाने का दृश्य आंखों के सामने आज भी चमक उठता है। बल के एक झटके  से युवक  बरहा  को खींचकर कूंड़ को कुंवे के जल में डुबोते थे। फिर एक झटके के साथ उसे ऊपर लाते थे और कुएं की जगत पर रखे पुआल के लादी पर कूंड़ को स्थिर कर एक झटके के साथ  पानी को उलीच देते थे। इस कार्य में दोनों ढेंकुल चलाने वालों में एक लय होता था। यह क्रम लगातार दो-तीन घंटे तक चलता था। इसके बाद एक दूसरी जोड़ी ओहार बदलने के लिए आती थी। चवना का पानी कच्ची नारियों से होते खेतों तक पहुंचता था। फसलों को लकड़ी के बने उपकरण जिसे हाथा कहा जाता था से छिड़ककर पटाया जाता था। प्रकृति में लय होता है। प्रकृति अपने लय को जीवो को दे देती है या जीव उस लय को अपने अंदर सहज ही समाहित कर लेते हैं। खेतों में पास पास हाथा चलाने वालों में भी एक ले स्थापित हो जाता था। पसारे जा रहे पानी में भी एक नियमित अंतराल पर आवृत्ति होती थी ।

छप …छप . .. छप …..चूं चर मर …. चूं चर मर 
चूं चर मर , चूं चर मर …

बीच कुंवे की पटरे पर खड़े दो युवक
ढेंकुल चला रहे हैं ।
रुच्छ पुआल पुरकर , कसकर बना मोटा बरहा 
उनके हाथों के दवाब से झुककर नीचे आता है।
थुंधी की कील पर बंधा छिप
या कहिये बांस , लट्ठा
कील से घर्षण कर सुरीला चीख निकालता है
चूं चर मर … चूं चर मर ….

कूंड़ कुंवे में डूब पानी भर लेता है ।
फिर दो युवकों के सांसो का साथ साथ संकुचन 
कूँड़ का पानी जगत के पुआल की लादी से टकरा
धूप में पिघलते धातु के सिक्कों की तरह चमकता बह जाता है चवना में 
छप छप …..
फिर नारियों में ,खेत की ओर 
जहाँ दो युवक हाथा चला रहे होते हैं
एक लय में 
छप … छप 

काम निकले , खेत पटें 
इसलिये जरूरी है दो अलग बरहे खींच रहे युवको की साँसे एक साथ उठें , गिरें
काम लम्बा हो , उबाऊ न हो 
इसलिए जरूरी है साँसों में लय हो ।
खेत की क्यारियों में हाथा चलाते दो युवक 
एक लय में पानी उलीचते हैं ..
छप … छप …
थकान विलम्बित हो इसलिये जरूरी है 
हाथा सांसों के लय के साथ चले 
मांस पेशियों के तनाव की आवृत्ति एक अंतराल पर हों ।
प्रकृति के सृजन का लय किसान जीते हैं ।

नभ में जलपाखी एक आकार, 
एक लय में उड़ते हैं।
यदि लय कभी टूटे भी तो अगले पल 
उसे प्राप्त कर लेते हैं।

पानी पटाने की यह लयदारी
ढेंकुल चलाने , पानी उलीचने का वह संगीत 
अब विस्मृत हो चला है ।
ढेंकुल , हाथा , छिप , लादी , कूँड़ 
चवना , ओहार , लोटा डोरी आदि 
अब प्रयोग में नहीं । 
विस्मृत हो चले हैं श्रम की साझेदारी 
वाले वे कृषिकर्म ।
क्या पता जल पाखियों को अब भी याद हो वह लय , वह संगीत !
कुँवे में उग आये बर , पीपल , गूलर के पौधे जो अब कुछ बड़े हो चले हैं , 
कह सकें कुछ कहानियां !
क्या पता ?

गांव के परंपरागत कुएं अब मर चुके हैं…

सभ्यता के विकास के प्रारंभिक दिनों में मानव द्वारा दो आविष्कारों ने उसके जीवन गति को बहुत उन्नत कर दिया । पहला है चक्के का आविष्कार और दूसरा है लीवर का आविष्कार । मानव सभ्यता  के लिए ये आविष्कार युगांतरकारी थे। ढेंकुल लिवर के सिद्धांत पर काम करनेवाली एक संरचना थी जिससे कुंवे से पानी निकाला जाता था ।
अधिक पानी वाले कुओं  में 2-2 में ढेंकुल चलते थे । हमारे पुराने घर के दरवाजे पर ऐसा ही एक कुंवा था । इससे 20 बीघे फसल का पटवन होता था।  उससे कम  पानी वाले कुंवे पर एक ढेंकुल चलता था। कुछ कुएं ऐसे भी थे जिसमें दो-तीन घंटे भर का पानी होता था। दो-तीन घंटे बाद ढेंकुल चलाना बंद कर दिया जाता था। दो-तीन घंटे में पानी रिस कर जमा होता था तो ढेंकुल फिर चलने लगता था। कुछ कुंओं से पानी निकालने के लिए जानवरों का प्रयोग किया जाता था। इस संरचना में कुंवे के मुड़ेर पर टेक में लकड़ी का घिरनी लगाया जाता था। कूड़ के स्थान पर जानवर के खाल का थैला होता था जिसे जमोट भी कहते थे ।

परंपरागत कुओं को बिसरा.. हर घर नल जल तक सरपट दौड़ता बोधा छपरा,गोराईंपुर और पकौलिया गांव का जल ऑडिट

गांव के परंपरागत कुएं , पटवन आदि से जुड़े शब्दों का विलुप्तीकरण

कृषि व्यवस्था के कुछ शब्द विलुप्त हो रहे हैं। शब्दों के विलुप्त होने का कारण वह सामाजिक कर्म, उससे जुड़े सभ्यता गत सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य का भी विलुप्त हो जाना है। शब्दों के विलुप्ति के साथ श्रम और पसीने से रचा जाने वाला पुरखों का अनुभव का भी समाप्त होना है। कुंओं और कृषि, पटवन, मौसम, मानव श्रम और पसीना आदि मिलकर जो सामाजिक संदर्भों का ताना-बाना बुनते थे उनका विलुप्त  हो जाना है। धीरे-धीरे उन शब्द और मुहावरे का समाज की स्मृतियों से उतर जाना है।

गांव के परंपरागत कुएं का मरना हमारी भाषा के शब्द संपदा कुछ अंशों का का मरना भी है । उस जीवन और कृषि कर्म से जुड़े कई शब्द अब प्रचलन में नहीं हैं । कई मुहावरों का अर्थ क्षरण हुआ है। अब की पीढ़ी शायद ही कूप जल , कुँवे का मेढक , लोटा डोरी आदि मुहावरों के सामाजिक संदर्भों पहचान पाये । कुएं की संस्कृति से जुड़े ढेर सारे शब्द जिन्हें हम अपने बचपन में सुना  करते थे अब प्रयोग में नहीं रहे। कुछ अब भी प्रयोग में हैं तो उनके सामाजिक संदर्भों को नई पीढ़ी देख नहीं रही, समझ भी नहीं रही । कुछ शब्दों को यहां लिख रहा हूँ ।
इनार – इसे कुंवा भी कहा जाता था।
चवना – कुंवे के चबूतरे का वह भाग जहां कुंवे से निकला पानी गिराया जाता था या जहां स्नान किया जाता था। चबूतरे के घेरे से यह 5- 6 ईंच नीचे होता था।
जगत – कुंवे का गोल घेरा या किनारा
लादी या पछड़न – पुआल , मिट्टी का लोंदा आदि का वजन जिसे छिप ( बाँस )  के एक छोर पर भार को स्थिर करने के लिये बाँधा जाता था ।
खम्भा या थुंधी – यह टेक का काम करता था और प्रायः जमीन से उर्ध्व बाँधा जाता था ।
कील – खम्भा के बीच में यह छिप ( बाँस ) के आधार का काम करता था ।
कूंड़ – गोल या अंडाकार पेंदी वाला बाल्टी नुमा पात्र ।
बरहा – पुआल को पुर कर बनाया गया मोटा रस्सा ।
पारी / ओहार – बारी बारी से ढेंकुल चलाने की व्यवस्था ।
जमोट – 1. यह आम तौर पर जामुन की मोटी लकड़ी से कुंवे के गोलाकृति के अनुरूप बनाया जाता था। खुदाई के बाद इसे ही सबसे नीचे बिठाया जाता था। फिर इसपर आगे ईंट का निर्माण ऊपर तक किया जाता था ।
2 . कूंड़ के स्थान पर पानी भरने के लिये चमड़े की थैली ।
ढेंकुल – छिप ( बाँस ) , बरहा , कूँड़ , थुंधी ,कील आदि को इकट्ठा कर बनाया गया संरचना।

क्यों विलुप्त हो रहे हैं गांव के परंपरागत कुएं
कुंओं के विलुप्त होने के कारनों में एक नए प्रकार का कूप, नलकूप, का प्रचलन बढ़ना तो है हमारी पीने के पानी की गुणवत्ता संबंधी मानकों में नए अध्ययनों का समावेश भी है। पारंपरिक कुंवे भूजल को ही उपयोग में लाते थे । उनका मुख खुला रहने के कारण आँधी बरसात में कई तरह के पत्ते , गंदगी, डंठल , पुआल आदि  उसमें गिर जाते थे और वही सड़ते रहते थे । फलत: कूप जल  मुहावरा गंदे पेयजल के लिए बन गया। कुंवे के जल की सफाई के लिए पारंपरिक तरीका होता था उसकी उड़ाही।  यह पूरा श्रम साध्य और खर्चीला होता था। कुएं के संपूर्ण पानी को उलीचकर बाहर फेंक देना एक अत्यंत कठीन काम था।  50- 60  दशक में सरकार ने एक व्यवस्था बनाई। कोई सरकारी कर्मचारी आकर नियमित अंतराल पर उनमें ब्लीचिंग पाउडर डाल जाता था। इससे बैक्टीरिया कीड़े मकोड़े आदि मर जाते थे जल् स्वच्छ हो जाता था और पानी पीने योग्य हो जाता था।  पर विद्यालय में बंटने वाले दूध के पाउडर की तरह इसमें भी कई यदि ….लेकिन वाले कारण आने लगे जो लगभग हर सरकारी योजनाओं में तब व्याप्त हो चुका था । सरकार ने ब्लीचिंग पाउडर के छिड़काव योजना को बंद भी कर दिया।
फिर नलकूप योजना आई। इस नये कूप में भी भूजल का शोषण होता था । इसमें लोहे के पाइप को धरती में छेद कर भूजल के तल तक डाल दिया जाता था। भूजल को ऊपर लाने के लिए इसके शीर्ष पर हाथ से चलने वाला प्रदूषक पंप लगा दिया गया था। खेतों में सिंचाई के लिए इस हैंडपंप के स्थान पर हॉर्स पावर से युक्त पेट्रोल या डीजल से चलने वाली मशीनें लगा दी गई । इस प्रकार बंद स्रोतों से प्राप्त भूजल शुद्ध तो होता था और इसमें परिश्रम भी कम लगता था। ढेंकुल से 10 कट्ठा जमीन पटाने में दिन भर लग जाते थे, वही पंपिंग सेट के आ जाने से इतना ही कार्य एक सवा घंटे में खेत को पूरी तरह लबालब भर के हो जाता है। हैंड पंप और पंपिंग सेट ढेंकुल की व्यवस्था से ज्यादा कुशल और आराम देह था।
कुएं की मौत का सबसे बड़ा यही कारण था।  आज  कुओं को  पाटकर बराबर कर दिया गया है , नहीं तो उनमें पीपल , बर , गूलर और घास पात के पौधे उग आये हैं । कुंओं के जल का अब कोई उपयोग नहीं है ।

(दूसरी व अंतिम किस्त)

गांव के सामाजिक ताने-बाने में रसूख का संकेत भी देते थे परंपरागत कुंवे

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *