गांधी के चंपारण सत्याग्रह का साक्षी रहा पूर्वी चंपारण के ऐतिहासिक तेतरिया गांव का जल आॅडिट

शैल

मुजफ्फरपुर से 45 किलोमीटर दूर पूर्वी चंपारण जिले यानी मोतिहारी में स्थित ऐतिहासिक तेतरिया गांव। बिहार के अन्य गांवो की तरह ही इस गांव में अलग-अलग जाती-वर्ण के लोग रहते हैं। 22 टोला का गांव तेतरिया,अलग-अलग टोलों की अलग-अलग आबादी। कुल मिलाकर तेतरिया पंचायत की आबादी 21,000 हजार है और लगभग 8000 मतदाता हैं। कोई बड़ा कोई छोटा टोला। अलग-अलग जाती में विभक्त हमारा गांव तेतरिया। कहीं पंडित जी की बहुतायत है तो किसी टोले में बनिया ज्यादा हैं। यादव भी हैं, चमार भी, पासवान,मुसहर भी और अन्य जातियां भी। वैसे तो गांव को कृषि प्रधान ही कहा जाएगा लेकिन बड़ा गांव होने के कारण बड़े छोटे दुकान भी है। हाट-बाजार भी है।                                                      …….ऐतिहासिक तेतरिया गांव
यदि हम ऐतिहासिक तेतरिया गांव के परंपरागत जल स्रोतों का आडिट करें या गांव के अलग टोले में स्थित परंपरागत कुएं,तालाब पेयजल के अन्य साधनों की चर्चा करें तो पहले से स्थिती काफी बदल गई है। आज कुएं तो गांव में दिखते हैं लेकिन इतिहास के निशानी के तौर पर। जबकी आज से लगभग कुछ दशक पहले तक कुएं ही पेयजल के स्रोत हुए करते थे। विभिन्न टोले में स्थित कुएं ही ग्रामीणों के पेयजल और पानी से जुड़ी अन्य जरूरतों की आर्पूती के प्रमुख साधन हुआ करते थे। जिस टोले में ये कुएं थे, उसी टोले के लोग उस कुएं से पानी भरते थे। पानी भरने को लेकर कोई जातीगत भेदभाव नहीं था। कोई भी कुएं से पानी भर सकता था। हां डोम जाति के थोड़ा वर्जित था। वह हर कुआं से पानी नहीं भर सकते थे पर ऐसा भी नहीं था कि एक गिलास पानी उन्हें दिया ना जाए। पानी के लिए इतना भेदभाव नहीं माना जाता था। उसे भी पानी का अधिकार था। भले लोग उसके बाल्टी या पात्र में पानी निकाल कर खुद डाल दिया करते ताकी बर्तन छुआ न जाए।
गांव के कुछ प्रसिद्ध और प्राचीन कुएं हैं भोगराज राय द्वारा खुदवाया गया कुंआ जो 1920 ईस्वी का है। साथ ही एक अन्य कुआं है जिसे निरसू ओझा द्वारा 1937 में खुदवाया गया था। मधु झा ने 1940 में एक कुआं खुदवाया।            …….ऐतिहासिक तेतरिया गांव

दुसाध टोला में हमारे ही घर के बगल में कुआं हुआ करता था जो पूरे गांव में प्रसिद्ध था। गांव के लोग अक्सर कहा करते कि जटही दाई के कुआं के पानी बड़ा साफ बाटे। यानी जटा वाली दाई के कुएं का पानी बहुत साफ है। उन्हें पूरा गांव ही जट ही दाई कहकर पुकारा करता था क्योंकि वह गांव की बुजुर्ग भी थी और उनके सर पर काफी बड़े और लंबे लंबे जटाएं हुआ करती थी। मुझे याद है कि जब हम जमशेदपुर में रहा करते थे और दादी गांव में तो हम गर्मियों की छुट्टी में दादी के पास तेतरिया जाया करते। मेरे पिता अकिन्द्र पासवान के साथ हम ​सभी भाई बहन तेतरिया आते। इसी क्रम में मेरी कुएं से जुड़ी हुई है। जट ही दाई का कुआं इतना सुंदर प्रतीत होता था कि मैं वहां घंटों वहां खेला करती थी। गांव के बच्चों के साथ जब कोई  महिला पानी भरने आती तो बोलती मुझे भी नहला दो। क्योंकि मैं पानी से भरी बाल्टी कुएं से नहीं खींच पाती थी। मेरी यह बात सुनकर वहां खड़ी महिलाएं मुस्कुरा देतीं और लोग मुझ पर ठंडा-ठंडा पानी डालते और मैं इतनी खुश होती कि जिसको याद कर आज भी रोमांचित हो उठती हूं और शायद शब्दों में उस खुशी का वर्णन आज संभव नहीं है। आज भी वह कुआं है लेकिन उड़ाही के अभाव में आज अब लगभग भर गया है। पानी भी सूख गया है। आज गांव के लगभग सारे कुए समाप्त हो चुके हैं, बंद हो चुके हैं, ढ़के जा चुके हैं। कुछ है भी तो उसका पानी अब पीने के लायक नहीं है।                                              …….ऐतिहासिक तेतरिया गांव
कुआं की स्थिति देखकर दुख भी होता है और यह सोचने पर मजबूर भी कि आखिर हम अपने पूर्वजों की धरोहरों को क्यों नहीं बचा पा रहे।
हम लोग के यहां एक स्टेट बोरिंग मशीन हुआ करती थी जो अभी हाल तक भी चालू था,यानी वर्ष 1990 से लेकर 2000 के बीच इस स्टेट बोरिंग को सिचाई कार्यों के लिए काफी इस्तेमाल में लाया गया। बाद में किसी कारणवश कोई दुर्घटना हो गई जिसके कारण यह बंद हो गया। आगे चलकर चापाकल का दौर आया जो अभी चल रहा है। लेकिन हर घर नल के जल योजना के तहत सरकार द्वारा पानी टंकी वर्ष 2020 गांव में लगा दिया गया है और पाईप वाटर को ही लोग पीने के पानी के रूप में इस्तेमाल करते हैं।

ऐतिहासिक गांव तेतरिया
तेतरिया एतिहासिक गांव है और तेतरिया के इतिहास से दो पात्र बखूबी जुड़े हुए हैं। राजा की कोठी, नील की खेती और महात्मा गांधी का आंदोलन। इसी पृष्टभूमि में तेतरिया गांव को समझा जा सकता है।
हमारे गांव में एक कोठी हुआ करती थी इसे 52 कोठी कहा जाता है, जो अतीत मियां द्वारा 1918 ई में बनवायी गई थी। कोठी अभी भी है पर जीर्ण शीर्ण अवस्था में।

पिता अकिन्द्र पासवान बताते हैं कि तेतरिया गांव शिवहर दरबार अधीन आता था। गांव के जो राजा यानी जमींदार थे वह जब भी आते तो कोठी में रहा करते,वहीं विश्राम किया करते थे। महल तो नहीं कहेंगे पर कोठी कह सकते हैं। राजा वहां के मंदिर के प्रांगण में बैठा करते थे जिसे उन्होंने बनवाया था। इस मंदिर में एक पुजारी रहा करते जिसके विषय में कहा जाता है कि वे हाथी पर चढ़कर नृत्य किया करते थे। कई लोग यह भी बताते हैं कि वह नंगा नृत्य किया करते थे। राजा उसे देखा करते थे और उस नृत्य से काफी खुश हुआ करते थे। कुछ लोग उनका नाम अतीत मियां बताते हैं। कोठी में मंदिर है, बगल में पोखर है। इसके अलावा हथिशाला भी था। उन्हें हाथी की सवारी काफी पसंद थी। जब राजा का राज्य समाप्त हुआ तो अंग्रेजों का राज्य आया तो वहां नील की खेती करवाया जाने लगा। कहते हैं कि कोठी के मालिक अतीत मियां के पास 700 बीघा जमीन था। वहां पर वह चीनी मिल के लिए गन्ने की खेती करवाया करते थे जो चकिया में था। अब बंद हो गया है। अब वह जमीन भी बिक चुकी हैं फिर उस कोठी का उपयोग अपने कार्यालय ऑफिस के रूप किया जाने लगा था। महात्मा गांधी के नेतृत्व में नील की खेती और अंग्रेजों के उत्पीड़न को समाप्त करने के जो सत्याग्रह हुआ था उसका असर यहां भी था। महात्मा गांधी ने सत्याग्रह करके किसानों का कर माफ कराया और उनका उत्पीड़न समाप्त कराया। यदि राजा के दरबार के किस्सों की बात करूं तो जैसा कि हमारे पिता बताते हैं कि हमारे परदादा दिरपाल हजरा राजा के दरबार में सिपाही हुआ करते थे। और उस समय अतीत मियां उस इलाके के एक मशहूर व्यक्ति हुआ करते थे जिनका काफी नाम था। वे दबंग टाईप के इंसान थे और लोग उनसे डरा करते। अतीत मियां ने खेती को संचालित करने के लिए रांची से मुसहर जाति के लोगों को लेकर गांव में आए थे जिसे उन्होंने बसाया था। ताकि वह मजदूर उनके खेतों में काम कर सके। सभी मजदूर गन्ने के खेत में काम किया करते थे।                                                  …….ऐतिहासिक तेतरिया गांव

 

यदि गांव के वर्तमान स्थिती की चर्चा करें तो शिक्षा के लिए गांव में मध्य विद्यालय व उच्च विद्यालय भी है जो पहले नहीं हुआ करती थी। इसके अलावा भी कई नए स्कूल बन गए हैं जो पहले नहीं हुआ करते थे। लेकिन गांव के युवाओं का रूझान पढ़ाई के प्रति नहीं है। शैक्षणिक माहौल का अभाव आज भी है। विशेष रूप से मध्यवर्ती और पिछड़ी व दलित जातियों में। आज भी लोग वहां पढ़ाई पर ध्यान नहीं देते हैं चाहे वह पासवान हों,यादव हों या कोई अन्य। रोजी रोजगार की स्थिती ये है कि जैसे ही गांव में लड़का 14 साल को होता है वह पलायन कर जाता है। वह कमाने के लिए गांव के बाहर चला जाता है। धान रोपने के समय और कटनी के समय पूरे गांव में 14 साल के ऊपर के पुरुष आपको दिखाई नहीं देंगे वे सभी मजदूरी करने के लिए अलग-अलग राज्यों में चले जाते हैं। आज भी गांव की पढ़ाई कर ले कर स्थिति मजबूत नजर नहीं आती।                                                                                                                    …….ऐतिहासिक तेतरिया गांव

 

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