गुरनाम चढूनी और राकेश टिकैत के सियासी खेल के भेंट न चढ़ जाये किसानों का शांतिपूर्ण आंदोलन

संतोष कुमार सिंह


दिल्लीः तीन कृषि कानूनों के वापसी के लिए आंदोलनरत वैसे तो कई किसान संगठन हैं। कई नेता हैं लेकिन दो ऐसे किसान नेता हैं जिनकी वजह से किसान आंदोलन फूट के कगार पर खड़ा है। दोनों की अपनी.अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षांए हैं जिसके कारण गैर राजनीतिक कहा जाने वाला किसान संगठन राजनीतिक दलों का मोहरा साबित हो रहा है और बाकी के किसान संगठन भी इनकी महत्वाकांक्षाओं को लेकर असहज महसूस करने लगे हैं। ये दो किसान नेता है हरियाणा में प्रभाव रखने वाले गुरनाम सिंह चढूणी और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में प्रभाव रखने वाले किसान नेता राकेश टिकैत। इनके बोल बच्चन किसानों के बीच भड़काउ भाषण देने के कारण शांतीपूर्ण कहा जाने वाला किसान आंदोलन आक्रामक नजर आता है और इनकी गतिविधियों का खामियाजा बाकी के किसान नेताओं को भुगतना पड़ रहा है।
सबसे पहले बात करते हैं गुरनाम चढूनी की। गुरनाम चढूनी और विवाद का चोली दामन का साथ रहा है। न उनकी बातों में स्थिरता है, न उनकी मांग में और न किसानों के प्रति भरोसे मे। शांतीपूर्ण किसान आंदोलन का दावा कर रहे किसान संगठनों के दावे से इतर भारतीय किसान यूनियन के हरियाणा अध्यक्ष गुरनाम सिंह चढूनी की गतिविधियां शुरू से ही संदेहास्पद रही हैं। गुरनाम चढूनी दो बातों के प्रति दृढ हैं एक तो उन्हें किसी भी कीमत पर हरियाणा के मनोहर लाल सरकार को बदनाम करना है और दूसरा कांग्रेस एवं आम आदमी पार्टी से नजदीकि का फायदा उठाते हुए हिंसक प्रदर्शन करते हुए अपना राजनीतिक कद बढ़ाना हैं। इसके लिए वो किसी भी हद तक जा सकते हैं।


चढूनी पर लगे आरोपों की बानगी
सबसे पहले किसान नेताओं की तरफ से ही यह आरोप लगा कि चढूनी ने हरियाणा की भाजपा, जजपा सरकार को गिराने के लिए उन्होंने एक डील किया है। इस डील के तहत चढूनी को न सिर्फ कांग्रेसी नेता से 10 करोड़ रुपए मिले हैं बल्कि उन्हें कांग्रेस का टिकट भी आफर हुआ है। यह आरोप कोई और नहीं किसान संगठनों के संयुक्त मोर्चा की बैठक में शिवकुमार कक्का ने लगाया। इतना ही नहीं चढ़ूनी पर यह भी आरोप लगा कि उन्होंने किसान आंदोलन को राजनीति का अड्डा बना दिया है और वे लगातार कांग्रेसी और आम आदमी पार्टी के नेताओं से संपर्क में है।
ऐसे में संयुक्त किसान मोर्चे ने आंदोलन की साख बचाने के लिए गुरनाम सिंह चढूनी को आंदोलन का संचालन करने वाली 7 सदस्यीय समिती से निलंबित किये जाने के साथ यह निर्णय भी लिया है कि उन्हें 19 जनवरी को को केंद्र सरकार से होने वाली बैठक से भी बाहर रखा जाएगा। हालांकि चढूनी के खिलाफ आरोपों की जांच के लिए 4 सदस्य समिति बनाई गई लेकिन किसान आंदोलन में फूट न पड़े इस कारण उन्हें फिर समिती में वापस ले लिया गया।
चढ़ूनी पर हिंसा भड़काने के हैं आरोप
इतना ही नहीं आंदोलन के दौरान इन पर हिंसा भड़काने के आरोप भी लगे हैं और इन पर हत्या के प्रयास समेत 8 धाराओं में केस दर्ज हो गया है। दायर एफआईआर में जनसमूह के साथ उपद्रव मचाने और वाहन चढ़ाकर हत्या करने की कोशिश करने व संक्रमण का खतरा फैलाने की धाराएं भी लगाई हैं। इतना ही नहीं चढूनी ने मुख्यमंत्री मनोहर लाल के करनाल में आयोजित किसान सम्मेलन में बड़े पैमाने पर तोड़फोड़ कराई थी। मंच तोड़ दिए गये थेए मुख्यमंत्री के लिए बनाये गये हेलीपैड खोद दिया गया था। जब मुख्यमंत्री ने हिंसा के लिए चढूनी पर हिंसा और उपद्रव के आरोप लगाए तो चढूनी ने खुद आगे आकर ये स्वीकार किया कि हमने करनाल में मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में उपद्रव कराया है और आगे भी करेंगे। भाषायी स्तर पर भी गुरनाम चढूनी के बोल बिगड़े हुए रहते हैं जब वे कहते हैं कि खट्टर के मरोड़ निकाल देंगे।


टिकैत पर चढूनी का गंभीर आरोप
इन दिनो गुरनाम चढूनी का सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें वे भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत पर किसान आंदोलन को सरकार के हांथो बेचने का आरोप लगा रहे हैं। वे राकेश टिकैत पर यह भी आरोप लगा रहे है वे बीजेपी के गोदी में बैठे हैं। भारतीय किसान यूनियन का हरियाणा प्रधान भाजपा के गोदी में बैठा हुआ है। वे यहीं नहीं रूकते। चढ़ूनी आरोप लगाते हैं कि ​राकेश टिकैत ने उनके खिलाफ हरियाणा के करनाल कोर्ट में और कुठाना थाने में मुकद्दमा दर्ज कराया है। चढ़ूनी कहते हैं कि सरकार मुकद्मा दर्ज करती है तो अलग बात है लेकिन टिकैत ने मुकद्दमा दर्ज कराया ये ठीक नहीं है।
लालकिला के दोषियों से सहानुभूती
एक तरफ गुरनाम 26 जनवरी को लाल किला में किये गये उत्पात के दोषियों के गिरफ्तारी की मांग करते हैंएवहीं दूसरी ओर यह भी कहते हैं कि वे सभी लोग सरकार के ही थे। ऐसा किसानों के आंदोलन को बदनाम करने की नीयत से किया गया और यह सुनियोजित था। इसके प्रमाण उस रोज के दिल्ली के खुले द्वार हैं। उन्होंने कहा कि किसानों ने ट्रैक्टर परेड पूरी तरह शांतिपूर्ण तरीके से निकाली थी। चढूनी ने यह भी कहा कि सरकार के इशारे पर पिछले एक सप्ताह से किसानों को डराने का काम किया जा रहा है। कभी पुलिस तो कभी दूसरी एजेंसी परेशान कर रही हैं। सरकारी गुंडों ने गाजीपुर और कुुंडली बार्डर पर पांच बार किसानों को निशाना बनाया है। यही नहीं किसानों की बिजली व पानी की रसद तक बंद की जा रही है।
राकेश टिकैत की बढ़ती साख से परेशान चढूनी
लालकिला की घटना के बाद गाजीपुर बोर्डर न छोड़ने का फैसला लेने वाले राकेश टिकैत की बढ़ती लोकप्रियता से गुरनाम इन दिनों परेशान हैं। उन्हे अपने पिछड़ जाने का भय सता रहा है। कुछ इसी तरह का नजारा आज चक्का जाम वाले दिन दिखा। एक तरफ जहां अन्य किसान संगठन चक्का जाम को सफल बनाने में जुटे हुए थे वहीं हरियाणा के पानीपत हाईवे पर मैच किसान नेताओं गुरनाम सिंह चढ़ूनी और राकेश टिकैत के समर्थक क्रिकेट मैच खेलते देखे गये। दोनों एक दूसरे के प्रतिद्वंदी के तौर पर मैदान में उतरे। दोनों में 10ण्10 ओवर के मैच खेले गए। इनके अलावा कुछ और वालंटियर्स भी शामिल थे। टॉस के बाद पहले चढ़ूनी ग्रुप ने बैटिंग की। 10 ओवर में टीम ने 56 रन बनाए और फिर टीण्ब्रेक के बाद करीब पौने 2 बजे टिकैत ग्रुप की पारी शुरू हुई। इस टीम ने 8 ओवर 4 बॉल पर 57 रन बनाकर मैच जीत लिया।
चढूनी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा जगजाहिर
गुरनाम सिंह चढूनी की राजनीतिक महत्वाकांक्षायें हैं यह किसी से छिपा नहीं है। चढूनी सियासत में भी हाथ आज़मा चुके हैं। वे पिछले साल बतौर निर्दलीय प्रत्याशी हरियाणा विधान सभा का चुनाव लड़ चुके हैं। 2019 के लोकसभा चुनावों में उनकी पत्नी बलविंदर कौर भी आम आदमी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ चुकी हैं।

किसान नेता राकेश टिकैत
ग्रामीण पृष्ठभूमि में जन्म गुरनाम सिंह चढूनी का परिवार राजनीति में शुरू से ही सक्रिय रहा है। इनके पिता गांव चढूनी के सरपंच रह चुके है। गुरनाम सिंह चढूनी का छोटा भाई कर्म सिंह वर्तमान में गांव चढूनी का सरपंच है। इनका बड़ा भाई गुरदीप सिंह सिंह भी राजनीति में सक्रिय है।
यदि बात राकेश टिकैत की करें तो उनकी भी सियासी महत्वकांक्षाएं रही है। किसान आंदोलन की धुरी बन चुके राकेश टिकैत किसानों के उस कोर ग्रुप में शामिल हैं जो कृषि‍ संशोधन बिल पर लगातार सरकार से बात कर रहा है।
गणतंत्र दिवस के मौके पर लाल किले पर उपद्रवि‍यों की हरकत से केंद्र सरकार के कृषि‍ बिल के विरोध में चल रहे किसान आंदोलन की तपिश कुछ हल्की हुई थी लेकिन भारतीय किसान यूनियन भाकियू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत के आंसुओं ने 28 जनवरी की रात अचानक माहौल बदल दियाण् गाजीपुर बॉर्डर पर मीडिया से बातचीत करते हुए अचानक राकेश टिकैत रोने लगे। रोते हुए उन्होंने कहा कि सरकार किसानों को बरबाद करना चाहती है। बार-बार राकेश टिकैत यह कहते रहे कि किसानों के साथ धोखा हुआ है। टिकैत ने रोते हुए ही घोषणा की कि अगर कृषि कानून वापस नहीं हुए तो वह आत्महत्या कर लेंगे। उनकी यह भावुक अपील किसानों के बीच बिजली की तरह कौंध गई। इससे न केवल किसानों को एकजुट कर दिया बल्कि‍ टिकैत के विरोधी भी उनके समर्थन में आ गए।


पिता के साये में सीखा दावपेंच
राकेश टिकैत का जन्म मुजफ्फरनगर के सिसौली गांव में 4 जून 1969 को हुआ था। इनके पिता महेंद्र सिंह टिकैत बड़े किसान नेता थे जिन्होंने वर्ष 1987 में भारतीय किसान यूनियन की नींव डाली थी। साल 2007 में पहली बार राकेश टिकैत ने मुज़फ़्फ़रनगर की बुढ़ाना विधानसभा सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ा जिसे वो हार गये थे। उसके बाद टिकैत ने 2014 में अमरोहा लोकसभा क्षेत्र से राष्ट्रीय लोक दल के टिकट पर चुनाव लड़ाए पर वहां भी उनकी बुरी हार हुई। वर्ष 2018 में टिकैत हरिद्वार से दिल्ली तक किसान क्रांति यात्रा के नेता थे। ज़िला मुजफ़्फ़रनगर के लोग चौधरी चरण सिंह के वारिस चौधरी अजित सिंह के 2019 लोकसभा चुनाव में भाजपा नेता संजीव बालियान से हारने की एक वजह राकेश टिकैत को भी मानते हैं बताया जाता है कि राकेश टिकैत ने अजित सिंह के ख़िलाफ़ संजीव बालियान का समर्थन किया था राकेश टिकैत को यह पता है कि उनकी दो ताक़त हैं एक है किसानों का कॉडर और दूसरा है खाप नामक सामाजिक संगठन जिसमें टिकैत परिवार की काफ़ी इज़्ज़त है। अब इसी इसी के सहारे वे किसान आंदोलन को धार देने में जुटे हैं। वे एक तरफ सरकार से बातचीत करने की बात कह रहे हैं वहीं दूसरी ओर लगातार किसान महापंचायत कर अपना रसूख बढ़ा रहे हैं। राकेश ने टिकैत ने कहा है कि तीनों केंद्रीय कृषि कानूनों के रद होने तक हम कहीं नहीं जाने वाले। हम आगामी अक्टूबर तक डटे रहेंगे
गौरतलब है कि पिछले दिनों राकेश टिकैत ने आंदोलन लंबा चलाने का एक फॉर्मूला दिया था जिससे इसे लंबा खींचा जा सके। किसान नेता राकेश टिकैत ने प्रदर्शनकारी किसानों से कहा था कि प्रत्येक गांव से एक ट्रैक्टर 15 आदमी और 10 दिन के फॉर्मूले पर काम करो फिर आंदोलन चाहे 70 साल चलेए कोई दिक्कत नहीं है।
उल्लेखनीय है कि राकेश टिकैत को लेकर दूसरे संगठन खुश नहीं हैं। वे अब खुद को किसान आंदोलन का प्रमुख चेहरा समझने लगे हैं। आने वाले दिनों में उनका यह रवैया दूसरे संगठनों से उन्हें दूर ले जा सकता है। उनपर ये आरोप लग रहा है कि उन्होंने अपनी मर्जी से उत्तर प्रदेशए दिल्ली और उत्तराखंड को चक्का जाम से बाहर रखने का फैसला लिया।
साफ है किसान नेताओं के ऐसे बर्ताव से किसान आंदोलन के साख पर असर पड़ता है और सरकार के साथ तीन कृषि कानूनों के सवाल पर सहमती बनाने में बाधा आती है।

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