संतोष कुमार सिंह
नयी दिल्ली: लोकनायक जयप्रकाश नारायण जयंती 11 अक्टूबर को बीत गयी। मतलब हुआ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किए गये सांसद आदर्श ग्राम योजना के दो साल पूरे हो गए। ऐसे में ठहरकर यह विचार किया जाना चाहिए कि इस दो साल में कितने गांव आदर्श हो पाए। या इनके आदर्श होने की राह में चुनौतियां क्या हैं? विपक्ष कहीं संसद में मोदी सरकार का विरोध करने के साथ इस योजना के क्रियान्यवयन में भी तो तेरी योजना,मेरी योजना नहीं कर रहा है। कई पहलुओं से रूबरू होना है। कई नामचीनों के चेहरे पर से ग्राम विकास के नकाब उतरेंगे। तो आईये पहले बात करते हैं योजना की।
कछुआ चाल से चल रही है योजना
आदर्श ग्राम योजना के दो साल पूरे होने के बावजूद कई सांसद ऐसे हैं जिन्होने अभी तक दूसरा गांव की बात कौन करे, पहला गांव ही गोद नहीं लिया है। जबकि दोनों सदनों के कुछ सांसद ऐसे भी हैं जिन्होने अपना दूसरा गांव चुनकर वहां काम शुरू कर दिया है। ग्रामीण विकास मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि योजना के पहले चरण में राज्यसभा और लोकसभा के कुल 796 सांसदों में से 702 सांसदों ने अपने इलाकों में आदर्श ग्राम चुन लिए थे। इनमें लोकसभा के 543 में से 499 सांसदों ने और राज्य सभा के कुल 253 सांसदों में 203 सांसदों ने गांव गोद लिए और काम शुरू कर दिया। दूसरे चरण की शुरुआत होने के बाद अब तक सांसद 132 गांवों को गोद ले चुके हैं। ग्रामीण विकास मंत्रालय के आंकड़ों की मानें तो कुल 702 गोद लिए गए गांवों में से 645 ने अपने क्षेत्र में लागू हुई ग्रामीण विकास योजनाओं को अपलोड किया। इनमें से 541 यानि 77 फीसदी गांवों ने अपनी पंचायत का हाल अपडेट किया है। दूसरे चरण की शुरुआत होने के बाद अब तक सांसद 132 गांवों को गोद ले चुके हैं। ग्रामीण विकास मंत्रालय के आंकड़ों की मानें तो कुल 702 गोद लिए गए गांवों में से 645 ने अपने क्षेत्र में लागू हुई ग्रामीण विकास योजनाओं को अपलोड किया। इनमें से 541 यानि 77 फीसदी गांवों ने अपनी पंचायत का हाल अपडेट किया है।
पहला गांव नहीं चुनने वाले सांसद
वैसे तो भाजपा के अधिकांश सांसदो ने गांव गोद लिये हैं लेकिन एक नाम ऐसा भी है जिसने अभी तक पहला गांव भी गोद नहीं लिया है। वो हैं चांदनी चौक के सांसद डॉ हर्षवद्र्धन। बाकी दलों की बात करें तो दोनों सदनों को मिलाकर 95 सांसद एसे हैं जिन्होने अभी तक अपना पहला गांव ही नहीं चुना है। 44 सांसद लोकसभा के हैं और 51 राज्यसभा के। इस योजना में विरोध का स्तर ये है कि गांव गोद नहीं लेने वाले सांसदो में ज्यादातर सांसद विपक्षी दलों के हैं. इनमें प्रमुख नाम है वरिष्ठ कांग्रेसी नेता जयराम रमेश, दिग्विजय सिंह, कर्ण सिंह, आनंद शर्मा, सत्यव्रत चतुर्वेदी, बीके हरिप्रसाद और अधीर रंजन चौधरी, वाम दलों के सीताराम येचुरी, डी राजा, तपन कुमार सेन और मोहम्मद सलीम, समाजवादी पार्टी के महासचिव रामगोपाल यादव और जनता दल यूनाइटेड के महासचिव केसी त्यागी. एआईएमआईएम के सांसद असदुदीन ओवैसी शामिल हैं
दूसरे चरण में भी रफतार धीमी
दूसरे चरण की शुरुआत होने के बाद अब तक सांसद 132 गांवों को गोद ले चुके हैं। अब तक 82 सांसदों ने अपने पहले गांव का काम पूरा कराकर दूसरे गांव को गोद ले लिया है. इनमें लोकसभा के 66 और राज्यसभा के 16 सांसद शामिल हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी के जयापुर गांव को पहले चरण में गोद लिया था. अब उन्होंने दूसरे चरण के लिए अपने संसदीय क्षेत्र में नागेपुर गांव को गोद लिया है.
क्या था योजना का उद्देश्य
प्रधानमंत्री आदर्श ग्राम योजना के तहत गांव गोद लेने के कार्यक्रम के पीछे इरादा यही था कि हर गांव आदर्श गांव बने। लेकिन इन आंकडों को देखें तो शुरूआत खासी धीमी ही रही है। सांसद आदर्श ग्राम योजना का मकसद गांवों के मूलभूत ढांचे में सुधार लाना और उनमें ऐसे मूल्यों को स्थापित करना है जिससे वे आदर्श गांव बन जाएं. इस योजना के तहत लोकसभा के सांसदों को अपने निर्वाचन क्षेत्र में एक गांव की पहचान करके 2016 तक उसे आदर्श ग्राम के तौर पर विकसित करना था. राज्यसभा के सांसदों को, जिस राज्य से वे आते हैं, वहां का कोई गांव गोद लेकर उसे आदर्श ग्राम बनाना था. इसके बाद 2019 तक कम से कम दो और गांवों का विकास इसी तर्ज पर हर सांसद को करना है. इसका मतलब यह हुआ कि वर्तमान मोदी सरकार के कार्यकाल में हर लोकसभा और राज्यसभा सांसद को कम से कम तीन गांवों को आदर्श ग्राम बनाना है. हालाँकि ग्रामीण विकास मंत्रालय को उम्मीद है कि सांसदों के साथ-साथ लोगों में भी जागरुकता आने लगी है इसलिए 2019 आते आते हालात और सुधरेंगे।
क्यों रूची नहीं ले रहे हैं सांसद
ऐसा नहीं है कि सांसद आदर्श ग्राम योजना के तहत गांव गोद न लेने के पीछे केवल राजनीतिक विरोध है। इसके पीछे आर्थिक पहलू भी है। यही कारण है कि विपक्ष्र के विरोध की बात तो छोड़ दें भाजपा में कई सांसद ऐसे हैं जो इस योजना से जुड़ना तो नहीं चाहते लेकिन मजबूरी में जुड़े हुए हैं। इस योजना में सांसदो के लिए आदर्श गांव में विकास कार्य कराने के लिए अलग से कोई फंड नहीं दिया गया है। उन्हें एमपीलैड फंड से गांव का विकास करना हैं। ऐसे में ज्यादातर सांसदो को लगता है कि यदि वे एक गांव के विकास में ही पूरा फंड उपयोग कर देंगे तो बाकी के गांवों की नाराजगी चुनाव में उठानी पड़ सकती है।



