लीची किसानों पर छाया संकट टला, व्यापारी उतरे…देश-विदेश में हो रहा निर्यात

अमरनाथ झा
पटना: शुरुआती कठिनाई के बाद बिहार के लीची किसानों के चेहरे की रौनक लौट आई है क्योंकि दूसरे राज्यों के बाहरी व्यापारी लीची बगानों में उतर गए हैं। पहले कोरोना जनित बंदी की वजह से व्यापारी नहीं आ रहे थे, इसलिए लीची की फसल के बगानों में ही रह जाने का खतरा उत्पन्न हो गया था। पर अब न केवल बड़ी संख्या में व्यापारी आए हैं, लीची की खरीद और उसे बड़े शहरों में भेजने में गति आ गई है।…..लीची किसानों
बिहार का मुजफ्फरपुर जिला लीची की पैदावार का केन्द्र है। यहां की लीची देश के विभिन्न राज्यों के साथ-साथ विदेश भी जाती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पिछले 30 मई को मन की बात में सन 2018 में यहां की लीची के इंगलैंड जाने का उल्लेख किया था। इस बार तमाम कठिनाइयों से उबरने के बाद चार किसान करीब एक हजार किलोग्राम शाहीलीची लंदन भेजने में सफल रहे। उन किसानों को बिहार सरकार ने सम्मानित किया है। कृषिमंत्री अमरेन्द्र प्रताप सिंह ने कहा कि वे किसान आसपास के क्षेत्र में प्रेरणा-स्रोत के रूप में काम करेंगे। वे मुजफ्फरपुर जिला के पुनास चतुरी गांव के लालबाबू शर्मा व प्रिंस कुमार, चैनपुर दामोदर पुर के कुंदन कुमार, तथा मुरौल, बसुली के छोटेलाल साह हैं। लेकिन अब लंदन ही नहीं, दुनिया के दूसरे भागों में भी लीची भेजे जाने की संभावना खोजी जा रही है। दरभंगा एयरपोर्ट से कार्गों की सेवा शुरु होने पर इसका सपना सकार हो सकेगा। लीची के अलावा मखाना के व्यापारी भी इस सेवा की ओर नजर लगाए हुए हैं।                                                                                                                                           …. लीची किसानों

पूरे बिहार में करीब 32 हजार हेक्टेयर में लीची की खेती होती है। इसमें 40 प्रतिशत हिस्सा केवल मुजफ्फरपुर का है। यहां की शाही लीची का स्वाद लाजवाब है। मुजफ्फरपुर में सालाना करीब चार सौ करोड़ रुपए का लीची का कारोबार होता है। 2018 में बाद हालांकि लीची की पैदावार पर एक संकट आ गया। अगले साल लीची बगानों में कोई बीमारी फैली और बड़े-बड़े बगान अचानक सूख गए। बाढ़ का भी असर था। लीची के पेड पानी के प्रति अति संवेदनशील होते हैं। अगर सात दिन से अधिक पानी लगा रह गया तो पेड़ सूख जाते हैं। पिछले साल बाढ़ का पानी महीनों ठहर गया था। बाद में लीची अनुसंधान केंद्र, मुशहरी के वैज्ञानिकों के परिश्रम से कुछ बगानों को बचाया जा सका। पर बगानों के सूखने और बाढ़ के असर से उबरने का अवसर आया तो पिछले साल 2020 में कोरोना जनित देशबंदी का कहर आ गया। इसके अलावा लीची के फल भी बहुत छोटे आकार के आए। इस वर्ष फल तो बड़े आकार के आए लेकिन उनकी बिक्री में कोरोना जनित मंदी आ गई। कई लोगों ने अपने इंतजाम से दूसरे शहरों में लीची भेजना शुरु किया। शुरुआती मंदी के बाद अब स्थिति थोड़ी सुधरी है। बाहर के व्यापारी आ गए हैं। और लीची के 40-50 ट्रक रोजाना विभिन्न शहरों के लिए रवाना हो रहे हैं।               …. लीची किसानों

मीनापुर प्रखंड के सहजपुर कोठी गांव के मनोज कुमार ने पिछले सप्ताह अपने बगान से लीची तोड़वाकर पैकिंग की और 130 पेटी शाही लीची लखनऊ भेजी। उनके गांव के चार-पांच किसानों की लीची लादकर ट्रक शाम में लखनऊ के लिए रवाना हुआ। मौसम ठीक रहने से लीची सबेरे सबेरे लखनऊ पहुंच जाएगा और मंडी में उसकी अच्छी कीमत मिल जाएगी। मनोज कुमार ने बताया कि इसबार पेड़ों में फल कम आए हैं, लेकिन फल का आकार बड़ा है। इसलिए कीमत अच्छी मिलेगी। इस गांव में करीब 120 एकड़ में लीची के बगान हैं। इस गांव से औसतन 40-45 पिकअप वान लीची प्रतिदिन व्यापारी ले जा रहे हैं। यह सिलसिला सप्ताह-दस दिन चलेगा। पिकअप से मुख्य सड़क पर पहुंचने पर लीची को बड़ी ट्रकों पर लादा जाता है।                                                                   …. लीची किसानों
बगान में व्यापारी 45-50 रुपए लीची खरीद रहे हैं। पिछले साल फल छोटा होने से 30-35 रुपए किलो बेचनी पड़ी थी। लेकिन इसबार पैदावार कम हुई है। यह स्थिति पूरे जिले की है। मीनापुर के अलावा रेवा रोड, बोचहां रोड, गोरौल रोड, मोतीपुर रोड आदि में ट्रकों में लीची लादे जा रहे हैं। गोरौल के समीप मांगनपुर के चंद्रभूषण शर्मा कहते हैं कि इसबार तो एख समय ऐसा लगने लगा था कि समूची फसल बगान में ही रह जाएगी। और अगर लीची तोड़ी नहीं गई तो अगले साल भी फल नहीं आएगा। लेकिन अब स्थिति संभल गई है।
फिरभी लीची के जूस बनाने वाले व्यापारी इसबार निराश हैं क्योंकि पिछले साल उनका आधा से अधिक जूस नहीं बिका। इसलिए इस साल नई फसल खरीदने के लिए पूंजी की किल्लत है। नई पेराई नहीं होने से पुराने जूस को बेचना भी कठिन हो जाएगा। ताजा जूस रहने पर उसमें मिलाकर पुराने के भी बेचना आसान होगा। जूस बनाने वाले गुच्छे से टूटकर अलग हुए लीची को 20 रुपए किलो खरीदते हैं। लेकिन इसबार उनकी तरफ से खरीद नहीं होने से इसतरह की लीची के बगान में ही सड़ जाने की आशंका है। मेथनापुर गांव में जूस बनाने की फैक्टरी लगा चुके सुनील साह बताते हैं कि बाहर के व्यापारी पहले एक किसान का लीची खरीदते हैं, फिर उसी किसान के माध्यम से दूसरे किसानों की फसल खरीदने के लिए सौदा करने लगते हैं। जूस का व्यापार संकट में जरूर है, लेकिन अगर लॉकडाउन जल्दी समाप्त हो गया तो जैसे तैसे यह कारोबार बच जाएगा। फैक्टरी को चलाने के लिए कम मात्रा में ही सही, हमने लीची खरीद ली है। वह अभी बगानों में ही है, फैक्टरी चालू होने पर तोड़ी जाएगी।                                                                                                 …. लीची किसानों

लखनऊ, कलकत्ता, दिल्ली,बनारस,कानपुर से आमतौर पर लीची लखनऊ, कलकत्ता, दिल्ली,बनारस,कानपुर आदि भेजा जाता है। इसबार लीची व्यापारियों ने दरभंगा एयरपोर्ट से लगेज में लादकर करीब एक क्वींटल लीची मुंबई भी भेजा है। इस एयरपोर्ट से अभी कार्गो सेवा शुरु नहीं हुई है। इसलिए लीची के पैकटों को यात्रियों के सामान की तरह लगेज वान में लादा गया।                                                       …. लीची किसानों
इसी तरह बि​हार के अलग—अलग​ जिलों से लखनऊ, कलकत्ता, दिल्ली,बनारस,कानपुर मालदह और जर्दालु आम भी देश के दूसरे राज्यों में भेजे जा रहे हैं जिससे प्रदेश के किसानों को लाभ होगा।

 

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