हम गांव के गंवार हैं साहिब

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डॉक्टर सिद्धार्थ सोनकर

गांव मतलब एक शहरी के लिए भौगोलिक रूप से पिछड़ा इलाका और मेरे जैसे लोगों के लिए गांव मतलब.क्या? आज तक गांव का मतलब नहीं निकाल पाया। इसलिए कहते रहे हैं कि “ गांव के गंवार है साहिब”। आज तक उसका ना कोई अर्थ समझ में आया है, ना कोई परिभाषा। बस समझ आया तो इतना कि मैंने मेट्रो में दशक तो गुजार दी पर मिला क्या? थोड़ी चमचमाती सड़कें, 10 घण्टे बिजली ज्यादा, साफ सुथरी गालियां, कन्वेंट स्कूल, बड़ा अस्पताल, थोड़ी आधुनिक जीवन शैली। कभी कभी सोचता हूँ कि क्या मेरी जरूरत वाकई यही थी। क्या मैं इनके बिना रह ना पाउंगा?.

गांव में जितना रहा, जिंदगी ना अभावों में कटी ना जरूरत को पूरी करने में, जैसी भी कटी मजे में कटी। “जो प्राप्त था वो पर्याप्त था” जिसको मेरे जैसे करोड़ों गांव के गंवारों ने जिया होगा। चाहे वो खेत में लाली खेला हो या गुल्ली-डंडा या फिर नदी की बहती धाराओं के विपरीत तैरकर पार करने की जिद। पतंगों की डोर जरूर हाथ में थी, पर कटी पतंग की तरह उड़ा करते थे। ना डाक्टर बनना था ना इंजीनियर, बस जब जो दिल किया वो बन गए या बना दिए गए। कभी सैनिक बन कर गांव में बारिश में डूबते छप्पर से जरूरी समान को बचाया तो कभी नदी की बाढ़ में डूबते को बचाकर जीवनदान दिया, कभी सेवक बनकर गांव में झोपडियाँ उठवाई “जोर लगाके हैया”, तो कभी गाँव में शादी हो या श्राद्ध वेटर बनकर जूठे पत्तल उठाए या पानी पिलाया, कभी चारवाहा बनकर पशुओं को चराया, नहलाया तो कभी पीटकर दूध भी दुहा, कभी खेत में खेतिहर किसान की तरह खेती की, खेत का कोना कोड़ना हो या चांदनी रात में पानी बराना या फिर सुबह उठकर सब्जी तुड़वाना, फिर सब्जी मण्डी पहुंचवाना, कभी कोई कठिन काम नहीं लगा। सब जिम्मेदारीपूर्ण ढंग से होता रहा क्योंकि कभी कुछ प्लान करने की जरूरत ही नहीं पड़ी। सब होता गया हम करते गए जिसमें आसीम आनन्द मिला करता था।

मेरे जैसे गंवार अपने अपने जिले के ठेठ देहात से निकले बच्चे थे। हमारा स्कूली जीवन कभी अभाव में नहीं कटा क्योंकि हमारे पास जरूरतें नहीं थीं या औकात नहीं थी, कभी पता ही नहीं चला।। पांचवी तक घर से तख्ती लेकर स्कूल गए थे। स्लेट को जीभ से चाटकर अक्षर मिटाने की हमारी स्थाई आदत थी और कक्षा के तनाव में चूने से बनी बत्ती खाकर हमने तनाव मिटाया था। तख्ती ही हमारा कपार फोड़ने का ब्रह्मास्त्र था तो खेत में खेलने के लिए बैट जो कभी-कभी बेत भी बन जाती थी। जिसको हम शीशे की शीशी से रगड़-रगड़ कर चमकाते थे। कभी टार्च वाली बैट्री से कालिख निकाल कर सुंदरीकरण भी खुद ही कर दिया कर देते थे। स्कूल में टाटपट्टी की अनुपलब्धता में घर से खाद की बोरी का कट्टा बैठने के लिए बगल में दबा कर ले जाते थे। कक्षा पांच में ही बोर्ड वाला इम्तिहान दे दिया करते थे, दूसरे स्कूल में सेन्टर होता था, मतलब बगल वाले स्कूल में। कक्षा छः में पहली दफा हमने अंग्रेजी का कायदा पढ़ा और पहली बार एबीसीडी देखी। स्मॉल लेटर में बढ़िया एफ बनाना हमें बारहवीं तक नहीं आया था। हमारे अंग्रेजी वाले मास्टर साहब बुझौनी बाबा बोलते थे, उत्तर नहीं आने पर उनको इधर-उधर घूमाते थे तो बोलते, बुझा रहे हो। पता नही कितनी नरगिस और क्लिच वाले स्वनिर्मित कलम से आलेख लिख डाले फिरभी-कभहु हैण्ड राइटिंग ना सुधरी।

मेरे जैसे गंवार देहाती बच्चों की अपनी एक अलग दुनिया थी। कपड़े के बस्ते में किताब और कापियां लगाने का विन्यास हमारा अधिकतम रचनात्मक कौशल था। तख्ती पोतने की तन्मयता हमारी एक किस्म की साधना ही थी। हर साल जब नई कक्षा में आने पर दूसरों की दी गईं किताबें मिलती, तब उन पर पुट्ठा(कवर) चढ़ाना हमारे जीवन का स्थाई उत्सव था। काली या खाकी पैंट और सफेद शर्ट में ही साल गुजरतीं गई। सरकारी अफसर की विजिट होती थी स्कूल में तो पता चल जाता था कि आज कौनो सरकार आने वाले है स्कूल में, हर तरफ स्वच्छता अभियान, दीवालों से लेकर हम सबको चमकाने का। 14 अगस्त और 25 जनवरी की रातें लम्बी होती थी शायद नये जूते मिलने की खुशी और झंडा लेकर सड़क पर देशभक्ति धुन पर इतरा के चलना, फिर अन्त में कभी लडडू तो कभी केला खाने का आनंद जो अब नही मिलता। इस आनन्द में कब हम आठवीं पास कर आए पता ही नहीं चला। फिर सामना हुआ समाज के उस सच से जिसने बताया कि तुम क्या हो और तुम्हें कहां होना चाहिए, सबकी एक जगह बनाई गई है उसको उसी दायरे में रहना चाहिए।

मुझे कोई बताने वाला था नहीं था, बस सुना था कि विज्ञान और कला वर्ग होता है तो मैंने विज्ञान वर्ग भर दिया। उस समय यह माना जाता था कि कला वर्ग वाले बच्चे नकारा होते हंै। खैर, प्रवेश के लिए परीक्षा होती थी जिसने ६० प्रतिशत माक्र्स लाना पड़ता था, पर आया 55 प्रतिशत तो कला वर्ग में एडिमशन दिया गया। लेकिन मुझे विज्ञान वर्ग में जाना था तो जाकर अध्यापकों से मिला, वहाँ बताया गया कि तुम्हारा नहीं हो सकता क्योंकि मार्क्स कम है। पर मेरे साथ वाले कई बच्चों का ३५ प्रतिशत से कम पर ही विज्ञान वर्ग में एडिमशन मिल गया था क्योंकि स्कूल पाण्डेय का, टीचर पाण्डेय, मैनेजर पांडेय, प्रिंसिपल पाण्डेय (ये बात उसने खुद बताई) और मैं समझता रहा मेरा मार्कस कम आया है। उस दिन समझ में आ गया कि कला और विज्ञान वर्ग के बाहर भी एक सामाजिक वर्ग है जहाँ यह तय किया जाता है कि किसको कहां भेजना है या कहां तक रखना है। एक समाजवादी अध्यापक ने घर से 8 किमी दूर ले जाकर एक बाबूसाहब के स्कूल में विज्ञान वर्ग में एडमिशन दिलवाया। खैर जब हम हाई स्कूल में पहुंचे तो पहली दफा खुद को कुछ बड़े होने का अहसास हुआ।

गांव से 8 किलोमीटर दूर साईकिल से रोज सुबह कतार बना कर जाना-आना और साईकिल की रेस लगाना, हमारे जीवन की अधिकतम प्रतिस्पर्धा थी। हाथ छोड़कर साईकिल चलाने में तो महारथ हासिल हो गई थी। बरसात में पानी भर जाने पर धान के खेत वाले डाढ़ से ही निकल लेते थे। हर तीसरे दिन बड़ी युक्ति से दोनों टांगो के मध्य पंप को फंसाकर साईकिल में हवा भरते, मगर फिर भी खुद की पेंट को हम काली होने से बचा न पाते थे। स्कूल में पिटते, मुर्गा बनते मगर हमारा ईगो हमे कभी परेशान न करता, हम देहात के बच्चे शायद तब तक जानते नहीं थे कि ईगो होता क्या है। क्लास की पिटाई का रंज अगले घंटे तक काफूर हो गया होता और हम अपनी पूरी खिलंदड़ी से हंसते पाए जाते। क्लास की लड़की से बोलने की कभी हिम्मत ना जुटा पाए और हाई स्कूल और इंटर दोनों पास हो लिए। रोज सुबह प्रार्थना के समय पीटी के दौरान एक हाथ फासला लेना होता, फिर भी धक्का मुक्की करते, अड़ते-भिड़ते, सावधान विश्राम करते रहते।

हम देहात से निकले बच्चे सपने देखने का सलीका नहीं सीख पाते, अपनें मां-बाप को यह कभी नहीं बता पाते कि हम उन्हें कितना प्यार करते हैं। हम देहात से निकले बच्चे गिरते, सम्भलते, लड़ते, भिड़ते, दुनिया का हिस्सा बनते हैं, कुछ मंजिल पा जाते हैं, कुछ यूं ही खो जाते हैं। एकलव्य होना हमारी नियति है शायद। देहात से निकले बच्चों की दुनिया उतनी रंगीन नहीं होती, वो ब्लैक एंड व्हाइट में रंग भरने की कोशिश जरूर करते हैं। संघर्ष रहे करते रहे या होता रहा, कभी फ्यूचर प्लानिंग किया नहीं, अगर किया भी हो तो शायद कुछ हुआ नहीं, बस कभी इस नाव कभी उस नाव भटकते रहे खानाबदोश की तरह, कभी डिग्री के लिए जो चाही-अनचाही दोनों तरह की थी। फिर एक ऐसा प्लेटफार्म मिला कि लगा कि सही जगह पहुँच गए हो। फिर बी॰एच॰यू॰, ए॰आई॰आई॰एम॰एस॰ मदद करते रहे।

पढ़ाई के बाद नौकरी के सिलसिले में लाख शहर में रहे, लेकिन हम देहात के बच्चों के अपने देहाती संकोच जीवनपर्यन्त पीछा करते है। नहीं छोड़ पाते हैं सुड़क-सुड़क की ध्वनि के साथ चाय पीना, अनजान जगह जाकर रास्ता कई-कई दफा पूछना। कपड़ों को सिलवट से बचाए रखना और रिश्तों को अनौपचारिकता से बचाए रखना, हमें नहीं आता है। अपने-अपने हिस्से का निर्वासन झेलते हम बुनते हैं कुछ आधे-अधूरे से ख्वाब और फिर जिद की हद तक उन्हें पूरा करने का जुटा लाते है आत्मविश्वास। हम देहात से निकले बच्चें थोड़े अलग नहीं, पूरे अलग होते हैं, अपनी आसपास की दुनिया में जीते हुए भी खुद को हमेशा पाते है थोड़ा प्रासंगिक, थोड़ा अप्रासंगिक। बस कुछ ना कुछ करता रहा हार नहीं मानी या और कुछ करने को था ही नहीं इसलिए बस जो था, यही था जो है यही है, बस लगे रहिए और भी कुछ होना बाकी है शायद।

(लेखक पेशे से डॉक्टर हैं व पोस्टडक्टोरल फेलो, फ्लोरिडा इंटर्नैशनल यूनिवर्सिटी,फ्लोरिडा यू॰एस॰ए॰ से पढ़़ाई कर देश में योगदान दे रहे हैं।)

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