अनिन्दो बनर्जी
निदेशक, कार्यक्रम प्रभाग, प्रैक्सिस
देश में लाॅकडाउन लागू किये जाने के बाद से बड़ी संख्या में दूसरे राज्यों में काम करने वाले प्रवासी मज़दूरों की अपने गांव वापसी हो रही है। ऐसा माना जा रहा है कि यदि निकट भविष्य में महामारी से निपटने में ठोस कामयाबी नहीं मिली तो अर्थव्यवस्था के बहुत सारे दायरों में दूरगामी प्रभाव देखने को मिलेंगे, जिनमें ऐसे कई दायरे शामिल होंगे जहो बड़ी संख्या में प्रवासी मज़दूर काम करते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों से विशाल संख्या में पलायन करने वाले मज़दूरों की जीविका पर कैसा प्रभाव पड़ेगा और उनके पास रोज़गार के क्या विकल्प उपलब्ध होंगे? एक बड़ा सवाल इन राज्यों की अपनी क्षमता से भी जुड़ा है, कि किस हद तक बिहार जैसे राज्यों की अर्थव्यवस्था पलायन करने वाले मज़दूरों की नियति बदल पाने में और स्थानीय स्तर पर ही रोज़गार के विकल्प उपलब्ध कराने में सक्षम होगी।
2011 की जनगणना में देश के अलग अलग राज्यों में बिहार से गए कुल 74 लाख प्रवासियों की गिनती की गई, जिनमें लगभग 22 लाख 65 हज़ार लोग रोज़गार के सिलसिले में राज्य से बाहर थे। ऐसे प्रवासी मज़दूरों की सबसे बड़ी संख्या दिल्ली (4.06 लाख), झारखंड (2.92 लाख), पश्चिम बंगाल (2.69 लाख), महाराष्ट्र (2.63 लाख) और गुजरात (1.62 लाख) में थी। जिन कठिन परिस्थितियों में इन मज़दूरों का गुज़र बसर होता है वह जगजाहिर है। स्थानीय बासिन्दों की नफ़रत, काम मिलने की अनिश्चितताओं, सीमित आमदनी, रोज़गार की कठिन परिस्थितियां, रहने की बुनियादी सहूलियतों का अभाव, बिचौलियों और ठेकेदारों का बोलबाला, परिवार और समाज से दूर रहने की मजबूरी, इत्यादि ऐसी चुनौतियां हैं जिनसे लाखों प्रवासी मज़दूरों को अनवरत गुज़रना पड़ता है! लेकिन हैरत की बात यह है कि साल-दर-साल मज़दूरों की विशाल संख्या फिर भी राज्य के बाहर बेगाने शहरों का रुख करती रहती हैं। ज़्यादातर लोग राज्य से बाहर इसलिए जाते हैं क्योंकि जीविका के पर्याप्त स्थानीय विकल्प उपलब्ध नहीं दिखते।
क्या प्रवासी मज़दूरों को अपने ही राज्य में रोज़गार के पर्याप्त अवसर नहीं मिल सकते? आखिर बिहार जैसे राज्यों में ऐसी क्या अड़चनें हैं जिनकी वजह से तथाकथित आर्थिक विकास दर के लगातार बढ़ते रुझान के दावों के बीच काम के लिए बाहर जाने वाले लोगों के लिए राज्य में ही रोज़गार के अवसर नहीं बनाये जा सकते? राज्य सरकार द्वारा प्रकाशित आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक राज्य के सकल घरेलू उत्पाद का वृद्धि दर वर्ष 2018-19 में 10.53 फीसदी था तथा पिछले तीन सालों से लगातार राष्ट्रीय वृद्धि दर से ज़्यादा रहा है। खासकर वाणिज्य और परिवहन से जुड़े क्षेत्रों का वृद्धि दर पिछले कुछ सालों में अभूतपूर्व रूप से बढ़ा है, जिससे रोज़गार के अवसरों के बढ़ने की भी अपेक्षा बनती है। हालांकि ऐसा कोई अध्ययन उपलब्ध नहीं है जिससे इन क्षेत्रों में उत्पन्न रोज़गार के अवसरों का स्पष्ट्र आकलन होता हो। एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि प्राथमिक क्षेत्र, जिसमें कृषि और सम्बद्ध गतिविधियां शामिल हैं, का वृद्धि दर 2018-19 में सिर्फ 0.6 प्रतिशत ही था। यह एक बड़ी चुनौती है क्योंकि राज्य में रोज़गार पैदा करने वाले उद्योगों में कृषि, वानिकी और मत्स्यपालन क्षेत्र की हिस्सेदारी अब भी सबसे ज़्यादा (पुरुषों में 44.6 प्रतिशत और महिलाओं में 53.6 प्रतिशत) है और इस क्षेत्र में वृद्धि दर का सीमित होना बहुत शुभ संकेत नहीं है।
रोज़गार के अवसर बढ़ाने में कृषि-आधारित उद्योगों की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है और इस दिशा में एक अच्छे रोडमैप का निर्माण किया जाना चाहिए। एक उत्साहवर्द्धक बात यह है कि राज्य में पिछले दशक के दौरान सक्रिय कृषि-आधारित कारखानों की संख्या में 16.4 प्रतिशत की वार्षिक दर से बढ़ोत्तरी हुई है। निर्माण और उत्पादन क्षेत्रों का प्रदर्शन भी पिछले पांच सालों में ठीकठाक और स्थिर रहा है और बेहतर सूचना व्यवस्था और समन्वय के साथ इन क्षेत्रों में रोज़गार के टिकाऊ अवसर बने रह सकते हैं।
वर्ष 2018-19 में बिहार में लगभग 29 लाख परिवारों को महात्मा गांधी ग्रामीण रोज़गार गारन्टी कार्यक्रम के तहत रोज़गार उपलब्ध कराया गया, जो उस साल कुल जाॅबकार्ड धारी परिवारों की संख्या का महज़ 18.7 प्रतिशत था। राज्य सरकार के आंकड़ों के अनुसार योजना के तहत औसतन प्रति परिवार 42.2 मानव दिवसों का रोज़गार उपलब्ध कराया गया। एक बड़ी कमी यह रही कि सिर्फ 0.2 लाख परिवारों को ही 100 दिनों का रोज़गार मिल सका, यानी कुल लाभार्थी परिवारों के एक प्रतिशत से भी कम! अगर थोड़ी और तैयारी और गम्भीरता के साथ इस कार्यक्रम को लागू किया जाये तो प्रवासी मज़दूरों की एक बड़ी संख्या को अपने ही राज्य में लगभग 20,000 रू. की सुनिश्चित वार्षिक आमदनी सिर्फ मनरेगा योजना से ही मिल सकती है। चूंकि मनरेगा के ज़रिये सिर्फ रोज़गार के अवसरों का ही सृजन नहीं होता, बल्कि महत्वपूर्ण ग्रामीण परिसम्पत्तियों का भी निर्माण होता है, इसलिए इस तरह के कार्यक्रमों के समुचित कार्यान्वयन से ग्रामीण बिहार के मंद पड़े विकास की रफ्तार को भी बढ़ाया जा सकता है। यूं भी बिहार जैसे राज्यों में हमेशा आने वाली आपदाओं की पृष्टभूमि में मनरेगा जैसी योजनाओं की विशेष भूमिका हो सकती है। उदाहरण के लिए, सूखा-प्रवण जिलों में सिंचाई के पारंपरिक संरचनाओं और नहरों की उड़ाही और पुनरुद्धार के लिए बड़े स्तर पर प्रयास किये जा सकते हैं, जिसमें बड़ी तादाद में स्थानीय लोगों के लिए रोज़गार के अवसर बन सकते हैं। इसी तरह, बाढ़ प्रवण जिलों में जलनिकासी या स्थानीय स्तर पर जल के बेहतर प्रबंधन के प्रयासों में रोज़गार के अवसर बनाये जा सकते हैं।
बिहार में रोज़गार के अवसरों में बेहतरी लाने के लिए तथाकथित अकुशल या अल्पकुशल श्रमिकों के कौशल विकास पर विशेष ध्यान दिये जाने की ज़रूरत दिखती है। लाॅकडाउन के बाद बड़ी संख्या में मज़दूरों का गांव लौटना उनके कौशल बढ़ाने के अवसर सृजित किये जाने का एक महत्वपूर्ण अवसर हो सकता है। अगर जल्द से जल्द पंचायत स्तर पर ही ऐसे अवसर उपलब्ध कराये जा सकें तो इससे बड़ी संख्या में लोगों को बेहतर कमाई और ज़्यादा मांग वाले वैकल्पिक बाज़ारों के लिए तैयार किया जा सकता है। साथ ही स्थानीय उद्योगों के हित में बाजार के विस्तार के लिए विशेष अभियान चलाये जा सकते हैं, ताकि कई तरह के ग्रामीण उद्यमों, जैसे सब्जी विक्रय, मिठाई निर्माण, दुग्ध उत्पादन, हथकरघा, इत्यादि को आय बढ़ाने के अवसर मिल सकें।
ध्यान रखने की बात यह है कि बिहार में खेती से जुड़े ज़्यादातर कामगार या तो सीमांत किसान हैं या खेतिहर मज़दूर, और उनमें भी एक विशाल अनुपात ऐसे लोगों का है जो बटाई या लीज़ जैसी व्यवस्थाओं में खेती करते हैं। सीमित संसाधनों और मौसमी अनिश्चितताओं के साथ किये जाने वाले कृषि कार्य की लाभदायकता बढ़ाने के लिए बहुत ज़रूरी है कि सरकार की ओर से स्थानीय स्तर पर महत्वपूर्ण सुविधाओं की उपलब्धता बढ़ायी जाये, जैसे सुरक्षित फसल भंडारण की व्यवस्था, कृषि ऋण की पहुंच बढ़ाया जाना, सहकारिता-आधारित पहलों को प्रोत्साहन दिया जाना, उत्पादकों को सीधे बाज़ार से जोड़ने की व्यवस्थायें, महिला किसानों के लिए विशेष प्रोत्साहक योजनायें लागू किया जाना, समर्थन मूल्य या आपदा-राहत जैसी नीतियों का समय पर उपलब्ध कराया जाना, इत्यादि।
कोशिश की जाये तो बड़ी संख्या में प्रवासी मज़दूरों का वापस आना राज्य के लिए एक नये स्तर की औद्योगिक उद्यमिता का अवसर बन सकता है। जो योगदान प्रवासी मज़दूर दूसरे राज्यों और देशों की अर्थव्यवस्था को चमकाने में देते रहे हैं, उसका रणनीतिक उपयोग राज्य की अपनी अर्थव्यवस्था के सुदृढ़ीकरण में किया जा सकता है। बिहार जैसे राज्यों को इस विषय पर ठोस प्लानिंग और त्वरित कारवाई के लिए एक उच्च स्तरीय व्यवस्था स्थापित करना चाहिए, जिसमें सुयोग्य अर्थशास्त्रियों, सामाजिक वैज्ञानिकों और मज़दूर संगठनों के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाना चाहिए। अपने ही राज्य में जीविका हासिल कर पाने के अवसरों से श्रमिकों को बहुत तरह के शोषणों से छुटकारा भी मिलेगा और उनकी ज़िन्दगी की गुणवत्ता में भी इज़ाफा होगा।
कुल मिलाकर देखा जाये तो बिहार जैसे राज्यों की अर्थव्यवस्था में पलायन करने वाले मज़दूरों को समाहित करने की कई सम्भावनायें बन सकती हैं, अगर इस विषय को आवश्यक प्राथमिकता दी जाये। राष्ट्रीय आजीविका मिशन या कौशल विकास मिशन जैसी व्यवस्थाओं की दृष्टि और कार्यक्षेत्र में कई गुणा अधिक विस्तार लाये जाने की ज़रूरत दिखती है, ताकि वह महज़ सांकेतिक या प्रायोगिक स्तर के हस्तक्षेपों से आगे बढ़ सकें। प्रवासी मज़दूरों के लिए रोज़गार के स्थानीय अवसर पैदा करने के प्रयासों के साथ साथ उपलब्ध अवसरों के प्रचारित किये जाने की भी बड़ी ज़रूरत है, जिसके लिए व्यापक स्तर पर संवाद, समन्वय, सहजीकरण और सहयोग की भूमिकाओं की ज़रूरत है। समन्वय की श्रृंखला में स्थानीय पंचायतों की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। लाॅकडाउन के दौरान बाहर फंसे जिन प्रवासी मज़दूरों को बिहार सरकार की नकद-हस्तांतरण योजना या हेल्पलाइनों का लाभ मिला, उनके सम्पर्क-विवरणों का डाटाबेस मज़दूरों के साथ सीधे संवाद और रोज़गार के स्थानीय अवसरों के सम्प्रेषण में एक सहज ज़रिया का काम कर सकता है, जिसका लाभ अवश्य लिया जाना चाहिये।




