स्मृति शेष…बदल गया मेरा गांव शोभीपुर

शेष नारायण सिंह,वरिष्ठ पत्रकार
लखनऊ से बनारस जाने की सड़क पर करीब 150 किलोमीटर दूर लम्भुआ-धोपाप रोड पर लंबे-सड़क पर मेरा गांव शोभीपुर, उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले में है। कहते हैं कि आज से करीब सवा सौ साल पहले यहां आबादी बसना शुरू हुई थी। मेरे पुरखों की जन्मस्थली मेरे मौजूदा गांव से करीब दो किलोमीटर पश्चिम गोमती नदी के किनारे है। मेरे बाबू के बाबा के पिताजी ने खेती की सुविधा के लिए यहां पाही बनाई थी। धीरे धीरे यहां आबादी हो गयी, नाऊ और हलवाहा तो साथ ही आए थे। पड़ोस के गांव से परिहार ठाकुरों का एक परिवार कहीं दूर बसने जा रहा था, उनको कुछ जमीन देकर रोक लिया गया। फिर उनके रिश्तेदार नेवासा आ गए। मेरे खानदान की एक लडकी बैसवाड़े में ब्याही गई थीं। वे भी यहीं बस गयीं और फिर भरा पूरा गांव हो गया।…………….मेरा गांव शोभीपुर

1961 की जनगणना में मैं मेरा गांव  के लेखपाल बैजनाथ उपाध्याय के साथ सबके घर गया था। सबके घर के सामने गेरू से घर की संख्या लिखने का काम मेरा ही था। मेरे गांव में कुल छब्बीस घर (परिवार ) थे। अब परिवारों की संख्या करीब सत्तर हो गयी है। उसी साल राजा पांडे भाग कर राना घाट चले गए थे। राजा मुझसे एक साल बड़े हैं और पांचवीं में पढ़ते थे। उनके पिता जी चार भाई थे। दो भाई फैजाबाद की मसोधा चीनी मिल में काम करते थे, उनके पिताजी घर पर ही रहते थे। राजा के भाग जाने से गांव में बहुत हडकंप मच गया था। शाम तक पता चल गया कि पड़ोस के गांव के भगल के साथ सतबजवा गाडी पकड़कर जौनपुर गए हैं। उसके बाद आगे की यात्रा कलकत्ता जाने वाली किसी ट्रेन से की होगी। उन दिनों परदेस जाना अपमान की बात थी, लेकिन लोग जाने लगे थे। ज्यादातर लोग कलकत्ता या कहीं और कमाने जाते थे, उनके परिवार के लोग यही कहते थे कि चुप्पे से भाग गए हैं। उन दिनों मेरे गांव के लोग परदेस के लिहाज से कलकत्ता, गाजियाबाद, कासगंज ,फर्रुखाबाद आदि कस्बों में मजदूरी करने गए थे। गांव में दो एक परिवार में लोग पढ़े लिखे थे जिनके घर के एकाध लोगों को सरकारी नौकरी मिली हुई थी, लेकिन परदेस जाना शर्मिन्दगी की बात ही मानी जाती थी।……………………मेरा गांव शोभीपुर

प्राइमरी स्कूल करीब दो किलोमीटर दूर नाला पार करके नरिंदापुर में था। मेरी उम्र के सभी लड़के वहीं पढने जाते थे। लेकिन लडकियां पढ़ने नहीं जाती थीं। मेरी छोटी बहन और उसकी सहेलियों ने जाना शुरू किया। मेरी बड़ी बहन कभी स्कूल नहीं गई। हालांकि नरिन्दापुर का स्कूल 1861 में खुल चुका था। लेकिन लड़कियों की शिक्षा का रिवाज ही नहीं था। कुछ अपेक्षाकृत विकसित गांवों की लड़कियां स्कूल आती थी। मेरे गांव में स्कूल 1962 में खुला जब मैं प्राइमरी पास करके छठवीं जमात में जा चुका था। मेरी उम्र के लड़कों में कोई ऊंची शिक्षा की बात नहीं करता था। मेरे खुद के पिताजी ने मुझे दसवीं के बाद पढ़ाने से मना कर दिया था। मेरी उम्र का कोई दूसरा लड़का दसवीं पास नहीं है।

यह जरूर है कि हम लोगों से दस साल बड़े लोगों में फौज में भर्ती होने की बड़ी हुड़क रहती थी। कई लोग जाते थे लेकिन फौज में केवल तीन लोग ही भर्ती हो पाए। उस उम्र के बाकी लोग घर ही रहे। खेती-बारी करते रहे। सन साठ में एक नौजवान अपने मौसा के यहां चला गया था। वे मुंबई में रहते थे। उनका किसी यूनियन में लोगों से संपर्क था। उन्होंने उसको नेशनल रेयान कॉरपोरशन में लगवा दिया था। मजदूर के रूप में ही लगा था लेकिन जब वह दो साल बाद वापस गांव आया तो उसके कपड़े-लत्ते से संपन्नता झलकती थी। जब वह मुंबई जा रहा था तो उसकी मां ने उसके लिए गोड़न्गा (पायजामा) बनवाने के लिए चार रूपए का महुआ रामनायक साहू को बेचा था। उसके पहले वह अन्य लड़कों की तरह पटरा का जांघिया ही पहनता था। उसके बाद वह जब भी गांव आता किसी की बिकाऊ जमीन खरीदने की कोशिश करता। उसकी मुंबई यात्रा का नतीजा यह हुआ कि बाद में ज्यादातर नौजवान गांव छोड़कर किसी भी शहर में जाने को तैयार रहने लगे।…………….मेरा गांव शोभीपुर

गांव में दलित, नाई ,कहार, ब्राह्मण और ठाकुर जातियों की आबादी थी। ब्राहमणों में एक घर पांडे का था और एक घर मिश्र। अब उन दो परिवारों से करीब पंद्रह परिवार हो गए हैं। ठाकुरों की कई उपजातियों के लोग मेरे गांव में रहते हैं। राजकुमार तो जमींदार ही थे, बैस, गौतम, चैहान और परिहार ठाकुरों के घर भी हैं। उन दिनों शादी-ब्याह में कुछ भी खर्च नहीं होता था। लड़के-लड़कियां आम तौर पर उन्हीं इलाकों में ब्याहे जाते थे जहां पुराने रिश्ते हों।……………मेरा गांव शोभीपुर

हमारे गांव में 1960 के आसपास सुल्ताना कोल्हू आया था। सरकार की तरफ से एक गुड गाइड भी तैनात हुए थे। सुल्ताना कोल्हू के साथ अलग तरह का भट्ठा भी बनाया गया था जिसमें कम इंधन से गुड़ बन जाता था। गन्ने की खेती को अहमियत देने की सरकार की कोई स्कीम रही होगी। उसी साल गांव में वी एल डब्लू (ग्राम सेवक ) का आना जाना शुरू हुआ था। कई गांवों के एक हलके में एक ग्राम सेवक की तैनाती होती थी। जमींदारी-उन्मूलन के बाद लोगों के बीच मालगुजारी देने की संस्कृति को विकसित किया जा रहा था। जो लोग मालगुजारी नहीं देते थे, उनके बैल या भैंस को हांककर ले जाने की चर्चा भी थी। लेकिन ऐसा कभी हुआ नहीं। पहले सिंचाई तालाब और कुओं से होती थी। तालाब में बेड़ी लगती थी और कुओं में गर्रा लगाकर पानी निकाला जाता था। 1967 में सब कुछ बदलना शुरू हुआ। यह शायद ग्रीन रिवोल्यूशन का असर था। मेरे गांव में एक बाबू साहब को जौनपुर में ग्राम सेवक की नौकरी मिल गयी थी। उन्होंने ही सबसे पहले गांव में कूपर इंजन का पम्पिंग सेट लगवाया। उनके घर में पढाई-लिखाई का फैशन था। उनके भाई जो जौनपुर में पढ़ाते थे, मेरे अंग्रेजी के पहले उस्ताद माने जाएंगे। 1962 में जब मैंने प्राइमरी का इम्तिहान दे दिया था, तो उन्होंने ही मुझे अंग्रेजी की वर्णमाला का ज्ञान दिया था और अभ्यास करवाया था। जब छठवीं में अंग्रेजी की पढ़ाई शुरू हुई तो मैं क्लास में सबसे आगे था। बाद में भी अंग्रेजी में मेरी रूचि का कारण शायद यही था। गांव में धीरे धीरे बदलाव आना शुरू हो गया था।…………….मेरा गांव शोभीपुर

साठ के दशक में ही मेरे जिले में राजनीतिक हलचल भी शुरू हो गई थी। सुल्तानपुर से 1952 और 1957 के लोकसभा चुनावों में डॉ केसकर और गोविन्द मालवीय लोकसभा के लिए चुने गए थे। कांग्रेस पार्टी ने शायद मान दिया था कि सुल्तानपुर के मुकामी लोगों में लोकसभा चुनाव जीतने के लिए जरूरी योग्यता का विकास नहीं हुआ है। इसलिए बाहरी लोगों को ही टिकट दिया जाता था। कांग्रेस का टिकट जीत की गारंटी माना जाता था। शायद इसीलिए जब 1961 में सीट खाली हुई तो लोकसभा उपचुनाव में कांग्रेस आलाकमान ने स्वर्गीय गोविन्द वल्लभ पन्त के बेटे कृष्णचन्द्र पन्त को टिकट दे दिया। वह उनका पहला चुनाव था। जिले के कांग्रेसियों में गुस्सा था। उसी गुस्से को शक्ल देने के लिए जिले के सबसे बड़े वकील बाबू गनपत सहाय ने निर्दलीय पर्चा दाखिल कर दिया और चुनाव जीत गए। कांग्रेस को हार का जबरदस्त झटका लगा। वह चुनाव भी क्या चुनाव था। गनपत सहाय को 37785 वोट मिले थे और 36656 वोट लेकर के सी पन्त 1139 वोट से हार गए थे। आज जहां लाखों वोट पड़ते हैं, उस लिहाज से यह संख्या बिलकुल अजीब लगती है। उसके बाद से कांग्रेस ने कभी बाहरी आदमी को टिकट नहीं दिया। आजकल बीजेपी वाले भी उसी कांग्रेसी ढर्रे पर चल पड़े हैं। अयोध्या काण्ड के बाद जबसे कांग्रेस कमजोर पडी है और बीजेपी जीतेने लायक हुई है, तब से बीजेपी भी लगातार बाहरी उम्मीदवार को ही टिकट दे रही है।……………मेरा गांव शोभीपुर

सुल्तानपुर जिला के ही दूसरे हिस्से में अमेठी लोकसभा क्षेत्र है, वहां राजीव गांधी के कारण विकास की हर कोशिश की गई लेकिन बगल के सुल्तानपुर क्षेत्र में कुछ नहीं हुआ। इस लिहाज से आज मेरा गांव बदकिस्मत कहा जाएगा जो पिछड़ा रह गया बल्कि यह जिला ही पिछड़ा माना जाता है। अब गांव में कोई नहीं रहना चाहता। 1980 के आसपास जब एशियाई खेलों की तैयारी शुरू हुई तो मेरे गांव के कुछ लड़के दिल्ली आ गए थे। मैं कई बार उनके काम करने या रहने की जगह पर गया। यहां शहर में रहकर ठाकुरों के वे लड़के जिस तरह की जिन्दगी बसर कर रहे थे, वह बहुत ही मुश्किल थी। मेरा मानना है कि अगर उन्होंने अपने गांव में, अपने खेतों में दिल्ली की आधी मेहनत की होती तो खुद तो आराम से रहते ही, अपने परिवार में भी खुशी लाते। लेकिन खंडित परिवार की सौगात अपने गांव में छोड़कर शहर में नरक की जिंदगी जीने को अभिशप्त तरुणाई को देखना बहुत ही तकलीफ था।……………मेरा गांव शोभीपुर

अब बहुत बदल गया है गांव
अब मेरे गांव में बहुत कुछ बदल गया है। शिक्षा की पूरे राज्य में खास्ता हालत ने हमारे गांव को भी जकड़ रखा है। कई नौजवानों ने डीलक्स नकल करके हाई स्कूल और इंटर में अच्छे नम्बर ले लिया है लेकिन कहीं कोई भी टेस्ट पास नहीं कर पाते। कुछ लड़के जो ठीक ठाक पढ़ाई कर सके हैं, वे सरकारी नौकरी में हैं या शिक्षक और वकील बन गए हैं लेकिन कुल मिलाकर हालत खराब है। कुछ लड़के सरकारी महकमों में जूनियर इंजिनियर बन गए हैं। घूस मिलता है, संपन्न हैं। जो लोग पढ़ लिख नहीं पाए हैं वे सभी शहर में जाकर कुछ करने के लिए बेताब हैं। इस बार गांव में मैंने एक अजीब बात सुनी। एक लड़का जो कुछ वर्ष पंजाब में कमाकर आया है उसने लड़कों में नशे की दवाएं बेचना शुरू कर दिया है। हालांकि यह बहुत शुरुआती बात है लेकिन शायद पुलिस को पता है क्योंकि वह अक्सर पकड़कर थाने ले जाया जाता है। अभी तो उसकी निंदा करने वाले ही गांव में मिले लेकिन एकाध लड़के उसकी चपेट में आ चुके हैं। जाहिर है मेरा गांव शोभीपुर बदल गया है, बदल रहा है।

(वरिष्ठ पत्रकार, एनडीटीवी हिन्दी के संस्थापकों की टीम में रहे, देशबंधु अखबार में राजनीतिक संपादक।)

 

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