प्रतिमा कुमारी पासवान
पटना: गांव-समाज के लोग यहां तक की अपनी बिरादरी वाले भी फूलमतिया की मां में ही हजार कमियां ढूढ़ने लगे। उसे ही दोष देने लगे कि बेटी को लालची बना कर रखी थी। खेलने के लिए छूट देने का नतीजा है, मछली ,घोंघा सब चुनने क्यों भेजती थी, एक बच्ची नहीं संभाल सकी। यहां तक कि निशाने पर फूल मतिया की दादी भी थी। लोग कहते, दादी के बारे में लोग कहते इनको जवानी में सब से उलझने का शौक था। किसी से भी लड़ जाती थीं। हो सकता है, उसी का बदला लिया गया हो। जबकि चारों आरोपियों के परिवारों के साथ ऐसा कोई झगड़ा आदि नही था। लेकिन अभी इस घटना ने लोगों के मन में इतनी आशंकाएं व डर भर दिया गया था कि लोग कुछ से कुछ बोले जा रहे थे। उन्हें यह भी नहीं लगता की इस परिवार को अभी साथ देने की बजाय वे सब तनाव दे रहे हैं। फूलमतिया के परिवार में न जाने इतना धैर्य कहा से आया सब सुनकर भी चुप रह जाते। हालाकि फूलमतिया के पिता को पता था की यह सब मुझे मेरी औकात दिखलाने के लिए किया गया है, क्योंकि जिस जगह पर यह रहते हैं उसके पीछे की जमीन पर इनकी नजर थी। वह खाली करवाना चाहता था। एक बार किसी और के द्वारा परेशान कराने पर ये लोग टिके रहे इसका खुन्नस था। क्योंकि उसे खाली कराने के लिए मोटी रकम मिल जाती। यह सब बातें फूलमतिया की दादी और उसके पिता आपस में बात करते। फूलमतिया की दादी बताती की पहले लोग अपनी जमीन पर भी बसाने का काम करते थे ताकि इनके घरों में या खेतों में काम करने वाला हो लेकिन आज तो यह स्थिति है की लोग इतना घिनौना काम कर रहे हैं।

चार महीने बाद फूलमतिया ने अस्पताल से घर आने के समय पूरे रास्ते अपने चेहरे को दादी के साल में छुपा लिया था। मानो वह अब बाहर की दुनिया से रूबरू नहीं होना चाहती। अब फूलमतिया पहले जैसी नहीं थी। उसकी चंचलता कहीं गायब हो गईं थी। आखों से नींद कोसों दूर चली गई थी। बड़ी —बड़ी आखों से किसी को टूक टूक निहारना। हां या ना में जवाब देने लगी थी अभी तो नौ साल की ही थी लेकिन इस घटना ने उससे उसका बचपन छीन लिया। फूलमतिया ऑटो से घर जब तक घर के पास पहुंचती, तबतक शाम हो चुकी है। लेकिन उसके दरवाजे पर भीड़ लगी थी। उसे देखने के लिए फूलमतिया यह भीड़ देख कर दादी से से चिपक जाती है और आंखें बन्द कर लेती है। लोग उसका चेहरा नही देख पाते और उसकी दादी उसे ऐसे ही बचाते हुए घर में ले जाती है। घर में आने पर भी फूलमतिया अपना चेहरा चादर से ढक लेती है सब लोग ऐसे ही बाहर से देख कर चले जाते हैं।
इस दुर्घटना के बाद पहली बार अपने घर लौटी फूलमतिया अपने घर को भी अच्छे से नहीं देख पा रही थी। उस रात तो उसने खाना भी नहीं खाया। सर्द रात में फूलमतिया को नींद नहीं आ रही थी लेकिन तब भी वह आंखें बन्द कर दादी से चिपकी रही। सब लोग सो गए तब एक बार चादर को थोड़ा हटाया और फूस की छत से छन कर मटमैली सी रौशनी आ रही थी। उससे नजरें चुराके झट से दादी से जा चिपकी। थोड़ी सुबह हुई तब शौच के लिए मां ने पूछा तो आहर पर जाने के नाम से पूरी तरह कांप उठी फूलमतिया। रोंगटे खड़े हो गए। उसके शरीर के रोंगटे खड़े हो गए। दादी ने कहा…नहीं यह कही नहीं जाएगी। आज हम इंतजाम कर देंगे इसके लिये। सुबह होते ही फिर से लोग आने लगे। फूलमतिया को देखने के लिए लेकिन वह अपना चेहरा चादर से ढकी ही रही। काजल की दादी ने दीन में बांस और कपड़े से घेर कर घर के पास वाले जगह पर एक सोख्ता बनवाया। उसमें भी साथ ले जाती उसे। दूसरे दिन शाम को गोलू और दीपू आता है फूलमतिया से मिलने। वह बिना पलक झपकाये इन दोनों को एक टक से देखती रहती है, बिल्कुल मौन। दोनों ने कुछ कहने की कोशिश भी की लेकिन फूलमतिया ने मुंह न खोला। तीन दीन बीत गये फूलमतिया को घर आये। ऐसा लग रहा था तीन दिन तीन बरस की तरह बीतें हों। अपना घर ही मानो पराया हो गया हो। माथे का जख्म अभी ताजा था। दादी जख्म को गर्म पानी से साफ करती। सर्दियों के मौसम में गुनगुनी धूप निकला देख दादी ने फूलमतिया को गर्म पानी से साफ़ करती थी। कपडे बदल कर घर के बाहर धूप में बिठाई। फूलमतिया आज भी असहज थी लेकिन नजरें झुकाये धूप में बैठी रही। सर पर लगे 52 टांके,मुंडा हुआ सर। जब पहली बार अपना चेहरा पहली बार आईने में देखा तो चीख पड़ी थी फूलमतिया। चेहरे पर जगह—जगह कटे के निशान के साथ ललाट और सर पर लगे टांके से चेहरा बहुत भयावह दिख रहा था। दादी दौड़ती हुए आई और सीने से लगाते हुए शीशा दूर हटाने को कहा। छोटी सी फूलमतिया जो खुद के साथ अपने दो भाईयों की भी देखभाल किया करती थी, आज इस हाल में है कि उसे पल भर के लिए भी अकेला नहीं छोड़ा जा सकता। माता -पिता तो मजदूरी करने चले जाते दादी इसके पास हर पल साये की तरह रहती। डॉ के पास भी ले जाती और कई बार कोर्ट—कचहरी का भी चक्कर लगाना पड़ता। लेकिन जैसे-जैसे समय बीत रहा था वो समय के साथ मजबूत हुई। भले ही निगाहें झुकी हुई हों लेकिन जमाने का सामना करने के लिए खुद को तैयार कर रही थी फूलमतिया।
अब स्कूलों में नए नामांकन का समय आ चुका था। संगी साथी अगली कक्षा में आ चुके थे। स्कूलों में कक्षा के हिसाब से छात्रों को पुस्तकें बांटी जा रही थीं। स्कूल की एक शिक्षिका को फूलमतिया से बहुत लगाव था वह किसी न किसी बहाने उससे मिलाना चाहती थीं। कुछ बच्चों का प्रोत्साहन भत्ता आया हुआ था। स्कूल के हेडमास्टर से बात कर के शिक्षिका फूलमतिया को पैसे देने आई थी ताकि उसे को वापस स्कूल आने के लिये प्रेरित किया जा सके। हालाकि इस घटना के बाद दलित लड़कियों का स्कूल भी जाना बहुत कम हो गया था लेकिन अब घटना को एक साल बीत चुका है। समय बड़े—बड़े जख्म भर देता है लेकिन फूलमतिया को ऐसा जख्म मिला था जो शायद ही आसानी से भर पाये। हालाकि शिक्षिका को यह भरोसा था कि फूलममिया का फिर से स्कूल आने से बाकी बच्चियों को दुबारा स्कूल आने में प्रेरणास्पद साबित होगा। इस लिए शिक्षिका ने कैश में ही दो तरह के पैसे दिए एक ड्रेस के लिए और दूसरा प्रोत्साहन भत्ता। लगे हाथो उन्होंने यह जानकारी भी दी कि स्कूल में कुछ अच्छे टीचर भी आएं हैं। खेल का सामान भी और दो दीदी बाहर से खेल करवाने आती है। तुम आओगी तब अच्छा लगेगा और तुमको तो स्कूल ड्रेस पहनकर, बैग लेकर स्कूल जाना पसंद है न अब इन पैसे से तुम्हारा सब हो जायेगा। कुछ कम पड़ा तो हम और ला देंगे इस तरह से शिक्षिका ने काजल को प्रोत्साहित किया। एक सप्ताह में नीले रंग की कमीज और डार्क ब्लू स्कर्ट काजल की दादी ने सिलवा दिया और ,बैग खरीद दिए। शिक्षिका ने खुद ही जूता खरीद लिया और काजल को स्कूल तक लाने के लिए उसके घर तक पहुंच गई। आज काजल का बचपन का सपना पूरा होते हुए दिखा उसे बहुत अच्छा लगता था जब उसके पड़ोस के या गांव के बहुत से बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ने जाते थे तब ऐसे ही ड्रेस में जाते थे। काजल तैयार होकर जैसे ही पीठ पर बैग रखी की उसे याद आया सर में कपडे का स्कार्फ बांधना और उसने दादी से स्कार्फ बंधवाया और शिक्षिका एवं दादी के साथ स्कूल के लिए घर से निकली। सिर झुकाए हुए सब की नजरों से बचने की कोशिश करती आगे स्कूल के रास्ते पर आगे बढ़ती जा रही है फूलमतिया।

उस घटना के बाद इस तरह से पहली बार घर से बाहर निकल रही थी फूलमतिया। रास्ते में जो भी महिला, पुरुष ,युवा, बच्चे मिल रहे थे सब रुक कर इसी को देख रहे थे और आपस में काना फूशी करते दिख रहे थे वही लड़की है न ? यह सब देख सुनकर का फूलमतिया खुद में सिमटती जा रही थी। भीतर —भीतर घबराई हुई सी। लेकिन साथ में दादी के आंचल पकड़े आगे बढ़ती फूलमतिया को हिम्मत मिल रही थी और बिना इधर—उधर निगाहें फिराये जैसे-जैसे आगे बढ़ रही थी, देखने वालों की संख्या बढ़ती जा रही थी। लोगों की फुसुर- फुसुर सब देख सुन रही थी। एक—एक बातें याद कर रही थी। वही गलियां, वही रास्ते, वही लोग, वही खेत—खलिहान सब कुछ वही है। सोच रही है फूलमतिया उसके जीवन में कितना कुछ बदल गया। हर ओर से उठती एक ही आवाज। कहीं मौन में, कहीं मुखर, कोई दबे स्वर में, कोई निगाहों से बस एक ही सवाल पूछ रहा था..यह वही है न? यहां तक की वीरान गलियां भी आवाज लगा रही हों, तेज हवाएं भी कुछ कह रही हों..यह वही है न?
फूलमतिया भले ही उपर से मौन दिख रही थी लेकिन उसके अंदर एक कोलाहल चल रहा था, खौफ था। यही सब सोचते स्कूल पहुंच गई फूलमतिया। स्कूल के बच्चों, शिक्षक की नजरें भी आज चुभ रही थी। उपर से शांत भीतर ही भीतर एक कोलाहल लिए तीसरे कक्षा में प्रवेश करती है। सबसे अंतिम पंक्ति में जाकर ज़मीन पर बिछी हुई दरी पर बैठ जाती है खिड़की के पास सभी बच्चे उससे देखने के लिए उस कमरे में बार—बार, आते—जाते हैं लेकिन फूलमतिया खामोश रहकर सब की कही-अनकही को सुनने का प्रयास कर रही होती है।
प्रार्थना की घण्टी लगी सभी बच्चे लाइन में आये लेकिन काजल अपनी जगह से नहीं हिली। बैठी ही रही। शिक्षक ने भी उसे कुछ नहीं कहा। क्लास लगा और सभी बच्चों को नए किताब दिए जाने लगे। फूलमतिया को भी तीसरी कक्षा की किताबें दी गई। एक हीं कक्षा में तीसरी से पांचवी तक के बच्चे बैठे थे। छुट्टी होने पर शिक्षिका घर छोड़ने के लिए साथ गई घर लौटते समय भी वह शिक्षिका का हाथ थामे सर नीचे झुकाकर सबकी नजरों से बचने की कोशिश करती रही। आज दीपू और गोलू उसके पीछे—पीछे आ तो रहे थे लेकिन वे दोनों भी झिझक से बात नहीं कर रहे थे। बस उसे देख कर खुश जरूर थे। उधर फूलमतिया लौटे हुए और भी असहज हो रही थी। मन में बहुत से विचारों का बवंडर तूफान मचाये हुए था। उधर घर आते ही चादर में समा गई। दादी और फूलमतिया की मां जब खेत से काम कर लौटी तो दादी ने पूछा काजल तूने खाना खाया क्या ? तुम ठीक तो हो? फूलमतिया अपनी दादी को पकड़ फफक फफक कर रोने लगी। फूलमतिया अब दस साल की हो गई है लेकिन उस हादसे ने काजल की केवल चंचलता हीं नहीं छीनी बल्कि उसका पूरा बचपन ही छीन लिया हो मानो। इस दर्द ने लोगों की चुभती निगाहों ने कम उम्र में ही फूलमतिया को पूरी औरत बना दिया था। वह लोगों के कानाफूसी और उसके पीछे छुपे भावों को समझने लगी। गलियों में पसरे सन्नाटे के पीछे छुपे भय को समझने लगी। इस दुर्घटना की पीड़ा ने उसके ज्ञानिद्रियों को झकझोर कर जगा दिया था। समय से पहले ही वह सही गलत समझने लगी। खुद से बातें भी करने लगी की अगर जिंदा रहना है तो खुद को मजबूत बनाना होगा। दादी के गोद लेटे फूलमतिया खाना बनाती हुई अपनी मां से पूछती है माँ क्या मुझे पूनम दीदी पढ़ना सीखा सकती है? पूनम मुहल्ले की लड़की है जो छोटे बच्चों को पढाती है और खुद भी हाई स्कूल में पढ़ती है। मां ने कहा ठीक है बात कर के देखेंगे। रात में सब सो गए लेकिन फूलमतिया को आज फिर नींद नहीं आ रही थी। स्कूल जाने आने एवं स्कूल में जिस तरह से लोगों ने उसे देखा और बोलते पाये गये कि यह वही लड़की है न… यह बात इसे परेशान करती रही न जाने कब नींद आई फूलमतिया को नहीं पता।
अगली सुबह फिर से तैयार हुई और दादी के साथ स्कूल गई। आज भी कमोबेश वैसा ही माहौल था। पूरे रास्ते वैसे हीं नजरें चुराती,बचाती, सर झुकाये स्कूल पहुंची लेकिन आज स्कूल का माहौल बदला हुआ था। बच्चों के साथ ही कुछ अभिभावक भी पहुंचे हुए थे। जैसे ही उन्हे यह पता चला कि की वह लड़की स्कूल आने लगी, तो वे उसे देखने स्कूल तक पहुंच गये। स्कूल इतना भरा हुआ पहले तो नहीं रहता था। अचानक इतनी भीड़ देखकर असहज हो गई फूलमतिया। आते हीं आपने कक्षा में चली गई और कल की तरह ही पिछली सीट पर बैठ गई । लोग अब दरवाजे से झांक—झांक कर चले जा रहे थे। आज बड़े बच्चे और अभिभावकों का तांता लगा रहा। शिक्षक ने समय होते हीं प्रार्थना की घंटी बजाई। फूलमतिया आज भी बाहर नहीं आई। सभी बच्चे अपने-अपने कक्षा में गए। शिक्षकों ने अभिभावकों एवं ग्रामीणों को जाने को कह दिया और बार बार झाँकने से मना किया। हाजिरी लगी। फिर मध्याह्ण भोजन का समय हुआ।
आज फूलमतिया बाहर निकली और पीपल के पेड़ के चबूतरे पर बैठ सिर झुकाए हुए खाना-खाने लगी। तभी संकुल से एक शिक्षक आये और काजल की तरफ देखते हुए कहा यही है वह लड़की? आवाज मानो फूलमतिया के कानों में जैसे टीस की तरह चुभी। फूलमतिया गुस्से में खाने की थाली दूर तक उछाल कर फेंक देती है और जितनी शक्ति थी उसके भीतर उतने ही जोर से चिल्लाती है हां मैं वहीं लड़की हूं। देखो, सब देखो मैं वही लड़की हूं सभी बच्चे डर गए और सभी शिक्षकों के हांथ—पांव फूल गए डर से।
तभी शिक्षिका स्टाफ रूम से दौड़ते हुए आती है और फूलमतिया को जोर से पकड़ कर अपने आंचल में छुपा लेती है और डरती हुई बोलती है शायद मैंने गलती की अभी इसे स्कूल नहीं लाना चाहिए था शिक्षिका के आंखों में डर के साथ साथ आंसू थे।
(दूसरी कड़ी..क्रमश: जारी।)
पटना जिले के परसा गांव के कुओं और पानी की व्यवस्था ने यूं बदला ग्रामीण जीवन

