अपनों ने यूं दी विदाई साथी पत्रकार शेष नारायण सिंह जी को

मंगरूआ
नयी दिल्ली: वरिष्ठ पत्रकार  और कॉलमिस्ट, देश और विदेश के राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर गहरी पकड़ रखने वाले शेष नारायण सिंह का शुक्रवार को सुबह निधन हो गया, वह कोरोना संक्रमित थे। उनका ईलाज ग्रेटर नोएडा के GIMS अस्पताल में इलाज चल रहा था। बीते दिन ही उन्हें प्लाज्मा थैरेपी दी गई थी, लेकिन उनकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। शेष नारायण सिंह के निधन पर राजनीतिक जगत के लोगों के साथ उनके पत्रकारिता से जुडत् साथियों ने भावभीनी श्रद्धांजली देते हुए उन्हें याद किया।
क्या कहती है पत्रकार बिरादरी

वरिष्ठ पत्रकार और राज्य सभा के उप सभापति हरिवंश ने सोशल मीडिया के जरिए शेष नारायण सिंह को याद करते हुए लिखा,” शेष नारायण सिंह के न रहने की खबर पीड़ादायी है. उन्होंने हिंदी पत्रकारिता में एक अलग पहचान बनाई। वह बहुत विनम्र, मिलनसार और सरोकारी इंसान थेै वह हम सब मित्रों के व्यक्तिगत जीवन में बड़ा सूनापन छोड़ गयेै हमारी श्रद्धांजलि। ईश्वर उनके परिवार को यह पीड़ा सहने की ताकत दे।


वरिष्ठ पत्रकार उमेश चर्तुवेदी ने लिखा कि, 1993 में दिल्ली आने से पहले तक बीबीसी सुनने का जबरदस्त रोग था..उन्हीं दिनों सुबह के कार्यक्रम में अखबारों की समीक्षा का एक कार्यक्रम आना शुरू हुआ। हफ्ते में करीब तीन दिनों तक एक गुरू गंभीर और स्पष्ट आवाज अखबारों की समीक्षा करती थी।
1994 में भारतीय जनसंचार संस्थान की ओर से हिंदी पत्रकारिता के छात्रों का बड़ा समूह नोएडा के राष्ट्रीय सहारा अखबार में दाखिल हुआ। मजबूरी थी कि उसके अलावा किसी भी बड़े संस्थान ने दो या तीन से ज्यादा लोगों को इंटर्नशिप की मंजूरी नहीं दी थी।
आज तो ज्यादातर संस्थानों में इंटर्न के साथ ज्यादातर सीनियर काम सिखाने के नाम पर बदतमीजी करते नजर आते हैं..हां, इंटर्न अगर खूबसूरत कन्या हुई तो उसे कुछ विशेषाधिकार जरूर मिल जाते हैं..लेकिन राष्ट्रीय सहारा में ऐसा नहीं था..सीनियर ना सिर्फ हमें काम सिखाते थे, बल्कि चाय-पकौड़ा भी खिलाते थे। उन दिनों सहारा में दो रूपए के कूपन पर भरपेट खाना मिलता था। सीनियर हमें वह कूपन भी खरीदवाते थे..
तब मेरी अंग्रेजी बहुत कमजोर हुआ करती थी..वैसे तो अब भी अच्छी नहीं है। लेकिन कह सकता हूं कि अब अंग्रेजी पढ़कर हिंदी में उसे लिख सकता हूं। इसके लिए मैंने सिर्फ और सिर्फ तब राष्ट्रीय सहारा के जनरल डेस्क पर ही काम किया।
लिखना-छपना तो शुरू हो चुका था, लेकिन इच्छा रहती थी कि संपादकीय पेज पर छपें। लेकिन सिंगल लीवर, सिंगल हड्डी और चालीस किलो के मुन्नानुमा इंसान को लोग गंभीर मानते ही नहीं थे..
उन्हीं दिनों पता चला कि सहारा के संपादकीय पृष्ठ जो सज्जन देखते हैं, वे वही हैं, जो बीबीसी पर सुबह अपनी गुरू गंभीर आवाज में अखबारों की समीक्षा किया करते हैं..जी हां, आपने ठीक समझा, वे शेष नारायण सिंह थे।
उन दिनों सहारा दफ्तर से रोजाना शाम को करीब साढ़े छह-सात बजे दिल्ली के लिए स्वराज माजदा बस चलती थी, जो निजामुद्दीन पुल से प्रगति मैदान वाया गोल डाकघर होते हुए जेएऩयू कैंपस जाती और फिर वहां से दक्षिण दिल्ली की ओर निकल लेती। तब जेएनयू के कई शोध छात्र सहारा के सोशल रिसर्च विंग आदि में काम करते थे।
अपने डेस्क इंचार्ज की कृपा से हमें भी बस में वापसी की यात्रा की सहूलियत होती थी। उसी बस में दरवाजे के बाद सबसे पहले वाली बाएं की सीट पर रोजाना शेष नारायण सिंह बैठा करते। एक दिन जब बस कुछ खाली हुई तो मैं हिम्मत करके उनके पास जा पहुंचा, उन्हें अपना परिचय दिया और संपादकीय पृष्ठ पर लिखने की इच्छा जताई।
मुझे आशंका थी कि वह झिड़क देंगे..लेकिन यह क्या..उन्होंने ना सिर्फ खुशी जताई, बल्कि आश्वासन भी दे दिया कि तुम्हारे लायक विषय सूझते ही बताता हूं।
इसके बाद उनका जो नेह और छोह मुझ पर कायम हुआ, आखिरी वक्त तक बरकरार रहा। उन्होंने सहारा के संपादकीय पेज पर न जाने कितने लेख, शनिवार को आने वाले मुद्दा पेज के लिए भर-भर पेज के कितने आलेख मुझसे लिखवाए होंगे, खुद मुझे ही याद नहीं।

आज संपादकीय पन्नों पर अपना नाम जो छपता रहता है, उसका सबसे बड़ा श्रेय शेष नारायण सिंह को जाता है।
बाद के दिनों में वे मेरे भैया हो गए थे। कुछ साल पहले तक मेरे योग्य बेहतर नौकरी की चिंता में वे लगातार परेशान रहे। वे कहा करते थे, तुम्हारी प्रतिभा के साथ न्याय नहीं हुआ।
पहली बार सहारा में नौकरी के लिए उन्होंने कोशिश की थी, लेकिन पता नहीं किसने अड़ंगा लगा दिया। दूसरी बार एनडीटीवी में जब वे गए तो मेरे लिए दो बार कोशिश की, लेकिन पहली बार पता नहीं किसने तो दूसरी बार उनके उस बॉस ने अड़ंगा लगा दिया, जिसकी वजह से उन्हें एनडीटीवी छोड़ना पड़ा।
शेष जी पर लिखने लगूं तो जगह कम पड़ जाएगी।
वे मेरी समझ पर कितना भरोसा करते थे, इसका अनुभव तब हुआ, जब वे अपनी बेटी के पास नार्वे गए। वहां उन दिनों संसदीय चुनाव हो रहा था। मुझसे लगातार पूछते कि इस पर कैसे लिखूं? मैं उन्हें झिड़कता था कि अब मैं आपको सिखाउंगा कि आप कैसे लिखेंगे? वे फौरन जवाब देते, तुम ज्यादा समझते हो। यह बताना छोटापन होगा कि मैंने उन्हें क्या बताया।
शेष जी की पढ़ाई-लिखाई लखनऊ और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में हुई थी। जेएनयू से निकलते ही उन्हें बढ़िया नौकरी मिल गई थी। बहुत कम लोग जानते हैं कि जब लोग क्रेडिट कार्ड नाम की चिड़िया से परिचित भी नहीं थे, तब उनकी कंपनी उन्हें क्रेडिट कार्ड देती थी। लेकिन उनका मन कंपनी की बजाय लेखन-पाठन की दुनिया में लगता था। लिहाजा वे पत्रकारिता में लौट आए और उन्हें बाद के दिनों में जबरदस्त संघर्ष करना पड़ा। वह लंबी कथा है।
आज के कुछ कथित बड़े पत्रकारों को देखता हूं और शेष जी को देखता हूं तो लगता है कि शेष जी कितने बड़े थे। आज के कुछ बड़े पत्रकार खुद को निरपेक्ष और निष्पक्ष होने का दावा करते नहीं थकते। लेकिन अतीत में वे पासवान के पेरोल पर थे या कांग्रेस के, यह तथ्य वे सब जानते हैं, जो आज से पंद्रह-बीस साल पहले तक रिपोर्टिंग की दुनिया में सक्रिय थे। किसके-किसके इन कथित निरपेक्ष और निष्पक्ष पत्रकारों ने पोतड़े धोए हैं, चरण चुंबन लिया है, इन पंक्तियों के लेखक ने अपनी आंखों से देखा है। लेकिन शेष जी अलग किस्म के पत्रकार थे। उन्होंने ना तो किसी का चरण चुंबन लिया और ना ही किसी विरोधी वैचारिक धुरी वाले राजनेता के कमर के नीचे वार किया। उनका समर्थन और विरोध व्यक्ति या वैचारिक राजनीतिक सोच के आधार पर नहीं, मुद्दा आधारित होता था। इसीलिए वे बीजेपी नेताओं के भी करीब थे तो कांग्रेसियों के भी। वामपंथी और समाजवादी भी उनकी परिधि में थे। वे मुद्दों पर समर्थन या विरोध के हिमायती थे, सिर्फ वैचारिक या व्यक्तित्व आधारित विरोध के दर्शन में उनका भरोसा नहीं था। इसीलिए कई बार वे मुद्दाहीन विरोध के लिए हड़काने से भी बाज नहीं आते थे।
शेष जी, स्वास्थ्य के लिहाज से बिल्कुल फिट थे। उनको न तो कोई व्यसन था और ना ही कोई बड़ा रोग। शायद ही किसी ने सोचा होगा कि वे इतनी जल्दी हमें छोड़ अनंत यात्री बन जाएंगे।
कोरोना काल में श्रद्धांजलि लिखने से बचता रहा…लेकिन शेष जी से अपना ऐसा रिश्ता रहा, कि खुद को रोक पाना असंभव हो रहा है..
बहुत कुछ याद आ रहा है…क्या लिखूं, क्या छोडूं की उधेड़बुन में सिर्फ अलविदा ही कह सकता हूं, अलविदा शेष जी..
जहां भी रहें, उसी तरह मस्त रहें, जैसे इस दुनिया में थे…

https://twitter.com/narendramodi/status/1390533488487518209

पत्रकार अरूण त्रिपाठी ने लिखा है कि, एक ‘सामंती’ समाजवादी का बिछोह’
शेष भाई(शेष नारायण सिंह) ने कहा था कि 26 अप्रैल को बेटी मृणाल की शादी में जरूर आएंगे। उनको एक ही दिक्कत थी कि उसी दिन अरविंद मोहन जी की बेटी अभिलाषा की शादी थी और उसका कार्यक्रम स्थल हमारे वाले से दूर था। लेकिन बाद में वह दिक्कत भी दूर हो गई। तब उम्मीद बंधी कि उनसे भेंट होगी। लेकिन एक दिन पहले मेसेज आया कि उनका नौकर पाजिटिव आया है इसलिए वे नहीं आ पाएंगे।
शायद यही वह मोड़ था जिसने उनके स्वास्थ्य पर धावा बोल दिया। उम्मीद थी कि उन्हें प्लाज्मा मिल गया है और वे जल्दी ठीक होकर आएंगे। लेकिन सुबह अंबरीश कुमार की पोस्ट से पता चला कि वे नहीं रहे। हाल में उन्होंने हमारी पुस्तक- राष्ट्रवाद देशभक्ति और देशद्रोह- की प्रस्तावना लिखी थी। उनकी टिप्पणी ने पुस्तक को सार्थक कर दिया था। इस बीच टीवी पर उनकी टिप्पणियां और न्यूज 18 में उनका ब्लॉग देखकर कम अच्छा लगता था। सवाल उठता था कि वे सरकार की गलत नीतियों की प्रशंसा क्यों कर रहे हैं। कभी फोन पर पूछने की हिम्मत नहीं हुई लेकिन लगता था कि तसल्ली से मिलेंगे तो जरूर पूछेंगे। पर वह मौका आया नहीं। मैं उन्हें बड़ा भाई मानता था और भरोसा रखता था कि जब भी कोई जरूरत पड़ेगी तो खड़े मिलेंगे। वे वैसा करते भी थे लेकिन खामोशी से। वे इतने समाजवादी थे कि विद्यार्थी उनके कंधे पर हाथ रखकर खड़े होते थे। लेकिन अवधी व्यक्ति की तरह एक सामंती स्वभाव भी था और जिसकी बात अच्छी नहीं लगती थी उसे डांट देने में कोई परहेज नहीं करते थे। हंसमुख, सरल और अभिव्यक्ति की कला में माहिर शेष भाई से हर कोई कुछ न कुछ सीख सकता था। उनका इस तरह जाना भीतर तक हिला गया है। शेष भाई आप कभी भुलाए नहीं जा सकेंगे। आप की स्मृति को नमन।

5 मई को कोरोना पीड़ित शेषनारायण सिंह के लिए प्लाज्मा डोनेट करने की अपील करते हुए रवीश कुमार ने लिखा था, ‘मुझे अंदाज़ा नहीं था कि लोगों की मदद लिखते लिखते किसी बेहद करीबी की भी मदद लिखनी होगी। शेष नारायण सिंह हमारे पूर्व सहयोगी हैं। काफ़ी वरिष्ठ हैं। इनसे काफ़ी कुछ सीखा है। आज शेष जी को प्लाज़्मा की ज़रूरत है। मुझे पूरा यक़ीन है कि आप लोग उनके लिए जान लड़ा देंगे और प्लाज़्मा की कमी नहीं होने देंगे। केवल AB+ डोनर चाहिए।
उनके न रहने पर रवीश कुमार ने लिखा…
शेष जी…

ज़िंदगी की इमारत अनेक लोगों के दम पर टिकी होती है। अलग अलग समय में कुछ लोग आपकी बुनियाद में खाद-पानी डाल जाते हैं। हरा कर जाते हैं। मेरी ज़िंदगी में वो इतनी तरह से शामिल हैं, इस हद तक मेरी ज़िंदगी में भरे हुए हैं कि उनके नहीं रहने की ख़बर के लिए कोई जगह नहीं बची है। उनके बग़ैर इन स्मृतियों की गठरी बंद हो गई है। अचानक कुछ याद नहीं आता या फिर इतना कुछ याद आ जाता है। पतंग की डोर जैसे अचानक कट गई है। देर तक उस पतंग को ओझल होते देख रहा हूं। इतना कुछ था कि रोज़ या कई महीनों तक मुलाकात की ज़रूरत ही नहीं रही। यह तब होता है जब आप होने को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हो जाते हैं। हर दिन किसी के नहीं रहने की इतनी ख़बरें आती हैं कि शोक अब भीतर गहरे बैठने लगा है। बाहर नहीं छलकता है। उसके बाहर आने का जैसे ही वक्त होता है, फिर किसी के चले जाने की ख़बर आ जाती है। किसी को बुढ़ापे में नौजवान की तरह देखना हो तो आप शेष जी से मिल सकते हैं। अब नहीं मिल पाएंगे। वो हमेशा नौजवान ही रहे। शेष जी, बहुत मिस कर रहा हूं।
वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल ने उनके निधन की सूचना साझा करते हुए लिखा है, ‘विद्वान पत्रकार श्री शेषनारायण सिंह का जाना स्तब्ध कर गया। वे हमारी पीढ़ी के सर्वाधिक विज्ञ पत्रकार थे। कल पता चला था कि उनके लिए प्लाज़्मा का इंतज़ाम हो गया। निश्चिंत था कि वे जल्दी ही स्वस्थ हो कर घर पहुंच जाएंगे। सोचा था कि कोरोना के बाद एक दिन उनके दर्शनों हेतु ग्रेटर नोएडा जाऊँगा। पर वे बचाये नहीं जा सके। शेष जी की स्मृतियों को नमन।’ वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम शेषनारायण सिंह के निधन पर कहते हैं, ‘हम सबके प्रिय शेष नारायण सिंह भी चले गये।’

https://twitter.com/myogiadityanath/status/1390544612456996873

साथी पत्रकार जयशंकर गुप्त लिखते हैं… ·
मन तो इससे पहले भी कई अवसरों पर व्यथित और विचलित हुआ लेकिन आज की तरह अग्रज शेषनारायण सिंह जी के निधन के बाद दिल्ली में हमने खुद को इतना असहाय और अनाथ शायद ही कभी महसूस किया हो! शेष जी हमारे गार्जियन, हमारी ताकत थे। बड़े पत्रकार थे लेकिन उससे बड़े सहृदय और मददगार इन्सान थे। उनका बड़प्पन ही था कि हमारे बारे में सार्वजनिक मंचों पर और सोशल मीडिया पर भी अक्सर कुछ अतिशयोक्तिपूर्ण बोल जाते, लिख जाते और हमारे विरोध जताने पर डांट देते, ‘चोप्प रहिए। मुझे मालूम है कि किसके बारे में क्या लिखना और बोलना है।’ हम दोनों देशबंधु अखबार से जुड़े रहे। वह हमारे राजनीतिक संपादक थे।
प्रेस क्लब में हों या किसी महंगे होटल-रेस्तरां में, मुझे याद नहीं कि खाने की टेबल पर उन्होंने मुझे कभी बिल भुगतान करने की छूट दी होगी। यह बताने पर भी कि इतना सक्षम और समर्थ तो हूं ही कि इस बिल का भुगतान कर सकूं, वह सार्वजनिक तौर पर भी डांट देते, ‘आप मुझसे छोटे हैं, अनुज हैं, वही रहिए।’ किसी राजनीतिक विमर्श में मतभेद होने पर (ऐसा बहुत कम ही होता था) वह हमारी बात मान लेते थे। कहते थे, ‘अब जयशंकर कह रहे हैं तो ठीक ही कह रहे होंगे।’ मेरे बच्चों को भी वह उसी शिद्दत से प्यार करते थे जैसे कोई गार्जियन अपने भतीजे-भतीजियों से करते हैं। अब यह सब कौन करेगा! कौन हमें स्नेहिल झिड़कियां देगा। कौन हमारे हर संघर्ष में मजबूत दीवार की तरह हमें ताकत देगा।
शेष जी, अभी हम सबको आपके गार्जियनशिप और मार्गदर्शन की और बहुत आवश्यकता थी। आप हमारी यादों में पूर्ववत अपनी चिर परिचित मुस्कराहट और झिड़कियों के साथ रहेंगे, हमेशा। नतशीष नमन। अश्रुपूरित आदरांजलि।

वरिष्ठ संपादक त्रिभुवन ने लिखा है, ‘अलविदा, मेरे प्रिय शेष नारायण सिंह! उदयपुर की वह आख़िरी, लंबी और यादगार मुलाक़ात कभी नहीं भूल पाएगी! आपसे हुई बातें भी कहां भूलूंगा। आपसे निरन्तर मिलने वाला बल अब कहां से आएगा। प्रेम का वह प्रवाह तो रुक ही जाएगा। दुःखद।’
कवि और लेखक मदन कश्यप कहते हैं, ‘पत्रकारिता में शेषनारायण सिंह के जैसे समझदार और शालीन लोग कम ही हैं। यह कैसा समय आ गया है,जाने किन-किन को अलविदा कहना पड़ेगा! नमन!!’
गीता श्री लिखती हैं..
सोचा था …
किसी को श्रद्धांजलि नहीं दूँगी। बहुत हो गया। पिछले दिनों इतने करीबी गुजरे कि दामन ख़ाली हो गया। आंखें पथरा गई हैं। रोते हैं मगर आंसू नहीं, सूखे पत्ते झरते हैं।
हर सुबह अब जागने से डर लगने लगा है। खबर जैसे इंतज़ार में बैठी रहती है। कोई सुबह ख़ाली नहीं। मृत्यु को रोज़ हमारे लोग चाहिए।
घनिष्ठ मित्र अरुण पांडेय चले गए।
पत्रकार साथी अशोक प्रियदर्शी चुपचाप चले गए।
आज सुबह मेरे अभिभावक -मित्र पत्रकार शेष नारायण सिंह चले गए. कल उनके प्लाज़्मा का इंतज़ाम भी हो गया था। हम आश्वस्त थे कि अब ख़तरा टल गया है, वे ठीक हो जाएंगे। अस्पताल से बाहर आकर अपने ठेठ देशी अंदाज में कहेंगे – ई ससुर , कोरोनवा हमको काहे धर लिया… हम ससुरे को पछाड़ दिए। “
इसी अंदाज में वे बातें करते थे। हमेशा परिहास के मूड में और अपने देशी अंदाज में। इतना पढ़ा लिखा इंसान हमेशा अपने को देशी अंदाज में रखता था। उनसे गांव -घर की ख़ुशबू आती थी। मेरे लिए हमेशा अभिभावक की तरह रहे। पिछली यात्रा हमने शिमला की साथ की थी। साथ गए और लौटे।
साथ तो हमारा नब्बे के दशक से था। जब वो राष्ट्रीय सहारा अख़बार संभाल रहे थे। मुझे बुला कर कला दीर्घा कॉलम लिखने को कहा। जो दो साल तक मैंने वहां लिखा। इस कॉलम की भी कहानी है. वहां उनकी टीम मुझे ये कॉलम देने से हिचकिचा रही थी। शेष जी ने मुझसे कला पर एक छोटा लेख लिखवाया और अपनी टीम के सामने रख दी। सबने पढ़ा और फिर सब तैयार हो गए। एक नयी पत्रकार से एक बड़ा अख़बार इतना महत्वपूर्ण कॉलम लिखवा रहा था… सब हैरान थे। मैं खुद यक़ीन नहीं कर पा रही थी। शेष जी को मुझ पर जाने कैसे यक़ीन हुआ। यह यक़ीन जीवन भर बरकरार रहा।
यही नहीं… बाद में जब मैंने एक अख़बार ज्वायन किया, संसद कवर करने लगी तो वहां रोज़ उनसे मुलाक़ात होती। हम साथ ही घूमते और वहां कैंटीन में खाते। एक दिन उनके पास तीस रुपये कम पड़ गए। मैंने तीस रुपये दिए- हाथ में लेते हुए बोले – भाई लोगों , गीता से मैंने अपने तीस रुपये उधार के वापस लिए, बचे 70.. बोलिएगा , जल्दी वापस कर दे। वहां कुछ पत्रकार बैठे थे। सब हंसने लगे। मैं खुद अकबका गई। ये देखो… उल्टी बात कर रहे।
इसके बाद हर रोज़ या जब कभी कहीं मिलते तो छेड़ते – गीता, तुम मेरे 70 रुपये कब वापस कर रही हो? करोगी कि नहीं। हम सबको बोल देंगे, देखिए भाई लोग, ये मोहतरमा मेरा 70 रुपया उधार वापस नहीं कर रही।
मैं कहती- आप मेरा 30 रुपया पहले दीजिए , फिर देती हूं।
यह घटना इतनी रोचक हो चली कि जहां भी मिलते- माहौल में तीस और सत्तर का चुटकुला चलता। कुछ लोग सीरियसली उधार समझते। फिर शेष जी मामला बताते। मने हंस हंस के सबका बुरा हाल।
अभी ये लिखते हुए मुझे आपकी आवाज़ सुनाई दे रही है… और हम दोनों की रट भी … तीस दीजिए, नहीं पहले तुम मेरा 70 वापस करो…
यह उधार हम दोनों का एक दूसरे पर रह गया।
शेष जी …
जब वहां मिलेंगे … फिर से ठहाका लगा कर उस लोक को भी कंफ्यूज्ड कर दीजिएगा। वहां भी आपके जाने से माहौल देसी और मज़ेदार हो गया होगा। आपकी आत्मीयता वहां छलक रही होगी।
अनेक स्मृतियां हैं आपकी। क्या क्या लिखूँ? कितने मंचों पर साथ रहा। आप भरोसे की तरह मेरे साथ खड़े रहे। मुझे अहसास दिलाते रहे कि मैं बहुत गुणी हूं।
याद है-
प्रेस क्लब में एक पत्रकार मित्र ने पूछा – कहां ग़ायब हो गीता?
आपने कहा- “हमारी लड़की साहित्य में बहुत अच्छा कर रही है। यहां धाक जमा कर हमने वहाँ काम पर लगा दिया। इसको पढिए तो आप लोग…!
उस दिन दीवाली मेला था…आपने दीवानों की तरह भाभी और बेटियों के लिए साड़ियां ख़रीदी, जोया के स्टॉल से। मेरी पसंद आपको इतनी पसंद आई कि बाद में भी जोया के यहां से आपने वो कलाकारी वाली साड़ियां मँगवाई.
मैं हैरान। कितना ख़रीद रहे।
अरे गीता… तुम्हारी भाभी को बहुत पसंद आई तुम्हारी पसंद. तुम तो मुसीबत करवा दी हो.. और मंगवाए का आदेश हुआ है…”
भाभी के साथ शिमला जाते-आते हम इस शॉपिंग पर बातें करते और हंसते।
वो आपकी कलाप्रियता पर बात कर रही थींै
क्या क्या लिखूँ…
अपनापन की कोई तस्वीर बनती तो आपका चेहरा बनतौ
आप मेरे जीवन के देशी राग थे… बजते थे तो पराया देश अपना गांव लगने लगता था। हम सब छोड़ कर आए थे, जिन लोगों ने अनजान दुनिया को हमारे लायक़ बनाया … उनमें एक आप थे.
विदा नहीं दूंगी मैं…. उठिए और ठहाके लगाइए…

वरिष्ठ पत्रकार निशिकांत ठाकुर लिखते हैं…

शेष बाबू से मेरे संबंध वर्ष 2000 के आस पास हुआ था । नोएडा के दैनिक जागरण कार्यालय में मैं बैठा था । जनरल मैनेजर अरुण सिंह के साथ आए शेष बाबू (शेष नारायण सिंह) ने आकर परिचय कराया । परिचय के दूसरे ही क्षण ऐसा लगा की हमलोग वर्षो पुराने जानकर है । इतना सहज और सरल तथा अपनापन से भरपूर की दोस्ती का जोसिलसिला शुरू हुआ वह आज सुबह ईश्वरीय हाथों द्वारा छीन लिया गया । किसी भी तरह से विश्वास करना कठिन था की सच में शेष नारायण सिंह नही रहे ।
मैं अपने बेटे बहु के पास मुंबई में था की घंटी बजी देखा तो ओम प्रकाश तिवारी और शेष बाबू खड़े थे । बताया की वह अपनी बेटी से मिलने आए हैं और ओमप्रकाश तिवारी उनके पुराने मित्र हैं। मुम्बई के ढेरों संस्मरण सुनने सुनाने के बाद दोनो चले गए , लेकिन फोन पर जो बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ वह लगातार चलता रहा । आज कल उनका झुकाव गांव की तरफ अधिक था वहा अपने बच्चों पोते पोतियों के साथ खूब मस्ती करते हुए वीडियो पोस्ट करते रहे थे । कुल मिलाकर अपने जीवनकाल का सुख भोग रहे थे । आज भी उनकी दी हुई हस्ताक्षरित किताब निशानी के रूप में मेरे पास है ।
उन्हे विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए भाव विह्वल हो रहा हूं और ईश्वर से प्रार्थना करता हूं की वह उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे तथा परिवार को इस दारुण दुख को सहने की शक्ति दे। दुख की इस घड़ी में हम सपरिवार परिवार उनके साथ खड़े हैं।
बीबीसी के पूर्व पत्रकार ​मणिकांत ठाकुर ने लिखा है कि
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जिनकी पत्रकारिता अक्सर विशिष्टता के साथ उभर आती थी और जो बहस/विश्लेषण में उतरते थे तो कभी निरर्थक नहीं लगते थे, ऐसे शेषनारायण सिंह के अब नहीं रहने की सूचना मुझे गहरा आघात दे गयी है। उनसे हुई मुलाक़ातें/बातें याद आने लगीं हैं। विदा मित्रवर।

वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह ने इन शब्दों के साथ शेष जी को याद करते हुए लिखा है कि…

कल प्लाज्मा की व्यवस्था के बाद लग गया था कि अब संकट टल गया। लेकिन आज की भोर उनके न होने की खबर लाई। मेरा शेषजी के साथ संपर्क 1987 से था। तब वे पत्रकारिता में नही थे। बाद में उदयन शर्माजी से मेरा परिचय उन्होंने ही कराया था। बहुत सी यादें हैं।उनका न होना पत्रकारिता का बड़ा नुकसान है। सादर नमन।

वहीं पत्रकार अनिल सिन्हा लिखते हैं..
शेष नारायण सिंह नहीं रहे। आईएनएस की सीढ़ियों से उतरते-चढ़ते या प्रेस क्लब में आते-जाते अपने जीवन, संघर्ष और संबंधों के बारे में बता दिया करते थे। एक बार उनके चलने में कमजोरी दिखी तो बताया कि चिकिनगुन्या के शिकार हो गए थे। फिर फिजियोथेरेपी और जिम के किस्से। संबंधों में गर्मी और मिठास घोलने का उनका अपना तरीका था। खस्ताहाल स्वास्थ्य व्यवस्था आसपास के लोगों को कोरोना का शिकार होने दे रही है। कई मित्र और परचित चलते-चलते अलविदा कह चुके हैं। शेष नारायण जी को नमन जो कभी भी बड़े भाई होने का अपना गौरव नहीं छोड़ते थे।


देशबंधु के राजीव रंजन श्रीवास्तव लिखते हैं…
शेष जी Shesh Narain Singh भी आज साथ छोड़ गए। कोरोना ने उन्हें भी नहीं छोड़ा। शेष जी का जाना मेरी व्यक्तिगत क्षति है। 2011 में शेष जी देशबन्धु से जुड़े और उसके बाद से हमेशा उन्होंने एक अग्रज और मेरे लोकल गार्जियन की भूमिका निभाई। हर दुःख-सुख के सहभागी रहे। पिछले साल दिसंबर में जब ललित सुरजन जी अचानक साथ छोड़ गए, तब भी शेष जी ने काफी सहारा दिया। उनका साथ हर पल बना रहा। मगर अब न ललित जी हैं और न ही शेष जी.. अब सिर्फ स्मृतियां शेष हैं। विनम्र श्रद्धांजलि। ईश्वर आपकी आत्मा को शांति प्रदान करे।

विनिता यादव लिखती हैं… ·
शेष नारायण सिंह जी ये वो नाम है जिनमें मैंने मीडिया में अपना परिवार पाया है। जब भी आपसे बात करती या आपको पास पाती बस लगता जैसे किसी बड़े का हाथ सर पर है अब सब ठीक है। और आपने आज वो हाथ हटा लिया। आप बोलते थे की मैं हिम्मत वाली हूं, हारूंगी नही लेकिन आप आज इस बीमारी से हार गए। आपने मुझमें हमेशा विश्वास को भरा, मैं आपके विश्वास को कभी हारने नही दूंगी,वादा है आपसे।
याद है आपको एबीपी के न्यूज़ रूम में आप दूर से मुझे लीडर बुलाते थे। कितना प्यार आपने दिया। मुझ हिम्मत दी हमेंशा । मैं मान नही सकती मेरा हौसला चला गया “बेटा” जब आप बोलते थे तो सुकून मिलता था।
वरिष्ठ पत्रकार संजय राय लिखते हैं…पत्रकार शेष नारायण सिंह जी के निधन की खबर सुनकर दिल को बहुत कष्ट हो रहा है। जब भी मिलते थे, उनके चरण स्पर्श करके आशीर्वाद लेता था। ऊर्जा से भरपूर उनका व्यक्तित्व हम सबके लिए फील्ड में उतरकर काम करने को प्रेरित करता था। जब भी मिला, उनका विशेष स्नेह अनुभव किया। सर आप जहां भी रहोगे आपके इर्द गिर्द हमेशा सकारात्मक
किसान मोर्चा के प्रवक्ता राकेश सिंह लिखते हैं,
‘का हो राकेश कईसे अहा’ दिल्ली में इस तरह कुशल क्षेम पूछने वाले वह इकलौते थे, पैर छूते तो सर पर जिस स्नेह से हाथ रखते जैसे घर का मुखिया बच्चों को स्नेह करता है…दिल्ली में अब कौन पूँछेगा ‘का हो राकेश कईसे अहा’


वहीं अमिताभ भूषण ने लिखा है कि
सवाल का सलीक़ा सिखाने वाले ,ता उम्र तमीज़ और तर्क की पाठशाला रहे मेरे गुरु आदरणीय शेष नारायण सिंह जी नही रहे…आपको अंतिम प्रणाम कैसे कहूं? माफ़ी पर ये बदतमीज़ी है सर ,आपको ऐसे नही जाना था सर। आप सी टिपण्णी आप सा हौसला आप सा आशीष अब कौन देगा सर? आप पत्रकारिता की पाठशाला भर नही थे सर ,आप मे पिता,गुरु ,दोस्त सब एक साथ पाया था मैंने ,आप भरोसा ऐसे नही तोड़ सकते है सर ,आपको लौट कर आना था सर। लौट आइए सर plz,आपका होना बहुत जरूरी है सर।

 

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