पिछड़ता ही जा रहा है गांवों में बसने वाला भारत

के सी त्यागी, जदयू नेता

  • उपभोग का अंतर बता रहा है कि गांवों और शहरों के जीवन का फर्क कितना और कैसा है?
  • ग्रामीण क्षेत्रों की आय अगर महंगाई दर के अनुपात में निकाली जाए, तो इसमें लगातार कमी ही दिखाई देगी।


आर्थिक विकास व उपभोग के उपलब्ध आंकड़े दर्शाते हैं कि देश में ग्रामीण लोगों की माली हालत और बुनियादी वस्तुओं के उपभोग की स्थिति शहरी लोगों के मुकाबले बेहद पिछड़ी अवस्था में है। आर्थिक उदारीकरण के दौर में शहर विकास की धुरी बनकर उभरे हैं, जिससे गांव और शहरों के बीच असमानता बढ़ी है। राष्ट्रीय आय में एक बड़ा अंश ग्रामीण क्षेत्र का होने के बाद भी गांव बहुत पीछे हैं। इसके बावजूद यह कहा जा रहा है कि गांव व शहर में आयकर के मामले में भेदभाव न कर कृषि आय को भी आयकर के दायरे में लाया जाना चाहिए। नेशनल सैंपल सर्वे संगठन (एनएसएसओ) की ताजा रिपोर्ट देश के ग्रामीण इलाकों और शहरी जीवन के बीच की गहरी खाई को दर्शाती है। दोनों के बीच खर्च और उपभोग के स्तर व परिमाण के मामले में गहरा अंतर है। रिपोर्ट बताती है कि शहरी आबादी और ग्रामीण आबादी के खर्च करने की प्राथमिकताएं भिन्न हैं। एनएसएसओ की रिपोर्ट यह भी बताती है कि शहरीकरण सकारात्मक कारणों से, मसलन बेहतर जीवन की आकांक्षा के कारण नहीं बढ़ा, बल्कि गांवों की जिंदगी इतनी कठिन हो गई है कि लोग वहां से शहरों की तरफ पलायन करने के लिए मजबूर हैं।

एनएसएसओ रिपोर्ट बताती है कि 2011-12 में दालों की प्रति-व्यक्ति खपत ग्रामीण क्षेत्रों में 783 ग्राम और शहरी क्षेत्र में 901 ग्राम दर्ज की गई थी। 118 ग्राम का फर्क इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि ग्रामीण लोगों के लिए दाल ही प्रोटीन का प्रमुख स्रोत है। ग्रामीण लोगों में प्रति व्यक्ति अंडे की खपत प्रतिमाह 1़.94 व नगरों में प्रतिमाह 3़18 दर्ज की गई। इसी रुझान को हम खाद्य तेलों में देख सकते हैं और फलों में भी। चाय पर खर्च प्रति-व्यक्ति प्रतिमाह ग्रामीण भारत में करीब 28 रुपये और शहरी क्षेत्र में लगभग दोगुना यानी करीब 48 रुपये था। बात अगर कपड़े, शिक्षा और चिकित्सा की करें, तो यह विषमता और भयावह नजर आती है। ऐसा नहीं है कि विषमता केवल ग्रामीण और नगरीय क्षेत्रों के बीच ही है। विभिन्न सामाजिक-आर्थिक वर्गो के औसत मासिक प्रति-व्यक्ति उपभोग, व्यय में भी भारी असमानता दर्ज की गई है। ग्रामीण भारत में अनुसूचित जनजाति के लिए यह व्यय अगर 1,122 रुपये था, तो अनुसूचित जाति के लिए 1,252 रुपये और अन्य पिछड़ी जाति के लिए 1,439 रुपये था। जबकि शहरी भारत में अनुसूचित जनजाति के लिए यह 2,193रुपये, अनुसूचित जाति के लिए 2,028 रुपये, और अन्य पिछड़ी जाति के लिए 2,275 रुपये था। इन आंकड़ों से असमानता स्पष्ट है। हमारे यहां आय को लेकर कभी कोई सर्वे नहीं हुआ। एनएसएसओ ने लोगों के व्यय के आधार पर आय का आकलन करने का प्रयास किया है। इससे उनकी आय का सटीक अनुमान लगा पाना मुश्किल है। व्यय आधारित आय सर्वे में भी काफी गंभीर स्थिति दिखाई पड़ी है। दस वर्षो के दौरान देश की औसत वार्षिक आर्थिक विकास दर 7.5 फीसदी रही, जबकि लोगों की आय में 2.5 फीसदी का भी औसत वार्षिक इजाफा नहीं हुआ।

ग्रामीण क्षेत्रों की आय अगर महंगाई दर के अनुपात में निकाली जाए, तो इसमें कमी ही दिखाई देगी। पिछले तीन वर्षो में कृषि क्षेत्र की विकास दर 1.7 दर्ज की गई। सरकार ने वर्ष 2022 तक खेती की आय को दोगुना करने का भी लक्ष्य रखा है। यह लक्ष्य पूरा होता नहीं दिख रहा है। ऐसे में, ग्रामीण और नगरीय क्षेत्रों की आय विषमता में और भी अधिक वृद्धि की आशंका है। शहरी व ग्रामीण आबादी के बीच खर्च और उपभोग के मामले में मौजूद विषमता का बड़ा कारण खेती की बदहाली और ग्रामीण इलाकों के लिए चलाई जा रही सामाजिक सुरक्षा-योजनाओं की नाकामी है। प्रति-व्यक्ति खाद्यान्न उत्पादन में कम वृद्धि, बिजली-सड़क आदि बुनियादी संरचनाओं की दुर्दशा और ग्रामीण रोजगार योजना तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली सरीखी योजनाओं के लक्ष्य-अनुरूप काम न करने के कारण भी ग्रामीण इलाके में लोगों की आमदनी में अपेक्षा के अनुरूप बढ़ोतरी नहीं हो पा रही है। गांव और शहर के अंतराल को पाटने, खाद्य सुरक्षा देने और ग्रामीण जनता को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए सामाजिक-आर्थिक आधार पर कोशिश करना आवश्यक हो गया है।(ये लेखक के अपने विचार हैं साभार:हिन्दुस्तान)

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