नल से जल नहीं निकला तो मुखिया जी नहीं लड़ सकेंगे पंचायत चुनाव

अमरनाथ झा

पटना: नल-जल योजना घपले घोटाले का खजाना है। लेकिन सरकार की टेढ़ी नजर इस योजना में भ्रष्टाचार करने वाले मुखिया पर है और ऐसे काहिल मुखिया को चुनाव लड़ने से वंचित करने का फरमान जारी हुआ है, जिनके यहां बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के महत्वाकांक्षी योजना यानी नल-जल योजना में कोताही बरती गई है, वैसे मुखिया जी की मुखियई चली जायेगी यानी पंचायत चुनाव नहीं लड़ सकेंगे जिनके यहां नल से जल नहीं निकला।
यह आरोप जब लोजपा अध्यक्ष चिराग पासवान ने लगाया तब इसे चुनावी राजनीति का हिस्सा माना गया था। पर योजना की हकीकत तभी से परत-दर-परत खुलती गई है। इस योजना में केवल आर्थिक घपले ही नहीं हो रहे, यह पंचायती राज संस्थाओं की स्वायतता पर भी सीधा हमला कर रहा है और भ्रष्टाचार को निचले स्तर पर तक प्रसार का माध्यम बना है।
इधर बिहार सरकार के पंचायती राज विभाग ने घोषणा की है कि नल-जल योजना को पूरा नहीं करने वाले पंचायत प्रतिनिधियों के आगामी पंचायत चुनाव में उम्मीदवार बनने से रोक दिया जाएगा। विभाग इसकी जानकारी प्राप्त कर रहा है कि किन ग्राम-पंचायतों और वार्डों में यह मुख्यमंत्री ग्रामीण पेयजल निश्चय योजना का काम पूरा नहीं हुआ है।
पंचायती राज अधिनियम में यह प्रावधान है कि निर्वाचित जन प्रतिनिधियों द्वारा दायित्वों का पालन में जान-बूझकर कोताही बरतने पर उन्हें पद से हटाया जा सकता है। सरकार इसी प्रावधान का आधार बनाकर नल-जल योजना को पूरा नहीं करने वाले प्रतिनिधियों को चुनाव लड़ने से रोकने के फेर में है। उन्हे पंचायत चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहराने का प्रावधान करने का प्रस्ताव विभाग तैयार करा रहा है।


मालूम हो कि नल-जल योजना का कार्यान्वयन ग्राम पंचायतों के अंतर्गत वार्ड प्रबंधन एवं क्रियान्वयन समिति द्वारा किया जा रहा है। इनका रखरखाव भी इन्हीं संस्थाओं को करना है। इसलिए जिन पंचायतों में काम पूरा नहीं हुआ, उन पंचायतों के जन-प्रतिनिधियों को अगला चुनाव लड़ने से रोका जा सकता है। इसे लेकर जिला पंचायती राज पदाधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे इस संदर्भ में जरूरी जानकारी एकत्र करें और विभाग को इसकी सूचना निश्चित रूप से दें। विभाग ने यह भी कहा है कि जनप्रतिनिधियों को बाकी बचे काम युध्द स्तर पर पूरा करने के लिए प्रेरित भी किया जाए ताकि उनके सामने चुनाव लड़ने से वंचित होने की अप्रिय स्थिति न आए।
इस योजना के कार्यान्वयन में पंचायत सेवक, मुखिया व वार्ड सेवक की मिलीभगत से बड़े पैमाने पर घपला होने की खबर आती रही है। इसकी आधिकारिक पुष्टि तब हुई जब पटना के तत्कालीन जिलाधिकारी कुमार रवि ने योजना के कार्यान्वयन की जांच कराया। जिले को 30 मुखिया जांच के घेरे में आए। ग्यारह पंचायतों में गडबड़ी जल्दी ही पकड़ में आ गई। बाकी में अभी जांच चल रही है। नल-जल योजना के साथ ही गली-नली पक्कीकरण योजना में भी गड़बड़ी हुई है। बताया जा रहा है कि संबंधित प्रखंड विकास अधिकारी ने काम की निगरानी सही ढंग से नहीं की। कुछ पंचायतों में पैसा रहते हुए भी मुखिया ने काम नहीं कराया तो कुछ में आवश्यकता से अधिक पैसा खर्च कर दिया गया। एक पंचायत में तो मुखिया ने पांच करोड़ रुपए खर्च कर दिए। एक वार्ड में नली-गली पक्कीकरण में 50 से 60 लाख रुपए खर्च दिखाए गए हैं। उस मुखिया के खिलाफ अथमलगोला थाना में प्राथमिकी दर्ज कराई गई है। दो अन्य मुखिया पर भी प्राथमिकी दर्ज होने की सूचना है, हालांकि अभी किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है।
इसीतरह मधुबनी जिले के 675 वार्डों में नल-जल योजना पूरी नहीं होने की खबर है। कई वार्डों में पंचायत सेवक, मुखिया व ठिकेदार की मिलीभगत से राशि गबन कर ली गई है। पंचायती राज विभाग के अपर मुख्यसचिव अमृतलाल मीणा ने जिलाधिकारी को निर्देश दिया है कि जिन मामलो की प्राथमिकी दर्ज हुई है, उनमें आरोपियों की गिरफ्तारी सुनिश्चित करें।
मुशहरी की बड़ा जगन्नाथ पंचायत में भी मामला आया सामने
इसी तरह का एक मामला मुशहरी की बड़ा जगन्नाथ पंचायत में भी सामने आई है। यहां के तीन वार्डों चार, 10 और 12 की नल-जल योजना के लगभग 32 लाख रुपये पंचायत की मुखिया मंजू देवी के पुत्र आदित्य कुमार के खाते में दे दिए गए।

नहीं थी पंजीकृत असेंबली
प्रखंड स्तर तक मामले की शिकायत में बीडीओ को इसमें कुछ भी गड़बड़ी नजर नहीं आई। मगर, अनुमडलीय लोक शिकायत निवारण अधिकार अधिनियम, पूर्वी में मामला आने के बाद मुखिया, पंचायत सचिव, तीनों वार्ड के वार्ड सदस्य एवं वार्ड सचिव को सरकारी राशि के दुरुपयोग करने का दोषी करार दिया गया। साथ ही लोक प्राधिकार को 15 दिनों में कार्रवाई का निर्देश दिया गया। जिला पंचायती राज पदाधिकारी को भी मामले में संज्ञान लेते हुए अपने स्तर से सभी दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने का आग्रह किया गया है। मगर आदेश के 15 दिन बीत जाने के बाद भी लोक प्राधिकार की ओर से कार्रवाई नहीं की गई।
मंशा पर उठे सवाल
मीनापुर के अमरेंद्र कुमार ने मामले की शिकायत दर्ज कराई थी। मामले की रिपोर्ट में कहा गया कि मुखिया द्वारा पुत्र के नाम से चेक काटा गया। मगर ध्यान दिलाए जाने पर तत्काल चेक वापस लेकर एजेंसी को दी गई। मुखिया ने बताया कि भूलवश चेक पुत्र को एजेंसी का लाभ दे दिया। जबकि वह पंजीकृत नहीं था। प्रखंड सांख्यिकी पदाधिकारी से परिवाद की जांच कराने में यह बात सामने आई कि योजना में प्राक्कलन के अनुसार वार्ड क्रियान्वयन एवं प्रबंधन समिति को राशि हस्तांतरित करनी है।

मगर नियम का उल्लंघन करते हुए वार्ड सदस्य और वार्ड सचिव ने मुखिया के पुत्र आदित्य कुमार के खाते में बड़ी सरकारी राशि हस्तांतरित कर दी। इसके लिए अनुमंडलीय लोक शिकायत निवारण पदाधिकारी पूर्वी ने दोनों को दोषी माना। वहीं 15 फरवरी 2019 को राशि भेजने और छह माह बाद दो अगस्त को राशि वापस लेने को गबन की मंशा प्रमाणित की गई। आदेश में कहा गया कि जब मुखिया पुत्र की एजेंसी पंजीकृत नहीं थी तो इतनी बड़ी राशि देने के पीछे गबन की मंशा थी। इसे देखते हुए पंचायत की मुखिया, पंचायत सचिव, मुखिया पुत्र, वार्ड सदस्य एवं वार्ड सचिव के खिलाफ कार्रवाई की जाए। डीडीसी मुजफ्फरपुर डॉ. सुनील कुमार झा ने कहा कि मामला गंभीर है। सरकारी योजना की इतनी बड़ी राशि किसी निजी खाते में नहीं दी जानी चाहिए। इसमें दोषियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई जाएगी। इसके अलावा लापरवाही के दोषियों पर भी कार्रवाई होगी।
योजना की समीक्षा में पंचायती राज विभाग ने पाया कि कई जगहों पर उस कंपनी के स्टेबलाइजर लगाने की सूचना दी गई है जो कंपनी बंद हो गई है। स्टेबलाइजर जल्द खराब हो जा रहे हैं जिससे मोटर बंद हो जाते हैं और पानी आपूर्ति का पूरा काम ठप्प हो जा रहा है। यह बात जिला पंचायती राज पदाधिकारियों के साथ बैठक में सामने आई। फिर निर्देश दिया गया कि केवल अच्छी कंपनी के स्टेबलाइजर और मोटर लगाए जाएं और इस काम की ठीक से निगरानी की जाए।
मालूम हो कि पंचायती राज विभाग द्वारा राज्य के 58 हजार वार्डों में नल-जल योजना का कार्यान्वयन किया जा रहा है। अभी लगभग 11 हजार वार्डों में ही काम पूरा हो सका है। बाकी जगहों पर काम चल रहा है। दूसरे 56 हजार वार्डों में इस योजना कार्यान्वयन लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग द्वारा कराया जा रहा है।

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