समय रहते समस्या को पहचान समाधान की दिशा में बढ़ने की है दरकार: छवि राजावत

  • कोरोना संकट बचाव एवं राहत तथा आत्मनिर्भर गांव” विषय पर तीसरी सरकार अभियान ने राजस्थान के प्रतिनिधियों के साथ आयोजित किया वेबीनारसंतोष कुमार सिंह

संतोष कुमार सिंह

जयपुर: कोरोना महामारी के दौरान बड़ी संख्या में मजदूर गांव लौट चुके हैं। उनके रोजगार का सवाल मुंह बाये खड़ा है। महामारी का फैलाव रूकने का नाम नहीं ले रहा है। इस बीच गांव और गांवों के आत्मनिर्भरता का सवाल विमर्श के केंद्र में है। सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर गांव से जुड़ी और पंचायती राज को बदलाव का सूत्र मानने वाली संस्थाएं अपने—अपने स्तर पर प्रयास कर रही हैं। उसी में एक संस्था है डॉ चंद्रशेखर प्राण के नेतृत्व में चलाई जाने वाली तीसरी सरकार अभियान। जो लॉक डाउन के बाद डिजिटल माध्यम का प्रयोग करते हुए ‘‘कोरोना संकट बचाव एवं राहत तथा आत्मनिर्भर गांव” विषय पर अलग-अलग राज्यों में गांव-पंचायत में काम करने वाले लोगों के साथ मिलकर वेबीनार का आयोजन कर रही है। इस कड़ी में अबतक उत्तर प्रदेश, बिहार,झारखंड और मध्यप्रदेश, उत्तराखंड,पंजाब,हरियाणा, राजस्थान में गांव—गंवई के विकास और उत्थान को लेकर काम कर रहे लोगों से लगातार संवाद कर रही है कि ताकि गांव के तरक्की और आत्मनिर्भरता की राह तलाशी जा सके। पंचायत खबर इन सभी राज्यों में हुए संवाद को बारी—बारी से आपके समक्ष प्रस्तुत करेगा। पेश है राजस्थान में हुए संवाद की ये रिपोर्ट…
अन्य राज्यों की तरह ही राजस्थान में भी तीसरी सरकार अभियान द्वारा ग्राम विषयक वेबीनार में बड़ी संख्या में गांव की बेहतरी के लिए प्रयास रत चिंतको ने शिरकत की।


क्या कहते हैं डॉ प्राण
वेबीनार के आयोजन के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए अभियान के संयोजक डा.प्राण ने कहा कि कोविड-19 की महामारी ने दुनिया के अनेक देशों को विचलित कर दिया है। भारत में भी इस संकट के कारण जनजीवन अस्त व्यस्त हो गया है। अनेक लोग जो दूसरे राज्यों में अपनी रोटी और रोजी कमा रहे थे, उन्हें उनके मूल गांव में वापस लौटने के लिए मजबूर कर दिया है। लाखों की संख्या में इस तरह के मजदूर और कामगार लौटकर वापस अपने घर आये हैं।
इन मजदूरों की वापसी से संकट अधिक बढ गया है। एक तरफ तो इनमें वह लोग हैं, जो संक्रमित हैं, उन्हें उपचार की आवश्यकता है। दूसरे इन्हीं के परिवार और पड़ोस के लोग हैं, जिन्हें संक्रमित होने से बचाना है। दोनो भयभीत हैं। सरकार अपने स्तर पर कार्य कर रही है। किन्तु उतना पर्याप्त नहीं है। समाज को भी आगे आकर सहयोग करना होगा, तभी इस संकट को समाप्त किया जा सकता है। इसमें तत्काल राहत एवं बचाव के कार्य की आवश्यकता है। लोगों को रोजगार दिलाने और आत्मनिर्भरता बनाने के लिए भी कोशिश होनी चाहिए। इन दोनों कार्यों में पंचायत की क्या भूमिका होगी यह विचारणीय है।
ग्राम सभा की हो प्रभावी भूमिका
पर्व सांसद व विचारक डॉ महेश चन्द्र शर्मा ने कहा कि राजस्थान पंचायत के क्षेत्र में अग्रणी प्रदेश रहा है।यहां की पंचायत की लीडरशिप ताकतवर है। किन्तु सरपंच ग्रामसभा को अपनी ताकत नहीं मानता जब तक वह ग्राम सभा को अपनी ताकत नहीं बनाएगा तब तक वह सरकार के रूप में काम नहीं कर पाएगा। संविधान में ग्राम सभा है लेकिन ग्राम सभा होने में दशकों लग जाएंगे। गांव के लिए कानून बनाने का काम ग्राम सभा सदस्यों को करना चाहिए। ग्राम सभा का अस्तित्व होगा, तभी तीसरी सरकार अस्तित्व में आयेगी। इस संविधान संशोधन को समझें और प्रयास करें कि गांव में ग्राम सभा हो यदि नहीं होती तो इसकी शिकायत पैदा करें। ग्राम सभा को मुद्दा बनाएं। ग्राम सभा के बैठने का स्थान सुनिश्चित होना चाहिए। इसका अपना एक स्पीकर भी नियुक्त होना चाहिए। लगभग 40 वर्षों के बाद भी इस दिशा में कोई सार्थक प्रयास, सरकार की ओर से नहीं दिखाई पड़ रहा है। लोगों को भी तीसरी सरकार का एहसास नहीं है। उनकी नजर में सिर्फ एमएलए एमपी ही सरकार हैं। इस विषय पर लोगों को निरंतर जागरूक करने की आवश्यकता है।


पंचायतों की मजबूती से आएगा ग्राम स्वराज्य

उत्तरी दिल्ली नगर निगम की एडिशनल कमिश्नर डॉ रश्मि सिंह ने कहा कि सरकारी योजनाओं का कन्वर्जन करके हम वंचित वर्ग तक लाभ पहुंचा सकते हैं। शिक्षा, आत्मनिर्भरता और कन्वर्जन, यह तीन ऐसी चीजें हैं,जिनसे बदलाव लाया जा सकता है। हम समग्र विकास और ग्राम स्वराज्य की बात कर रहे हैं। इसके लिए हमें लोगों को जागरूक और पंचायत को सशक्त बनाना होगा, जिससे पंचायतें रिसोर्स मैपिंग करने में सक्षम हो सकें और विकास की योजनाएं बना सकें। सफलता के लिए अपने दायित्व को पहचानना अधिकारों को जानना और सामंजस्य के साथ काम करना आवश्यक होता है।
अधिकारों का प्रयोग करे पंचायत सरकार
मिशन समृद्धि के संस्थापक सदस्य योगेश एंडले ने कहा कि पंचायत एक सरकार है। उसको सरकार के अधिकार मिले हैं। हमें उनका प्रयोग करना चाहिए। इसके लिए पंचायत को सशक्त करना होगा। अपने भीतर हिम्मत और चेतना जगानी होगी। यह विश्वास करना होगा कि हम निर्णय कर सकते हैं। हम सरकार पर निर्भर नहीं है। हम अपनी समस्याओं का समाधान खुद करने में समर्थ हैं। छोटे-छोटे काम से शुरुआत करके सफलता अर्जित करनी होगी। यह सफलता हमारी शक्ति और पूंजी बनेगी। वहीं “मिशन समृद्धि ” के संस्थापक अरुण जैन ने कहा कि शहर में ही नहीं गांव में भी स्टार्टअप हो सकते हैं। किसान भी उद्यमी है। अब शहर दो घंटे की दूरी पर हैं। गांव में उत्पादन कर शहर में बेचा जा सकता है। मिडिल मैन को निकाल सकें तो ज्यादा फायदा मिल सकता है। जब बैठकर बात करेंगे तो बहुत सारे तरीक़े निकल सकते हैं। आज 40 लोग बैठे हैं, 40 से 40 गुना और फिर 1600 गुना अपनी ताकत बढा सकते हैं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में अच्छा योगदान कर सकते हैं।

पंचायत प्रतिनिधियों की क्या है राय

साडा ग्राम पंचायत की सरपंच छवि राजावत के अनुसार तीसरी सरकार अभियान एक अच्छा मंच है। हम लोगों को मिलकर काम करना चाहिए। एक कॉमन एजेंडा और माइंडसेट बनना चाहिए। मुख्य रूप से पंचायती राज के सशक्तिकरण के लिए काम करने की आवश्यकता है। इस समय हमें यह देखना चाहिए कि कैसे आगे बढ़ सकते हैं। समस्या गंभीर है, इसके बारे में लोगों को जानकारी देनी चाहिए एक ऐसा स्ट्रांग नेटवर्क हो, जो आवश्यकता पर सहयोग दे सके। गांव में समस्या के समाधान की मांग देर से होती है और उसका समाधान भी देर से निकलता है। जैसे जल संरक्षण की बात करें तो जब तक इस कार्य की योजना बनती है, तब तक बरसात का समय निकल जाता है। पंचायत को कार्य को चुनने और करने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए और इसके लिए पर्याप्त फंड भी उपलब्ध कराया जाना चाहिए। जिससे वह आवश्यकता अनुसार समय पर काम कर सकें।
अन्य प्रतिभागियों की राय

पंचायत व्यवस्था की शोधार्थी निमिषा ने कहा कि गांव में जन सहभागिता नहीं हो पाती। इसे कैसे बढ़ाया जा सकता है,इस पर रणनीति बनाई जानी चाहिए। इस संकट काल में युगांतकारी परिवर्तन देखने को मिल रहा है। लोग गांव की तरफ जा रहे हैं। सरकारी योजनाओं में प्रत्यक्ष हस्तांतरण और डिजिटल इंडिया आदि के माध्यम से कुछ जीवंतता आने लगी है लेकिन गांव के लिए व्यापक स्तर पर कार्य करने की जरुरत है। अंग्रेजों के 200 साल के शासन में लोगों को इतना प्रताड़ित किया गया है कि वह शासन से भयभीत हो गए हैं। इस भय के कारण शासन पर ही निर्भर हो गए। इस स्थिति से कैसे निकला जा सकता है, इस पर विचार और काम करने की आवश्यकता है आत्मनिर्भरता के लिए आवश्यक है कि छोटे उद्योगों की स्थापना करें। शिवकरन सैनी ने आत्मनिर्भरता के लिए किये जा रहे कार्यों के बारे में बताया। साथ ही प्रेमभट्ट ने राजस्थान में पानी की कमी पर चर्चा करते हुए कहा कि यहां वर्षा होती है लेकिन हम उस जल को बचा नहीं पाते। जल संरक्षण के लिए जमीनी स्तर पर कार्य करना होगा। यदि जल होगा तो कई कार्य किए जा सकते हैं।

आध्यात्मिक संस्था गायत्री परिवार शांतिकुंज हरिद्वार के वरिष्ठ विचारक वीरेश्वर उपाध्याय ने कहा कि तीसरी सरकार अभियान का प्रयास अच्छा है आप स्वावलंबी भारत का निर्माण करने का प्रयास कर रहे हैं। गांव की व्यवस्था इतनी समग्र हो कि वह परिपुष्ट विश्व का अंग दिखाई दे। “विश्वं पुष्टं अस्मिन ग्रामें अनातुरम्”। यह हमारी सोच है। संसाधनों को अर्जित करने की आतुरता के पीछे विश्व को परिपुष्ट करने का भाव रखना होगा। कार्य के साथ जो भाव होता है, वही महत्वपूर्ण होता है। यदि कार्य स्वार्थ प्रेरित ना हो कर परमार्थ प्रेरित है तो उससे सबका भला होता है। महत्वपूर्ण यह कि हमारा मिशन क्या है? हम भारत को स्वावलंबी बनाने वाले लोग हैं, या अपनी आवश्यकता तक सीमित हवसी लोग हैं, जो अनाप शनाप कमायी कर रहे हैं। अध्यात्म परिवर्तन में बहुत सहायक होता है। इससे जुड़ा आदमी परमार्थिक दृष्टि से सोचता है। यदि अमीरी बंट जायेगी, तो गरीबी घट जायेगी। हमें ऐसे लोकसेवी और उद्योगजीवियों की जरूरत है, जिनकी स्वयं की आवश्यकता नहीं के बराबर हो और वह अपनी क्षमता समाज को दे सकें। गांव के लोग यदि जीवन दाता हैं तो वह पिछड़े क्यों कहलाते हैं।यह धारणा बदलनी होगी। मानसिक गुलामी हटनी चाहिए। नयी तकनीक और तरीके से कृषि क्षेत्र में कार्य करने की आवश्यकता है।

विजय सिंह पालीवाल ने कहा कि जनसुनवाई में अर्जी लगाने पर भी समाधान नहीं होता। सरकार दबाव में काम करती है। जिसका दबाव होता है, उसका काम हो जाता है। इस संकट काल में भी देखिए कि सबसे पहले सरकार ने शराब और गुटके का व्यापार ही खोला गया। इसलिए दबाव बनाना चाहिए, एक प्रेशर ग्रुप बनना चाहिए। योजनाएं बनाने वालों को जमीनी सच्चाई पता नहीं होती। इसलिए योजनाएं ऊपर से बनती हैं और ऊपर ही ऊपर कागज पर चलती रहती है। सरकार ने एमएसएमई को प्राथमिकता दे रखी है लेकिन भ्रष्टाचार बहुत है। प्रत्येक क्षेत्र में पूंजीपति और बड़ी कम्पनियां ही लाभ उठा पा रही हैं।
स्निग्धा वैष्णव ने कहा की की राज्य सरकार पर निर्भरता समाप्त होनी चाहिए। स्वयं प्रयास करना होगा। विचार- विमर्श और संवाद करने की पहल बहुत सराहनीय है। इसी से रास्ता निकलेगा। प्रत्येक जिले मे कुछ गांव का चयन किया जाय और प्रत्येक गांव में 10 व्यक्तियों की पहचान कर उन्हें समूह में समूह जोड़ा जाय। इसमें चर्चा की जाय कि गांव वालों की क्या समस्याएं हैं। इसके निष्कर्ष के आधार पर कार्य की योजना बनायी जाय। प्रदीप पूनिया का कहना था कि इस तरह के संवाद के रुप में एक सार्थक शुरुआत हुई है। मनरेगा में नये प्रावधान किए जाने की आवश्यकता है। कुशल मजदूर गांव में वापस आए हैं, उनका ग्रामोत्थान की दृष्टि से उपयोग किया जा सकता है। ग्राम सभा में सदस्यों की सहभागिता बढ़े तभी सांझी आवाज और सांझे प्रयास होंगे। शॉर्ट टर्म और लोंग टर्म, दोनों तरह की योजनाएं बनानी पड़ेगी। प्रेशर ग्रुप भी बहुत जरूरी है।सोशल मैपिंग एवं ब्रेन मेपिंग का तरीका भी अपनाना चाहिए। यदि सही रणनीति बनाकर कार्य किया जाएगा तो धरातल पर परिवर्तन देखने को मिलेगा।
जबकी गोपाल सिंह परमार ने कहा कि आत्मनिर्भरता के लिए ग्रामीण स्तर पर कुछ नया प्रयास करने पर जोर देते हुए बताया कि राजस्थान में पानी की समस्या है।पानी के कारण लोग बाहर जाते हैं, पानी संरक्षित होगा तो रोजगार के अवसर बनेंगे।
उल्लेखनी है कि ग्राम विषयक इस वेबीनार में प्रदेश के कई जिलों से पंचायत प्रतिनिधि, सामाजिक कार्यकर्ता, स्वैच्छिक संगठनों के प्रतिनिधि, लेखक, चिंतक और पत्रकार सम्मिलित हुए।

 

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