अमितेश सिंह
रोविंग एडिटर पंचायत खबर
गाजीपुर: कोरोना महामारी से बचाव के लिए सोशल डिस्टेंसिग सबसे बेहतर फार्मूला बनके उभरा है। लोग लॉकडाउन में हैं। गांव बंदी है। शहर बंदी है, नगर बंदी है,बाजार बंदी है लेकिन इस बंदी ने हमारे अन्नदाताओं की कमर तोड़ दी है। बावजूद इसके कि दावा है कि सरकार अन्नदाताओं के बेहतरी के लिए बहुत सारे कदम उठा रही है। लेकिन वो कदम जमीन पर नहीं दिखाई देते तभी तो लॉक डाउन में देश के अलग-अलग हिस्सों से किसानों के कराहने की खबर आ रही है विशेष रूप से सब्जी किसानों की।
परेशान है भावरकोल के सब्जी किसान
ऐसी ही खबर आई है उत्तर प्रदेश के गाजीपुर और उसके आसपास के जिलों से जहां बेबस किसान अपनी भरे पूरे खेत पर ट्रैक्टर चलाने को मजबूर हैं। जी हां यह तस्वीर उस तस्वीर से अलग है जहां भावरकोल के कुछ किसानों द्वारा अपनी मिर्च और लौकी लंदन भेजे जाने की खबर आई थी। वहीं दूसरी तरफ कुछ किसान सब्जी लॉक डाउन के चलते सब्जी की बिक्री न होने से मेहनत और खून पसीने से उगाए गई सब्जियों के लहलहाते खेत खुद बर्बाद करा रहा है। उसी भावरकोल के रानीपुर कीजहाँ किसान हज़ारो की लागत से उगाई गई मूली की फसल को ट्रैक्टर के पहियों के नीचे रौदने को मजबूर हैं। बेबस और मजबूर अन्नदाता कोरोना के मार से बर्बादी के कगार पर है।
दरअसल लॉक डाउन के डाउन के चलते गाजीपुर – बक्सर आजमगढ़, मऊ और बलिया समेत आसपास के सभी सभी जिलों की सीमाएं सील कर दी गई है। नावों का परिचालन भी बंद कर दिया गया है। जिससे किसानों की मूली की खेप आसपास के जिलों में भेजना मुश्किल हो रहा है। तौफीक अहमद उर्फ गुड्डू ने बताया की कई बार बिक्री का प्रयास भी किया लेकिन असफल रहा। लॉक डाउन में कोई मूली एक रुपए किलो तक लेने के लिए कोई तैयार नहीं।
दरअसल लॉक डाउन में किसानों का हाल जानने पंचायत खबर टोली गाजीपुर जिले से तकरीबन 40 किलोमीटर दूर भाँवरकोल ब्लॉक के पातालगंगा सब्जी मंडी पहुँची। जहां क्षेत्रीय किसान मंडी में थोक भाव से सब्जियों की बिक्री कर मुनाफा कमाते थे। लेकिन कोरोना के चलते मंडी में खरीदार नदारद नजर आए। अचानक हमारी मुलाकात मंडी के बिल्कुल पास के गांव रानीपुर के किसान तौफीक अहमद उर्फ गुड्डू से हुई। गुड्डू मायूसी के साथ ट्रैक्टर और रोटावेटर से अपनी मूली की खड़ी फसल बर्बाद कर रहे थे।
क्या कहते हैं किसान
जब हमने इस बाबत किसानों से बातचीत की तो तौफीक अहमद उर्फ गुड्डू ने बताया, क्या करें.. बिक नहीं रहा। बक्सर बिहार सब बंद है। फसल खराब हो रही है। कितना इंतज़ार करेगे, बिकेगा की नहीं बिकेगा। पिछले 20 दिन से इंतजार कर रहा हूं की फसल बिकेगी, कुछ पैसे मिलेंगे, लेकिन बिक्री नहीं हो रही। अगली फसल भी तो बोना है। इसीलिए वह मेहनत से उगाई गई फसल को खुद रौदवाने को मजबूर हैं। क्योंकि अगली फसल भी तो बोनी है। उन्होंने बताया कि दो अलग-अलग खेतों में उन्होंने लगभग 3 बीघा मूली उगाई थी। अंदाजा था कि 2 से 3 लाख लाख का मुनाफा होगा। लेकिन लॉक डाउन के चलते ऐसा ना हो सका। उन्होंने बताया की मूली का एक खेत वह पहले ही बर्बाद करा चुके चुके हैं। दूसरा आज करा रहे हैं। उन्होंने बताया कि मूली की खेती में 80 से 85 हज़ार की लागत लगी थी। लेकिन लॉक डाउन के चलते लागत मूल्य भी निकलना मुश्किल है।
महेशपुर के ग्राम प्रधान मो0 जुबैद ने बताया कि पहले नाव से मूली बक्सर भेजी जाती थी। अच्छा मुनाफा हो रहा था। लेकिन लॉक डाउन में नावों का परिचालन भी बंद है। इसीलिए वह खून पसीने की कमाई मिट्टी में मिलाने को मजबूर हैं। गाजीपुर के इस किसान की बेबसी देखकर आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं कि लॉक डाउन में सब्जी उगाने वाले किसानों की बेबसी का आलम क्या है। उनपर क्या बीत रही है।
क्या कहते हैं जिलाधिकारी
गाजीपुर के जिलाधिकारी ओमप्रकाश आर्य से जब सब्जी किसानों के इस परेशानी की बात की गई तो उन्होंने कहा कि जनपद में किसानों की सुविधा के लिए एफपीओ बनाये गए हैं। किसानों से आग्रह है कि वे अपनी फसल एफपीओ के जरिए अपनी फसल बेचें। बावजूद इसके उन्हें कोई परेशानी आती है तो वे कंट्रोल रूम से संपर्क करें।
ऐसे में ज्यादातर किसानों का कहना है कि यदि जल्द ही सरकार के द्वारा सब्जी किसानों को राहत देने की दिशा में प्रयास नहीं किया गया तो पूरे इलाके के किसान को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा। साथ ही साथ आम उपभोक्ताओं को भले ही तात्कालिक फायदा हो लेकिन दीर्घकाल में सब्जियों के दाम में बढ़ोतरी की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। क्योंकि किसान सब्जी की फसल के बजाय दूसरे फसल की ओर जायेंगे फलत: सब्ज्यिों की किल्लत होगी और उपभोक्ताओं को परेशानी होगी।