तालाबंदी में आई गांव की याद, खत्म होते ही शहर लौटना चाहते हैं श्रमिक

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  • प्राक्सिस ने कराया अध्ययन, जाना लॉक डाउन में गांव वापस लौटने वाले श्रमिकों का हाल
  • बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश लौटने में कामयाब हुए 238 प्रवासी श्रमिकों से की गई  बातचीत

संतोष कुमार सिंह
नयी दिल्ली: शहर बसाने वाले अब गांव के रास्ते में हैं, ये चुनौती नहीं गांव के लिए अवसर है। केंद्र सरकार ने भी इन प्रवासी श्रमिकों को उनके गृह प्रदेश में भेजने की अनुमति दे दी हैं लेकिन यह सही मौका है देश के अलग—अलग हिस्सों में बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड के जो प्रवासी मजदूर रह रहे थे, उनकी ऐसी कौन सी चिंतायें थी जिसकी वजह से उन्हें अपना गांव, अपना जिला याद आया, अपना राज्य याद आया और वे किसी भी हाल में जान जोखिम में डालकर भी अपने गांव लौटने को बेताब थे। ऐसे बहुत सारे लोग किसी भी तरह बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड के अपने गांवों में लौटने में कामयाब रहे, जबकि हजारों की संख्या में मजदूर भोजन, पानी और बुनियादी सुविधाओं और स्थानीय लोगों द्वारा व सरकारी व गैर सरकारी तौर काम करने वाली संस्थाओं समूहों द्वारा आयोजित की जाने वाली सुविधाओं पर टिके रहे।


 जाना लॉक डाउन में गांव वापस लौटने वाले श्रमिकों का हाल
ऐसे ही प्रवासी श्रमिकों बातचीत कर व उनके जीवन व रोजगार से जुड़े विभिन्न पहलुओं को टटोलते हुए प्राक्सिस यानी इंस्टीट्यूट फॉर पार्टिसिपेटरी प्रैक्टिस द्वारा एक अध्ययन कराया गया और उस अध्ययन से तैयार किये गये रिपोर्ट से जो तथ्य उभर कर सामने आते हैं, उनसे उन सभी बिंदूओं पर प्रकाश पड़ता है जिसमें 25 मार्च, 2020 से भारत में लागू देशव्यापी तालाबंदी के मद्देनजर, कोविद -19 के प्रकोप को रोकने के लिए एहतियाती उपाय के रूप में, देश भर में स्थित बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड के हजारों प्रवासी श्रमिकों ने खुद को अनिश्चित स्थिति में पाया। यही कारण था कि आगामी दिनों में संभावित रूप से लंबे समय तक लॉकडाउन के अप्रत्याशित परिणामों से बचने के लिए हताश अवस्था में क्यों इन श्रमिकों ने घर जाना तय किया। देश के विभिन्न महानगरीय शहरों और राजमार्गों में बसों, ट्रेनों और परिवहन के अन्य साधनों की तलाश कर और बड़ी संख्या में वैसे श्रमिक जो कोई भी परिवहन का साधन न दिखने पर महामारी के संक्रमण की परवाह किये बिना हजारों किलोमीटर की पैदल यात्रा कर अपने गांव की ओर चल पड़े।

क्या था सर्वे का उद्देश्य
भारत में, कोविद -19 द्वारा देशव्यापी तालाबंदी के मद्देनजर प्राक्सिस यानी इंस्टीट्यूट फॉर पार्टिसिपेटरी प्रैक्टिस द्वारा अन्य सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर लॉक डाउन पीरियड में अपने राज्य यानी बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश लौटने में कामयाब हुए 238 प्रवासी श्रमिकों से बातचीत की गई और इस बातचीत के केंद्र में इन प्रवासी श्रमिकों द्वारा महानगरों से अपने गृह प्रदेश की यात्रा के दौरान होने वाली परेशानियों, परिस्थितयों और आगे की चिंतन और चेतना को समझने का प्रयास हुआ। भले ही इस बातचीत के दौरान जो सैंपल सर्वे हुआ उसकी संख्या कम है लेकिन प्रवासियों के लिहाज से समस्या की भयावहता पर प्रकाश पड़ता है और इससे समस्या को समझने में काफी मदद मिलेगी। इस अध्ययन से पलायन के पूरे परिवेश को समझने में मदद मिलता है।

क्या कहता है सर्वे
प्रैक्सिस द्वारा किये गये साक्षात्कार में जिन श्रमिकों से बात की गई उनमें 54 फीसदी  श्रमिक 20 – 30 वर्ष की आयु वर्ग के थे। इनमें 53 फीसदी अनुसूचित जाति से थे। जबकि इनमें से लगभग 86 फीसदी लोगों के पास अपने गृह प्रदेश में एक एकड़ से कम भूमि का स्वामित्व है और 29 फीसदी केवल कब्जा था जबकि जबकि 5 फीसदी बिल्कुल भूमिहीन थे। साक्षात्कार देने वालों में 93% हिंदू थे। अगर उन राज्यों की चर्चा करें जिन राज्यों से ये श्रमिक वापस अपने गृह प्रदेश आये तो इनसे से सबसे ज्यादा 25 फीसदी कामगार दिल्ली से वापस आए व क्रमश: गुजरात से 13 फीसदी, महाराष्ट्र से 12 फीसदी, और हरियाणा से 5 फीसदी श्रमिक आये। बाकी 45 फीसदी श्रमिक नेपाल सहित देश के 46 प्रमुख कार्यस्थलों से वापस लौटे। लौटने वालों में से लगभग 67 फीसदी श्रमिक बिहार के विभिन्न जिलों से जबकि 25 फीसदी पूर्वी उत्तर प्रदेश और 8 फीसदी झारखंड के प्रवासी श्रमिक थे। यदि इन प्रवासी श्रमिकों के कामकाज के शहर पर गौर करें तो दिल्ली, मुंबई, सूरत, फरीदाबाद, चेन्नई, बैंगलोर, कोलकाता, शिमला, काठमांडू, पुणे, नोएडा, जयपुर, रायपुर, शिलांग और लुधियाना आदि शहर शामिल हैं।
किन कामकाज में लगे हुए थे श्रमिक
यदि इन राज्यों से महानगरों में पलायन करने वाले श्रमिकों और लॉक डाउन के दौरान गांव लौटने वाले श्रमिकों के कामकाज की प्रवृति पर गौर करें तो लगभग 53 फीसदी लोग कारखानों में काम करते थे, 21 फीसदी दैनिक मजदूरी करते थे, 6 फीसदी लोग टैक्सी ड्राईविंग, होटल में 3 फीसदी, गैरेज में दो फीसदी लोग काम करते थे। इसके साथ ही सुरक्षा गार्ड के रूप में 2 फीसदी, स्वरोजगार 2 फीसदी अन्य क्षेत्र मसलन कृषि गतिविधियों, ईंट भट्टों आदि में 11 फीसदी लोग काम करते रहे हैं। यदि इनकी मासिक आय पर गौर करें तो पता चलता है कि लगभग 50 फीसदी लोगों की मासिक आमदनी 10,000- 15,000 रुपये, 37 फीसदी लोगों की मासिक आमदनी 5,000 – 10,000 रुपये, 9 फीसदी लोगों की मासिक आमदनी 15,000-25,000 रुपये से कम थी जबकि 3 फीसदी लोगोंं की मासिक आमदनी लगभग 5000 रुपये थी।
प्रवासी श्रमिकों में सबसे कम आमदनी वाले समूहों में शामिल हैं कृषि मजदूर, रिक्शा चालक और गैरेज में काम करने वाले श्रमिक जिनकी आमदनी लगभग 7100 -9417 रुपये थी। इसके बाद दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी लगभग 10,598 रु, ईंट-भट्ठा श्रमिक 10,833 , सुरक्षा गार्ड लगभग 10,500 रु और कारखाना श्रमिक लगभग ११,४०7 रुपये मासिक थी।

क्यों लौटना चाहते हैं घर
लगभग 46 फीसदी श्रमिक कोरोना वायरस का डर, आजीविका की हानि की वजह से 31 फीसदी, भुखमरी के डर से 22 फीसदी व विविध पारिवारिक आवश्यकताओं 23 फीसदी, छंटनी की वजह से 10 फीसदी व परिवार के सदस्यों के लिए सुरक्षा चिंता के कारण 9 फीसदी,आश्रय की कमी की वजह से 8 फीसदी मजदूर लौटे। जहां तक इन मजदूरों के आर्थिक हालात का सवाल है जब घर छोड़ने का फैसला किया तो 42 फीसदी श्रमिकों के हाथ में औसतन 4293 रुपये था जबकि उन्होंने घर लौटने का फैसला किया तो उनके पास 2000 से कम रुपये था।
भूखमरी से बचने के लिए उठाया ये कदम
उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर के हालिया प्रखंड निवासी 32 वर्षीय राजकुमार दिल्ली के एक कारखाने में कार्यरत थे। जब उन्होंने लॉकडाउन की घोषणा के बाद घर जाना तय किया तो उनके पास 1000 रुपया था। 9 लोगोंं के एक जत्थे के साथ वे दिल्ली से चले ताकि भूखमरी से बच सकें। सफर में उन्हें लगभग एक सप्ताह लगा जहां रास्ते उन्होंने पैदल और आंशिक रूप से ट्रक से सफर किया। इस दौरान उन्हें रास्ते में 3 स्थानों पर प्रशासन द्वारा गाजियाबाद,कानपुर और प्रयागराज आईसोलेट किया गया।
इस तरह से लगभग 30 फीसदी मजदूरों को 1910 रुपया उधार लेना पड़ा। वहीं गांव लौटने में 2,196 रुपये से लेकर 25,000 रुपया तक खर्च करना पड़ा जिसमें भोजन पर 34 फीसदी, यात्रा पर 56 फीसदी, दवाई पर 3 फीसदी, और शेल्टर पर 6 फीसदी राशि खर्च की गई।  लॉकडाउन की घोषणा के बाद श्रमिकों को अमूमन घर लौटने में जितना खर्च हों उससे 71 फीसदी ज्यादा रकम यात्रा व्यय के रूप में खर्च करना पड़ा। एक श्रमिक द्वारा औसतन 1236 रुपया यात्रा पर खर्च किया गया था।

लॉकडाउन की घोषणा के बाद आनन—फानन में लौटे मजदूर
लॉकडाउन के बाद लगभग 34 फीसदी श्रमिक ट्रेन, 32 फीसदी बस, पैदल 20 फीसदी, अन्य परिवहन के साधनों मसलन ट्रक, पिक-अप वैन, मालगाड़ियों, बाइक, किराए के वाहन, आदि से 14 फीसदी जबकी 6.3 फीसदी श्रमिक पैदल चलकर वापस लौटे। इनमें से बहुत सारे मजदूर अकेले ही यात्रा पर निकल पड़े या फिर उनके साथ परिवार के सदस्य भी थे। इन मजदूरों से बातचीत करने पर यह भी पता चलता है कि इन्हें वापसी यात्रा के दौरान रास्तें में लोगों में सहयोग भी मिला। औसतन देखें तो लगभग 13 फीसदी लोगों को वित्तीय या जीवन निर्वाह के लिए सहायता मिली। 16 फीसदी लोगों को किसी और के द्वारा मुफ्त भोजन दिया गया। लगभग 37 फीसदी श्रमिकों को रास्ते में सरकारी अधिकारी व कर्मचारियों से मदद मिली। उनके जरिए 23 फीसदी लोगों को मुफ्त भोजन, 22 फीसदी का स्वास्थ्य जांच, 7 फीसदी लोगों को परिवहन सुविधा, 6 फीसदी लोगों के आश्रय की व्यवस्था व अन्य तरह की सहायता 4 फीसदी लोगों को प्राप्त हुई। 9 फीसदी श्रमिकों में से केवल 2.2 फीसदी श्रमिकों ने आधिकारिक हेल्पलाइन से संपर्क किया।

गांव लौटे लोगों के साथ सापंद्रायिक आधार पर भेदभाव
सारण जिले के एक प्रवासी श्रमिकों को धर्म के आधार पर भेदभाव का सामना करना पड़ा। प्रवासी श्रमिक जो कि मुसलमान थे उनपर गांव वालों ने कोरोना संक्रमण फैलाने का आरोप लगाते हुए गांव के एक स्कूल में ठहरने को मजबूर किया वहीं गैर मुसिलम श्रमिकों को उसी गाँव में लौटने पर बिना किसी बाधा के उनके परिवार के साथ पुनर्मिलन की अनुमति दी गई। इतना ही नहीं 4 फीसदी श्रमिकों ने बताया कि उन्हें गाँव लौटने के बाद हिंसा या अपमान के शिकार होना पड़ा।


गांव में पंचायत का मिला साथ
प्रदेश से गांव लौटने वाले प्रवासियों में से 45 फीसदी श्रमिकों ने कहा कि उन्हें पंचायत का सहयोग मिला है। इनमें 39 फीसदी श्रमिकों को मुफ्त भोजन, 27 फीसदी श्रमिकों को आश्रय और 27 फीसदी लोगों को स्वास्थ्य जांच कराया गया। जबकि 7 फीसदी लोगों को अन्य तरह से समर्थन प्राप्त हुआ। इन प्रवासियों में से 89 फीसदी श्रमिकों के पास बैंक खाता था। पिछले एक महीने में 52 फीसदी लोगों को सरकार से सहयोग प्राप्त हुआ जिनमें 43 फीसदी लोगों को 500 रूपये और 14 फीसदी लोगों को 1000 रूपया और 10 फीसदी लोगों को 2000 रूपया और अन्य लोगों को अलग-अलग राशियाँ मिलीं। सरकार द्वारा विभिन्न श्रमिकों को और उनके परिवारों के लिए चलाये जा रहे विभिन्न योजनाओं के तहत दर्ज किया गया है मसलन आइपीडीएस 2 के तह 65 फीसदी श्रमिकों, किसानों किसानों की योजना 17 फीसदी, रोजगार की गारंटी के तहत 8 फीसदी, पेंशन योजना 3 फीसदी, अन्य के तहत 13 फीसदी लोग दर्ज हैं। लेकिन जिन 238 श्रमिक सर्वेक्षण में शामिल किए गए है उनमें से कोई भी भवन और अन्य निर्माण श्रमिक कल्याण कोष या किसी बीमा योजना के तहत तहत पंजीकृत नहीं पाया गया। इससे पता चलता है कि इस दिशा में काम किये जाने की जरूरत है।

लॉकडाउन खत्म होते ही काम पर लौट जाना चाहते हैं ज्यादातर श्रमिक
हालांकि जिन श्रमिकों में 58 फीसदी लोग ऐसे थे जिनके परिवार ने चालू माह में पीडीएस खाद्यान्न का लाभ उठाया और लगभग 81 फीसदी मजदूरों ने यह भी कहा कि वे तालाबंदी खत्म होने के बाद काम पर वापस लौटना चाहते हैं। इन श्रमिकों से बातचीत के बाद एक महत्वपूर्ण तथ्य जो सामने आता है वो ये है कि इन राज्यों से आजीविका की तलाश में लाखों श्रमिकों का पलायन एक अपरिहार्य मजबूरी है। क्योंकि  बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड जैसी प्रति व्यक्ति आय कम है जिसकी वजह से प्रवासी श्रमिकों  कम भुगतान, अपर्याप्त बचत, नौकरी की कमी के साथ ही आजीविका हासिल करने में कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है और इन राज्यों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। साथ ही मूल राज्यों में लगातार कृषि संकट और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का ठहराव की वजह से कामगारों के पास अपने काम के स्थान पर दुबारा वापस लौटने के अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं दिखता यही कारण है कि इनमें से ज्यादातर स्थिति सामान्य होने पर तमाम तरह की बाधाओं के बावजूद जल्द से जल्द अपने काम के स्थानों पर लौटने के इच्छुक दिखाई दिये।
इस लिहाज से देखें तो प्रवासी श्रमिकों द्वारा सामना किए जा रहे चुनौतियों को देखते एक व्यापक नीति तैयार किये जाने की जरूरत है। खाद्य सब्सिडी,देश भर में एंटाइटेलमेंट पोर्टेबिलिटी के जरिए सुविधा प्रदान किया जाना, प्रवासी श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा लाभों का विस्तार, ठेकेदारों और बिचौलियों से जुड़े नीतियों के जरिए नियोक्ताओं को प्रवासी श्रमिकों के कल्याण के लिए जवाबदेह रखने के उपाय, श्रमिकों के लिए कार्य करने की बे​हतर व्यवस्था, आश्रय स्थलों में सुधार और बुनियादी सुविधाओं के विस्तार की जरूरत महसूस की जा रही है।

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