गांव सिरिसिया…आर्थिक संपन्नता से पैदा हुए अभिमान ने गंवई स्वाभिमान को ढ़क दिया

भानु प्रताप सिंह
मेरा गांव सिरिसिया बिहार राज्य के आरा जिला में बबुरा के नजदीक गंगा किनारे का गांव है। ग्रामीण जीवन का आधार सरकार मुक्त जीवन जीने की कला पूर्वजों द्वारा संस्कारित था। हर अपने से छोटों को आचार,विचार, व्यवहार निस्वार्थ भाव से न्योछावर कर देता था, जिससे गांव के युवक युवतियां समाज के संतुलित संचालन में अपनी भूमिका तय कर पाते थे। इस लिहाज से स्वयं को भाग्यशाली मानता हूं कि मेरा जन्म गंगा मईया की गोद में आरा जिला के गांव सिरिसिया  में हुआ। गांव के प्रति असीम प्रेम का कारण ग्रामीण प्रकृति और परिवेश रहा है।

यदि अपने बचपन के गांव सिरिसिया की बात की जाए तो कहा जा सकता है कि उस वक्त इंसानियत का वातावरण था। अपने से बड़े उम्र के भाईयों, चाचा, दादा का अद्भुत प्रेम दिखा जिसे शब्दों में पिरो पाना मुश्किल है। भारत के अन्य गांव की तरह ही हमारे गांव में भी गांव की बेटी की शादी पूरे गांव के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न होता। सब लोग मिल जुलकर शादी वाले घर की व्यवस्था देखते। हम नौजवान साथियों का काम होता गांव के अलग—अलग घरों से चौकी,चादर,तकिया गद्दे आदि ए​कत्रित कर शादी वाले घर में पहुंचाना ताकि वर पक्ष जब बारात लेकर आये तो उसे किसी प्रकार से कोई परेशानी न हो। उनके आवभगत में कोई कमी न रह जाये। गांव में किसी के भी घर शादी विवाह हो पूरे गांव के लिए उत्सव होता था। हर व्यक्ति के उम्र के हिसाब से जिम्मेवारी बंटी होती थी। कोई मरवा सजाता, तो कोई गड़वाता तो कोई भंडार का काम देखता तो कोई बारात की अगवानी करता तो ​कोई विदाई के काम में लगा होता।

कोई हमारे गांव सिरिसिया में उम्र से बड़ा दसवीं की परीक्षा पास कर लेता था तो वहां दो चार वर्षों में दसवीं की परीक्षा में सम्मिलित होने वाले विद्यार्थियों की लाईन लग जाती थी और जो बड़े भाई उत्तीर्ण हुए थे वो अपना सारा ज्ञान अपने से छोटों पर लुटा देने और पढ़ाई लिखाई में मदद करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते थे ताकी पास करने में कोई परेशानी न हो।

गांव के हम उम्र साथी बड़ी संख्या में थे। हम सब मिलकर तरह-तरह के परंपरागत खेलों का आनंद ​लेते। नदियों में स्नान,तैराकी सबसे ज्यादा रोमांच पैदा करने वाला खेल होता। इस बीच यदि कोई गांव का बड़ा आ जाता था तो गंगा स्नान पर रोक लगा देता था,ताकी कोई बच्चा बीमार न पड़ जाये। इस लिहाज से देखें तो हर बड़ा अपने छोटों के बेहतरी के प्रति जवाबदेह था। इस तरह का माहौल था कि प्रत्येक टोले में कोई न कोई बड़ा आप पर नजर रखता और गलती करने पर टोका टाकी करता, या फिर सजा भी दे सकता था,इसलिए एक सीमा से ज्यादा बदमाशी करने की संभावना नहीं रहती और एक तरह का सामाजिक अंकुश था।
देश और प्रदेश की सेवा का जज्बा इस कदर था कि हमारे गांव सिरिसिया से प्रत्येक वर्ष बड़ी संख्या में नौजवान ​भारतीय सेना, पारा मिलिट्री फोर्स और बिहार पुलिस के लिए चुने जाते। एक अद्भुत वातावरण था। सभी बड़े—छोटे दौड़ लगाने के लिए सूर्योदय से पहले एक जगह पर एकत्रित हो जाते थे। कुछ बड़े भाई आगे-आगे दौड़ते और उनके पीछे बड़ी संख्या में उनसे कम उम्र के युवा उनका पीछा करते दौड़ लगाते। कोशिश ये होती कि 6 किमी की दौड़ तय सीमा से पहले पूरी कर ली जाए ताकि तैयारी में कोई कमी न रह जाए। यदि कोई पीछे छूटता तो अन्य लोग उसे प्रोत्साहित करते। इस तरह सब को साथ लेकर चलने और आगे बढ़ने का जज्बा ग्रामीण समाज की खूबसूरती थी। जीतने की इच्छा शक्ति तो थी लेकिन कोई जीवन के इस भागम भाग में पीछे रह जाता तो उसे पीछे न छूटने देने की हर कोशिश गांव के लोग करते दिखाई देते। इसके परिणाम स्वरूप 32 वर्ष की उम्र तक कोई न कोई सरकारी वर्दी में आते रहता था। बहुत आनंद का पल होता था जब कोई भाई, चाचा छुट्टी में गांव आते रहते थे। गांव के इन जवानों से भरतीय सेना के वीरता की कहानी सुनने में बहुत आनंद आता था। उनके छुट्टियों के हर दिन का हिसाब हमलोग रखते थे। इस दौरान उनसे कुछ धन लेकर खेल का सामान या अन्य सामान जुटाया जाता। वे खुशी-खुशी अपने से छोटे भाईयों के हर इच्छा का सम्मान करते हुए इसे पूरा करते।

आमतौर पर बिहार के गांवो में गर्मी के मौसम में आगजनी की घटना आम है। जैसे ही कहीं से ​भी आगजनी की खबर मिलती पूरे गांव के बच्चे, बड़े,बुजुर्ग इक्टठा होकर हर मुमकिन कोशिश करते की आग पर जल्दी से जल्दी काबू पा लिया जाए। कोई बाल्टी लेकर दौड़ता तो कुछ लोग रेत फेंककर आग पर काबू पाने की कोशिश करते।
गांव में नशाखोरी के लिए कोई जगह नहीं था। शराब पीने वाले लोगों की संख्या उंग्लियों पर गिनी जा सकती थी।
खेती के संबंधो यानी खेती की व्यवस्था पर आधारित सिरिसियां गांव में कमोबेश पूरे गांव की आर्थिक स्थिति एक जैसी ही थी। पूरे गांव में 10-20 साईकल और एक यो 2 मोटरसाईकिल थी। गाय-भैंस के दूध का व्यवसाय थोड़ा चलन में था। वरना एक फसल देकर दूसरे फसल का अदला-बदली होते रहता था।
सामाजिक बंधन ऐसा था कि पूरे गांव में किसी के घर कोई मेहमान आ जाए तो पूरे गांव को खबर हो जाती थी। ठीक इसी तरह गांव में यदि कोई भी बीमार हो जाए तो भी सबको खबर हो जाती थी। कहने का तात्पर्य है कि ऐसी संचार और संस्कार युक्त वातावरण जिसमें एक दूसरे के प्रति प्रेम और सौहार्द की भावना थी।

ये सब तबतक चलता रहा जब तक हमारे दादा लोग जीवित थे या उनके संस्कार का प्रभाव था। जैसे-जैसे गांव के कुछ प्रतिष्ठित लोग जैसे की रामा सिंह, चुन्नी सिंह, दीपन सिंह, जरोपण सिंह, ​बृज बिहारी सिंह, जैसे लोग जो पंच का काम करते थे। स्वाभाविक है जहां लोग रहते हैं वहां छोटे-बड़े विवाद भी होते रहते थे। लेकिन ये पीढ़ि बहुत ही सहजता से हर विवाद को आपसी सहमती और तालमेल के आधार पर समाधान कर देती थी। वे निस्वार्थ होते थे इसलिए उनका हर निर्णय लोगों को स्वीकार्य था।

 

आज आयु 42 वर्ष की है। इस पड़ाव तक आते-आते गांव, नगर, महानगर का भ्रमण किया। ईश्वर की कृपा से कर्म के माध्यम से पारिवारिक, सामाजिक और आर्थिक समृद्धि भी हासिल किया पर जो गांव ने दिया उसी का परिणाम अभी तक के यात्रा को मानता हूं। वर्ष 1993 में गांव के स्कूल से 10 वीं की परीक्षा पास की। स्नातक की पढ़ाई के लिए 1999 तक जिले में रहा। उसके बाद उच्च शिक्षा के लिए दिल्ली और मुंबई आना पड़ा। आगे बढ़ने की लालसा और घर—परिवार,गांव को आगे ले जाने की महत्वाकांक्षा ने बहुत कुछ सिखाया। इस दौरान यह पाया कि आर्थिक रूप से सबल होना है तो शहर में बसेरा करना होगा। यहीं से आगे की राह बनेगी। लेकिन इसका परिणाम ये हुआ कि गांव का परिवेश पीछे छूट गया पर गांव हर पल,हर क्षण आत्मा में बसा रहा। जब भी गांव जाना हुआ तो वापस लौटते वक्त एक तरफ की उदासी मन में घर कर जाती और आंसू रोके नहीं रूकते। पर गांव में साधनहीनता और शहर की व्यवसायिक चुनौतियों के बावजूद पारिवारिक जिम्मेदारियों के वशीभूत खुद बखुद पांव शहर की ओर उठता चला गया। आप कह सकते हैं कि यूं ही 15 वर्ष निकल गये।
समय गुजरते रहा और ग्रामीण संस्कारों का क्षय होते रहा। क्योंकि दादा लोग रहे नहीं और पिताजी लोगों ने व्यक्तिगत जीवन को महत्व दिया। गांव के प्रति सामाजिक,सामूहिक जवाबदेही से किनारा कर लिया, जिसके कारण 15 वर्ष बाद जब गांव में 15-20 दिन लगातार रहने का अवसर मिला तो आश्चर्यचकित रह गया। इस प्रवास के दौरान बचपन का गांव ढूंढ़ने की कोशिश की तो निराशा ही हाथ लगा। इस दौरान आर्थिक संपन्नता घर-घर में आई पर इर्ष्या और द्वेष से परिपूर्ण वातावरण ने गांव को डस लिया।

 

पहले लोगों के घर कच्चे होते थे लेकिन परस्पर संबंध मजबूत थ। आज घर-घर में मोटर साईकिल आ गई, मकान छतदार हो गये, दीवारों का रंग चटख हो गया लेकिन संबंधों का रंग फीका पड़ता गया। हर घर टीवी,फ्रीज आदि विलासिता के साजो सामान मिलेंगे ओर परंपराओं को भूल नौजवानों का फिल्मी अंदाज दिखाई देगा। सबकुछ मिला पर वो प्रेम और आपसी सहभागिता की कड़ी टूट गई जो ग्रामीण समाज को जोड़े रहता था। गांव जाने पर लोग एक दूसरे को गले लगा लेते, दुख-सुख साझा करते और हर्षोल्लास के साथ मिलते, गुजरे समय के साथ वो भाव खत्म होते चला गया। सिर्फ आपस के संबंध ही नहीं बदले। गंगा मईया ने भी बदलाव को स्वीकार कर लिया और गांव से दूरी बनाकर दूसरी दिशा में बढ़ने लगीं।

इस तरह से विगत 15-20 वर्षों में गांव के संस्कार युक्त वातावरण का समूल विनाश इस प्रकार​ से हुआ की सामाजिक समरसता खत्म हो गई। नवयुवक आधुनिकता को स्वीकार कर फिरंगी अंदाज में जीवन जीने लगे। शादी—विवाह व समारोह का स्वरूप बदल गया और हर चीज पैसे से खरीदी जाने लगी, ठीक उसी तर्ज पर जैसे शहरों में होता है।
गांव के रसूख दार लोगों द्वारा गांजा, अफीम,शराब का कारोबार जोर शोर से संचालित कर पूरे नौजवान पीढ़ी के अंदर नशाखोरी की प्रवृति को बढ़ाने में मदद की।
गांव के सम्मानित बुजुर्ग चल बसे। पिताजी के उम्र वाली पीढ़ी में सामर्थ नहीं थी कि जिससे शासन और प्रशासन के गंठजोड़ से ये काला कारोबार चला रहे लोगों को विरोध कर सकें।
जिस गांव की होली में कन्हैया चाचा का ढ़ोलक और पृथ्वी बाबा का फगुआ सभी के सिर चढ़ कर बोलता था, उस गांव में आर्थिक संपन्नता से पैदा हुए अभिमान ने गंवई स्वाभिमान को ढ़क दिया।
सोशल मीडिया के इस दौर ने देश के अन्य गांवों की तरह ही गांव सिरिसिया के युवाओं को और नई पीढ़ि को अपनी जद में ले लिया। गांव के बच्चे ह्वाटसएप्प,फेसबुक,टिकटॉक रूपी आभाषी दुनिया में खोते चले जा रहे हैं और खेल का मैदान खाली होता जा रहा है। निद्रा का आलम ये है कि रात भर जाग कर सोशल होते हैं और दिन में सोते पाये जाते हैं। जिस गांव में उंग्लियों पर गिन कर शराबखोरों का नाम बताया जा सकता था उस गांव में अब चर्चा इस बात की होती है कि कौन—कौन नहीं पीता है। 15-20 वर्षों की ग्रामीण संपन्नता की प्रतीक सरकारी स्कूल जिससे मैनें 1993 में दसवीं पास किया, उसमें पता चला पूरे स्कूल में 100-200 बच्चे हैं जबकि हमारे समय में एक वर्ग में 200 बच्चे होते थे।
प्राथमिक विद्यालय का भवन दो ​मंजिला बन गया पर गांव के कुछ रसूख रखने वाले लोगों ने कब्जा कर उसमें अपना व्यक्तिगत भंडारण गृह बना दिया। पढ़ाई के नाम पर शिक्षा मित्र मंडल के शिक्षक की हाजिरी दिखती है पर पढ़ने वालों की संख्या बस खिचड़ी खाने तक सिमटी रहे।
हमारे समय में हमारी उम्र के बच्चे कंची खेला करते थे। लेकिन जब भी कोई बड़ा भाई, चाचा आता दिखाई देता तो हम छुप जाते। यदि पकड़े गये तो दो चार हाथ पड़ना कोई बड़ी बात नहीं होती थी। पर अभी यदि किसी के पिता को इसके विषय में बोल दें तो उल्टा डांट पड़ सकता है।
किसी ग्रामीण के देहावसान के वक्त पूरा गांव का बच्चा, जवान, बुजुर्ग सभी अंतिम यात्रा में शामिल होते। अब मोटरसाईकल की यात्रा से उपस्थिती दर्ज कराने का संस्कार दिखा। शादी विवाह में गांव वाले भी मेहमान की भूमिका देखे जा सकते हैं।

 15-20 वर्षों में गांव सिरिसिया में आर्थिक संपन्नता आई है इससे इंकार नहीं किया जा सकता पर अर्थ के बुनियाद पर संस्कार युक्त जीवन शैली की संपूर्ण हत्या हो चुकी है। आज गांव का किसान रसायनिक खाद का इस्तेमाल करके ही उत्पादन कर पा रहा है पर मुनाफा न के बराबर है जिससे खेती करने में रूची भी न के बराबर दिखाई देती है। इतना ही नहीं गांव के प्राकृतिक जलाशय बिल्कुल समाप्त हो चुके हैं, पीने वाला पानी दूषित हो चुका है। जहां लोग 100 वर्ष की आयु पूरा कर मरते थे अब 50-60 वर्ष में परम-धाम को प्राप्त करने लगे हैं। जहां हमलोग अंधेरा होते ही बिस्तर पकड़ लेते थे आज रात भर नौजवानों को घूमने की आजादी मिल चुकी है।

 

गांव मेरे भीतर
रोजी रोटी के सिलसिले में गांव सिरिसिया से जब मुंबई आया तो काम चल निकला। मुंबई में जीवन के तमाम चुनौतियों से विचलित हुए लगातार आगे की तरफ बढ़ते हुए अपना व्यापारिक प्रतिष्ठान खड़ा किया। लेकिन ग्रामीण होने के नाते खेती से लगाव था। इस लगाव के वशीभूत मुंबई शहर से सटे पालघर जिला के ग्रामीण क्षेत्र में कुछ एकड़ जमीन खरीदी और खेती करने में जुट गए। खेती-बाड़ी से जुड़ी ग्रामीण पृष्ठभूमि से होने के कारण न सिर्फ जैविक खेती का रास्ता अपनाया अपितु वहां आधुनिक जैविक खेती का ज्ञान एवं खेती के लिए उपलब्ध आधुनिक उपकरणों के साथ ग्रामीण माहौल जैसा सभी शहरी सुविधा उपलब्धता सुनिश्चित की। जैसा कि आमतौर पर होता है जब आप नये जगह पर कोई नया काम शुरू करते हैं,नयी व्यवस्था बनाते हैं तो परेशानियां आती ही है। इस क्रम में भी स्थानीय अधिकारियों द्वारा खेती के काम में बाधा डालने का प्रयास किया गया और भ्रष्टाचार की प्रवृति के वशीभूत धन ऐंठने का प्रयास हुआ। लेकिन गंवई मन भ्रष्टाचार और लूट खसोट की ​बलिबेदी पर चढ़ने को तैयार न हुआ और पुरजोर विरोध किया। लेकिन अधिकारी भी इतना जल्दी कहां मानने वाले थे,ताक में लगे हुए थे कि कैसे बाधा पहुंचाई जाए। जल्दी ही अधिकारियों को मौका भी मिल गया। खेती हेतु पानी की आवश्यकता पूर्ति के लिए अपने जमीन में एक छोटा सा तालाब बनवाया है। जिला में इस तरह के खनन करने से पहले सरकारी अनुमति लेने का शायद प्रावधान है। हालांकि इसकी जानकारी मुझे नहीं थी और जानकारी के अभाव में यह काम हो गया। लेकिनअधिकारी इस तालाब को गैरकानूनी कह कर तीस लाख रुपए का जुर्माना लगा दिया। अधिकारियों द्वारा जुर्माना लगाने का यह निर्णय सरकारी कानून के मूल भाव के विपरीत है। क्योंकि इस तरह के उद्योग (पानी संरक्षित)) के लिए अनुमति एवं परवाना लेने का प्रावधान व्यापारिक उद्देश्य वालों के लिए ही होगा, अपने खेतों में पानी पहुंचाने के उद्देश्य से किया गया यह काम शायद कानून के घेरे में नहीं आता होगा। इस प्रावधान के मूल भाव में किसानों के प्रति संवेदनशीलता जरुर बरती गई होगी। जुर्माना लगाने वाले अधिकारियों को अपने पूर्वाग्रह से हटकर कानून के मूल भावना के अनुरूप काम करना चाहिए था।

खैर हमारे प्रयास से उस जमीन पर फल,सब्जियां एवं अन्य खाद्यान्न उपजाएं गए हैं। हालाकि यह कृषि कार्य व्यापारिक उद्देश्य के लिए नहीं है। हमारा मकसद सिर्फ यह बताना है कि कैसे एक किसान जिसके पास 5 एकड़ जमीन हो, अपने श्रम और समझदारी की बदौलत खेती कर अपने साथ साथ गांव और शहर दोनों की जरुरतों को पूरा कर सकता है। इस जैविक खेती से उपजे फल एवं सब्जियां प्रदेश के स्वास्थ्य समस्याओं को सुलझाने में अहम भूमिका अदा करेगा। किसान और किसानी बेहतर हो सके, लाभदायक बन सके जिससे गांव और शहर दोनो को शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, सामाजिक स्वास्थ के लिए काम करके अपने हिस्से का जय हिन्द, वन्देमातरम बोलने का संकल्प को पूरा करने का जीवन का अंतिम लक्ष्य है और उसके लिये जी तोड़ श्रम जारी है।

परिचय
भानु प्रताप सिंह, गांव सिरिसिया, पोस्ट -बबुरा, जिला -आरा, बिहार
स्नातक तक की पढ़ाई जैन कॉलेज, आरा। एमबीए करने के लिये 2001 में मुंबई आया। इस व्यवसायिक राजधानी ने मुझे भी व्यवसायी बना दिया। हमारी कंपनी गैस पाइपलाइन लगाने का काम करती है जो देश के करीब 20 शहरों मे काम कर रही है।

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