दुनिया देखा… पर हर पल सीने में धड़कता रहा है गांव सरोत्तर…

राकेश पांडे, सीएमडी ब्रावो फार्मा व ब्रावो फाउंडेशन
नैनों में था रास्ता… हृदय में बसा है गांव
साकार होगा जरूर गांव सरोत्तर के तरक्की का सपना..भले छलनी हो जाए पांव!  तो आईए आपको अपने गांव सरोत्तर की ओर लिए चलता हूं।  मोतिहारी का सरोत्तर गांव। आप कह सकते हैं कि हमारा गांव सरोत्तर बाबू साहब लोगों का गांव है। हमारे दादा जी श्री रामेश्वर पांडे पुरोहित थे। का सब लोग सम्मान करते। पहला रसवर यानी पहिला फसल पंडीजी को। ग्राम समाज में ये भाव था। जब 6 ठी क्लास में था तब तक पूजा पाठ कराते थे। मैं भी गाहे-बेगाहे उनके साथ जाया करता। जैसा जजमान, वैसा दान। जब पूजा कराके देर रात यानी 10 बजे रात तक वापस लौटते तो पास में लड्डू होता। आवाज लगाते…जगे हो या सो गये हो। पास जाने पर झोले में हाथ डालके लड्डू निकालते और देते। डायन का प्रचलन था। नवरात्र के पहले दिन से लेकर सप्तमी तक पूजा होती। सप्तमी के दिन डायन घोंजने बांसबाड़ी में। चिल्होर-आसमान में घूम रहा है यानी खेत जोत रहा है। बगीचे में उल्लू का बच्चा ढूढ़ना। बालपन की यही मस्ती होती थी।                                    ……गांव सरोत्तर

मेरे बाबूजी श्रीकांत पांडे पेशे से इंजीनियर थे। टिस्को में कार्यरत भी रहे। घर में बड़े थे। उनकी प्राथमिकता हमेशा से संयुक्त परिवार रहा। जब नौकरी नहीं रही तो बच्चों को गांव लेकर गये। वैसे भी हमलोग अक्सर गांव जाते रहते। लेकिन नौकरी छूटने के बाद गांव के दीदी मुनी के स्कूल में दाखिला दिला दिया गया। यह स्कूल सरोतर हाईस्कूल के बगल में था। स्कूल में बिलायती दूध मिलता। वहीं पढ़ाई होती। शाम को स्कूल से वापस आते तो जो खाना बचा होता दादी गर्म कर देती चूल्हे पर, वही खाते थे। दादी का हमारे उपर बहुत ध्यान रहता। शाम को जब स्कूल से आने के बाद खेलने जाना होता तो दादा से पूछता खेले जाईं। दादा तपाक से मना कर देते, बिल्कुल नहीं। फिर दादी पैरवी करती तब खेलने जाने को मिलता। वहां से वापस लौट कर लालटेन का शीशा साफ कीजिए और बथान में लालटेन लेकर पढ़ने बैठ जाईये। मुश्किल ये होती कि वहीं दादा बगल में बैठे रहते यानी आप पढ़ रहे हैं कि नहीं आवाज आनी चाहिए।

जैसे ही 7.50 पर रेडियो पर समाचार आता दादी हाक लगाती, ” लईका लोग के भूख लागल होई छोड़ दीहिं। खाना खाने के बाद दादी के पास ही सोता। दादी अक्सर कहानी सुनाती, ” सोन परी नदी में नहाई और भी बहुत सारी कहानियां सुनातीं। बेना डोलाती रहतीं और सोती रहतीं। पता नहीं, कब हमें भी नींद आ जाता था। उसके बाद जब सुबह उठतीं तो शिव की पराती गातीं। सूर्योदय के पहले हम लोगों को भी उठ जाना होता। नहीं तो फिर दादा जी की डांट। आम के बगीचे में भांजा बनाना।

 

पिताजी के नौकरी छोड़ने के कारण पढ़ाई और स्कूल की व्यवस्था में अनियमितता रही। किंडर गार्डर-दीदी मुनी स्कूल से हुआ। 7 वीं 8 वीं बेतिया से छोटे स्कूल से पूरा हुआ। 10 वीं की पढ़ाई मोतिहारी के मंगल सेमिनरी से पूरी हुई। शुूरूआत में गांव से ही बस का सफर करते हुए स्कूल जाते। गांव से मोतिहारी की दूरी 32 किलोमीटर थी। यदि बस के अंदर बैठे तो 5 रूपया किराया लगता। उपर बैठते तो 3 रूपया देना होता। आगे चलकर वहीं मामा जी के यहां रहने लगा। जब 10 वीं का परीक्षा देना था तो उन दिनों सिनेमा हाल में बेटा फिल्म लगा हुआ था। रोज परीक्षा से पहले ध​कधक गाना सुनने पहुंच जाता। हॉल मालिक पिता के परिचित थे। हालाकि इन सब चूहलबाजियों के बावजूद मैट्रिक की परीक्षा 69 फीसदी नंबरों के साथ उत्तीर्ण हुआ।                                                        ……गांव सरोत्तर
इंटरमीडियट साईंस की पढ़ाई करने के लिए पटना आना हुआ। वहां नया टोला में स्थित आर पी एस कॉलेज में दाखिला हुआ। हालांकि क्लास पटना विश्वविद्यालय के बीएन कॉलेज या साईंस कॉलेज में लेता। 1995 में इंटरमीडिएट पास किया। हमारी भी इच्छा थी इंजीनियरिंग व मेडिकल में जाने की लेकिन दाखिला नहीं हुआ। हालाकि हमारे यहां के लोग लगातार लगे रहते हैं। माता पिता को सांत्वना देते रहते हैं कि इस बार नहीं तो अगली बार हो ही जायेगा। हमने ऐसा नहीं किया और न ही मुझे ये सुविधा थी। पटना में रहता था तो पैसे की दिक्कत थी। रंगी प्रसाद लॉज में रहना होता था। पैसे की तंगी थी। उसी लॉज में होटल मैनेजमेंट के कुछ छात्र भी रहते थे। वे शाम को किसी शादी या पार्टी में जाते थे। उन्होंने सुझाव दिया कि आप भी कर सकते हैं। इसके बदले कुछ पैसे भी मिलेंगे। इस दौरान मौर्या बैंक्वेट, रेस्टोरेंट में काम भी किया। उस दौरान का एक वाक्या याद आता है। चीफ जस्टिस एन एन पांडे से हमारी रिश्तेदारी थी। वित्तमंत्री शंकर प्रसाद टेकरीवाल पार्टी के दौरान ड्यूटी लग गई। वे काउंटर पर रखे मालपुआ स्टैंड पर खाने लगे। मैं वहीं आस पास था। समझ नहीं पा रहा था कि कैसे बचूं। खैर किसी तरह खुद को उनकी नजरों से ओझल रखा। बुद्धा कॉलोनी,मंदिरी,किदवई पुरी में बुजुर्ग के साथ अखबार भी बांटा।

उसके बाद दिल्ली चला आया। दिल्ली में गैप ईयर के कारण दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिला नहीं हुआ। फलस्वरूप कॉरेस्पॉन्डेंस में दाखिला लिया। हालांकि द्वितीय वर्ष में हंसराज कॉलेज में नियमित दाखिला हो गया। वहीं हमारी पत्नी मिली। पीजी में जूनियर थीं। डीएस कोठारी हॉस्टल में रहना होता। हॉस्टल का साईकल स्टैंड पर अपना वेयर हाउस खोला। वहीं हमारा सामान आता और उसे ही बेचा जाता। पेट्रोलियम में विशेष रूप से ओएनजीसी से जो बल्ब, मोटर,पंप आदी आता उसी का मार्केटिंग करता। इस तरह से व्यवसाय की दिशा में कदम बढ़ गया था। हरियाणा के एक मित्र धीरज लाठर ने जमीन गिरवी रखके ढ़ाई लाख रूपया दिया, उसी से व्यवसाय शुरू हुआ।

इसी तरह अचानक कदम मुंबई की ओर मुड़ गया। मुंबई में छोटा-मोटा कांट्रैक्ट लेने लगा। एसबीआई बीकानेर एंड जयपुर का कांट्रैक्ट मिला। फंड तो ज्यादा था नहीं और न ही ज्यादा पूंजी। पाली हिल में ओमपुरी रहते थे। उनसे अपनी बात कही। उनके जरिए आसिफ भाई से मुलाकात हुई। उन्होंने कहा कि पैसे कैसे वापस करेंगे। साढ़े तीन लेंगे। वादा था, तीस तारीख तक वापस करने का। सरकारी काम था। पेमेंट रूक गई। यह बताने के लिए हम उनके घर टैक्सी करके गये कि अभी 15 दिन और लगेंगे। उन्होंने कहा कि यह बताने के लिए टैक्सी करके आये हो कि पैसे बाद में मिलेंगे। जिसके पास पैसे नहीं है वो टैक्सी से आएगा। यह एक सबक था,फिजूल खर्ची को लेकर।
आगे चलकर झारखंड में कुछ काम मिला। रामगढ़ में प्रदीप बेल्थरिया के जरिए। मां छिन्न् मस्तिका स्टील का स्पंज आयरन प्लांट। झारखंड और बंगाल में वेस्ट हिट रिकवरी बॉयलर का काम शुरू हुआ। 2006 आते-आते 17 प्लांट का का​म किया।
शायद भविष्य करवट ले रहा था। एक महिला से मुलाकात हुई। उन्होंने पूछा काम करना चाहते हैं या ठेकेदारी। मेरे पास कोई विशेष जवाब नहीं था। खैर 2006 में मधुकोड़ा सीएम बने थे। 14 अगस्त 2008 को मधुकोड़ा के खास आदमी का अकांउट हैक हुआ। मेरे पास संयोग से 500 पन्ने का डॉक्यूमेंट पहुंच गया। जो यह बता रहा था कि मधुकोड़ा का साम्राज्य दुबई तक फैला हुआ है। यह सारी जानकारी के साथ दैनिक जागरण के ब्यूरोचीफ संतशरण अवस्थी और प्रभात खबर के संपादक हरिवंश जी से मिला। हरिवंश जी से संपर्क होने के बाद वे लगातार मेरे मार्गदर्शक रहे हैं। झारखंड में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ बिगुल फूकने में उनका बहुत बड़ा योगदान रहा है विशेष रूप से मधुकोड़ा के काले कारनामों को उजागर करने में उनका साथ मेरे जैसे युवा का संबल बना।

इसी तरह झारखंड के मुख्य मंत्री रघुवर दास को हराने वाले सरयू राय जी वही व्यक्तित्व हैं जिन्होंने भूतपूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव और मधु कोड़ा के लूटकांड को कानून की चौखट तक पहुंचाया था। मुझे इस बात की खुशी है कि सरयू राय जी का 2006-2007 में झारखंड में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में उनका मार्गदर्शन मिला। उन्होंने झारखंड में व्याप्त भ्रष्टाचार पर एक किताब लिखी थी शीर्षक है, ”मधु कोड़ा लूट राज” और मेरा सौभाग्य है की उस किताब के लिखने में मेरा भी योगदान है। जिसका विस्तृत वर्णन उस किताब में है (पेज २६२ से) इसके लिए मैं उनका सदा आभारी रहूंगा।

मधु कोड़ा वाले मामले के दौरान इंटेलिजेंस के कई अधिकारियों से सामना हुआ। एक दिन एस आई बी से फोन आया कि मैं फलां अधिकारी बोल रहा हूं? आप मधु कोड़ा के खिलाफ क्यों हैं? दिल्ली में भी कई अधिकारियों के संपर्क में रहा। ये सब चीजें चल रही थीं। मधु कोड़ा अपने मुकाम पर पहुंच गये थे। लेकिन उसके बाद अपने पास भी पैसे खत्म होने लगे थे,लेकिन कोड़ा कांड के दौरान इंटेलिजेंस वालों से जो संबंध बना था वो फलीभूत हआ। वे मुझसे काम लेने लगे। इसी दौरान एस एस पी रहे …… सिंह से भी पहचान हुई। फिर 2010 आते-आते लगने लगा कि अपने लिए कुछ करना चाहिए। 2011 में ब्रेवो फार्मा के नाम से कंपनी रजिष्टर्ड हुई। एक कंसल्टेंट हायर किया। एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में उज्बेकिस्तान सरकार ने जमीन दिया। 250 डॉलर में 5 एकड़ जमीन मिल गया। इस तरह से पहली फैक्ट्री बनी। काम चल निकला। स्वाभाविक तौर पर जिन देशों में काम करता था उन देशों में कंपनी के जरिए सीएसआर भी करता।

जो गांव की मिट्टी में पलते है,
वही इतिहास को भी बदलते है।
ये जीवन का सूत्र वाक्य रहा और इसी के वशीभूत ख्याल आया कि क्यों न अपनी मातृभूमि के लिए कुछ किया जाए। जो सीएसआर का पैसा बाहर लगता है, उससे अपने गांव—जवार की बेहतरी के लिए कुछ काम हो। इस तरह 2019 में चंपारण के अपने गांव सरोत्तर गया। पंचायत भी सरोत्तर ही है। तय किया कि हमें 3 क्षेत्र में काम करना है। स्वास्थय,शिक्षा और रोजगार। इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए कई स्तर पर चंपारण में प्रयास किया जा रहा है। मोतीहारी से कोटवा के बीच धनगरहा चौक पर 10 एकड़ जमीन खरीद कर उसमें प्लांट डालने का काम चल रहा है। इसके साथ ही ब्रावो फ़ाउंडेशन का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य महिला सशक्तिकरण है – ग्रामीण भारत में महिला सशक्तिकरण को सुदृढ़ करने और रोज़गार का सृजन करने के लिए फ़ाउंडेशन कटिबद्ध है। ब्रावो फांउडेशन के जरिए सभी महिला कॉलेज,स्कूल में वेंडिंग मशीन लगाये गये। साथ ही सैनेटिरी नैपकिन का मैन्यूफैक्चिरिंग भी हम खुद करते हैं ताकी रोजगार सृजन हो। जगह-जगह पर सैनिटाईजर मशीन भी लगाई गई। इसके साथ ही फाउंडेशन हर स्तर पर लोगों की बेहतरी के लिए कटिबद्ध है।                                                                ……गांव सरोत्तर

कोविड महामारी में सरकार के साथ अपना कर्तव्य समझते हुए ब्रावो फाउंडेशन अपनो के लिए सकारात्मक कार्य कर रहा है। हमने निशुल्क आॅक्सीजन बैंक बनाया। कोविड 19 की आपदा में ब्रावो फार्मा भारत में कई स्थानों पर मेडिकल ऑक्सीजन जेनरेशन प्लांट की आपूर्ति कर रहा है। इसमें बिहार के भी कई जिले शामिल हैं। ​हमारा दावा है कि बिहार में जिस तरह का उच्चतर गुणवत्ता से परिपूर्ण आक्सीजन प्लांट हमने लगाया है शायद ही किसी कंपनी ने लगाया होगा।                                                                                                              ……गांव सरोत्तर
शहीद स्मारक के रखरखाव से लेकर युवाओं के लिए क्रिकेट अकादमी चलाने का काम ब्रावो फाउंडेशन द्वारा किया जा रहा है। ब्रावो फाउंडेशन ने कई काम किये हैं चाहे ठंढ़ के मौसम में चम्पारण के 27 प्रखंडों में कंबल का वितरण करने का काम हो या फिर शहर के नरसिंह बाबा मन्दिर प्रांगण में जहां रोज सैकड़ों छात्र जो जमीन पर बैठकर सुबह शाम जनरल कंपटीशन की तैयारी करते थे उनकी बैठने के लिए मैट की व्यवस्था की गई।

आर्यन कुमार उर्फ सुखाडी जी को ब्रावो फाउंडेशन के कार्यालय में बुलाकर 51 हजार रुपये की आर्थिक सहायता प्रदान करना, जिससे वो अपनी जीविका फिर से शुरू कर सके। आर्यन कुमार गायत्री नगर मोतिहारी के निवासी हैं और ठेला पर सत्तू बेचकर अपना जीवन यापन करने ​थे। पिछले दिनों उनके ठेला और सामानों को नष्ट कर दिया गया था और उनकी जीविका का साधन बंद हो गया था। इतना ही नहीं बिटिया की शादी के लिए भी लोगों को सहयोग देता रहा हूं।                                                                                                                      …….गांव सरोत्तर


हरसिद्धि प्रखंड के मठलोहियर पंचायत के दक्षिणी छतवनिया गांव निवासी 32 वर्षीय रंजना देवी कैंसर से पीड़ित है। उनके पति चन्देश्वर पटेल एक मजदूर है। इनके इलाज के लिए ब्रावो फांउडेशन की तरफ से आर्थिक मदद किया गया साथ ही इनके पति के नौकरी की भी व्यवस्था हुई।
नवयुवक पुस्तकालय जो कई वर्ष से बंद पड़ा था। इसका भवन जीर्ण शीर्ण अवस्था में आ चुका था। यानी मीना बाजार स्थित यह पुस्तकालय पूरी तरह उपेक्षित अवस्था था। जबकी इसका गौरवशाली ​इतिहास रहा है। इसका निर्माण वर्ष 1931 में हुआ था। इसे संदर्भ कक्ष ग्रंथागार एवं श्री गजाधर वाचनालय के रूप में भी जाना जाता रहा है। ब्रावो फांउडेशन ने इसे संवारने का बीड़ा उठाया और इसे आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित किया गया है। हमें गर्व हैं कि ब्रावो फाउंडेशन के द्वारा शहर के ह्रदयस्थली में स्थित नवयुवक पुस्तकालय का जीर्णोद्धार सह चहारदीवारी निर्माण कार्य भी कराया गया है।                                                                                            …..गांव सरोत्तर

मेरे लिए ये गर्व की बात है कि मेरा जन्म मोतिहारी के सदर अस्पताल में हुआ था और उसी सदर अस्पताल परिसर का निरीक्षण करने का मौका मिला जिसमें मुख्य रूप से चिल्ड्रन पार्क,वाटर प्यूरीफायर, माताओं , बहनों के लिए सेनेटरी नैपकिन, ऑटोमेटिक वेडिंग मशीन लगाने और अन्य सुविधा प्रदान करें का संकल्प लिया। आशा है यह काम जल्द पूर्ण होगा। जिले के दिव्यांग लोगों में से 400 लोगों के कृत्रिम पैर लगवाने का काम भी फाउंडेशन द्वारा किया गया है।

 

अगर सार संक्षप में अपनी बात रखूं तो जय हिंद बोलता हूं। क्योंकि भारत मेरा देश है और जय चम्पारण क्योंकि चम्पारण मेरी जन्मभूमि, बिहार की मिट्टी से प्रेम इसलिए बिहारी संबोधन से गौरवान्वित हूं। मुझे वक्त ने अपने गांव सरोत्तर के लिए, चम्पारण के लिए कुछ करने का मौका दिया और मैं धीरे धीरे करने का प्रयास भी कर रहा हूं। परन्तु,इसके कई राजनीतिक मायने निकले गए और कयास लगाए जाते रहे हैं। इसका परिणाम ये हुआ कि मुझे स्नेह और सम्मान भी मिला तो राजनेता के कोप का भाजन बनना भी मैंने सहर्ष स्वीकार किया।   ……….गांव सरोत्तर

छोड़ ये बात कि मिले ज़ख़्म कहां—कहां से मुझको
ज़िंदगी बस इतना बता मेरे हिस्से का कितना काम बाकी है।
अब देखिये न हमने चंपारण के साथियों के साथ मिलकर ‘चंपारण मांगे एयरपोर्ट’ की अभियान में शिरकत करना शुरू किया है। ये भी कुछ लोगों को नागवार गुजर रहा है। लोग इसे प्रचार पाने का माध्यम बता रहे हैं। लेकिन इसकी वजह से हम अपना काम नहीं रोक सकते। हमें तो बढ़ते ही जाना है। ………………गांव सरोत्तर
कुछ कर्ज चुकाना बाकी है,
कुछ दर्द मिटाना बाकी है
कुछ कर्तव्य निभाना बाकी है।
इसी सोच के वशीभूत कि ज़िन्दगी कभी आसान नही होती इसे आसान करना पड़ता है कुछ नजर अंदाज करके कुछ को बर्दास्त करके!
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
प्रयास रहता है की जात-पात से ऊपर उठ कर युवकों और युवतियों के लिए कुछ काम करूं क्योंकि यही लोग चम्पारण,बिहार और अंततोगत्वा राष्ट्र का निर्माण करेंगे। हमारा संकल्प है कि आनेवाले वाले समय में बिहार में स्वास्थ्य, शिक्षा एवम रोजगार के क्षेत्र में जो आंदोलन होगा युवा वर्ग और चम्पारण उसका प्रणेता बनेगा।

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