सरकारी मॉडल विलेज के सपनों में खो गया प्रेमचंद का आदर्श गांव

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संतोष कुमार सिंह

आज गांवों को मॉडल से लेकर आदर्श बनाने की कोशिश सरकारी स्तर पर हो रही है। लेकिन न तो गांव की परिकल्पना स्पष्ट है,और न ही गांव के विकास को लेकर कोई चिंतन धारा दिखाई देती हैं। ऐसे में हमें ठहरकर गांव गंवई के चितेरे मुंशी प्रेमचंद की रचनाओं में गांव के विकास,उसकी समस्यायें,सोच,सामाजिकता,समरसता को अवश्य टटोलना चाहिए ताकि इतिहास के जरिए भविष्य दृष्टि मिले और मुंशी प्रेमचंद का गांव आदर्श बन सके ताकि किसी होरी को न तो बैल बेचना पड़े और न ही किसी धनिया का जीवन कठिन हो। नही कोई गोबर शहर जाकर जीविको पार्जन को सोचे और हताश निराश गांव लौटने को मजबूर हो।

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प्रेमचंद को गांवों -देहातों का चितेरा भी कहा जाता है। उनकी रचनाओं में गांवों का जो रूप आया है वह सचमुच अनोखा है। वह गांव के सौंदर्य को वहां रहने वाली गरीब जनता के दर्द से जोड़ देते हैं। वह गांवों में कलकल बहती नदी को देखते हैं, तो उसके किनारे खेतों में जी-तोड़ मेहनत कर रहे खेतिहर मजदूर को भी देखते हैं। वे रोटी खाने के लिए बहने वाले पसीने को ओस की बूंद से अधिक महत्व देते रहे हैं। हां ,वे गांव के चितेरे हैं,लेकिन उन्होंने गांव में रह कर वहां के कष्टों को देखा हैं। उनकी दृष्टि में गांव में रहने वाले ‘होरी’, ‘गोबर’ और ‘सीलिया’ के दुख-दर्द छुपे हैं। वे अपनी रचनाओं में अगर गांव रचते हैं, तो वहां के ‘विलेन’ भूमिपतियों -जमींदारों के शोषण के हथियारों को भी देखते हैं। सच, उनकी रचनाओं में गांवों-देहातों का सबसे कष्टप्रद वर्णन हैं। एक तरह से उनके साहित्य में गांवों को शोषण का सबसे बड़ा क्षेत्र ही समझा गया है।

1880 में उत्तर प्रदेश के लमही गांव में जन्मे प्रेमचंद का असल नाम धनपत राय था। प्रेमचंद ने अपनी रचनाओं में गाँव, सामाजिक ताने-बाने और ग़रीब किसान को ख़ास जगह दी थी। प्रेमचंद की प्रासंगिकता इसमें निहित है कि वे वंचितों, किसानों, दलितों और प्रगतिशील समाज के लिए प्रतिबद्ध बने रहे। ग्रामीण जीवन से उनका जीवंत संबंध था और किसानों ही नहीं, कृषि-बंधुआ मजदूरों के जीवन के वे निकट साक्षी थे। असहाय, निर्धन और उपेक्षितों के लिए उनकी पक्षधरता असंदिग्ध थी। आज भी उनकी रचनायें सद्गति, ठाकुर का कुआं, कफन, पूस की रात, दो बैलों की कथा, बूढ़ी काकी, पंच परमेश्वर जैसी कहानियां और गोदान सरीखा उपन्यास सहज रूप से आज के गांवो का भी चित्रण प्रस्तुत करते है। गांव की समस्याएं बदस्तूर बनी हुई हैं किसान का जीवन प्रेमचंद के समय की तुलना में सुधरने की बजाय और भी जटिल हो गया है, ऐसे में प्रेमचंद और अधिक प्रासंगिक लगते हैं, प्रेरक और रहबर की तरह दिखते हैं।

आज बार—बार यह कहा जाता है कि किसान खेती छोड़ रहे हैं। खेती किसानी लाभकारी नहीं रही। किसानों की जमीने छीनि जा रही हैं। जगह—जगह किसान के आत्महत्या की खबरें अब लोगों को आश्चर्य में नहीं डालती। दुर्भाग्य से विकास के तथाकथित नये मॉडल, अनचाहा और अमानवीय मॉडल है। किसान विरोधी व्यवस्था कॉरपोरेट के दबाव में खेती को ही नष्ट कर देना चाहते हैं, इसलिए जब किसान आत्महत्याएं करते हैं तो व्यवस्था इसके पीछे मूल कारण के बजाय दायें बाये झांकते हैं।

चाहे सवाल दलितों का हो या महिलाओं का प्रेमचंद ने इन सवालों को बड़ी बारीकि से उठाया है। प्रेमचंद ने ‘निर्मला’,’रंगभूमि’ और ‘कर्मभूमि’ सहित कई अन्य उपन्यासों में उस समय की सबसे बड़ी समस्याओं को छूआ। ‘निर्मला’ में उन्होंने स्त्री के अंतर्द्वंद्व और पुरुषवादी समाज के शंकालु चरित्र को बड़ी ही गहराई से प्रस्तुत किया वहीं’सद्गति’ और ‘कफन ‘ में उन्होंने दलितों के जीवनयापन और उनके साथ जुड़ी त्रासदी को सामने रखा है। आज भी वो समस्याएं ग्रामीण परिवेश में बनी हुई हैं या यूं कहें विकराल रूप में सामने आयी हैं।

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लेकिन न तो प्रेमचंद के सपनों का मॉंडल गांव किसी सरकार के आदर्श गांव के एजेंडे में शामिल है और न ही वर्तमान साहित्य के एजेंडे में। उसका आर्कषण सिर्फ छद्म सहिष्णुता अ​सहिष्णुता  के नारों तक सीमित है और कर्म पुरस्कार वापसी तक। वह न तो रचना के जरिए विद्रोह कर पा रहा हैं और न ही कर्म के जरिए। आज का साहित्यकार प्रगतिशीलता का दंभ भरते हुए अपनी रचनाओं को लेकर चिंतित नहीं होते बल्कि इस बात को लेकर चिंतित होते हैं कि कौन रचनाकार किस कार्यक्रम में जाता है।

ऐसे में गूगल द्वारा ग्रामीण समाज के चित्तेरे कलम के सिपाही रचनाकार मुंशी प्रेमचंद की 136 वीं जयंती के अवसर पर डूडल देकर उनकी याद दिलाना निश्चित ही सुखद है,ताकि हमें सनद रहे..प्रेमचंद का गांव ही आदर्श गांव है,जिसे हुक्मरान मॉडल विलेज बताये जा रहे हैं।

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