डाॅ रामजी सिंह
गांव भारत का ही दूसरा नाम है- अस्मिन् ग्रामे परिपुष्ट विष्वम, भारत माता ग्रामवासिनी। अर्थात ग्राम में ही परिपुष्ट विश्व का दर्शन, यानी गांव ही भारत है और भारत ही गांव है। अगर भारत को जानना है तो भारत के गांव को जानना-समझना होगा। इसलिए गांधी जी ने स्वराज की कल्पना गांव के संदर्भ में ही की थी। उनके शिष्य आचार्य विनोबा भावे ने ग्राम स्वराज को अपना अभीष्ट माना था। आज भी शहरीकरण की अबाध गति के बावजूद भारत की लगभग 60 प्रतिशत जनसंख्या गांव में ही रहती है।
मै भी गांव में ही जन्मा हूं और पला बढ़ा हूं। मुंगेर जिले के एक छोटे से गांव इंदरूख में मेरा जन्म हुआ और वहीं ग्रामीण पाठशाला के शिक्षकों से मैंने प्राथमिक शिक्षा पाई। बल्कि स्वतंत्रता के संग्राम की ओर उन्मुख होने का सौभाग्य भी उन्हीं दिनों मिला। उन्हीं दिनों ग्रामसेवा और देशप्रेम की दीक्षा भी मुझे गांव के उन लोगों से मिली जो गांधी जी के स्वतंत्रता आंदोलन के निष्ठावान सिपाही थे। इसलिए मैं कविवर हरिऔध के शब्दों में कहना चाहता हूं-
‘‘ अहा ग्राम्य जीवन भी क्या है
कौन यहां सबका मन चाहा,
थोड़े में निर्वाह यहां है
ऐसी सुविधा और कहां है।’’
वस्तुतः गांव की संकल्पना परिवार की संकल्पना का ही विस्तार है। शहरों में अक्सर किराए के मकानों में लोगों को रहना पड़ता है, जहां उन्हें आत्मीयता नहीं मिल पाती। आजकल जब बहुमंजिली इमारतों का विस्तार हो रहा है, लोगों को वहां कबूतरखाने की तरह रहने को बाध्य होना पड़ता है। जिस घर में आदमी को किसी काम के लिए बाहर जाने का अवसर ही नहीं मिलता। इसलिए शहर के जीवन में आत्मीयता और सामाजिकता पनप नहीं पाती। इससे इतर गांवो में न केवल पर्व-त्यौहारों में बल्कि दैनंदिन कामकाज में भी सामुहिकता रहती है। किसी के घर में कोई आयोजन होता है तो वह केवल एक परिवार में सीमित नहीं रहता, बल्कि संपूर्ण गांव का पर्व बन जाता है। ग्राम देवता किसी एक व्यक्ति या परिवार का नहीं बल्कि समूचे ग्राम परिवार को होता था।
ग्राम समाज में सामुदायिकता फलती और फूलती है। लेकिन दुर्भाग्य है कि अंग्रेजों ने गुलामी के दिनों में ग्राम व्यवस्था को छिन्न-भिन्न कर दिया और दुख की बात है कि आजादी के 70 साल बाद भी भारत का गांव उजड़ ही रहा है। असल में यंत्रीकरण और शहरीकरण दो अभिशाप हैं जिसके कारण गांव की यह दुर्दशा हुई। अंग्रेजी के कवि गोल्डस्मिथ ने डिर्जटेड विलेज नामक पुस्तक में इंग्लैंड में औद्योगिक सभ्यता के विस्तार से ग्राम सभ्यता के विनाश का विवरण दिया है।
सबसे बड़ी दुर्दशा तब हुई जब कृषि का यंत्रीकरण हुआ जिससे अब न हलवाहे की जरूरत, न चरवाहे की जरूरत, न ओसाने वाले की जरूरत रही। आज ट्रैक्टर और हार्वेस्टर के कारण खेती में कम से कम आदमी की जरूरत रह गई है। इसलिए खेतीहर मजदूर छोटे-मोटे रोजगार पाने के लिए शहरों की तरफ चले जाते हैं। इसका फल होता है कि शहर भी आबादी की बोझ से दुखमय और अधिक से अधिक गंदे और सामाजिक रूप से अपराध प्रवण हो गए हैं। आजकल गांवों में केवल वही रह जाते हैं जो या तो बच्चे है, बेकार हैं, बीमार या किसी कारण से अक्षम व बेसहारा हैं।
छोटे किसान को तो लगभग समाप्त ही कर दिया गया है क्योंकि वे ट्रैक्टर और हार्वेस्टर खरीद नहीं सकते। इस राक्षसी प्रचलन ने अपने श्रम से खेती करने की प्रथा को ही समाप्त कर दिया है। खेती इसलिए भी उतरोत्तर खत्म हो रही है क्योंकि आमदनी कम और लागत ज्यादा है। किसान की फसल जब तैयार होती है तो बिचौलिए बाजार पर हावी हो जाते हैं और किसानों को अपनी फसल उनकी शर्तों पर औने पौने दामों में बेचने को मजबूर होना पड़ता है क्योंकि उसे अगली फसल की तैयारी के लिए नकदी चाहिए होता है। हालात यहां तक बिगड़ गई है कि महाराष्ट्र व दूसरे राज्यों में लाखों किसानों ने आत्महत्या कर ली। इसलिए जब ग्राम ही नहीं है तो ग्राम स्वराज कैसे होगा। ग्रामीण कौन बनेगा।
असल में भारत में जिस प्रकार ग्रामीण सभ्यता का विनाश हुआ है, उससे समूचा भारत अभिशाप ग्रस्त हो जाएगा। शहरों में मुट्ठी भर लोगों के पास अकूत संपत्ति जमा हो गई है और विषमता 10 लाख गुना अधिक हो गई है। जहां विषमता है, जहां विग्रह है, वहीं हिंसा होगी। आज गांधी जी रहते तो जिस तरह से उन्होंने चंपारण, खेड़ा और बारदोली आदि जगहों में सत्याग्रह का बिगुल फूंका था, उसी तरह भारत में गांवों की इस दुर्दशा के लिए, हमारी गलत अर्थनीति के खिलाफ सत्याग्रह करते। गांधी जी कृषि के साथ ग्रामोद्योग को इसलिए जोड़ते थे कि खेती में साल के छह माह ही रोजी-रोजगार मिलता है। इसलिए फुर्सत के समय चरखा, करघा व छोटे-छोटे उद्योग मिल जाते तो किसानों की गांव से भगदड़ नहीं मचती और उनके द्वारा आत्महत्या का प्रसंग भी नहीं आता।
गांधी जी और कस्तूरबा की 150 वां जन्मवर्ष मनाने के हम हकदार नहीं हैं क्योंकि हम गांधी के सपनों का भारत बनाने की दिशा के बिलकुल विपरीत चल रहे हैं। गांधीजी का गांव विनाश के गर्त में चला गया है। उसका पुनरूद्धार करना गांधी जी को याद करने का सच्चा स्वरूप होगा। यदि गांव नहीं है तो गांधी भी नहीं है। इसलिए गांधी जी जयंती को गांव की जयंती के रूप में मनाना ही गांधी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
(लेखक पूर्व सांसद और जैन विश्व भारती विश्वविद्यालय के कुलपति रहे हैं। प्रख्यात गांधीवादी व कई पुस्तकों के लेखक हैं।)

