रोविंग एडिटर
- बहुत मदद नहीं, बस थोड़ा सा मदद कर दे, सरकार। हम जीत जाएंगे।
राकेश राय। हाल ही में लौटे प्रवासी मजदूरों में से एक। कोरोना वायरस ने उसका रोजगार और तीन महीनों की जमा-पूंजी को निगल गया। राकेश, ‘हमको नहीं लगता कि जल्दी हालात सुधरेेगा। इसलिए घर-परिवार के साथ रहने में ही भलाई है। भायरस ने हमारा भाग्य खराब कर दिया। जो थोड़ा-बहुत खेत है, उसी को जोतेंगे, कुछ बोएंगे और क्या करेंगे।’ राकेश के साथ ही लौटे अनिल महतो, -’ हमलोग बाहर कमाने क्यों जाते हैं? दू गो पैसा बचाकर घर भेजने के लिए, ना। लेकिन पिछले दो महीने में सब हमीलोग पर खाने में खर्चा हो गया। एगो भाई बेंगलोर में है। उसका भी सब पैसा खर्चा हो गया। वहीं सुबोध सिंह ने भविष्य का खाका खींचते हुए बताया, हम टाइल्स लगाने का काम करते थे। वही काम अब यहां करेंगे। बढिया काम करेंगे, तो काम मिलेगा ही। साथ में सुबह-शाम खेती-किसानी भी कर लेंगे। शुरुआत में कुछ दिक्कत तो होगा ही। लेकिन समय के साथ सब कुछ सेट हो जाएगा।’ इसी तरह लल्लन भगत सरकार से कहते हैं, – हमलोग मेहनती हैं। नइका लइका सब पढा-लिखा भी है। सरकार को चाहिए कि जो जिस काबिल है, उसके अनुसार थोड़ा मदद कर दे। भले ही शुरुआत में कम आमदनी हो। लेकिन ऐसा कर दे कि फिर बाहर जाने की जरुरत न पड़े। बहुत मदद नहीं, बस थोड़ा सा। हम जीत जाएंगे। हम संवर जाएंगे। हम बोझ नहीं बनेंगे। उलटे हम सरकार का बोझा कम कर देंगे। सगरो बिहारी जाके चमका दिया, त हम अपने घर को भी चमका देंगे। हम मजबूरी में बाहर गए थे। खुशी से थोड़े ही।’
लौट रहे मजदूरों में से अधिकतर अलग-अलग तरह के कामों में माहीर हैं। जैसे, दर्जी, जड़ी के काम, बागवानी, तरह-तरह की चीजें बनाने में। संभ्रांत ग्रामीण युवा भी इनके साहरे अपनी रोजी-रोटी का जुगाड़ लगा सकते हैं। फूड प्रोसेसिंग, डेयरी और खासकर सब्जी उत्पादन में बड़ी संख्या में मजदूरों को रोजगार मिल सकता है। बशर्ते सरकार कुछ करे, तो। सस्ते मजूदर की उपलब्ध्ता आनेवाले समय में निवेशकों को जरुर आकर्षित करेगा। सरकार को इसकी तैयारी में अभी से लग जाना चाहिए। इसके लिए सुरक्षित व भय मुक्त वातावरण पहली शर्त होगी। राज्यों को अपने मानव संसाधन का प्रभावी और कुशलता से उपयोग करने का एक सुनहरा अवसर है। इस दिशा में उत्तराखंड सरकार कतार में सबसे पहले नजर आ रही है। खबरों की मानें तो राज्य सरकार अभी से ही कई कदम उठाने लगी है, जिससे प्रवासी मजदूर फिर से पलायन करने के लिए मजबूर ना हों।
लौटे मजदूरों में 70 फीसदी बगैर मन से मनरेगा के तहत काम करने को राजी हैं। वहीं इनमें 30 फीसदी की माली हालात बेहद खराब है। इन्हें न्यूनतम आय वर्ग में शामिल किया गया है। अधिकतर मजदूर सेवा क्षेत्रों, चालक या बिजली मिस्त्री का काम करते थे। कई के तो विदेशों में काम करने का अनुभव है। उत्तराखंड सरकार लाॅकडाउन के बाद का एक्शन प्लान भी बना चुकी है। किसे कैसे रोजगार उपलब्ध कराया जाएगा। आयोग द्वारा प्रस्तावित कई सुझावों में बागवानी, डेयरी, पशुपालन, बकरी पालन, इको-टूरिज्म, होमस्टे, सूक्ष्म उद्यमों आदि जैसे प्रमुख क्षेत्र शामिल हैं। हरेक राज्यों में अलग-अलग अवसर हैं। इन्हें पहचान कर मजदूरों की योग्यता के अनुसार सर्वे करवा कर एक्शन प्लान बनाने की जरुरत है। वाकई इमानदारी से पहल की जाए तो प्रवासी मजदूर बोझ नहीं तरक्की के देवदूत साबित होंगे।


