अमरनाथ
पटना:आपदा-ग्रस्त राज्य बिहार में वज्रपात की घटनाएं और उससे मरने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इसका दीर्घकालिक इंतजाम के बारे में सोचने के बजाए सरकार फौरी इंतजाम करने और मुआवजा बांटकर वाहवाही बटोरने में लगी है।
मंगलवार को वज्रपात अर्थात ठनका से विभिन्न जिलों में 11 लोगों की मौत हो गई। पिछले सप्ताह गुरुवार को एक दिन में वज्रपात से 83 लोगों की जान चली गई। सैकड़ों झुलस गए और अस्पतालों में भर्ती हैं। कुछ अखबारों ने मृतकों की संख्या एक सौ से अधिक बताई है। दो सप्ताह पहले सारण जिले में एक ही जगह ग्यारह लोग मारे गए थे। मृतकों में से अधिकतर खेतों में काम कर रहे थे। कुछ जगहों पर तो पूरा का पूरा परिवार ही साफ हो गया है। कई घर जल गए हैं, मवेशी झुलस गए हैं। इस मौसम में अब तक वज्रपात से 223 लोगों की मौत वज्रपात से हुई है।
वज्रपात की घटनाएं पूरे देश में होती हैं, सबसे ज्यादा ओडीसा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, तेलांगना व पश्चिम बंगाल आदि राज्यों में होती हैं। पर इससे मरने वालों की संख्या उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में सबसे अधिक होती है। इस आंकड़े का विश्लेषण करने की जरूरत है। पिछले साल अप्रैल से जुलाई के बीच चार महीने में वज्रपात से लगभग 1311 मौते हुई जिसमें सर्वाधिक उत्तर प्रदेश में 224, बिहार में 170, ओडीसा में 129 और झारखंड में 118 मौतें हुई। जबकि ओडीसा में सर्वाधिक 9 लाख वज्रपात की घटनाएं हुई। ओडीसा के बाद महाराष्ट्र(6लाख) कर्नाटक, (6लाख) पश्चिम बंगाल (5 लाख) और आंध्रप्रदेश में (4 लाख से अधिक) घटनाएं हुई। लेकिन महाराष्ट्र और कर्नाटक में वज्रपात से मौत सौ से भी कम हुई। बिहार में 2 लाख से कुछ अधिक और उत्तर प्रदेश में 3 लाख से कुछ अधिक घटनाएं हुई।
वज्रपात की घटनाएं अधिक होने और उससे मौत की घटनाएं इन राज्यों में कम होने के कारणों पर विचार करने की जरूरत है। इसका एक कारण तो यह लगता है कि पश्चिमी राज्यों में धान की खेती कम होती है, इसलिए बरसात में किसान पानी से भरे खेतों में कम होते हैं। दूसरा सबसे बड़ा कारण यह है कि ओडीसा, आंध्रप्रदेश, पश्चिम बंगाल में धान की खेती तो होती है, पर साथ ही इन राज्यों में ताड़ के ऊंचे पेड़ों की संख्या भी बहुत हैं। इसलिए वज्रपात का प्रभाव पेड़ झेल जाते हैं, जान-माल की क्षति कम होती है। बांग्लादेश ने इस प्रत्यक्ष अनुभव का लाभ उठा रहा है और वहां बड़े पैमाने पर ताड़ के पेड़ लगाए जा रहे हैं। भारत में खासकर बिहार में पूर्वानुमान की प्रणाली विकसित करने पर जोर है। पर पूर्वानुमान अपने-आप में कोई निदान नहीं होता, यह समझने वाला कोई नहीं है।
बिहार के आपदा प्रबंधन विभाग ने वज्रपात की पूर्व चेतावनी देने के लिए पिछले दिनों इंद्रवज्र नामक एप्प बनवाया और उसे सार्वजनिक उपयोग के लिए प्रस्तुत किया। पर यह एप्प ठनका से मरने वालों का बचाव करने में कतई उपयोगी नहीं है। इस एप्प को स्मार्ट फोन में गूगल प्ले से डाउनलोड करना है। जिनके पास स्मार्ट फोन नहीं है, उनके लिए तो यह पहले ही बेकार है। फिर विभाग का दावा है कि यह एप्प ठनका गिरने के 45 मिनट पहले 20 किलोमीटर की परिधि में ठनका गिरने की पूर्व सूचना दे सकता है। परन्तु यह उन किसानों के लिए कतई उपयोगी नहीं जो खेतों में काम करते हैं। खेतों में मोबाइल लेकर कोई नहीं जाता और गरज के साथ वर्षा होने पर मोबाइल का इस्तेमाल नहीं करने की चोतावनी दी जाती है क्योंकि ध्वनि तरंगों के साथ-साथ विद्युत तरंगे भी विसर्जित हो सकती है। ऐसी कई घटनाएं भी हुई हैं जब तेज बर्षा के दौरान मोबाइल चला रहे व्यक्ति की मौत वज्रपात हो गई है। अब अगर खेतों में काम करने वाला कोई मजदूर-किसान खेतों में काम करने के दौरान स्मार्ट फोन पर इस एप्प को चालू रखे और उसे वज्रपात की पूर्व सूचना मिल भी जाती है तो 45 मिनट के भीतर 20 किलोमीटर के दायरे से बाहर निकल जाना संभव नहीं है। इसतरह यह एप्प शहरी लोगों के उपयोगी भले हो, उन लोगों के लिए कहीं से कारगर नहीं हो सकता जो खेतों में काम करते हैं और वज्रपात में मारे जा रहे हैं।
वज्रपात दरअसल वायुमंडल में बने विद्युत तरंगों का अतिशीघ्र और बड़े पैमाने पर विसर्जन का परिणाम होता है। पृथ्वी से उठने वाले वाष्प तापमान कम होने पर बादल बहते हैं। तापमान अधिक कम होने पर वह जमकर हिम कणों में बदलने लगता है। हिमकण और जल की बूंदे जब अधिक भारी हो जाती हैं तब पृथ्वी की ओर गिरने लगती हैं, जो ओला के रूप में गिरते हैं। पृथ्वी से वाष्प का उपर की ओर आना लगातार जारी रहता है। उपर से जल कणों का नीचे की ओर जाना जारी रहता है। उनमें टकराव होता है। इस प्रक्रिया में बड़ी मात्रा में उष्मा पैदा होती है जो विद्युत-तरंगों में बदल जाती हैं। बादलों की उपरी सतह जिसका तापमान कम ( -35 से -45 डिग्री तक) होता है, से नीचली सतह की ओर इन विद्युत तरंगों का प्रवाह होता है। इस क्रम में तरंगें आपस में टकराती हैं जिससे जोरों की आवाज होती है और आसमान लाल दिखने लगता है। इन्हीं में से कुछ तरंगे पृथ्वी की ओर आ जाती हैं और तेजी से विसर्जित होती हैं क्योंकि पृथ्वी विद्युत का सुचालक है। इसके रास्तें में जो आता है, वह विद्युत तरंगों से आवेशित हो जाता है और जल जाता है। यही वज्रपात है। विद्युत शक्ति के लिहाज से इसमें लाखों वोल्ट और करोडों एंपियर का विसर्जन होता है, यही कारण हैं कि मनुष्य, मवेशी या पेड़ पौधे जो भी संपर्क में आते हैं, फौरन जल जाते हैं। तरंगे जब पृथ्वी से 80-100 मीटर उपर रहती हैं तभी निकटवर्ती ऊंची वस्तु की ओर आकर्षित होकर उसपर विसर्जित हो जाती हैं।

पिछले साल वज्रपात से बड़े पैमाने पर हुई मौतों के बारे में जलवायु विशेषज्ञ संजय कुमार श्रीवास्तव की राय है कि वज्रपात की सर्वाधिक घटनाओं के बादजूद ओडीसा में मृतकों की संख्या कम होने का कारण है कि वहां पूर्वानुमानों के आधार पर ग्रामीणों को सचेत करने की व्यवस्था तो है ही, ताड़ के पेड़ भी बड़े पैमाने पर लगाए गए हैं। बिहार में आपदा प्रबंधन विभाग तो है, पर जोखिमग्रस्त आबादी के पास समय पर सूचना पहुंचाने का तंत्र विकसित नहीं हो पाया है। उत्तर प्रदेश का भी यही हाल है। झारखंड के कुछ इलाके में पहले से विद्युत आवेशित चट्टानें ( छोटानागपुर) हैं, उस जिले में देश में सबसे अधिक वज्रपात होते हैं। वहां की आबादी को दूसरे इलाके में पुनर्वासित करने की जरूरत है।
