महिला पंचायत के कामकाज में अगर पति परमेश्वर ने दिया दखल तो होगी कड़ी कार्रवाई

मंगरूआ
जयपुर: अन्य राज्यों की तरह राजस्थान में पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण दिया गया है जिसके तहत महिलाएं भी सरपंच या ग्राम प्रधान बनकर पंचायत से जुड़े फैसले ले सकती हैं। इसकी वजह से बड़ी संख्या में महिलाएं चुनी गईं और उन्हें पंच, सरपंच बनने का मौका मिला। लेकिन यहां भी ज्यादातर पंचायतों में ये बस नाम की सरपंच होती है और सारे पंचायत से जुड़े फैसले या तो पति परमेश्वर लेते हैं या फिर कोई रिश्तेदार। ये महिला सरपंच या तो सिर्फ साइन या अंगूठा लगाने तक रहती है और इनके सारे बड़े सरपंच के फैसले इनके पति या फिर कोई बड़े अधिकारी लेते है।


ऐसे सरपंचों की छिनी जा सकती है सरपंची
उपरोक्त परिस्थितियों के मद्देनजर राजस्थान ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव राजेश्वर सिंह ने एक आदेश जारी किया है जिसके मुताबिक अब अगर महिला सरपंच के काम में पति या कोई अन्य व्यक्ति हस्तक्षेप करता हुआ पकड़ा गया तो उस पर कड़ी कारवाई की जाएगी। साथ ही अगर महिला सरंपच की सरपरस्ती में यदि पति परमेश्वर या किसी अन्य रिश्तेदार का दखल दिया तो जनप्रतिनिधि पर भी कड़ी कार्रवाई की जाएगी। ये कड़े निर्देश अतिरिक्त मुख्य सचिव राजेश्वर सिंह की ओर से जिला कलक्टर, जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों और पंचायत समितियों के विकास अधिकारियों के द्वारा जारी किए गए है। साफ तौर पर दिए गए इस निर्देश के मजमून को समझे तो स्पष्ट है अगर कोई पति या अन्य रिश्तेदार महिला सरपंच के काम में दखल देता हुआ पाया गया तो उस पर राजस्थान पंचायती राज अधिनियम 1994 की धारा-38 के तहत कड़ी कारवाई की जा सकती है।

साथ ही अगर महिला सरपंच या कोई और ऐसे काम में सहयोग करता हुआ पाया गया तो अनुशासानात्मक नियमों के तहत सजा दी जाएगी। आदेश के अनुसार, पंचायती राज संस्थाओं में ऐसा नहीं होना चाहिए और अगर ऐसा होता है तो संबंधित निर्वाचित जनप्रतिनिधि एवं सहयोग करने वाले अधिकारी कर्मचारी के विरुद्ध कार्रवाई का जाएगी।
राजस्थान के पंचायती राज विभाग ने इस दिशा में पहल किया है लेकिन केवल राजस्थान ही क्यों किसी भी राज्य के गांव में आप कहीं भी चले जाइये, अगर महिला प्रधान हैं तो वहां 75 फीसदी काम उसका पति, बेटा या ससुर ही करता है। अभी हाल में ‘पंचायत’ के नाम से अमेजन प्राईम पर एक वेब सीरिज प्रसारित की गई है। जहां महिला प्रधान है लेकिन फैसले पति द्वारा लिए जाते हैं। इस सीरीज़ में हंसी ठहाकों की फुलझरियों के बीच पंचायती राज व्यवस्था में महिला प्रधानों व सरपंचों की स्थिति और परमेश्वर के रूप में पति की भूमिका को साफ तौर पर दिखाती है। किस्सा यूं है कि उत्तर प्रदेश के बलिया जिले का फुलेरा ग्राम जहां ग्राम प्रधान भले ही मंजू देवी है। घर के डेहरी के पीछे भले ही वे प्रधान जी से ताकतवर प्रतीत होती हैं लेकिन पंचायत के सीवाने में प्रधान के नाते सारे फैसले उनके पति बृजभूषण दूबे ही लेते हैं यानी प्रधान महिला कमान परमेश्वर पति के हाथों में।

क्या है स्थिति
ज्यादातर राज्यों में पंचायती राज्य व्यवस्था में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने के बजाय 50 फीसदी आरक्षण देकर राज्य सरकारों ने आधी आबादी को पूरी महत्ता दी। इसके पीछे सोच थी कि य​दि महिलाएं लोकतंत्र के सबसे नीचले स्तंभ यानी ग्राम पंचायतों में मुखिया, सरपंच बनेगी तो महिलाओं भागीदारी सुनिनिश्चत होने के साथ ही निर्णय लेने की प्रक्रिया में भी उनका असर होगा। वे गांव की मुखिया बनकर गांव की सरकार चलाएगी। लेकिन इस निर्णय के बावजूद जमीन पर इसका व्यापक असर हुआ हो ऐसा नहीं दिखाई देता। कुछ जगह अपवाद जरूर हैं जहां महिलाएं पंचायत की कमान पूरी तरह से अपने हांथ में रखे हुए है।  कोरोना महामारी के दौरान भी ऐसे कई उदाहरण सामने आयें हैं जहां महिलाओं द्वारा चलाई जा रही पंचायतें पुरूषों की तुलना में बेहतर तरीके से काम कर रही हैं। बावजूद इसके  ज्यादातर जगहों पर महिला पंचायत प्रधान घर का चूल्हा चौकी संभाल रही है और पति परमेश्वर की भूमिका में हैं। यदा कदा यदि वह कागजी खानापूर्ती के लिए पंचायत की बैठकों में उपस्थित भी होती है तब भी पति परमेश्वर उनके इर्द गिर्द होते हैं और उसकी जवाबदेही सिर्फ कागजो पर हस्ताक्षर या अंगूठा लगाने तक सीमित होती है।

क्या कहती हैं महिला प्रधान

उत्तर प्रदेश के बलिया के रतसरकलां गांव की युवा महिला ग्राम प्रधान स्मृति सिंह राजस्थान सरकार के फैसले की सराहना करते हुए कहती हैं कि किसी भी महिला प्रधान द्वारा संचालित पंचायत में पंचायत चलाने का अधिकार महिला प्रधान के हाथ में ही होनी चाहिए। प्रधान पति या प्रधान प्रतिनिधि जैसी कोई भी व्यवस्था पंचायत में महिलाओं के अधिक से अधिक भागीदारी दिए जाने और शाषण-प्रशाषण में आधी आबादी को उसका पूरा हक दिए जाने के मूल भावना के खिलाफ है। हालांकि कई जगहों पर ऐसा होता है। लेकिन धीरे—धीरे महिलाएं सशक्त हो रही है। कई प्रधान बिना किसी पुरूष सदस्य के अतिरिक्त हस्तक्षेप के स्वतंत्र रूप से पंचायत चला रही हैं। ऐसी कोशिशों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। कई जगहों पर महिला प्रधान के सुरक्षा से भी जुड़ा मसला है। कई जगह महिला प्रधान के प्रशिक्षण के अभाव में भी पुरूषों का दखल है तो कई जगह पितृसतात्मक मानसिकता की वजह से भी महिलाओं को उनका हक नहीं दिया जाता। ऐसे सभी बिंदूओं पर सरकार को ध्यान देना चाहिए। एक प्रधान होने के नाते मुझे लगता है कि बाकी जगहों पर भी राजस्थान की तरह व्यवस्था को लागू करने का आदेश दिया जाना चाहिए। केवल सैद्धांतिक स्तर पर नहीं बल्कि कार्यव्यवहार में भी। जो लोग ऐसा नहीं करते हैं उन्हें निश्चित रूप से दंड मिले ताकि अन्य लोग सबक ले सकें।

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