आंध्र प्रदेश के अनंतपुर का आदर्श गांव “प्रोटो विलेज”

मनोरमा सिंह

टेकुलोडू आत्मनिर्भरता की कहानी बताने को तैयार ….बशर्ते आनेवाले उन्हें कुछ सिखाकर जाएं …
बेंगलुरु: गांधी जी ने कहा था, जहां कपास उगाने से लेकर सूत कातने तक के सभी कार्य एक ही गांव या क़स्बे में किये जाते हों, वही सच्चा स्वदेशी है।” बेंगलुरु से 120 किलोमीटर दूर आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले के चिल्लामत्तूरु की ओर जाती सड़क से लगा एक छोटे से गांव टेकुलोडु का “प्रोटो विलेज “ गांधी के उसी सपने को सूचना क्रांति के इस दौर में धीरे -धीरे लेकिन मजबूती से एक-एक कदम बढ़ते हुए साकार कर रहा है और ये बात कोई भी वहां गीता, गोवर्धन , प्रवालिका , उग्रा, वम्शी के अनुभवों को जान और सुन लेने के बाद यकीन से कह सकता है।
जैसा कि “प्रोटो विलेज” नाम से तो गांव है लेकिन बहुत ख़ास है, इसे देश का पहला आत्मनिर्भर गांव कह सकते हैं जिसने भोजन, पानी, बिजली और अन्य तमाम जरूरतों के लिए एक सक्षम और आत्मनिर्भर मॉडल विकसित किया है और वो भी पर्यावरण का संरक्षण करते हुए। अपने नाम के मुताबिक प्रोटो “प्रोटोटाइप” है। भारत के भविष्य के गांवों का, आनेवाले दिनों में देश के गांव ऐसे ही मॉडल पर विकसित होकर गांधी के स्वदेशी और भारत सरकार के आत्मनिर्भर सपनों को साकार कर सकते हैं। यहाँ अपना पानी रेन हार्वेस्टिंग से आता है, विंड मिल से बिजली बनती है, खेती भी की जा रही है और गाय,बकरी मुर्गी, मछली पालन भी, कम्पोस्ट भी बनता है और पेपर और वुड कंक्रीट पैनल के पांच-छह लाख में पर्यावरण अनुकूल घर भी।
हालांकि 2014 से अस्तित्व में आने के बाद से इस गांव के बारे में राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में काफी कुछ लिखा गया है, “प्रोटो विलेज” और इसके संस्थापक को कई सम्मान भी मिले हैं। लेकिन हम “प्रोटो विलेज” के बारे में पिछली जानकारी के साथ आगे की बात करेंगे और जानेंगे 2021 से 2024 -30 तक प्रोटो विलेज की यात्रा किस ओर होगी।

कथा गांव के तरक्की की
बेंगलुरु से 120 किलोमीटर दूर आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले के एक छोटे से गांव हिंदूपुर से आनेवाले कल्याण अक्कीपेड्डी की शुरुआत आम लड़कों की तरह हुई थी, माता-पिता के अच्छे बेटे की तरह उन्होंने समय से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री ली बाद में एमबीए की भी और बंगलुरु में उन्हें “जीई” जैसी बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में बड़े पैकेज पर नौकरी मिल गयी उन्हें भी लगा लाइफ सेट हो गयी, बंगलुरु जैसा शहर, बड़ा सैलरी पैकेज तमाम देशों की यात्राएं, उनके जॉब प्रोफाइल में मध्य पूर्व व खाड़ी देशों की यात्राओं के साथ अमेरिका के विभिन्न शहरों की यात्राएं भी शामिल थी। सब ठीक चल रहा था लेकिन कहीं कुछ था जो उन्हें असंतोष से भर रहा था, नौ से पांच का दफ्तर और दिन भर फोन लैपटॉप, इस जीवन शैली में ना मिट्टी की गंध थी और ना बारिश का स्पर्श, आखिर अपने द्वंद पर विराम लगाते हुए कल्याण अक्कीपेड्डी ने जीई की नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया और भारत के गांवों की यात्रा पर निकल पड़े। 2008 से 2010 तक लगभग ढाई साल उन्होंने कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत के हर राज्य के गांवों की यात्रा की, अपने देश के लोगों को उनके गांव में जाकर समझा और ये जाना कि भारत के बारे में जो बड़ी-बड़ी बातें दुनिया में की जाती हैं वो सच में गांव में ही जिन्दा है। कल्याण इस यात्रा के अपने सबसे सुन्दर अनुभवों में ये बताते हैं कि यहां के गांव अपरिचय होने पर भी आपको भूखा नहीं रहने देते। लेकिन उन्हें कच्छ से लेकर सुंदरबन तक का आदिवासी इलाका खासतौर पर पसंद आया और इसी बेल्ट के आदिवासियों की जीवन शैली ने इस यात्रा के बाद फ़िलहाल 43 वर्षीय कल्याण अक्कीपेड्डी को 2014 “प्रोटो विलेज”  की शुरुआत करने की प्रेरणा दी।

कल्याण का गांव हिंदूपुर “प्रोटो विलेज” से कुछ किलोमीटर ही दूर है तो उन्हें ये तथ्य मालूम था कि आंध्र का अनंतपुर भारत के सबसे शुष्क इलाको में से एक माना जाता है, जैसलमेर के बाद यह भारत का दूसरा ऐसा जिला है जहां सबसे कम बारिश होती है। ऐसे में शुरुआत से ही काम चुनौती पूर्ण और सबसे पहले पानी के इंतज़ाम और उसकी लगातार उपलब्ध्ता को लेकर थी साथ में पास के गांव के लोगों का अविश्वास भी लेकिन इतने सालों में प्रोटो विलेज के मॉडल ने इस इलाके को रेगिस्तान के हरे भरे मरूउद्यान सा बना दिया है। शुरुआत पास के एक झील को पुनर्जीवन देने, रेनवाटर हार्वेस्टिंग से हुई और आज यहां अस्सी से दो सौ फ़ीट पर पानी उपलब्ध है, किसी भी दिन पचास से ज्यादा प्रजाति की चिड़िया को आसपास देखा जा सकता है, भौंरे और मधुमक्खी की कई प्रजाति पेड़ों पर नज़र आती हैं। हालांकि कई सालों के बाद पिछले साल अनंतपुर में मानसून मेहरबान रहा। ये कल्याण की पत्नी शोभिता ने बताया जो प्रोटो विलेज की शुरुआत से बतौर वालेंटियर कल्याण के साथ रही हैं और मुख्य संरक्षिका हैं।

शोभिता ने ही गीता से मिलवाते हुए कहा ये यहां सामुदायिक रसोई के लिए खाना बनाती हैं। लॉक डाउन के बाद से “प्रोटो विलेज” में लोगों का आना प्रभावित हुआ लेकिन अभी भी 30-35 लोगों का भोजन यहां रोजाना बनता है और सारे लोग एक ही रसोई का खाना खाते हैं चाहे कोई भी जाति -धर्म हो। गीता को यहां काम करना अच्छा लगता है रसोई के साथ वो “प्रोटो विलेज”  के “ग्रामम” योजना का हिस्सा है जो उत्पादन और बिक्री का पूरी तरह से आत्मनिर्भर मॉडल है जिसमें किसी भी वस्तु के उत्पादन, निर्माण और बिक्री के सभी स्तरों पर बाहर से कुछ भी शामिल नहीं होगा, कल्याण इसके बारे में और बताते हुए कहते हैं ये तीन चरण की योजना है और यही हमारा 2024 तक का सपना है जब हम आसपास की आठ हज़ार महिलाओं को इससे जोड़ पाएंगे और उनकी न्यूनतम मासिक आमदनी बारह हज़ार से कम नहीं होगी। फिलहाल ग्रामम स्वदेशी ब्रांड मॉडल योजना “प्रोटो विलेज” में सफलता से चल रही है और गीता जैसी महिलाएं इसके तहत साबुन, खाखरा इत्यादि का निर्माण कर रही है। इसकी खासियत साबुन के लिए फूल उगाने से लेकर बेचने तक पर ग्रामीण महिलाओं का नियंत्रण है। शोभिता कहती हैं ये सब आसान नहीं था। आसपास की औरतें तो बिल्कुल बाहर नहीं निकलती थीं लेकिन अब बहुत कुछ बदला है और उनकी भागीदारी जबरदस्त है।

“प्रोटो विलेज” में हमें जगह—जगह मैक्सिकन सन फ्लावर भी देखने को मिला। ये मल्चिंग में मदद करता है और मिट्टी की नमी बरकरार रखने में मदद करता है। इतना ही नहीं इसके पत्तों से अच्छा कम्पोस्ट भी बनाया जाता है। इसलिए अनंतपुर के गावों में इसको लगाने का प्रचलन बढ़ा है।

“प्रोटो विलेज” की एक और खासियत वहां का स्कूल और वहां पढ़ने वाले बच्चे हैं। वहां जाने पर हमारी मुलाकात वासुदेवन, लावण्या जगदीश,चरतऋषि और कृति साई जैसे बच्चों से हुई जो स्कूल में ही लैपटॉप पर तेलगु की कोई फिल्म देख रहे थे, आसपास के गांव के बच्चे जो पहले पढ़ने में रूचि नहीं लेते थे अब आराम से अंग्रेजी में संवाद कर लेते हैं बगैर किसी दवाब से शिक्षा ग्रहण करते हुए, उन्हें चिड़ियां, पेड़ों के नाम सब आसानी से मालूम थे क्योंकि वो उनके परिवेश का हिस्सा थे। इसी दौरान हमारी मुलाकात वम्शी से भी हुई जो पहले यहां वालेंटियर के तौर पर आये थे अब यहीं के होकर रह गए।

“प्रोटो विलेज” का स्केट चैम्पियन उग्रा की कहानी भी उसी तरह दिलचस्प है जिसे गांव में आवारा बच्चा समझा जाता था और गोवर्धन बीकॉम दूसरे साल में था जब प्रोटो विलेज आया और यहाँ आने के बाद उसे औपचारिक डिग्री की जरूरत ही नहीं महसूस हो रही इसलिए उसने आगे परीक्षा नहीं दी। क्या तुम्हे नौकरी नहीं करनी ? इस सवाल पर गोवर्धन कहता है मैं अब किसी दौड़ का हिस्सा नहीं हूं। मुझे पर्यावरण संरक्षण व उसके सतत विकास के लिए काम करना है। नौकरी के लिए यही मेरा भविष्य है। डिग्री से ज्यादा महत्त्व यहां हर पल, हर काम में सीखने का है। प्रोटो विलेज आकर गोवर्धन नेचर फोटोग्राफी करने लगे हैं। वहीं दूसरी तरफ कल्याण कहते हैं कि मेरा यही लक्ष्य था पैसा आप बहुत कमा सकते हैं लेकिन आत्म संतुष्टि नहीं। प्रोटो विलेज यही देता है कि आप अपने आसपास को बदल सकते हैं धरती पर बोझ बने बगैर !

(दैनिक भास्कर से साभार)

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