भले रुपये में 15 पैसा पहुंचा हो गांव, पंचायतों में आए संस्थागत बदलाव के अगुआ थे राजीव

मंगरूआ
नई दिल्ली: देश के मौजूदा प्रधानमंत्री देश के एक पूर्व प्रधानमंत्री के उस बयान की गाहे बेगाहे चर्चा करते रहते हैं जिसमें उन्होंने कहा था कि वे दिल्ली से एक रुपया भेजते हैं, तो गांव में 15 पैसे पहुंचता है। वे कभी ये बातें चुनावी सभा में कहते हैं तो कभी विपक्षी दल के पूर्व प्रधानमंत्री पर निशाना साधने और भ्रष्टाचार के आरोप को पुख्ता करने के लिए। पिछले दिनों भी मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पंचायती राज दिवस के अवसर पर देश के पंचायत प्रधानों को संबोधित करते हुए पूछा था पहले कहा जाता था कि दिल्ली से अगर 100 रुपया भेजा जाता है तो गांव तक सिर्फ 1 ही पैसा पहुंचता है, लेकिन अब लोगों के खातों में सीधा पैसा पहुंच रहा है तो इस पर क्या कहना है। जी हां, मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिस प्रधानमंत्री के साफगोई सहित दिये गये जिस बयान पर तंज करते हैं वो पूर्व प्रधानमंत्री राजी​व गांधी हैं। यह बयान लगभग 3 दशक पहले खरगोन नवग्रह मैदान में भाषण के दौरान दिया था। आज उसी प्रधानमंत्री की 29 वी पुण्यतिथि है। लेकिन मौजूदा प्रधानमंत्री जिस प्रधानमंत्री के बयान पर तंज करते हुए पंचायत प्रतिनिधियों को संबोधित कर रहे होते हैं, उसी राजीव गांधी का इस देश के वर्तमान पंचायती राज व्यवस्था को नया आयाम देने में महत्वपूर्ण योगदान रहा है और जिस 24 अप्रैल को देश में पंचायती राज दिवस के रूप में मनाया जाता है वो दिन भी राजीव गांधी के पंचायती राज व्यवस्था में बदलाव का सूचक है।
वर्तमान पंचायती व्यवस्था के सूत्रधार थे राजीव

पंचायत भारतीय समाज की बुनियादी व्यवस्थाओं में से एक रहा है। गांधी और नेहरू के सपने को पूरा करने के उद्देश्य से ही 1992 में संविधान में 73वां संशोधन किया गया और पंचायती राज संस्थान का कॉन्सेप्ट पेश किया गया। बता दें, स्वतंत्रता के बाद से, समय-समय पर भारत में पंचायतों के कई प्रावधान किए गए और 1992 के 73वें संविधान संशोधन अधिनियम के साथ इसको अंतिम रूप दे दिया गया था। महात्मा गांधी ने भी पंचायतों और ग्राम गणराज्यों की वकालत की थी। उन्होंने कहा था कि गांव की पंचायत के पास अधिकार होने चाहिए। 2 अक्टूबर 1959 को पंचायती राज की मजबूत नींव देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू जी ने रखी थी, उस पर अधिकारों की एक शानदार इमारत खड़ी करने का काम राजीव गांधी ने किया था। पंचायती राज से जुड़ी संस्थाएं मजबूती से विकास कार्य कर सकें, इस सोच के साथ राजीव गांधी ने देश में पंचायती राज व्यवस्था को सशक्त किया। उनका मानना था कि कि जब तक पंचायती राज व्यवस्था सफल नहीं होगी, तब तक निचले स्तर तक लोकतंत्र नहीं पहुंच सकता। इसी क्रम में उन्होंने अपने कार्यकाल में पंचायती राज व्यवस्था का पूरा प्रस्ताव तैयार कराया। राजीव गांधी ने हिन्‍दुस्‍तान के गांवों को विकास में हिस्सेदार बनाने के लिए 73वें संविधान संशोधन के जरिए पंचायती राज व्यवस्था लागू की। यह राजीव के सपनों के भारत की बुनियाद थी। उन्होंने पंचायती राज के जरिए एक साथ दो काम कर दिया। गांवों को अपने विकास का अधिकार और महिलाओं को एक तिहाई हिस्सेदारी।


राजीव गांधी की सरकार की ओर से तैयार 64वें संविधान संशोधन विधेयक के आधार पर तत्कालीन नरसिम्हा राव सरकार ने 73वां संविधान संशोधन विधेयक पारित कराया। 24 अप्रैल 1993 से पूरे देश में पंचायती राज व्यवस्था लागू हुआ। जिससे सभी राज्यों को पंचायतों के चुनाव कराने को मजबूर होना पड़ा। पंचायती राज में गांव के स्तर पर ग्राम सभा, ब्लॉक स्तर पर जनपद पंचायत और जिला स्तर पर जिला पंचायत होता है। इन संस्थानों के लिए सदस्यों का चुनाव होता है जो जमीनी स्तर पर शासन की बागडोर संभालते है।
शुरुआती दिनों में एक सरपंच गांव का सर्वाधिक सम्मानित व्यक्ति होता था। हर कोई उसकी बात सुनता था। यानी गांव के स्तर पर सरपंच में ही सारी शक्तियां होती थीं। लेकिन अब ग्राम, ब्लॉक और जिला स्तरों पर चुनाव होता है और प्रतिनिधियों को चुना जाता है। अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति एवं महिलाओं के लिए पंचायत में आरक्षण होता है। पंचायती राज संस्थानों को कई तरह की शक्तियां दी गई हैं ताकि वे सक्षम तरीके से काम कर सकें।
कंप्यूटर और दूरसंचार क्रांति के अगुआ


इतना ही नहीं दिवंगत प्रधानमंत्री राजीव गांधी को गांव-गांव को टेलीफोन से जोड़ने और देश में कंप्यूटर क्रांति का जनक भी माना जाता है। राजीव गांधी का सपना था कि गांव-गांव में टेलीफोन पहुंचे और कंप्‍यूटर शिक्षा का प्रचार हो। उन्होंने ना सिर्फ कंप्यूटर को भारत के घरों तक पहुंचाने का काम किया बल्कि भारत में इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी को आगे ले जाने में अहम रोल निभाया। उन्होंने कुछ ऐसा किया कि कंप्यूटर आम लोगों तक पहुंच गया। उस दौर में कंप्यूटर लाना इतना आसान नहीं था। तब कंप्यूटर महंगे होते थे, इसलिए सरकार ने कंप्यूटर को अपने कंट्रोल से हटाकर पूरी तरह ऐसेंबल किए हुए कंप्यूटर्स का आयात शुरू किया जिसमें मदरबोर्ड और प्रोसेसर थे। इतना ही नहीं उन्होंने कंप्यूटर तक आम जन की पहुंच को आसान बनाने के लिए कंप्यूटर उपकरणों पर आयात शुल्क घटाने की भी पहल की। कम्प्यूटर क्रांति की तरह ही दूरसंचार क्रांति का श्रेय भी उन्हीं को जाता है। राजीव के पहल पर ही अगस्त 1984 में भारतीय दूरसंचार नेटवर्क की स्थापना के लिए सेंटर फॉर डिवेलपमेंट ऑफ टेलीमैटिक्स की स्थापना हुई। इस पहल से शहर से लेकर गांवों तक दूरसंचार का जाल बिछना शुरू हुआ। जगह-जगह पीसीओ खुलने लगे। जिससे गांव की जनता भी संचार के मामले में देश-दुनिया से जुड़ सकी। इसके बाद 1986 में राजीव की पहल से ही एमटीएनएल की स्थापना हुई, जिससे दूरसंचार क्षेत्र में और प्रगति हुई।

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